h n

असली स्वतंत्रता हासिल करने के लिए हम बहुजनों को प्रेरित करता है तिरंगा

फुले और आंबेडकर द्वारा एक साथ मिलकर राष्ट्रीय ध्वज फहराने का यह चित्र, हमारे देश में 75 साल तक लोकतंत्र के बचे रहने और उस संविधान और ध्वज का प्रतिनिधित्व करता है, जिन्हें उन्होंने हमें दिया था। इस अवसर पर हम यह शपथ लेते हैं कि हम दुनिया की किसी भी ताकत को इस संविधान, हमारे तिरंगे और उन लोकतांत्रिक संस्थाओं, जिन्हें हमने अपने खून-पसीने से खड़ा किया है, को नष्ट नहीं करने देंगे। पढ़ें, कांचा इलैया शेपर्ड का यह आलेख

इस चित्र में जोतीराव फुले, जिनका निधन भारत की स्वाधीनता के 57 वर्ष पहले, सन् 1890 में हो गया था, और डॉ. बी.आर. आंबेडकर, जो उस समिति की सदस्य थे जिसने जुलाई 1947 में भारत के राष्ट्रीय ध्वज की परिकल्पना का अनुमोदन किया था, दोनों एक साथ तिरंगा फहरा रहे हैं। इस चित्र में देश के सबसे मेधावी और रचनात्मक शूद्र/दलित व्यक्ति, औपनिवेशिक काल के उस पहनावे में दिख रहे हैं, जो आत्मसम्मान का प्रतीक था।

वे उस ‘ट्राई कलर’ (मैं जानबूझकर हिंदी शब्द तिरंगा का प्रयोग नहीं कर रहा हूं) को फहरा रहे हैं, जिसके बीच में बौद्ध अशोक चक्र है। गांधी के कई अनुयायी, जो समिति के सदस्य थे, का कहना था कि ध्वज के केंद्र में चरखा होना चाहिए। परंतु आंबेडकर ने अशोक चक्र पर जोर दिया। ऐसा लगता है कि पंडित जवाहरलाल नेहरु इस मुद्दे पर आंबेडकर से सहमत थे। चक्र समय की गति का प्रतीक है, प्रगति का प्रतीक है। वह लोगों और खाद्यान्न को एक से दूसरे स्थान पर ले जाने का साधन था और है। वह हर किस्म की गतिहीनता का, ठहराव का, निषेध करता है।

सम्राट अशोक का चक्र मूलतः बैलगाड़ी का पहिया था, युद्धक रथों का पहिया नहीं। आधुनिकतम हवाईजहाज़ भी पहियों के बिना किसी भी काम के नहीं हैं। मानव इतिहास के किसी भी चरण में, पहिए के बिना गति संभव नहीं थी। पहिया मानव सभ्यता की निरंतरता बनाए रखे के लिए अनिवार्य है। पहिया तभी अप्रासंगिक होगा जब मानव सभ्यता का अंत हो जाएगा। पहिए की मानव सभ्यता के महान प्रतीक के रूप में पहचान करने और उसे हमारे राष्ट्रीय ध्वज का हिस्सा बनाने का श्रेय केवल डॉ. आंबेडकर को जाता है।    

अब हम आज की बात करें। कांग्रेस ने राष्ट्रीय ध्वज हाथ में लिए नेहरु की तस्वीरें प्रसारित कीं। जवाब में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने ऐसा दर्शाया मानो नरेंद्र मोदी इस झंडे के मालिक हैं। इसके विपरीत, फुले-आंबेडकर सेंटर फॉर फिलोसोफी एंड इंग्लिश ट्रेनिंग, हैदराबाद का झंडा, राष्ट्र और ध्वज को सत्ताधारियों (नेहरु और मोदी दोनों सत्ता का प्रतिनिधित्व करते हैं) से न जोड़कर, उन्हें आंबेडकर और फुले जैसे दार्शनिक-नेताओं से जोड़ता हैं, जिन्होंने सच्ची, असली आज़ादी के लिए संघर्ष किया अर्थात शूद्र/अति-शूद्र और आदिवासी उत्पादक शक्तियों की आज़ादी के लिए। यह झंडा सभी भारतीयों की स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे को प्रतिबिंबित करता है।

फुले पहले रचनात्मक भारतीय चिंतक थे और मनुष्यों की स्वतंत्रता पर केंद्रित भारत की पहली पुस्तक गुलामगिरी के लेखक भी। आंबेडकर एक दार्शनिक और विधि विशेषज्ञ थे, जिन्होंने यह सुनिश्चित किया कि ये आदर्श भारतीय संविधान और ध्वज का हिस्सा बनें। उन्होंने स्वंत्रतता आंदोलन पर अनेक पुस्तकों का लेखन किया, जिनमें ‘जाति का विनाश’ और भारत का संविधान शामिल हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के दूसरे सरसंघसंचालक एम.एस. गोलवलकर ने स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के बंधनों से आज़ाद करवाने सिद्धातों और तिरंगे झंडे का विरोध किया। उन्होंने इसे विदेशी बताया। उन्होंने कहा, “हमारे नेताओं ने हमारे देश के लिए एक नया झंडा तैयार किया है। उन्होंने ऐसा क्यों किया? यह सिर्फ बहकने और नकल करने का मामला है। यह झंडा कैसे अस्तित्व में आया? फ्रांसीसी क्रांति के दौरान, फ्रांस ने स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा के ट्रिपल विचारों को व्यक्त करने के लिए अपने झंडे पर तीन पट्टियां लगाईं। अमेरिकी क्रांति ने भी उन्हीं सिद्धांतों से प्रेरित होकर कुछ बदलावों के साथ इसे अपनाया। हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के लिए भी तीन धारियां एक तरह का आकर्षण ही था। इसलिए कांग्रेस ने इसे अपनाया।”

अगर वे 1947 में सत्ता में होते तो वे तुरंत-फुरंत मनु के धर्मशास्त्र को संविधान और स्वस्तिक के साथ भगवा ध्वज को भारत का राष्ट्रीय ध्वज घोषित कर देते। इसके बाद भारत में गृहयुद्ध होता, मुसलमानों और हिंदुओं के बीच नहीं, बल्कि शूद्र-दलित-आदिवासी और द्विजों के बीच। जोतीराव फुले, शाहूजी महाराज, आंबेडकर, पेरियार रामासामी नायकर और अन्यों ने आरएसएस जैसी शक्तियों के खिलाफ विद्रोह की ज़मीन तैयार कर दी थी। अब आरएसएस ने संविधान और तिरंगे को स्वीकार कर लिया है। परंतु मैं यह विश्वास से नहीं कह सकता कि सन् 2047 में, जब स्वतंत्र भारत 100 साल का हो जाएगा, भारतीय लोकतंत्र की क्या स्थिति क्या होगी। 

गोलवलकर स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्यों के खिलाफ इसलिए थे क्योंकि ऋग्वेद के काल से लेकर आज तक संपूर्ण ब्राह्मणवादी साहित्य और उसके प्रणेताओं का आचरण मनुष्यों की समानता के विरोधी रहे हैं। शूद्र-दलित-आदिवासी शक्तियों को कभी अपने बुद्धिजीवियों को विकसित नहीं करने दिया ताकि वे अपने लेखन के जरिए एक वैकल्पिक व्यवस्था का निर्माण कर सकें।   

मुझे इस बात की ख़ुशी है कि जिस झंडे का विरोध गोलवलकर ने इस आधार पर किया था कि उसके पीछे का विचार और आत्मा विदेशी है, आज घर-घर फ़हराया जा रहा है। इससे निश्चित रूप से युवाओं, चाहे वे गांवों या छोटे शहरों में ही क्यों न रहते हों, में झंडे के इतिहास और उसके विकासक्रम के बारे में उत्सुकता जागेगी। 

सन् 1947 में हिंदुत्ववादियों ने लाल, सफ़ेद और हरी पट्टियों और बीच में अशोक चक्र वाले झंडे का विरोध खालिस सांप्रदायिक आधार पर किया था। लाल को कम्युनिस्टों का रंग माना गया, जबकि कम्युनिस्ट भी इस झंडे के विरोधी थे, क्योंकि उनका मानना था कि वह विदेशियों की एजेंट बुर्जुआ शक्तियों का प्रतिनिधित्व करता है। हालांकि इसके तुरंत बाद लाल का स्थान भगवा ने ले लिया। मेरे विचार में लाल, क्रांति और परिवर्तन का रंग है। सफ़ेद रंग शांति और सद्भाव का प्रतिनिधित्व करता है। आरएसएस को ऐसी कोई ‘शांति’ मंज़ूर नहीं थी, जो वर्णाश्रम धर्म पर आधारित न हो। संघ ने कभी यह स्वीकार नहीं किया कि अशोक हमारे देश का सबसे सम्मानीय शासक थे, क्योंकि उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाया। वे यह मानते हैं कि अशोक चक्र, बौद्ध धर्म का प्रतिनिधित्व करता है, ब्राह्मणवाद का नहीं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अशोक के काल में हिंदू धर्म जैसी कोई चीज़ नहीं थी। उस समय जिस सामाजिक व्यवस्था को अशोक ने ध्वस्त किया था, वह ब्राह्मणवादी व्यवस्था थी, हिंदू नहीं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि एक लंबे समय तक आरएसएस अशोक को नहीं, बल्कि समुद्रगुप्त को प्राचीन भारत के महानतम शासक रूप में प्रस्तुत करता रहा है। 

हरा रंग निश्चित तौर पर प्रकृति, कृषि और उत्पादन का प्रतिनिधित्व करता है। सन् 2020-21 में उत्तर भारत में ऐतिहासिक किसान आंदोलन में राष्ट्रीय ध्वज का प्रयोग इसलिए किया गया, क्योंकि उसमें शामिल हरा रंग किसानों की फसलों की हरियाली और वैश्विक पर्यावरणवाद का प्रतिनिधि है। शूद्र-दलित-आदिवासी आम जन, देश की स्वंत्रतता, संविधान और राष्ट्रीय ध्वज को जोतीराव फुले, सावित्रीबाई फुले, आंबेडकर, पेरियार, जयपाल सिंह मुंडा और अन्यों की विरासत मानते हैं।  

फुले और आंबेडकर द्वारा एक साथ मिलकर राष्ट्रीय ध्वज फहराने का यह चित्र, हमारे देश में 75 साल तक लोकतंत्र के बचे रहने और उस संविधान और ध्वज का प्रतिनिधित्व करता है, जिन्हें उन्होंने हमें दिया था। इस अवसर पर हम यह शपथ लेते हैं कि हम दुनिया की किसी भी ताकत को इस संविधान, हमारे तिरंगे और उन लोकतांत्रिक संस्थाओं, जिन्हें हमने अपने खून-पसीने से खड़ा किया है, को नष्ट नहीं करने देंगे। 

(अनुवाद: अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल/अनिल)    


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें 

मिस कैथरीन मेयो की बहुचर्चित कृति : मदर इंडिया

बहुजन साहित्य की प्रस्तावना 

दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

महिषासुर एक जननायक’

महिषासुर : मिथक व परंपराए

जाति के प्रश्न पर कबी

चिंतन के जन सरोकार

लेखक के बारे में

कांचा इलैया शेपर्ड

राजनैतिक सिद्धांतकार, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता कांचा इलैया शेपर्ड, हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक और मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय, हैदराबाद के सामाजिक बहिष्कार एवं स्वीकार्य नीतियां अध्ययन केंद्र के निदेशक रहे हैं। वे ‘व्हाई आई एम नॉट ए हिन्दू’, ‘बफैलो नेशनलिज्म’ और ‘पोस्ट-हिन्दू इंडिया’ शीर्षक पुस्तकों के लेखक हैं।

संबंधित आलेख

दलित कविता में प्रतिक्रांति का स्वर
उत्तर भारत में दलित कविता के क्षेत्र में शून्यता की स्थिति तब भी नहीं थी, जब डॉ. आंबेडकर का आंदोलन चल रहा था। उस...
पुनर्पाठ : सिंधु घाटी बोल उठी
डॉ. सोहनपाल सुमनाक्षर का यह काव्य संकलन 1990 में प्रकाशित हुआ। इसकी विचारोत्तेजक भूमिका डॉ. धर्मवीर ने लिखी थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि...
कबीर पर एक महत्वपूर्ण पुस्तक 
कबीर पूर्वी उत्तर प्रदेश के संत कबीरनगर के जनजीवन में रच-बस गए हैं। अकसर सुबह-सुबह गांव कहीं दूर से आती हुई कबीरा की आवाज़...
विज्ञान की किताब बांचने और वैज्ञानिक चेतना में फर्क
समाज का बड़ा हिस्सा विज्ञान का इस्तेमाल कर सुविधाएं महसूस करता है, लेकिन वह वैज्ञानिक चेतना से मुक्त रहना चाहता है। वैज्ञानिक चेतना का...
बहस-तलब : आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पूर्वार्द्ध में
मूल बात यह है कि यदि आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाता है तो ईमानदारी से इस संबंध में भी दलित, आदिवासी और पिछड़ो...