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सामाजिक आंदोलन में भाव, निभाव, एवं भावनाओं का संयोजन थे कांशीराम

जब तक आपको यह एहसास नहीं होगा कि आप संरचना में किस हाशिये से आते हैं, आप उस व्यवस्था के खिलाफ आवाज़ नहीं उठा सकते है। इसका उदाहरण जोतीराव फुले, छत्रपति शाहू जी महाराज, डॉ. आंबेडकर और कांशीराम के विचारों में देखने को मिलती है। बता रहे हैं नरेंद्र कुमार

कांशीराम (15 मार्च, 1934 – 9 अक्टूबर, 2006)  पर विशेष

भारतीय समाज भावनाओं में बिखरा हुआ समाज है, जो परिवार, रिश्तेदार, रसूखदार के भाव से ओतप्रोत रहा है। क्योकि इसकी संरचना में भावनाओं की जगह आपसी संबंधों से निर्धारित होती है। जैसा कि दार्शनिक रूसो लिखते है कि व्यक्ति स्वंतंत्र पैदा होता है, लेकिन तत्पश्चात अपने आपको जंजीरो में जकड़ा हुआ पाता है। 

ये शब्द एक व्यक्ति के जीवन की यात्रा को परिभाषित करते हैं। लेकिन कुछ समाजों के इतिहास में मनुष्य मानव मात्र दर्जे के लिए भी तरसा है। चाहे वह रंगभेद या नस्लभेद की शोषणकारी व्यवस्था रही हो या फिर जातिगत आधार पर आपको सूरज उगने से पहले या फिर ढलने के बाद अपने घरो से निकलने की सभ्यागत हिंसा रही हो। और इस व्यवस्था में जब व्यक्ति जन्म लेता है तो वह अपने आपको उस व्यवस्था में असहज महसूस करता है। इसी असहज भाव की परवर्ती से विचारों का टकराव शुरू होता है और उससे ही सत्य का उद्भव होता है, जिसे कांशीराम ने आसान शब्दों में ‘रिबफ एवं रिफार्म’ कहा हैं। अर्थात जब तक आपको यह एहसास नहीं होगा कि आप संरचना में किस हाशिये से आते हैं, आप उस व्यवस्था के खिलाफ आवाज़ नहीं उठा सकते है। इसका उदाहरण जोतीराव फुले, छत्रपति शाहू जी महाराज, डॉ. आंबेडकर और कांशीराम के विचारों में देखने को मिलती है। 

इतिहस के पन्नों को पलटकर देखें तो यह श्रृंखला बुद्ध, चार्वाक, रैदास, कबीर, घासीदास आदि से शुरू होती हुई आज जनमानस के बीच सामाजिक आंदोलन की कड़ी के रूप में स्थापित है। लेकिन इतिहास को केवल घटनाओं से परिभाषित नहीं किया जाता है। उसकी अपनी एक भाषा होती है कि किस अतीत और किन विचारकों के विचार को जनमानस के बीच में लाना हैं और किसको ख़ारिज करना है। इसी के साथ शुरू होता है सांस्कृतिक पूंजी का निर्माण। इसमें भाव, निभाव, एवं भावनाओं का संयोजन होता है। लेकिन शोषणकारी व्यवस्था में शोषक ऐसे संस्थाओं एवं भाषाओं को प्रयोग में लाता है, जिससे कि शोषित उस व्यवस्था का पंगु बना रहे और उसको आत्मसात करे और वह अपन वर्चस्व कायम रख सके। लेकिन दूसरी तरफ शोषितों ने समय-समय पर अपनी प्रतिरोध की भाषा को महापुरुषों के विचारों से तैयार किया और उसको आम जनमानस के बीच में स्थापित करने का काम कांशीराम ने किया। वह जनमानस के बीच में जनता की मनोदशा की पहचान कर उनसे सीधा संवाद स्थापित करने वाले बुद्धिजीवी के रूप में उभरे। 

कैडर कैंप: सांस्कृतिक पूंजी का निर्माण

कैडर कैंप एक वह पद्धति होती है, जिसके माध्यम से विचारधारा के धरातल पर वर्तमान परिस्थितियों को इतिहास से संदर्भित किया जाता हैं, जिससे एक समर्पित मिशनरी लीडरशिप का निर्माण होता है। इसे कांशीराम जनमानस की भाषा में गुरु गोविदं सिंह के शब्दों से परिभाषित करते है– “चिड़ियों से मै बाज लडाऊं, सवा लाख से एक लडाऊं, तभी गोबिंद सिंह नाम कहाऊं।” यानी एक ऐसा व्यक्तित्व तैयार करना जो विचारधारा के धरातल पर अपने समाज का नेतृत्व कर सके। कांशीराम अपने कैडर कैंप में हमेशा एक बात को बार-बार दोहराते थे कि “विचारों को अगर बार बार न मांजा जाये तो विचार मर जाते हैं और विचारों के मरने से इतिहास मर जाता है। जिस समाज का इतिहास मर जाता है तो वह समाज खुद-ब-खुद मर जाता है।” इसलिए विचारों को बार-बार मांजना जरूरी होता है, जिससे कि समाज में विचारों की गति एवं भावनाओं का सामंजस्य बना रहे और उसको आगे ले जाने का भाव उसके अंदर पनपता रहे। 

इसलिए कांशीराम ने कैडर कैंप को इस आंदोलन की एक प्रारंभिक पाठशाला के रूप में स्थापित किया, जिससे सांस्कृतिक पूंजी का निर्माण हो और समाज उस पर गर्व कर सके। इसलिए वह कहते भी थे कि जिस समाज की गैर-राजनीतिक जड़ें कमजोर होती हैं, उसकी राजनीति कभी सफल नहीं होती हैं। इसके लिए उन्होंने बामसेफ (गैर-राजनैतिक और गैर-धार्मिक) की आधिकारिक स्थापना 6 दिसम्बर 1978 को की। 

वे कहते थे कि “बामसेफ गहरी इच्छाओं, सावधान विचारों, किये गए प्रयोग, और विकसित सिद्धांतों की उतपत्ति है”। लगभग 9 साल तक जमीनी संघर्ष के बाद उन्होंने इस संगठन को अमली जामा पहनाया। कैडर कैंप के बारे में वे पांच विशेषताएं बताते थे– संवाद कायम करना, जाति का इतिहास बताना, जाति का भूगोल बताना, जाति का मनोविज्ञान और जाति का दर्शन बताना। इसे वे ‘एलॉय पद्धति’ कहते थे। यानी जातियों के मिश्रण से ही जातियों को साधने की पद्धत्ति। वे सीधा प्रहार अपने विरोधिरों पर करते थे कि यदि जाति को समाप्त नहीं किया जा सकता है तो मैं जाति का प्रयोग बहुजन समाज को सत्ता तक पहुंचाने के लिए करूंगा। जैसे इसका उदाहरण हम बंगाल में गुरुचंद ठाकुर एवं हरिचंद ठाकुर एवं उनके दर्शन “जे जाते राजा नहीं, ते जाते ताज़ा नहीं, जे जाते दल नहीं, ते जाते बल नहीं” में पाते हैं। यानी जिस जाति का राजा नहीं होता है, वह जाति ज्यादा दिन जिंदा नहीं रहती है; जिस जाति का अपना कोई दल नहीं होता है, उसका अपना कोई बल नहीं होता है। जनमानस के बीच कांशीराम द्वारा जातियों के महापुरुषों को परिचित कराना इसी को संदर्भित करता है। इसी दृष्टिकोण से उन्होंने समाज के अंदर निभाव की भावना पैदा की। 

6 दिसंबर, 1978 को दिल्ली के बोट क्लब पर बामसेफ के पहले विधिवत स्थापना दिवस समारोह में कांशीराम और उपस्थित जनसमूह

भ्रमणकारी दृष्टिकोण : जनता के साथ इतिहास का सीधा संवाद 

बहुजन समाज की सच्चाई से परिचित हो जाने के बाद जनता के बीच इतिहास का सीधा संवाद स्थापित करने के लिए कांशीराम ने ‘मेला ऑन व्हील्स’ की शुरुआत की। उन्होंने इसके माध्यम से जनता के बीच उनके समाज के महापुरुषों से परिचित कराया। इसके लिए उन्होंने उस भाषा को अपनाया, जिससे कि वो अपने आपको उनसे जोड़ सकें और संवाद कायम कर सकें। जैसे वे अलग अलग जगहों पर जाकर लोगो को बताते थे कि मैं आपके लिए टाई वाला बाबा (डॉ. आंबेडकर) लाया हूं, अचकन वाला बाबा (शाहूजी महाराज), पगड़ी वाला बाबा (फुले) लाया हैं) और दाढी वाला बाबा (पेरियार) लाया हूं। इस तरह से उन्होंने समानांतर जनता का निर्माण किया, जिससे वो अपनी संस्कृति एवं इतिहास से परिचित होकर अपने समाज के इतिहास पर गर्व कर सकें तथा भावनात्मक रूप से आंदोलन का हिस्सा बनें। 

अगर देखा जाये तो कांशीराम ने ‘भावनाओं’ के महत्त्व को सामाजिक आंदोलन में समझा और उसका सही जगह इस्तेमाल किया। इसके माध्यम से उन्होंने अलग-अलग जातियों में कैडर तैयार किये। वे कहते थे कि “एक तम्बू में एक बम्बू कैसे काम कर सकता हैं।” इसलिए उन्होंने देश के अलग-अलग कोनों में कैडर तैयार किये। इस प्रकार तार्किकता के माध्यम से उन्होंने भावनात्मकता को सामाजिक आंदोलन में निष्पादित किया। उन्होंने समाज के अंदर प्रतिभाओं को पहचानकर उन्हें आंदोलन में उसी जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़ाया। उन्होंने ‘अवेकनिंग स्क्वाड’ तैयार किया, जो आम जनता के बीच गीत के माध्यम से इतिहास की जानकारी बहुजन समाज के बीच पहुंचा सके। जनता के बीच ज्यादा से ज्यादा संवाद स्थापित करने के लिए उन्होंने ‘दो पैर, दो पहियों’ का आंदोलन चलाया और इस क्रम में उन्होंने 7 राज्यों में करीब 3000 किलोमीटर की दूरी तय की और करीब 300 किलोमीटर की यात्रा पैदल चलकर पूरी की। 

यह उनके आंदोलन का ही परिणाम था कि उत्तर भारत में एक स्वर के साथ मज़लूमों के बीच एकता का आगाज़ हुआ। उन्होंने बताया कि मज़लूमो की सहायता मज़लूम ही कर सकते हैं, पहलवान नहीं इसलिए हमे एक होना होगा। वे कहते थे– “दुःख दरिद्र की भारी गठरिया, घाट जाये मिल बांटें, दुखिया के दुःख दुखिया बांटें।” 

कांशीराम बहुजन समाज के लोगों को समझाते थे कि “सेल्फ रेस्पेक्ट [आत्मसम्मान] का आंदोलन, सेल्फ हेल्प [स्वयं सहायता] से ही चल सकता है।” इसलिए उन्होंने जिम्मेदारी के निभाव की भावना लोगों के अंदर स्थापित कर अपने माध्यम तैयार किये।

मैं टिकाऊ समाज चाहता हूं

आज के दौर में जब तमाम पार्टियां अपने अपने मैनिफेस्टो तैयार कर इस देश की जनता को असत्यता के अंधकार में ले जा रही है ऐसे में कांशीराम का वह समय याद आता है जब वो 1988 में इलाहाबाद की सीट पर उपचुनाव में ‘एक नोट – एक वोट’ के माध्यम से जनता के बीच लोकतंत्र के असली खेवनहार बनकर उभरते हैं और इस उपचुनाव में जितना पैसा (लगभग 70 हजार रुपए) मिला, उतने ही लगभग 71 हजर 586 मत उन्हें मिले। अपने साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि “यदि मुझे कोई गरीब सफाई कर्मचारी 2 रुपए भी देगा तो जो कांग्रेसी उम्मीदवार उसका वोट खरीदने आएगा, उसको चप्पल मारने की हिम्मत रखेगा।” बहुजन समाज के अंदर वोट के साथ सम्मान को जोड़ने का एहसास हुआ। यह कांशीराम का करिश्मा ही था जो उन्होंने आम जनमानस के बीच में जाकर वैधता प्राप्त की न कि उस समय की मीडिया के द्वारा। हम कह भी सकते है कि समाज के अंदर जब कांशीराम योग्यता पैदा करने की बात करते हैं तो उसका संबंध बहुजन समाज की स्वतंत्र राजनीति से निकलता है। इसलिए वह बहुजन समाज के लोगों का आह्वान करते हुए कहते थे कि “खरीददारों को बता दे कि आप बिकाऊ माल नहीं हैं।” 

भारतीय राजनीति के इतिहास में पहली बार शोषितो मज़लूमो के बीच बहुजन समाज पार्टी एक ऐसे विकल्प के रूप में उभरी, जिसने बहुजन समाज के लोगों को ‘राज के चस्के’ का एहसास कराया। लेकिन इसकी बानगी हम डीएस-4 (दलित शोषित समाज संघर्ष समिति) द्वारा हरियाणा के 1982 के विधानसभा चुनाव में देखने को मिलती है, जहां कांशीराम घोषणा करते है कि हम टिकट बनाना सीखेंगे। इस चुनाव में कांशीराम 46 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे, जिनमें लगभग 20 उम्मीदवार पिछड़ी जाति के थे। कांशीराम ने टिकट देते समय कहा था कि यह प्लेटफार्म टिकट है। इससे आप प्लेटफार्म पर जा सकते हैं, इससे आप संसद भवन में नहीं जा सकते। 

इस तरह कांशीराम ने बहुजन समाज के बीच में आंदोलनकर्ता जमात तैयार करके भारतीय राजनीति में प्रतिनिधित्व लोकतंत्र को मजबूत किया। एक समय ऐसा आया कि आरएसएस के संघचालक बालासाहेब देवरस को यह बोलना पड़ा कि बसपा उत्तर भारत में हमारे लिए बड़ा खतरा है। 

(संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

नरेंद्र कुमार

लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं

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