डॉ आम्बेडकर का अर्थ-चिंतन

आर्थिक असमानता, कृषि उत्पादन में वृद्धि, नागरिकों को मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध करवाने की सरकार की जिम्मेदारी के सम्बन्ध में उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं

भीम राव आम्बेडकर को अक्सर भारतीय संविधान के निर्माता और दलितों के मसीहा के रूप में ही जाना जाता है; परन्तु उनके व्यक्तित्व का एक अति महत्वपूर्ण पहलू—उनका अर्थ-चिंतन-अभी तक जनसाधारण से छिपा हुआ है। उनके विकास और भूमि सुधार सम्बन्धी आर्थिक विचारों से आमजन काफी हद तक नावाकिफ़़ है। वे भारत की उस पहली पीढ़ी के चुनिन्दा लोगों में से एक थे, जिसने अर्थशास्त्र का बाक़ायदा अध्ययन और पेशवाराना इस्तेमाल किया। हालांकि, भारत में अर्थशास्त्र के अध्ययन की प्राचीन परंपरा रही है। अर्थशास्त्र, शुक्रनीति और तिरुक्कुरल आदि ग्रंथ इसी परंपरा की देन हैं। फिर भी, उन्नीसवीं सदी के मध्य में भारत के संदर्भ में इस अनुशासन का पेशेवाराना अध्ययन और प्रशिक्षण तब शुरू हुआ, जब डॉ आम्बेडकर, सीएन वकील, पीएन बैनर्जी, डीआर गाडगिल, पीएन मथाई और राधाकमल मुखर्जी सहित अन्य लोग विदेश गए और वहाँ बाक़ायदा प्रशिक्षित हुए।

डाक्टर आम्बेडकर का पीएचडी शोधप्रबंध ‘इवैल्यूएशन ऑफ पब्लिक फ़ाइनेंस इन ब्रिटिश इण्डियाÓ (ब्रिटिश भारत में सार्वजनिक वित्त का विकास) था तथा डी.एससी. का लघु-शोध प्रबंध ‘प्रॉब्लम्स ऑफ द रूपीÓ (रुपये के समस्याएं) था। बाद में ये दोनों शोधप्रबंध पुस्तक के रूप में भी प्रकाशित हुए। उन्होंने एमए के दौरान ‘एनशिएंट इंडियन कॉमर्सÓ (प्राचीन भारत में व्यापर-व्यवसाय) तथा एम.एससी. के दौरान ‘डिसेंट्रलाईज़ेशन ऑफ इंपीरियल फ़ाइनेंस इन ब्रिटिश इण्डियाÓ (ब्रिटिश भारत में वित्त का विकेंद्रीकरण) आदि विषयों का भी अध्ययन और उन पर शोध किया। डॉ आम्बेडकर ने आज के भारत की आर्थिक समस्याओं से निजात का नुस्ख़ा बहुत पहले ही सुझा दिया था। सबसे पहले, देश के सामने दरपेश दो बड़ी आर्थिक चुनौतियों—असमानता और बेरोजग़ारी—की चर्चा करते हैं।

आर्थिक विषमता

भारत तेजी से आर्थिक प्रगति करते हुए विश्व की एक आर्थिक महाशक्ति के रुप में उभर रहा है (अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के शब्दों में ‘उभर चुका है’)। वल्र्ड बैंक समूह से जुड़े अंतर्राष्ट्रीय तुलना कार्यक्रम (इंटरनेशनल कॉम्पेरेटिव प्रोग्राम या आईसीपी) के आंकड़ों के मुताबिक़, भारत, क्रय शक्ति क्षमता (पीपीपी) के आधार विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है।

इस आर्थिक संवृद्धि के बरक्स, भारत में भारी आर्थिक असमानता, भयावह गऱीबी व भुखमरी भी है। हाल ही में, वेल्थ-एक्स और यूबीएस की वल्र्ड अल्ट्रा वेल्थ रिपोर्ट 2013-14 में प्रकाशित दुनियाभर के अमीरों की फ़ेहरिस्त में भारत छठवें स्थान पर है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, सिर्फ मुंबई में ही 30 अरबपति हैं। भारत में अरबपतियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, और गरीबों की उससे भी अधिक तेजी से।

भारतीय अर्थव्यवस्था में आर्थिक संवृद्धि के साथ-साथ असमानता तो बढ़ ही रही है, वहीं यह वृद्धि नागरिकों को पर्याप्त रोजग़ार उपलब्ध कराने के मामले में भी फिसड्डी साबित हो रही है। हाल के वर्षों में संगठित क्षेत्र के रोजग़ार में गिरावट आई है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएस) के 68वें राउंड के आंकड़ों से यह खुलासा हुआ कि जून, 2010 से जून, 2012 के बीच बेरोजगारी 10.2 फीसदी की दर से बढ़ी है। इन आंकड़ों के मुताबिक़, जनवरी, 2012 में देश में पूर्ण बेरोजगारों की संख्या 1.08 करोड़ थी, जबकि दो साल पहले यह आंकड़ा 98 लाख था। इन आंकड़े के अलावा कई सरकारी एवं गैर-सरकारी सर्वेक्षणों के आंकड़े भी बहुत बड़ी संख्या में बेरोजगारों की बात कह रहे हैं।

वित्त मंत्रालय द्वारा प्रकाशित आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, 1991 से 2008 के बीच प्रति वर्ष, औसतन 1,27 लाख श्रमिकों को संगठित क्षेत्रों में रोजगार मिला तो वहीं, 64 लाख श्रमिक असंगठित क्षेत्र में धकेल दिये गए। इसके पूर्व, एनएसएस के 66वें राउंड के अनुसार, वर्ष 2004-05 और 2009-10 के बीच रोजग़ार में सालाना 0.8 प्रतिशत की ही बढ़ोत्तरी हुई जबकि जनसंख्या की वृद्धि दर 1.5 प्रतिशत थी।

देश आर्थिक व सामाजिक असमानता और बेरोजग़ारी के भंवर में फंस गया है। भारतीय अर्थव्यवस्था की इस विसंगति को डॉ आम्बेडकर ने बहुत पहले—जब आज़ाद भारत की राजनैतिक और आर्थिक तक़दीर लिखी जा रही थी—पहचान लिया था। उन्होंने इस ओर इशारा करते 25 नवंबर 1949 को चेतावनी भरे लहजे में कहा था कि- ’26 जनवरी, 1950 से देश विरोधाभासों के दौर में प्रवेश करेगा, जहां ‘एक व्यक्ति-एक वोट’ के सिद्धांत के आधार पर राजनीतिक समानता तो होगी, पर सामाजिक और आर्थिक जीवन में पसरी विषमता इस राजनीतिक समानता को निरुद्देश्य करती रहेगी, जब तक कि हम सदियों से चली आ रही सामाजिक-आर्थिक असमानता को पूरी तरह से मिटा नहीं देते। अगर हम ऐसा निकट भविष्य में नहीं कर पाते हैं तो विषमता-पीडि़त जनता हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था को ध्वस्त कर सकती है।

कृषि में अधिशेष श्रम हाल ही में जारी की गयी एग्रिकल्चर सेंसस रिपोर्ट के अनुसार क्रियाशील जोत के औसत आकार में गिरावट आई है। 2005-06 में क्रियाशील जोत का आकार 1.23 हेक्टेयर था, जो 2010-11 में गिर कर 1.15 हेक्टेयर रह गया। जहाँ पिछले चालीस सालों से कुल रक़बा 140 मिलियन हेक्टेयर बना हुआ है वहीं किसानों की संख्या दोगुनी (7 करोड़ से 14 करोड़) हो गयी है। हर पांच साल में किसानों की संख्या में एक करोड़ की वृद्धि होती है। दिन ब दिन कम होती औसत जोत से उत्पादकता पर असर पड़ा है। 2011-12 में, सहबद्ध कार्यकलापों सहित कृषि क्षेत्र की जीडीपी में हिस्सेदारी 14.1 प्रतिशत थी तो वहीं इसका रोजग़ार में हिस्सा 58.2 फ़ीसदी था। विकास की रफ़्तार को इस सेक्टर के अधिशेष श्रम को विनिर्माण सेक्टर में समायोजित करके ही तेज किया जा सकता है।

कऱीब एक सदी पहले, डॉ आम्बेडकर ने 1918 में ‘स्माल होल्डिंग्स इन इण्डिया एंड देयर रेमेडीज़Ó नामक अपने शोध-पत्र में इस समस्या से निपटने का मार्ग सुझाया था। उनका मानना था कि कृषि को उद्योग का दर्जा देना चाहिए तथा इस क्षेत्र की उत्पादकता बढ़ाने के लिए पूँजी और पूँजीगत माल को विस्तारित करने के साथ-साथ इसमें लगे अधिशेष श्रम को कम किया जाये।

सार्वजनिक सेवाएं

स्वतंत्रता के बाद भारत में कैसी अर्थव्यस्था हो, इसके बारे में आम्बेडकर के विचार ‘स्टेट्स एंड माइनॉरिटीज़Ó नामक पुस्तक में दर्ज हैं। डॉ आम्बेडकर प्रत्येक नागरिक की मूलभूत आवशयकताओं की पूर्ति को किसी भी लोकतंत्र का प्रथम कर्तव्य मानते थे। वे साम्राज्यवाद और पूँजीवाद के धुर विरोधी थे और राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक-शैक्षिक असमानताओं को क्रमिक और तार्किक ढंग से दूर करना चाहते थे। उन्होंने प्रीवी पर्स की समाप्ति, बैंकों, बीमा कम्पनियों तथा कोयला खदानों के राष्ट्रीयकरण की बात बहुत पहले उठाई थी। इससे भी आगे बढ़कर, उन्होंने भूमि तथा कृषि केराष्ट्रीयकरण की वकालत भी की थी। वे सार्वजानिक क्षेत्र के पक्षधर थे, जिसके माध्यम से पंडित नेहरु भी भारतीय अर्थव्यवस्था को विकसित करना चाहते थे।

स्वतंत्रता के सम्बन्ध में चर्चा करते हुए डॉ आंबेडकर ने कहा—’संवैधानिक विशेषज्ञ यह मान लेते हैं कि स्वतंत्रता की सुरक्षा हेतु मौलिक अधिकार दे देना ही काफी है। उनकी मान्यता है कि जब सरकार व्यक्तिगत, सामाजिक और आर्थिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करती तो व्यक्ति की स्वतंत्रता सुरक्षित रहती है। किन्तु आवश्यकता इस बात की है कि न्यूनतम सरकारी हस्तक्षेप को कायम रखते हुए, वास्तविक स्वतंत्रताओं को बढ़ाया जाये’।

ग़ौरतलब है कि सामाजिक क्षेत्र या सामाजिक सेवाएँ वह सेक्टर है जो मानव विकास में प्रत्यक्ष रूप से योगदान करता है। इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, जलापूर्ति और स्वच्छता, सामाजिक सुरक्षा एवं कल्याण और पोषण शामिल हैं। पिछले 15 सालों में केंद्र के कुल सार्वजनिक व्यय में सामाजिक क्षेत्र का हिस्सा लगभग 30 फ़ीसदी के आस-पास ही रहा है, जो जीडीपी के 2 प्रतिशत से भी कम है। विश्व के अपेक्षाकृत विकसित देश, जिनका संगठन ‘आर्थिक सहयोग और विकास के लिए संगठन’ या ओईसीडी के नाम से जाना जाता है, अपने-अपने देशों में सामाजिक सेवाओं पर जीडीपी का 15 फ़ीसदी से भी ज़्यादा हिस्सा व्यय करते हैं।

वाशिंगटन सहमति के तहत वल्र्ड बैंक और आईएमएफ़ के निर्देशन के अनुसार सामाजिक सेवाओं के व्यय में लगातार कटौती की जा रही है; सरकार, राजकोषीय घाटे का ठीकरा सामाजिक क्षेत्र के सर फोड़ रही है। सरकार या राज्य बुनियादी सुविधाएं मुहय्या कराने की मूलभूत जि़म्मेदारी से हाथ खींच रही है। ऐसे में डॉ आम्बेडकर की मान्यता कि बुनियादी सेवाओं तक आम नागरिकों की पहुँच को यक़ीनी बनाना राज्य का कर्तव्य है, और भी समीचीन हो जाता है।

ज 83 करोड़ लोग प्रतिदिन 20 रुपए से भी कम पर गुज़ारा करने को मजबूर हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, बिजली जैसे बुनियादी सेक्टरों सहित तमाम क्षेत्रों को कारपोरेट के हवाले कर दिया गया है। जीडीपी के 25 फीसदी मूल्य की संपत्ति पर सौ अरबपतियों का क़ब्ज़ा है। हाशिये के समाज को उसके जल-जंगल-ज़मीन से बेदख़ल किया जा रहा है।

ऐसे में, 21 जून, 1941 को डॉ आम्बेडकर के अख़बार जनता में छपी कमलसिंह बलिराम रामटेके की कविता को भी याद रखना ज़रूरी है:
जनता का हथियार उठाओ,

मील के पत्थर : अर्थशास्त्री आम्बेडकर

आम्बेडकर पहले भारतीय राजनैतिक नेता थे जिन्होंने अर्थशास्त्र में औपचारिक शिक्षा ग्रहण की और जिनके शोध प्रबंध जानेमाने अकदामिक प्रकाशनों में छपे। वे मौद्रिक अर्थशास्त्र के विशेषज्ञ थे। अर्थशास्त्री के रूप में उनके विकास के मील के पत्थर निम्नांकित थे :

  • 1913-16: कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयार्क। उनके पाठ्यक्रम का आधा हिस्सा अर्थशास्त्र था।
  • 1918-20: प्राध्यापक, राजनीतिक अर्थशास्त्र, सिडेनहैम कालेज ऑफ कामर्स एण्ड इकोनामिक्स, बंबई।
  • 1918: जर्नल ऑफ इंडियन इकोनामिक्स में बर्टेड रसेल की पुस्तक की उनकी समीक्षा प्रकाशित हुई। इसके अतिरिक्त, जर्नल ऑफ इंडियन इकनोमिक सोसायटी में उनका लेख ‘स्माल होल्डिंग्स इन इंडिया एण्ड देयर रेमेडीजÓ प्रकाशित हुआ।
  • 1920: जुलाई में वे लंदन लौट गए जहां उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनामिक्स में अर्थशास्त्र का अपना अधूरा अध्ययन पुन: शुरू किया।
  • 1922: आम्बेडकर ने जर्मनी के बॉन विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र पर शोध करने का निर्णय किया। उन्होंने विश्वविद्यालय को जर्मन भाषा में हस्तलिखित पत्र और अपना बायोडेटा भेजा। परंतु यह काम आगे नहीं बढ़ सका।
  • 1923: लंदन यूनिवर्सिटी में उनके पीएचडी शोध प्रबंध ‘द प्राब्लम ऑफ द रूपी’ को राजनैतिक आधारों पर चुनौती दी गई परंतु उन्होंने उसे फिर से प्रस्तुत किया और अंतत: वह स्वीकार कर लिया गया। जल्दी ही वह लंदन में प्रकाशित हो गया।
  • 1925: उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनामिक्स का अपना एमए शोध प्रबंध ‘द एविल्यूशन ऑफ प्रोविंशियल फाईनेंस इन ब्रिटिश इंडियाÓ प्रकाशित किया। उसकी भूमिका कोलंबिया विश्वविद्यालय के उनके प्रोफेसर सेलिगमेन ने लिखी।
  • 1925: दिसंबर में आम्बेडकर को ‘रायल कमीशन आन इंडियन करेन्सी एण्ड फाईनेंस’ के समक्ष अपने विचार व्यक्त करने के लिए निमंत्रित किया गया।
  • 1926: बंबई के गर्वनर ने उन्हें बंबई विधान परिषद का सदस्य नामांकित किया। उन्होंने अपने कर्तव्यों को काफी गंभीरता से लिया और 1927 से 1939 के बीच आर्थिक मसलों पर कई भाषण दिए।
  • 1927: 8 जून को उन्हें कोलंबिया विश्वविद्यालय ने औपचारिक रूप से पीएचडी की डिग्री प्रदान की।

डॉ आम्बेडकर की अर्थशास्त्र पर तीन विद्वतापूर्ण पुस्तकें प्रकाशित हुई:

1. एडमिनिस्ट्रेशन एण्ड फाईनेंस ऑफ इ ईस्ट इंडिया कंपनी (उनका 1915 का कोलंबिया विश्वविद्यालय का एमए शोध प्रबंध)।
2. द प्राब्लम ऑफ द रूपी: इट्स ओरिजन एण्ड इट्स साल्यूशन (उनका 1923 का लंदन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स में प्रस्तुत डीएससी शोध प्रबंध)
3. इ इवील्यूशन ऑफ प्राविंशियल फाईनेंस इन ब्रिटिश इंडिया (1924 में कोलंबिया विश्वविद्यालय में प्रस्तुत उनका पीएचडी शोध प्रबंध)।

 

(फारवर्ड प्रेस के  दिसम्बर 2014 अंक में प्रकाशित)


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