अपना दल परिवार में कलह

अपना दल जैसे उभरते राजनीतिक दल में पारिवारिक विवाद, बहुजन नजरिये से त्रासदपूर्ण है. कारण, हिंदी पट्टी में सामाजिक न्याय के स्थापित नायक/नायिकाओं के विविध कारणों से निस्तेज हो जाने के बाद, यह दल, बहुजनों की आशा-आकांक्षा के नए प्रतीक के रूप में उभरने लगा था, जिसमें इसकी नेत्री अनुप्रिया पटेल का असाधारण योगदान था

जिस उत्तर प्रदेश से राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय होती है, आज वहां सपा-बसपा, भाजपा-कांग्रेस जैसे बड़े दल नहीं, बल्कि ‘अपना दल’ जैसा एक छोटा दल चर्चा में है और वह भी पारिवारिक कलह जैसे अप्रिय कारणों से. और यहाँ तक कि दल के वजूद पर ही संकट खड़ा हो गया है.

दल की राष्ट्रीय अध्यक्ष कृष्णा पटेल ने मिर्जापुर की सांसद और दल की राष्ट्रीय महासचिव अनुप्रिया पटेल को पद से हटा दिया है जबकि अनुप्रिया के कारण ही दल को कुछ पहचान मिली है.

राष्ट्रीय महासचिव को हटाये जाने के कारणों को स्पष्ट करते हुए पार्टी अध्यक्ष ने तल्ख़ स्वर में कहा है कि ‘अनुप्रिया पटेल मेरी बेटी हैं किन्तु कुछ नजदीकी लोग उन्हें गुमराह कर रहे हैं. जिन लोगों ने उन्हें सिर पर बैठाया और विधायक तथा सांसद बनाया, वे उन्हीं का विरोध करने पर उतर आयीं हैं, जो ठीक नहीं है. अनुसशासनहीनता और पद की गरिमा का ध्यान न रखने के कारण उन्हें महासचिव पद से हटाया गया है.’ उन्होंने आरोप लगाया कि अनुप्रिया ने उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटाने की घोषणा कर दी, जो पार्टी के संविधान का उल्लंघन है. उनका यह भी आरोप है कि रोहनिया उपचुनाव में उनके दामाद आशीष कुमार (अनुप्रिया के पति) चुनाव लडऩा चाहते थे. इसके लिए दबाव भी बनाया गया, लेकिन दल के कार्यकर्ताओं की इच्छानुसार, उन्होंने खुद चुनाव लड़ा. अनुप्रिया व उनके पति ने भीतरघात किया, जिसके परिणामस्वरुप वे हार गईं. उनका आरोप यह भी है कि 20 अक्तूबर को ‘असंवैधानिक’ बैठक कर अनुप्रिया ने राष्ट्रीय अध्यक्ष के अधिकार खुद में समाहित कर लिए. केन्द्रीय कार्यालय में रखे अभिलेखों के साथ छेड़छाड़ की गयी और कुछ को गायब भी कर दिया गया. उनकी शिकायत यह भी है कि अनुप्रिया सांसद बनते ही तानाशाह रवैया अपनाने लगीं हैं.

उधर अनुप्रिया पटेल का कहना है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष पार्टी संविधान के सभी प्रावधानों को ताक पर रखकर, मनमाने तरीके से संगठन चलाना चाहती हैं, जिससे वे असहमत हैं. ‘परिवार और दल के कुछ स्वार्थी लोग पांच साल के मेरे परिश्रम पर पानी फेरने तथा भाजपा के साथ पार्टी के गठबंधन को तोड़कर अपना हित साधने में लगे हैं. इस षड्यंत्र को किसी भी कीमत पर कामयाब नहीं होने दिया जायेगा’, उन्होंने कहा.

राजनीतिक परिवारों में कलह

दरअसल, अपना दल में जो पारिवारिक घमासान मचा है, उसकी पृष्ठभूमि में है अनुप्रिया की बड़ी बहन पल्लवी पटेल, जिन्हें उनकी मां कृष्णा ने राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया है. सक्रिय राजनीति से दूर रहीं पल्लवी पटेल, अपनी बाकी दो बहनों- पारुल और अमन – को भी राजनीति में लाना चाहती हैं. पल्लवी को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया जाना, अनुप्रिया को गंवारा नहीं हुआ और उन्होंने इसका विरोध कर दिया. नतीजे में उन्हें पद से हटा दिया गया.

पार्टी प्रमुख के अपने परिवार के किसी सदस्य के प्रति विशेष लगाव के कारण अपना दल में जो पारिवारिक घमासान मचा है, वह कोई नई परिघटना नहीं है. भारतीय राजनीति में इसके अनेक दृष्टान्त हैं. सन 1980 में संजय गाँधी की विमान दुर्घटना में मृत्यु के बाद उनकी पत्नी मेनका गाँधी अपनी सास और देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के साथ उनके आवास में रहने लगीं. किन्तु 1982 की एक सुबह उनका सारा सामान आवास के लॉन में फ़ेंक कर उन्हें गाँधी परिवार से दूर कर दिया गया. अपने निष्कासन के बाद अलग पार्टी गठित करने वालीं मेनका गाँधी उस अपमान को भूली नहीं और इंदिरा गाँधी की उग्र विरोधी बन गयी. इंदिरा गाँधी के बाद उनकी राजनैतिक विरासत संभालने वाले राजीव गाँधी से भी उनका विरोध रहा यह कटुता अगली पीढ़ी तक जारी है और पिछले आमचुनाव में, प्रियंका गाँधी ने मेनका गाँधी के पुत्र वरुण गाँधी के खिलाफ तल्ख़ टिपण्णी कर दी. गाँधी परिवार में इस तिक्त स्थिति के उत्पन्न होने का कारण, सोनिया गाँधी के प्रति इंदिरा गाँधी की अतिरिक्त दुर्बलता रही. ऐसी ही दुर्बलता के कारण पिछले दिनों डीएमके में पारिवारिक कलह खुलकर सामने आ गया, जब अपने छोटे बेटे एमके स्टालिन को तरजीह देते हुए, पार्टी अध्यक्ष एम करूणानिधि ने अपने बड़े बेटे व पूर्व केन्द्रीय मंत्री एमके अलागिरी को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से बर्खास्त कर दिया. कुछ ऐसे ही कारणों से शिवसेना के राज ठाकरे को अलग पार्टी बनाने का निर्णय लेना पड़ा. इसी तरह, आज एनसीपी में शरद और अजित पवार में मधुर सम्बन्ध नहीं रह गए हैं.

बहुजन परिप्रेक्ष्य

भारतीय राजनीति में पारिवारिक कलह आम परिघटना होने के बावजूद, अपना दल जैसे उभरते राजनीतिक दल में पारिवारिक विवाद, बहुजन नजरिये से त्रासदपूर्ण है. कारण – हिंदी पट्टी में सामाजिक न्याय के स्थापित नायक/नायिकाओं के विविध कारणों से निस्तेज हो जाने के बाद यह दल बहुजनों की आशा-आकांक्षा के नए प्रतीक के रूप में उभरने लगा था, जिसमें इसकी नेत्री अनुप्रिया का असाधारण योगदान रहा. सन 2013 में, जब उत्तरप्रदेश राज्य लोकसेवा आयोग द्वारा त्रिस्तरीय आरक्षण की घोषणा के बाद, आरक्षित और गैर-आरक्षित वर्ग के छात्र आमने-सामने आ गए थे, तब अनुप्रिया पटेल ने आरक्षण समर्थकों का खुलकर साथ दिया और एकाधिक बार जेल गयीं. इसने उन्हें सामाजिक न्याय की नायिका के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया. उसके बाद से हिंदी पट्टी में सामाजिक न्याय के मुद्दे पर सबसे मुखर नेता के रूप में उनकी छवि बनती गई. सोलहवीं लोकसभा में अनुप्रिया पटेल ने महिला आरक्षण में कोटे के अन्दर कोटे का समर्थन किया. एक सांसद के रूप में वे सामाजिक न्याय से जुड़े हर मुद्दे पर मुखर रहीं हैं. अनुप्रिया सामाजिक न्याय के उन विरल नेताओं में से एक हैं, जो सड़क पर लडाई लडऩे से लेकर देश के बड़े से बड़े बुद्धिजीवियों की सभा को हिंदी और अंग्रेजी में आत्मविश्वास से संबोधित करने तक की क्षमता रखती हैं. जहाँ तक संगठनकर्ता के रूप में उनकी भूमिका का सवाल है, अपना दल का बढ़ता ग्राफ उसका साक्ष्य है.

ज्ञातव्य है कि बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक व कांशीराम के निकट सहयोगी रहे डॉ.सोनेलाल पटेल ने मायावती से गहरे मतभेद के चलते बसपा छोडऩे के बाद 4 नवम्बर, 1995 को अपना दल की स्थापना की थी. दल की स्थापना के लगभग चार साल बाद, 4 अगस्त 1999 को वाराणसी में पहली रैली करते हुए डॉ.लाल ने लाख के करीब की भीड़ जरुर जुटाई, किन्तु पार्टी बड़ी सफलता से दूर ही रही. पार्टी को पहली सफलता तब मिली जब 2002 में बाहुबली अतीक अहमद, दल के टिकट पर उप्र विधानसभा में पहुंचे. उसके बाद, 2007 के यूपी विधानसभा और 2009 के आम-चुनाव में दल को सफलता नहीं मिली. अक्तूबर 2009 में कार दुर्घटना में डॉ.सोनेलाल की मृत्यु के बाद पार्टी को आगे बढाने के लिए अनुप्रिया पटेल सक्रिय हुईं. तब से हालात बदले हैं.

अनुप्रिया पटेल, 2012 के उत्तर-प्रदेश विधानसभा चुनाव में पीस पार्टी जैसे छोटे दलों के साथ गठबंधन बनाकर चुनाव में उतरीं और रोहनिया से जीत गयीं. उनके विधानसभा में पहुचने के बाद धीरे-धीरे पार्टी की चर्चा होने लगी. 2014 में लोकसभा चुनाव के लिए बीजेपी के साथ उसका चुनावी गठबंधन हुआ और सहयोगी दल के रूप में उसे मिर्जापुर और प्रतापगढ़ सीटें आवंटित की गईं. दल को न सिर्फ दोनों लोकसभा सीटों पर बल्कि विश्वनाथगंज विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में भी सफलता मिली.

इस सफलता ने हिंदी पट्टी के सामाजिक न्यायवादी चेहरों में अनुप्रिया पटेल को अलग पहचान दी. लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने उन्हें एनडीए के ओबीसी चेहरे के रूप में पेश किया. परिणामस्वरूप आज़मगढ़ को छोड़कर, उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में बीजेपी को वह सफलता मिली जिसे विनय कटियार और ओमप्रकाश सिंह जैसे पुराने नेता दिलाने में असफल रहे थे. इस सफलता के बाद बहुत-से लोग अनुप्रिया में यूपी के भावी सीएम की सम्भावना तलाशने लगे थे.

उनकी मां और पार्टी अध्यक्ष कृष्णा पटेल ने रोहनिया विधानसभा सीट से उपचुनाव लड़ा और सपा की आंधी में खेत रहीं. यहीं से अपना दल में गृह कलह की शुरुआत हुई जो पल्लवी पटेल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाये जाने के बाद चरम पर पहुँच गयी.

मौजूदा स्थिति में अनुप्रिया के सामने अब दो ही रास्ते रह गए हैं. पहला, वे पार्टी अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के अधीन रहकर एक अनुशासित कार्यकर्ता की भांति दल की सेवा करती रहें. और दूसरा, वे अपना दल (अ) बनाकर अपनी राजनीतिक यात्रा जारी रखें. अपना दल की छवि आज एक ऐसी प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी के रूप में स्थापित हो गयी है, जिसकी मुखिया अपनी अयोग्य संतानों को बड़े पदों से नवाज़ रही हैं. इससे राजनीतिक पार्टी के रूप में अपना दल की छवि को गहरा धक्का लगा है. ऐसे में बेहतर होगा कि वे मेनका गाँधी की भांति जोखिम उठायें और दूसरे रास्ते का अवलंबन करें.

(फारवर्ड प्रेस के  दिसम्बर 2014 अंक में प्रकाशित)


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