क्या बारह महीने सिंचाई संभव है?

महाराष्ट्र के विदर्भ के सहायक मुख्य अभियंता चाहते हैं कि सरकार किसानों की ज़रुरत पूरी करने के लिए हिमालय के जल का उपयोग करे

हो सकता है कि पर्यावरणविद इस योजना का विरोध करें लेकिन विदर्भ के एक इंजीनियर ने देश में पूरे साल सिंचाई व्यवस्था सुनिश्चित करने की एक योजना भारत और महाराष्ट्र सरकार के समक्ष प्रस्तुत की है। विदर्भ के सहायकमुख्य अभियंता प्रशांत जनबंधु उन लोगों में से एक हैं, जो जुनूनी हद तक देश के लिए कुछ कर गुजरना चाहते हैं। जनबंधू, जो निर्माण इंजीनियर का पद सँभालने के पूर्व काफी वर्षों तक सिचाई विभाग में कार्यरत थे, कहते हैं, ‘विकास के लिए थोड़ा सा जोखिम तो उठाना ही होगा। चूँकि हिमालय इतना बड़ा जलस्रोत है इसलिए इस योजना से कोई नुकसान नहीं होगा। बाबा साहेब आम्बेडकर, भारत के उन पहले नेताओं में से थे, बार-बार पडऩे वाले सूखे से भारतीय किसानों को होने वाली तकलीफों से वाकिफ और चिंतित थे और इससे निपटने को आजाद भारत की प्राथमिकताओं में से एक मानते थे।’

एक आंकड़े के अनुसार, 1995 से 2013 तक देश में 2 लाख 84 हजार से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है। बारह-मासी सिंचाई से किसान अपनी जान लेने पर मजबूर नहीं होंगे। जनबंधु के अनुसार, हिमालय में 9,575 ग्लेशियर हैं, जिनका कुल क्षेत्रफल 26,413 वर्ग किलोमीटर है। इनसे 1,292 घन किलोमीटर पानी उपलब्ध हो सकता है। इसके लिए हिमलाय के इलाके में 12.5 लाख करोड़ की लागत से 55 बांधों के निर्माण और नहरों व पाईपलाईनों के जाल ज़रिये इसे देश के असिंचित हिस्सों तक पहुँचाने की व्यवस्था करनी होगी। जनबन्धु का दावा है कि इससे 132.83 मिलियन हेक्टेयर अतिरिक्त कृषि योग्य भूमि की सिंचाई हो सकती है और 50 हजार मेगावाट बिजली भी उत्पादित हो सकती है। अगर यह हो जाता है तो देश में समृद्ध कृषि व्यवस्था के साथ अन्न की आत्मनिर्भरता और कृषि चक्र में सुधार हो सकता है।

जनबंधु इस प्रस्ताव को लेकर पूर्व कृषि मंत्री शरद पवार और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी से मिल चुके हैं। इस प्रस्ताव को उन्होंने संसदीय समिति के समक्ष भी 2006 में पेश किया था। वे बताते हैं, ‘भारत सरकार ने कहा कि इसे पहले राज्यों से अनुशंसित करवा लीजिये फिर केंद्र में विचार होगा’। महाराष्ट्र सरकार में 2009 से आज तक उनका प्रस्ताव लंबित है। नई सरकार से आशान्वित जनबंधु कहते हैं, ‘सिंचाई, भाजपा के नेताओं की प्राथमिकता रही है। वे विदर्भ में सिंचाई की समुचित व्यवस्था के लिए प्रयासरत रहे हैं, इसलिए एक आशा बनती है’। 29 सितम्बर को भंडारा के संसद सदस्य नाना पटोले ने प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर इस परियोजना पर विचार का आग्रह किया है।

ऐसा भी नहीं है कि इस प्रस्ताव का मार्ग निर्बाध है। गंगा मुक्ति आन्दोलन से जुड़े डा विजय कुमार कहते हैं, ‘नदियों, पहाड़ों को छेडऩा घातक होगा। उत्तराखंड के केदारनाथ और कश्मीर में आई तबाही इस छेड़छाड़ का परिणाम है।’ जनबंधु इसके जवाब में कहते हैं कि ‘मैं किसी भी मंच पर पर्यावरणविदों से बात कर उनकी शंकाओं का निवारण करने के लिए तैयार हूँ। मिलने वाले लाभ की तुलना में यह छेड़छाड़ कोई मायने नहीं रखती। स्वास्थ्य कार्यों से जुड़े समाजकर्मी नन्दकिशोर धबर्डे के अनुसार, राज्य सरकार के प्रस्ताव को स्वीकृत न करने के पीछे लालफीताशाही और अफसरों की आपसी प्रतिस्पर्धा है।’

(फारवर्ड प्रेस के  दिसम्बर 2014 अंक में प्रकाशित)


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