मीडिया और मुसलमान

सरकार द्वारा उर्दू की उपेक्षा और समाचारपत्रों व टीवी चैनलों में मुसलमानों के अल्प प्रतिनिधित्व के व्यापक निहितार्थ हैं

सन 2006 में अनिल चमडिय़ा, योगेन्द्र यादव और जीतेन्द्र ने दिल्ली-स्थित 37 मीडिया संस्थानों के संपादकीय विभागों के 315 कर्मियों की सामाजिक पृष्ठभूमि के अध्ययन में पाया था कि वहां मुस्लिम प्रतिनिधित्व न के बराबर है।

मीडिया स्टडीज ग्रुप के शोधों पर आधारित ‘मीडिया और मुसलमान’ नामक पुस्तक, उपलब्ध आंकड़ों का बेहद सूक्ष्मता से अध्ययन करने की कोशिश है। खास कर, हिंदी पट्टी में मीडिया में मुस्लिम प्रतिनिधित्व की स्थिति पर इसमें बड़ी तफसील से प्रकाश डाला गया है। मुस्लिम प्रतिनिधित्व का उच्च जातियों के अशरफ और निम्न ‘जातियों’ के अज्लाफ़ व महिलाओं और पुरुषों के आधार पर वर्गीकरण भी किया गया है।

यह पुस्तक मीडिया में मुसलमानों का उचित प्रतिनिधित्व न होने से सामाजिक तानेबाने में क्या-क्या खामियां आई हैं, उसका विस्तृत विश्लेषण पेश करती है। पहले ही लेख, भूमंडलीकरण के दौर में खबरों की पुष्टि के सिद्धांत’ में अनिल चमडिय़ा ने मीडिया के पूर्वाग्रहों पर सवाल खड़ा किया है। अगर मीडिया अपने पूर्वाग्रहों से मुक्ति पा ले तो समाचारों की पुष्टि के स्रोतों की बेहतर पहचान कर सकता हैं। पत्रकारों के पूर्वाग्रह, जो अक्सर किसी राजनीति विशेष से प्रेरित होते हैं, उनके लेखन को प्रभावित ही नही करते बल्कि वह एक ऐसे समाज का निर्माण करते हैं, जो एक भ्रामक इतिहास पर विश्वास करने लगता है। इस इतिहास से लाभवान्वित होने वाला राजनीतिक समूह, इसे प्रचारित कर एक तथ्य के रुप में समाज में स्थापित कर देता है। इस प्रक्रम में पत्रकार उसका औजार मात्र होता है।

आतंकवाद को लेकर मीडिया में हो रही बहसों और उसके द्वारा रचे गए समाज को जमीनी स्तर पर समझने की कोशिश कई आलेखों मे की गई है। मसीहुद्दीन संजरी का लेख ‘आजमगढ़ का मीडिया ट्रायल’ इस परिघटना को समझने में बहुत उपयोगी है। दिसंबर 2010 में वाराणसी के दशाश्वमेध घाट पर हुए बम विस्फोट के बाद आजमगढ़ के ‘मीडिया ट्रायल’ पर बड़ी सूक्ष्मता से नजर डालते हुए बताया गया है कि किस तरह से लोकतंत्र के चौथे स्तंभ ने जनता को सही व तथ्यात्मक खबरें देने के बजाए अपने पूर्वाग्रहों के आधार पर और सरकारी मशीनरी के हथियार के रूप में खबरों को प्रकाशित किया।

‘हिंदी-उर्दू में विभाजित खबरें’ में शाहीन नजर ने बताया है कि हिंदी अखबारों में मुस्लिम जन-जीवन से जुड़ी खबरों का अभाव होता है। राष्ट्रीय मीडिया, चाहे हिंदी हो या अंग्रेजी, दोनों मुसलमानों से जुड़े मसलों को महत्व नहीं देते। मसलन, यह किस प्रकार, आतंकवाद के नाम पर, सुरक्षा एजेंसियों ने देश के कुछ चिन्हित स्थानों को निशाना बनाया, जहां मुसलमान आर्थिक व सामाजिक रुप से मजबूत हैं। एक तरफ उर्दू मीडिया ने जहां इस मुद्दे के साथ-साथ मुस्लिम नेताओं और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के नागरिक अधिकारों के हनन के मसले को भी उठाया वहीं ‘राष्ट्रीय मीडिया’ में इन घटनाओं पर कोई ध्यान नहीं दिया गया।

लेखक ने एक ही प्रकाशन समूह के हिंदी व उर्दू सामाचारपत्रों के अलग-अलग दृष्टिकोण को बड़े ही कारगर ढंग से प्रस्तुत किया है। ख़बरों को परोसने के तरीके में यह अंतर बहुत साफ-साफ दिख जाता है। जहां उर्दू अखबार किसी खबर को प्रथम पृष्ठ पर प्रमुखता से छापता हैं, वहीं हिंदी अखबार में उसी खबर को जगह तक नहीं मिल पाती।
उर्दू मीडिया की भूमिका और उसके चरित्र को समझने के लिए अलीगढ़ विश्वविद्यालय के सहायक अध्यापक मो. सज्जाद का लेख ‘नई दुनिया: तब और अब’ मददगार हो सकता है। सरकार की उर्दू को लेकर समय-समय पर व्यक्त की जाती रही ‘चिंता’ को अवनीश के ‘डी डी उर्दू’ पर किए गए सर्वेक्षण-आधारित शोध से समझा जा सकता है। डीडी उर्दू के विभिन्न केन्द्रों में काम करने वाले मीडिया कर्मियों की संख्या और उसके सांस्थानिक ढांचे की बदहाल स्थिति से यह आंकना मुश्किल न होगा कि यह चैनल, उर्दू भाषा की वजह से नहीं बल्कि सरकार की बेरुखी की वजह से बदहाल है। ‘समाचारपत्र और मुसलमान प्रतिनिधित्व की विमुखता’ में अविनाश ने उर्दू अखबारों के पत्रकारों की वैचिरिकी का गहरा विश्लेषण करने की कोशिश की है।

किताब के परिशिष्ट में अनिल चमडिय़ा के 16 महत्वपूर्ण लेख व रपटें हैं।

यह पुस्तक इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह हिंदी पट्टी के अख़बारों पर विश्लेषणात्मक लेखन को हिंदी में प्रस्तुत करती है। यह कहना मुश्किल है कि भाषाई सुविधा के कारण, हिंदी पट्टी के पत्रकार, इसमें झांक कर खुद को आंकने की कोशिश करेंगे या नहीं, परन्तु उनके पाठक यह जरुर देख सकेंगें कि वे किस सांचे में गढ़े पत्रकारों को पढ़ रहे हैं।

पुस्तक : मीडिया और मुसलमान
संपादन : अनिल चमडिय़ा
प्रकाशक : मीडिया स्टडीज ग्रुप
फोन: 9868456745

(फारवर्ड प्रेस के जनवरी, 2015 अंक में प्रकाशित)


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