धार्मिक अधिकारों पर संघ परिवार का पहरा

ये स्वनियुक्त हिन्दू धर्मरक्षक धर्मांतरण को तो मुद्दा बनाते हैं लेकिन जाति पर आधारित शोषण-दमन, भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार जैसे मसले उनकी नजर में कोई समस्या नहीं हैं

उत्तर भारत में हाल ही में परस्पर संबद्ध दो घटनाएं एक के बाद एक हुईं। पहली घटना उत्तर प्रदेश में अलीगढ़ से तीस किलोमीटर दूर असरोई की है, जहां अगस्त माह के अंत में छह दर्जन लोगों को ईसाई से हिंदू धर्म में वापस लाया गया। दूसरी घटना मध्यप्रदेश के शिवपुरी जिले की खनियांधाना तहसील स्थित बुकर्रा गांव की है, जहाँ सितम्बर की शुरुआत में कुछ लोगों की इस्लाम धर्म से हिंदू धर्म में वापसी हई। पुलिस की निगरानी और मीडिया की निगहबानी में इन लोगों का ‘शुद्धिकरण’ हुआ। इन दोनों घर वापसियों से संघ परिवार अति प्रसन्न है। असरोई में हिंदू संगठनों ने लगे हाथों स्थानीय गिरजाघर को भी शिव मंदिर में बदल दिया। यानी आदमी के साथ, धार्मिक स्थल का भी ‘शुद्धिकरण’! राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और दूसरे उग्र हिंदू संगठन, धर्मांतरण की इस प्रक्रिया को धर्म परिवर्तन की बजाय ‘घर वापसी’ बता रहे हैं। परन्तु यह साफ़ है कि यह सब देश का धार्मिक ध्रुवीकरण करने की संघ परिवार की रणनीति का हिस्सा है। धर्मांतरण एक बार फिर संघ परिवार के एजेंडे पर है और वह भी काफी आक्रामक स्वरुप में।

गौरतलब है कि असरोई में धर्मान्तरित हुए सभी बहत्तर लोग दलित वाल्मीकि जाति से थे और उन सबने लगभग दो दशक पहले ईसाई धर्म ग्रहण किया था। बुकर्रा के नव-हिन्दू भी दलित हैं और इसी साल फरवरी में धर्मपरिवर्तन कर मुसलमान बने थे। जाहिर है कि ये लोग तभी से हिंदू संगठनों की आंखों में खटक रहे थे। ये संगठन अपनी तरफ से पूरी कोशिशें कर रहे थे कि उनकी ‘घर वापसी’ हो। उनके लगातार ‘प्रयासों’ का ही नतीजा था कि ‘भटके हुए लोग’ वापस अपने ‘घर’ आ गए। ऐसे मामले अक्सर सामने आ रहे हैं। दिलीप सिंह जूदेव ने छत्तीसगढ़ में ईसाई धर्म स्वीकार कर चुके आदिवासियों को फिर से हिंदू बनाने के लिए बाकायदा अभियान चलाया था, जिसे उन्होंने ‘घर वापसी’ का नाम दिया था। गुजरात के आदिवासी इलाके डांग में भी स्वामी असीमानंद, जो फिलवक्त समझौता एक्सप्रेस बम विस्फोट मामले में अहम आरोपी हैं और जेल में आराम फरमा रहे हैं, ने एक बड़ी मुहिम के तहत ईसाई बन गए आदिवासियों का फिर से हिंदू धर्म में दाखिला कराया था। धर्मपरिवर्तन के इस पूरे अभियान को गुजरात की तत्कालीन मोदी सरकार का पूरा समर्थन हासिल था। वहां यह काम, बड़े पैमाने पर बिना रोक-टोक कई दिनों तक चला। झारखंड और ओडि़शा, जहां आदिवासी बड़ी तादाद में हैं, वहां से भी इस तरह की खबरें आए दिन आती रहती हैं।

धर्मांतरण की इन घटनाओं के तटस्थ विश्लेषण से यह साफ़ हो जायेगा कि दूसरा धर्म ग्रहण करने वाले ज्यादातर लोग हिंदू समाज की दलित-वंचित जातियों के या फिर गरीब आदिवासी रहे हैं। हिंदू समाज में सबसे निचले पायदान पर रखी गई इन जातियों की सामाजिक हैसियत और उनसे ऊंची कही जाने वाली जातियों का उनके साथ बर्ताव किसी से छिपा नहीं है। ऊंची और दबंग जाति के लोग इनके साथ जानवरों सा बर्ताव करते हैं। दलित और वंचित जातियों को समाज में हर जगह भेदभाव का सामना करना पड़ता है। मंदिरों में उन्हें प्रवेश नहीं मिलता। उनका शोषण और दमन होता है। तनिक भी विरोध करने पर उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाता है, जो गरीबी, अशिक्षा और अभाव से भरी उनकी जिंदगी को और भी दुखमय बना देता है।

ऐसे में अगर किसी दूसरे मत या धर्म के प्रचारकों की ओर से उन्हें यह उम्मीद दिलाई जाती है या उन्हें खुद लगता है कि कोई खास मजहब स्वीकार करने से उन्हें इस सामाजिक त्रासदी से मुक्ति और बेहतर, सम्मानजनक जीवन-स्तर मिल सकता है, तो दमित वर्गों का उस ओर आकर्षित होना कोई ताज्जुब की बात नहीं। पूर्वोत्तर भारत में ईसाई धर्म प्रचारकों ने शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में जमीनी काम से हिंदू समाज के हाशिये की जातियों को प्रभावित किया। सामाजिक अपमान से त्रस्त कमजोर तबकों के हिंदुओं ने बौद्ध या ईसाई धर्म की ओर रुख किया जो स्वभाविक भी है। फिर हमारे देश का संविधान भी हर नागरिक को धर्म की स्वतंत्रता प्रदान करता है।

संवैधानिक अधिकार

संविधान की प्रस्तावना में तो यह साफ-साफ उल्लिखित है ही, साथ ही धार्मिक स्वतंत्रता को मौलिक अधिकारों में भी शामिल किया गया है। संविधान का अनुच्छेद 25 नागरिकों को ”अंत:करण की और धर्म की अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है। यानी भारतीय संविधान हर भारतीय को अपने धार्मिक विश्वासों का पालन करने के अलावा उनमें बदलाव करने की इजाजत भी देता है। लेकिन हिंदुत्व की राजनीति करने वाले, धर्मपरिवर्तन की हर घटना को जबरन धर्मांतरण के रूप में प्रचारित करते हैं। उनके द्वारा समाज में यह हौव्वा खड़ा कर दिया जाता है कि हिंदू धर्म ‘खतरे’ में है और दलित जातियों का धर्मांतरण, अंतरराष्ट्रीय ‘साजिश’ के तहत हो रहा है।

धर्मपरिवर्तन की चुनिन्दा घटनाओं को जानबूझकर विवाद का मुद्दा बनाया जाता है। ऐसे मामलों में ‘जबर्दस्ती’ के पहलू को खूब हवा दी जाती है, भले ही धर्मपरिवर्तन करने वाले शख्स ने खुद ही इसके लिए रजामंदी जाहिर की हो। ये स्वनियुक्त हिन्दू धर्मरक्षक धर्मांतरण को तो मुद्दा बनाते हैं लेकिन जाति पर आधारित शोषण-दमन, भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार जैसे मसले उनकी नजर में कोई समस्या नहीं हैं। बुकर्रा गांव की ही यदि बात करें, तो यहां रहने वाला दलित समुदाय वर्षों से बेहद कष्टप्रद जीवन जी रहा है। मनरेगा में उन्हें काम नहीं, मिलता और उचित मूल्य की दुकानों से पूरा राशन। कहने को मध्यप्रदेश सरकार की ओर से गांव में दलित समुदाय के बाईस परिवारों को खेती के लिए पट्टे मिले थे लेकिन वे लोग आज भी वहां खेती नहीं कर पाते। गांव की दबंग जाति के लोगों ने उनके खेतों पर कब्जा कर लिया है। जब भी वे अपने खेतों पर जाते हैं, तो उन्हें मारकर भगा दिया जाता है। परन्तु संघ परिवार का दलितों के इन बुनियादी सवालों से कोई सरोकार नहीं है। दलितों और वंचितों को ईश्वर और धर्म से ज्यादा रोजी-रोटी और सम्मान की जरूरत है। यदि उन्हें रोजी-रोटी और समाज से सम्मान मिले, तो वे क्यों धर्मांतरण के बारे में सोचेंगे।


धार्मिक (अ) स्वतंत्रता अधिनियम

मध्यप्रदेश सरकार ने धर्मांतरण रोकने के लिए कानून बना रखा है। पहले भी संघ श्बरी योजना के तहत प्रदेश भर में ईसाई धर्म स्वीकार कर चुके आदिवासियों को वापस हिन्दू धर्म में लाने की मुहिम चला चुका है। सूबे के शिवपुरी जिले में पुलिस ने धर्म परिवर्तन कानून के उल्लंघन के आरोप में चार लोगों को गिरफ्तार कर लिया। इनमें से दो, मनीराम और तुलाराम पर पहले से ही धार्मिक स्वातंत्र्य अधिनियम के तहत मुकदमा चल रहा है। पुलिस ने बाद में मनीराम की पत्नी मक्खो और उसके बेटे केशव उर्फ कासिम के खिलाफ भी अधिनियम की धारा 4, 5 और आईपीसी की धारा 188 के तहत मुकदमा दर्ज किया। बाद में जमानत पर रिहा हुए मनीराम और तुलाराम का भगवा संगठनों के लोगों ने वापस हिन्दू धर्म में प्रवेश कराया। प्रारंभिक जांच में यह भी सामने आया कि मनीराम और तुलाराम का परिवार अपनी सारी जमीन बेचकर कहीं और बसने की तैयार में था। जिला पुलिस अधीक्षक एमएस सिकरवार ने इस मामले की जांच के लिए एसआईटी गठित की है। पुलिस ने उन लोगों के बैंक खातों की भी जांच की लेकिन खाते में कोई बड़ी रकम जमा न होने की बात कही है। वहीं केशव उर्फ कासिम का कहना है कि धर्मपरिर्वतन करने का फैसला उसने स्वविवेक से लिया है। उसका कहना है कि जिस धर्म में उसे सर उठाकर जीने का अवसर और इंसानों जैसा व्यवहार मिलेगा, वह क्यों न उसे स्वीकार करे! -हुसैन ताबिश

(फारवर्ड प्रेस के जनवरी, 2015 अंक में प्रकाशित)


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