न्यायपालिका में लैंगिक अन्याय

रूमा पाल को देश की प्रथम महिला मुख्य न्यायाधीश बनने की दौड़ से कैसे अलग किया गया, यह अभी भी रहस्य बना हुआ है. आंकडे बताते हैं कि किसी अलिखित नियम के तहत, भारत में अदालतों पर केवल पुरुषों का वर्चस्व बना हुआ है

भारतीय गणतंत्र के 65 साल  पूरे हो गए हैं. इतिहास के इन ‘गौरवशाली’ 65 सालों में, सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की कुर्सी तक एक भी महिला नहीं पहुँच पाई या पहुँचने नहीं दी गई. वर्तमान स्थिति के अनुसार, अगस्त 2022 तक, कोई स्त्री मुख्य न्यायाधीश नहीं बन  सकेगी.

संविधान  लागू होने के लगभग 40 साल बाद, फातिमा बीवी (6 अक्टूबर, 1989) सर्वोच्च न्यायालय की पहली महिला न्यायाधीश बनीं. वे 1992 में सेवानिवृत्त हो गईं. इसके बाद, सुजाता वी. मनोहर (1994),  रुमा पाल (2000), ज्ञान सुधा मिश्रा (2010), रंजना प्रकाश देसाई (2011) और आर. बानूमथि (2014) को सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश बनने का अवसर मिला. कुल मिला कर, 65 सालों में, 219 (41  पूर्व मुख्य न्यायाधीशों, 150 पूर्व न्यायाधीशों और 28 वर्तमान न्यायाधीशों) न्यायाधीशों में से केवल 6 (2.7%) महिलाएं थीं.

रुमा पाल को नहीं बनने दिया गया मुख्य न्यायाधीश

Justice Ruma Pal

Justice Ruma Pal

सन 2000, जो सुप्रीम कोर्ट का स्वर्ण जयंती वर्ष था, में 29 जनवरी को, मुख्य न्यायाधीश ए.एस.आनंद द्वारा तीन नए न्यायमूर्तियों (डोरेस्वामी राजू, रूमा पाल और वाई.के.सभरवाल) को शपथ दिलाई जानी थी.  अचानक, ना जाने  क्यों, शपथग्रहण  की तारीख 29 की बजाय 28 जनवरी कर दी गई. शायद स्वर्ण जयंती समारोह की वजह से.

डोरेस्वामी राजू और वाई.के.सभरवाल को 28 जनवरी को सुबह शपथ दिलाई गई और रूमा पाल को दोपहर बाद. बाद में पता चला कि डोरेस्वामी राजू और वाई.के.सभरवाल को समय रहते शपथग्रहण की तारीख में परिवर्तन की सूचना मिल गई परन्तु  रूमा पाल को नहीं मिली.

उसी दिन यह तय हो गया था कि अगर कोई अनहोनी नहीं हुई तो, डोरेस्वामी राजू (जन्म 2.7.1939) एक जनवरी 2004 को रिटायर हो जायेंगे और मुख्य न्यायाधीश आर.सी. लाहोटी के सेवानिवृत्त होने के बाद, एक नवम्बर, 2005 को वाई.के.सभरवाल (जन्म 14 जनवरी, 1942) भारत के नए मुख्य  न्यायाधीश बनेंगे और 13 जनवरी 2007 तक इस पद पर रहेंगें. इस बीच, रूमा पाल (जन्म 3.6.1941)  2 जून 2006 को, सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति के रूप  रिटायर हो जायेंगीं.

रूमा पाल को समय से सूचना मिलने में इतनी देरी  हुई कि देश की किसी ‘बेटी’ को ना जाने कितने साल और देश का मुख्य न्यायाधीश बनने के लिए इंतज़ार करना होगा. शपथ लेने में कुछ घंटों की देरी से देश के न्यायिक इतिहास की धारा ही उलट गई. कहना कठिन है कि नारीवादी इतिहासकार इसे सिर्फ ‘संयोग’ और ‘नियति’ कहेंगे या ‘पितृसत्ता का षड्यंत्र’?

स्त्रियों  को सिद्ध  करना पड़ती है ‘योग्यता’

जहाँ सर्वोच्च न्यायालय में यह स्थिति है, वहीं देश के अधिकाँश उच्च-न्यायालय अपनी ‘प्रथम महिला मुख्य न्यायाधीश’ का इंतज़ार कर रहें हैं. 9 फरवरी, 1959 को अन्ना चेंदी देश में किसी भी उच्च न्यायायलय की पहली महिला न्यायाधीश बनीं जब उन्हें केरल उच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में शपथ दिलाई गयी. इसके कई साल बाद, (30 मई, 1974) पी.जानकी अम्मा और के.के.उषा (1991) केरल उच्च न्यायालय की न्यायाधीश बनीं. लीला सेठ, दिल्ली उच्च न्यायालय की प्रथम महिला न्यायाधीश (25.7.1978) थीं, जो भारत में किसी भी उच्च-न्यायालय की ‘प्रथम महिला मुख्य न्यायाधीश’ (हिमाचल, १९९१) बनीं. सन 2013 में टी. मीना कुमारी को मेघालय उच्च न्यायालय और 2014 में जी. रोहिणी को दिल्ली उच्च न्यायालय और डॉक्टर मंजुला चेल्लुर को कलकत्ता उच्च-न्यायालय की ‘प्रथम महिला  मुख्य न्यायाधीश’ बनने का गौरव प्राप्त हुआ. देश भर के 24 उच्च न्यायालयों में अब तक नियुक्त महिला न्यायधीशों की संख्या 7 प्रतिशत से अधिक नहीं है. न्यायपालिका में महिला न्यायधीशों की कमी का एक कारण यह बताया जाता है कि वकालत के पेशे में ही महिलाओं की संख्या, पुरुषों के मुकाबले बहुत कम है. उच्च न्यायपालिका में ‘महिला आरक्षण’ के सवाल पर बड़े से बड़े विद्वान् न्यायविदों की राय ‘योग्यता’ के पक्ष में जा खड़ी होती हैं.

परिधी पर स्त्री

आश्चर्यजनक तथ्य यह भी है कि इन 65 सालों में भारत के कानून मंत्री (भीमराव रामजी आम्बेडकर से लेकर शिवानन्द गौडा तक) व राष्ट्रीय विधि आयोग और राष्ट्रीय मानवाधीकार आयोग के अध्यक्ष पदों पर भी मर्दों का कब्ज़ा बना हुआ है. भारत के अटोर्नी जनरल और सोलिसिटर जनरल का पद भी मानों पुरुषों के लिए आरक्षित रहा है. हाँ, कुछ समय पहले, इंदिरा जयसिंह को अतिरिक्त सोलिसिटर जनरल बना कर, महिला सशक्तिकरण की जय-जयकार अवश्य की गई थी. मतलब यह कि सभी महत्वपूर्ण निर्णय-स्थलों पर पुरुषों का वर्चस्व बना रहा है.

यही नहीं, वकीलों की अपनी संस्थाओं में भी महिला अधिवक्ताओं को हाशिये पर ही खड़ा रखा गया. बार कौंसिल ऑफ़ इंडिया के अभी तक सभी अध्यक्ष (एम सी. सीतलवाड़ से लेकर मन्नन कुमार मिश्र तक) मर्द  ही रहे हैं.  दिल्ली में हाईकोर्ट बार एसोसिएशन, दिल्ली बार एसोसिएशन (तीस हजारी कोर्ट), नई दिल्ली बार एसोसिएशन (पाटियाला हाउस कोर्ट), रोहिणी बार एसोसिएशन, शाहदरा बार एसोसिएशन, साकेत बार एसोसिएशन और द्वारका बार एसोसिएशन के अध्यक्ष और महामंत्री भी पुरुष ही चुने जाते रहे हैं. अपवाद के तौर पर परीना स्वरुप व ऐश्वर्य भाटी सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की महामंत्री और  संतोष मिश्रा नई दिल्ली बार एसोसिएशन (पाटियाला हाउस) के अध्यक्ष पद का चुनाव जरूर जीती हैं. अगर देश की राजधानी  में यह हाल है तो  राज्यों की स्थिति का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

पहली महिला वकील

यहाँ उल्लेखनीय है कि रगीना गुहा के मामले में कलकत्ता उच्च न्यायालय (१९१६) और सुधांशु बाला हजारा के मामले में पटना उच्च न्यायालय (1922) ने कहा था कि “महिलायें कानून की डिग्री के बावजूद अधिवक्ता होने की अधिकारी नहीं हैं”. इस संदर्भ में ये दोनों ऐतिहासिक दस्तावेज पढने योग्य हैं. 24 अगस्त, 1921 को पहली बार इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कोर्नेलिया सोराबजी को वकालत करने की अनुमति दी थी. स्त्री अधिवक्ता अधिनियम, 1923 ने, अंततः, महिलाओं की इस ‘अयोग्यता’ को समाप्त किया. इस हिसाब से देखें तो महिलाओं को वकालत के पेशे में सक्रिय भूमिका निभाते अभी 100 साल भी पूरे नहीं हुए हैं. सन २०२१  में, जब इसकी शताब्दी  मनाई जाएगी, तब तक क्या यह विश्वास और उम्मीद की जा सकती है कि न्याय व्यवस्था में लिंग भेद नहीं होगा? जब तक महिलाओं को समता और सम्मान नहीं मिलता तब तक ‘जेंडर जस्टिस’ का स्वप्न केवल स्वप्न ही रहेगा. ‘कॉलेजियम सिस्टम’ टूटने से इस स्थिति में क्या अंतर आयेगा, यह अभी भविष्य के गर्भ में छुपा हुआ है.

 

फारवर्ड प्रेस के अप्रैल, 2015 अंक में प्रकाशित

 

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