नागराजू कोप्पुला (1980-2015): उसने हार न मानने की कीमत अदा की

संभावनाओं से भरपूर एक मडिगा दलित पत्रकार के अल्पकालिक करियर से अंग्रेजी समाचापत्रों के न्यूज रूमों में व्याप्त जातिवाद की झलक मिलती है

सरपाका से बैंगलोर से दिल्ली और फिर हैदराबाद। नागराजू कोप्पुला के जीवन की कहानी दिल को छूने वाली है। यह एक व्यक्ति के साहस और मुसीबतों से दृढ़तापूर्वक जूझने की कहानी है। वह तब तक लड़ता रहा, जब तक कि भारतीय समाज को जकड़े जातिवाद ने उसकी सांसे उससे छीन न लीं।

kullpaमंदिरों के बाहर बर्फ बेचने से लेकर ब्राह्मणवादी वर्चस्व के गढ़ – अंग्रेजी प्रिंट मीडिया – में सेंध लगाने वाले नागराजू, एक हिम्मतवर लड़ाका थे, जिन्हें समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव ने उस फेंफड़े के कैंसर से कहीं ज्यादा कष्ट दिया, जिसने अंतत: उनकी जान ली। हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर डिग्री हासिल करने के बाद, नागराजू को बैंगलोर स्थित प्रतिष्ठित ‘इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ जर्नलिज्म एंड न्यू मीडिया’ से पत्रकारिता में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा करने के लिए छात्रवृत्ति मिल गई। वे हंसमुख स्वभाव के थे और हमेशा लोगों की मदद करने के लिए तैयार रहते थे। इस कारण इस संस्थान में उनके ढेर सारे मित्र बन गए और इनमें सभी जातियों और वर्गों के लोग शामिल थे। अगर वहां अध्ययन करते समय उन्हें कुछ अप्रिय अनुभवों से गुजरना पड़ा भी होगा तो नागराजू उन लोगों में से नहीं थे जो उनकी कथा ही दोहराते रहते। वे ”क्षमा करो और भूल जाओ” की नीति में विश्वास रखते थे। डिप्लोमा हासिल करने के बाद, उन्होंने चेन्नई स्थित ”द हिंदू” अखबार में इंटर्नशिप की। ”द हिंदू” में उन्हें स्थायी नौकरी मिलेगी या नहीं, यह इस पर निर्भर था कि वे अंग्रेजी का टेस्ट पास कर पाते हैं या नहीं। इससे एक महत्वपूर्ण प्रश्न उभरता है और वह यह है कि पत्रकार के लिए क्या ज्यादा जरूरी है-अंग्रेजी पर पकड़ या एक अच्छे रिपोर्टर के गुण। नागराजू में समाचार खोद निकालने की अद्भुत क्षमता थी, जिसका हैदराबाद के एक अन्य अंग्रेजी दैनिक ने भरपूर उपयोग किया। परंतु इसकी चर्चा बाद में।

”द हिंदू’ में नौकरी न मिलने के बाद वे दिल्ली आ गए, जहां उन्हें ”तहलका स्कूल ऑफ जर्नलिज्म’ में पढऩे के लिए छात्रवृत्ति मिली थी। उनके शिक्षक, प्रतिष्ठित पत्रकार परन्जॉय गुहा ठाकुरदा, जिनके अधीन उन्होंने कुछ समय काम भी किया, उन्हें उनकी कठिन मेहनत करने की क्षमता और समर्पण के लिए याद करते हैं। ”वो मेरी कक्षा के अन्य सभी लड़कों से अलग था। बाकी सब श्रेष्ठी वर्ग से थे, जिन्हें यह नहीं मालूम था कि वे अपनी जिंदगी में क्या करना चाहते हैं। परंतु नागराजू यह अच्छी तरह से जानता था’, परान्जॉय ने ”दिल्ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स’ द्वारा नागराजू की स्मृति में आयोजित शोकसभा में कहा। नागराजू अंग्रेजी भाषा के पत्रकार बनने के लिए दृढ़ संकल्पित थे और उन्होंने अपनी अंग्रेजी सुधारने के लिए दिन-रात मेहनत की।

दिल्ली में पढ़ाई पूरी करने के बाद जब उन्हें हैदराबाद के एक अंग्रेजी दैनिक में नौकरी मिल गई तो उन्हें लगा कि उनके बुरे दिन खत्म हो गए हैं। परंतु ऐसा नहीं हुआ। उन्हें बहुत मामूली वेतन पर नौकरी दी गई और यह जानते हुए भी कि उनके सहकर्मियों की तुलना में उन्हें बहुत कम वेतन दिया जा रहा है, उन्होंने यह नौकरी स्वीकार कर ली। परंतु उन्हें यह नहीं मालूम था कि पत्रकारिता के पेशे में खून चूसने वालों की भरमार है और उन लोगों का खून सबसे अधिक चूसा जाता है, जिनमें सबसे कम खून होता है। यद्यपि सभी को कम वेतन मिलता है परंतु जो लोग हाशिए पर पड़े वर्गों से आते हैं, उन्हें कम से कम पैसे देना मानो एक अलिखित नियम है। किसी सवर्ण को अधिक या कम वेतन मिल सकता है परंतु अवर्ण को तो आवश्यक रूप से कम वेतन दिया जाता है।

मीडिया संस्थानों में आज ‘कान्ट्रेक्ट’ का बोलबाला है। जोर ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने पर है न कि संपादकीय सामग्री की गुणवत्ता पर। और इस व्यवस्था के शिकार सवर्ण और अवर्ण दोनों बनते हैं। परंतु द्विज, उन विशेषाधिकारों के जरिए, जो लंबे समय से जारी उनके वर्चस्व के नतीजे में उन्हें प्राप्त होते हैं, इस व्यवस्था से बेहतर ढंग से मुकाबला कर लेते हैं। सवर्ण पत्रकारों के सभी शहरों में जाति आधारित नेटवर्क हैं, जो नए पत्रकारों की मदद करते हैं-ठीक उसी तरह से जैसे लंदन में गुजरातियों या कनाडा में पंजाबियों के। नागराजू, अंग्रेजी प्रिंट मीडिया के पहले मडिगा दलित पत्रकार थे और उनकी मदद करने के लिए कोई नेटवर्क नहीं था। अंग्रेजी प्रिंट मीडिया में कुल मिलाकर 40 से ज्यादा दलित पत्रकार नहीं हैं और वे आपको बताएंगे कि किस तरह उन्हें बेकार समझी जाने वाली बीटें दी जाती हैं और ब्यूरो में वे अल्पसंख्यकों से संबंधित मामलों को कव्हर करने वाले एकमात्र पत्रकार होते हैं। उसके बाद उन पर दलित संवाददाता का ठप्पा लगा दिया जाता है। वे आपको यह भी बताएंगे कि उन्हें देरसबेर विकल्पों की तलाश करनी पड़ती है। व्यवस्था यह सुनिश्चित करती है कि वे पत्रकारिता छोड़ दें या वह उनकी जान ले लेती है, जिस तरह उसने नागराजू की ले ली।
नागराजू ने ढेर सारी अच्छी रपटें लिखीं, जिनमें से कई अखबार के पहले पन्ने पर भी छपीं। वे हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी से रोजाना 50 किलोमीटर का सफर तय कर अखबार के कार्यालय आते थे। अपने बहुत कम वेतन में वे शहर में मकान नहीं ले सकते थे और इस वेतन का भी बड़ा हिस्सा उन्हें घर भेजना पड़ता था और उसी में से मोटरसाइकिल खरीदने के लिए जो कर्ज उन्होंने लिया था, उसकी किस्तें चुकानी होती थीं। खाने-पीने का कोई ठिकाना न था और धीरे-धीरे उनके फेंफड़े कमजोर होते गए और वे बीमार पड़ गए।

हैदराबाद के ‘गर्वमेंट चैस्ट एंड टी बी हास्पिटल’ ने उन्हें टीबी का मरीज घोषित कर दिया। दरअसल, वे टीबी से ग्रस्त नहीं थे। चूंकि उनके नियोक्ता ने उनकी कोई मदद नहीं की इसलिए वे बिना वेतन के पांच महीने की छुट्टी लेकर सरपाका चले गए, जहां उन्होंने आरोग्यश्री नामक सरकारी योजना के अंतर्गत टीबी का इलाज करवाया। यह योजना गरीबी की रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले लोगों के लिए है। किसी भी संस्थान के लिए यह शर्मनाक है कि उसके किसी कर्मचारी को बीपीएल सूची में अपना नाम दर्ज करवाना पड़े। नागराजू के नियोक्ता को कम से कम मानवीय आधार पर उनके इलाज में मदद करनी चाहिए थी। उल्टे जिस अखबार के लिए उन्होंने दिन को दिन और रात को रात नहीं समझा था, उसने उन्हें उसी दिन मृत मान लिया जिस दिन यह पता चला कि वे स्टेज 4 के फेफड़ें के कैंसर से ग्रस्त हैं। यह संस्थान, जो अपनी खबरों में मानवाधिकारों का ढोल पीटता है और स्वयं को अत्यंत प्रगतिशील व उदार विचारों का पैरोकार बताता है, ने नागराजू को बिना कोई सूचना दिए, उनका नाम कर्मचारियों की सूची से हटा दिया।

नागराजू ने बीमार पडऩे से पहले कई लोगों की मदद की थी और इसलिए जब उन्हें पैसे की जरूरत पड़ी, तो वे लोग आगे आए। उनके नियोक्ता ने तो उनकी कोई खोज खबर नहीं ली परंतु उनके मित्रों ने पैसे जुटाकर उनके इलाज की व्यवस्था की। जो लोग उन्हें सीधे नहीं जानते थे, वे भी उनकी मदद के लिए आगे आए। इस तरह की घटनाओं से मानवीयता में हमारा विश्वास पुनर्स्‍थापित होता है। परंतु इस सब के बावजूद भी नागराजू की जान नहीं बचाई जा सकी। 12 अप्रैल को उन्होंने अंतिम सांस ली और उन्हें गोदावरी नदी के किनारे सुपुर्दे खाक कर दिया गया। वे अपने पीछे बूढ़ी मां को छोड़ गए हैं, जिनके सामने अब एक अनिश्चित भविष्य है। घर का एकमात्र कमाने वाला व्यक्ति नहीं रहा और परिवार में उनके चार भाई-बहन, चार भतीजियां और दो भतीजे हैं, जो उन पर निर्भर थे।

अपने जीवन की अंतिम सांस तक नागराजू ने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा। उन्होंने उस बीमारी का, जो शनै: शनै: उनके शरीर को खोखला करती जा रही थी, हिम्मत से मुकाबला किया। ठीक उसी तरह जिस तरह उन्होंने उन सामाजिक बुराईयों से मुकाबला किया था जिन्हें मनु अपने पीछे छोड़ गए हैं। नागराजू नहीं रहे और अब हमें न्यूज रूमों में न्याय के लिए लडऩा है और मीडिया संस्थानों को दबे-छुपे और खुल्लमखुल्ला जातिगत भेदभाव के कैंसर से छुटकारा दिलवाना है।

फारवर्ड प्रेस के जून, 2015 अंक में प्रकाशित

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