ब्राह्मण-बनिया राज के विरूद्ध शंखनाद

सन् 1990 के दशक की शुरूआत तक भारतीय अर्थव्यवस्था को लायसेंस-कोटा राज के नाम से जाना जाता था। परंतु इनमें से किसी भी दलित उद्यमी से पूछिए और वह आपको बताएगा कि उस समय अर्थव्यवस्था पर ब्राह्मण-बनिया राज भी था

रतिलाल मकवाना, ‘‘गुजरात पिकर्स’’ के मालिक हैं। इस कंपनी का वार्षिक कारोबार 750 करोड़ रूपये है। वे एक दलित हैं। उनके पिता गालाभाई ने इस व्यवसाय की नींव डाली थी। व्यवसाय की दुनिया में किस्मत आजमाने वाले वे अपने परिवार के पहले व्यक्ति थे। स्थानीय शासक द्वारा भेंट किए गए जमीन के एक टुकड़े पर चमड़े का कारखाना स्थापित करने से पहले, गालाभाई और उनके भाई भावनगर की एक मलिन बस्ती के पास चारा बेचा करते थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान प्रसंस्कृत चमड़े की मांग में जबरदस्त बढोत्तरी हुई और गालाभाई ने जमकर कमाई की। युद्ध ने कपड़ा मिलों पर विपरीत प्रभाव डाला और लूमों में इस्तेमाल होने वाले चमड़े के काटन पिकर्स की मांग घट गई परंतु गालाभाई ने हार नहीं मानी। एक साल के भीतर वे देशभर में फैली कपड़ा मिलों को पिकर बेच रहे थे।

DE2लगभग इसी वक्त, रतिलाल ने अपने पारिवारिक व्यवसाय में प्रवेश किया। वे उत्पादन के काम की देखभाल करते थे जबकि उनके पिता देश भर में घूमकर उत्पाद की मार्केटिंग करते थे। रतिलाल ने स्टेट बैंक आफ सौराष्ट्र में कर्जे के लिए दरख्वास्त दी। वे पिकर बनाने की एक स्वचलित मशीन स्विट्जरलैंड से आयात करना चाहते थे। बैंक के नागर ब्राह्मण अधिकारियों ने उनका आवेदन नामंजूर कर दिया क्योंकि ‘‘चमड़ा’’ शब्द अपनी फाईलों में लिखना भी उन्हे गवारा नहीं था। किस्मत से एक दिन तत्कालीन वाणिज्य मंत्री टी.टी. कृष्णामाचारी भावनगर आए और उन्होंने शहर के अग्रणी व्यवसायियों से मिलने की इच्छा प्रगट की। इस बैठक में रतिलाल को भी बुलाया गया और उन्होंने अपनी समस्या कृष्णामाचारी को बताई। कृष्णामाचारी भी ब्राह्मण थे परंतु उन्होंने जिला कलेक्टर को निर्देश दिया कि वे बैंक के अधिकारियों को समझाएं कि चमड़ा दरअसल काला सोना है। कृष्णामाचारी की फटकार के बाद, रतिलाल और गालाभाई को कर्ज मिल गया और स्विट्जरलैंड से स्वचलित मशीन भावनगर आ गई। रतिलाल ने जब अपने व्यवसाय को अकेले पूरी तरह संभाला, तब तक बाजार में प्लास्टिक के पिकर आने लगे थे और चमड़े के पिकर की मांग घट गई थी।
रतिलाल ने व्यावसायिक चतुराई अपने पिता से विरासत में पाई थी। वे देख चुके थे कि उनके पिता किस तरह पहले से ही यह भांप लेते थे कि हवा की दिशा में क्या परिवर्तन आने वाला है। रतिलाल ने एक अखबार में इंडियन पेट्रो केमिकल्स कार्पोरेशन लिमिटेड (आईपीसीएल) नाम की सरकार कंपनी का विज्ञापन देखा। आईपीसीएल को लो-डेनसिटी पाली इथिलीन (एलडीपीई) के लिए वितरक चाहिए थे। दो साल तक कई राजनेताओं के दरवाजे खटखटाने के बाद अंततः सन् 1980 में उन्हें यह काम मिल गया। परंतु केवल वितरक बनने से काम नहीं चलने वाला था। उन्हें खरीददार भी ढूंढने थे। भावनगर में बहुत बड़ा प्लास्टिक उद्योग था परंतु सभी निर्माता हाई-डेनसिटी पालि इथिलीन (एचडीपीई) का इस्तेमाल करते थे। प्लास्टिक निर्माताओं को इस नए कच्चे माल का इस्तेमाल करने के लिए राजी करने में सबसे बड़ी बाधा थी उनकी जाति – जिसे वे बदल नहीं सकते थे। वे दलित थे और अधिकांश कारखाना मालिकों ने उनका बहिष्कार करने का मन बना लिया था। परंतु संयोग से उनमें से एक कारखाने में काम करने वाले अधिकांश मजदूर दलित थे। उस कारखाने के मालिक को यह डर था कि वे काम छोड़कर चले जाएंगे इसलिए रतिलाल के वितरक के तौर पर नियुक्ति के पहले ही दिन उसने, उनसे एलडीपीई खरीदी। धीरे-धीरे अन्य निर्माता भी उनसे कच्चा माल खरीदने लगे।

लगभग दो दशकों तक रतिलाल का व्यवसाय जमकर फला-फूला। उन्होंने हजारों लोगों को रोजगार दिया, जिनमें से अधिकांश दलित थे। फिर, 2002 में, सरकार ने आईपीसीएल का एक हिस्सा रिलायंस को बेच दिया और नये प्रबंधन ने रतिलाल से डिस्ट्रीब्यूटरशिप वापस ले ली। उन्होंने पेट्रो केमिकल आयात के व्यवसाय से जुड़ने का प्रयास DEकिया परंतु सफल न हो सके। इसके बाद उन्हें गैल और इंडियन आयल की डिस्ट्रीब्यूटरशिप मिल गई। रतिलाल की उम्र अब 70 से अधिक है। दलित युवाओं को उनकी सलाह है, ‘‘अच्छी शिक्षा पाओ, आईएएस अधिकारी या डाक्टर बनो। उसके बाद अपना व्यवसाय शुरू करने की सोचो। दलितों को व्यवसाय के लिए धन जुटाने में कहीं अधिक संघर्ष करना पड़ता है और उनके लिए व्यवसाय करना अपेक्षाकृत कठिन है’’। रतिलाल ने बहुत उतारचढ़ाव देखे हैं। उन्होंने देखा है कि बाजार व्यवस्था कितनी हृदयहीन और क्रूर होती है और यह भी कि वह दलितों और अन्यों में विभेद करती है।

रतिलाल उन चंद दलित उद्यमियों में से हैं, जिनके जीवन और संघर्ष की कहानियां ‘‘डिफाईंग द आड्स: द राईज आफ दलित आंत्रेप्रेन्योरस’’ (रेंडम हाउस) व ‘‘दलित करोड़पति: 15 प्रेरणादायक कहानियां’’ (पेंग्विन) नामक सद्यप्रकाशित पुस्तकों में संकलित हैं।

‘‘डिफाईंग द आड्स’’ में इन संघर्षशील व मेहनती व्यवसायियों की उपलब्धियों का दिलचस्प वर्णन है। इस पुस्तक में मिलिंद खांडेकर ने उद्यमी बतौर दलितों के उदय का यथार्थपूर्ण आंकलन किया है। वे यह स्वीकार करते हैं कि व्यवसाय में सफलता के लिए केवल कठिन श्रम पर्याप्त नहीं होता, विशेषकर दलित उद्यमियों के मामले में। जो दलित उद्यमी सफल हुए, उन्हें शिक्षण संस्थानों और सरकारी नौकरियों में दलितों के लिए आरक्षण से न तो कोई लाभ हुआ और ना ही उससे उन्हें कोई मतलब था। परंतु उन्हें यह सफलता न मिलती अगर ऐसी सरकारी नीतियां नहीं बनाई गई होतीं जिनका लक्ष्य सामाजिक समानता स्थापित करना है, अगर सरकारी तंत्र में महत्वपूर्ण पदों पर कुछ ऐसे लोग न होते, जिनकी सोच, व्यापक समाज की सोच से अलग है और राजनीतिज्ञों को सत्ता पाने के लिए दलितों के वोटों की जरूरत न होती। उदाहरण के लिए, कल्पना सरोज ने जब मुंबई में अपने निर्माण व्यवसाय को बढ़ाने की कोशिश की तो एक स्थानीय कांग्रेस नेता ने जमीन के एक टुकड़े को खरीदने के उनके प्रयास में अडंगे लगाने शुरू कर दिये क्योंकि वे दलित थीं। अंततः उन्हें सोनिया गांधी की शरण में जाना पड़ा, जिनकी मदद से उनकी समस्या सुलझी।

इस पुस्तक में सविता बेन कोलसावाला, भगवान गवई, अशोक खाड़े व कल्पना सरोज जैसे उद्यमियों की चर्चा की गई है। उनसे रतिलाल इस अर्थ में भिन्न थे कि वे अपेक्षाकृत समृद्ध परिवार में जन्मे थे। उनके पिता का जमाजमाया व्यवसाय था और उन्हें अपना काम एकदम छोटे पैमाने से शुरू नहीं करना पड़ा। हां, बाजार की मांग और वक्त के तकाज़े के चलते उन्हें अपने व्यवसाय अवश्य बदलने पड़े। शायद इसलिए वे दलित युवाओं के व्यवसाय की दुनिया में प्रवेश के प्रति बहुत उत्साहित नहीं हैं। सविताबेन कोलसावाला, भगवान गवई, अशोक खाड़े और कल्पना सरोज का जीवन, धरती से शुरू कर आसमान छूने की कहानी है।

भगवान गवई, अशोक खाड़े और कल्पना सरोज को एक लाभ यह हुआ कि वे अपने घर से दूर मुंबई में रहते थे और इस महानगर ने उन्हें वह गुमनामी दी, जो उनके गांव या कस्बे में

The President, Shri Pranab Mukherjee presenting the Padma Shri Award to Smt. Kalpana Saroj, at an Investiture Ceremony-II, at Rashtrapati Bhavan, in New Delhi on April 20, 2013.

कल्पना सरोज

उन्हें कभी नहीं मिलती। वहां उन्हें अपनी दलित पहचान के साथ जीना पड़ता। अशोक खाड़े को मालूम था कि अपनी कंपनी के नाम में उनके उपनाम को जगह देने से उन्हें नुकसान ही होगा इसलिए उन्होंने अपनी कंपनी का नाम ‘‘दास आफशोर इंजीनियरिंग प्रा. लि.’’ रखा। ‘‘दास’’ उनके और उनके दो भाईयों के नामों के आद्याक्षरों को मिलाकर बना शब्द था। भगवान गवई, मुंबई से बहरीन चले गए, जहां उन्होंने तेल के व्यवसायी के रूप में सफलता पाई। बहरीन में उनका दलित होना अप्रासंगिक था। इस सब के बावजूद, फर्श से अर्श तक पहुंचने की ये कहानियां दिल को छू लेती हैं।

सविता बेन कोलसावाला के पति अहमदाबाद में बस कंडक्टर थे। वे घरों और ईंट के भट्टों में जाकर अधजला कोयला बेचती थीं क्योंकि उनके पति की आमदनी से उनके बच्चों और सास-ससुर का पेट भरना संभव नहीं था। इसके अलावा, उन पर ढेर सारा कर्ज भी था जिसे चुकाना आसान न था। कुछ धन अर्जित करने के बाद उन्होंने अहमदाबाद में पटेलों के एक मोहल्ले में एक डाक्टर का मकान खरीद लिया। यह पटेलों को नहीं भाया और उन्होंने अंततः उनके मकान को गिरवाकर उन्हें वहां से खदेड़ दिया। उस समय जातिगत बैर उतना ही कटु और हिंसक था, जितना कि सन् 2002 के दंगों के समय हिंदुओं और मुसलमानों के बीच साम्प्रदायिक बैर। अब वे फर्श पर लगाई जाने वाली टाईल बनाने की फैक्ट्री की मालिक हैं, जिसमें 200 लोग काम करते हैं और जिसका वार्षिक टर्नओवर 50 करोड़ रूपये है।

भगवान गवई का बचपन मुंबई, नासिक, रामगिरी और अन्य शहरों के निर्माणस्थलों पर बीता जहां उनकी मां मजदूरी करती थीं। स्कूल की गर्मी की छुट्टियों में वे भी मजदूरी करते थे ताकि सालभर का स्कूल का अपना खर्च जुटा सकें। अब वे दुबई की ‘‘सौरभ एनर्जी’’ कंपनी के चेयरमैन व सीईओ हैं। उन्होंने अपनी कंपनी के कार्यालय के लिए जो जगह खरीदी है, उसकी कीमत 2.2 करोड़ रूपये है। ‘‘सौरभ एनर्जी’’ रिफायनरियों से तेल खरीद कर अफ्रीका और पूर्वी एशिया में ग्राहकों को बेचती है।

अशोक खाड़े, ‘‘दास आफशोर इंजीनियरिंग प्रा. लि.’’ के प्रबंध निदेशक हैं। इस कंपनी का 2011-12 में टर्नओवर लगभग 140 करोड़ रूपये था और इसमें 400 कर्मचारी हैं। अशोक खाड़े की टेबल पर दो पेन रहते हैं। एक वह जिससे वे स्कूल में लिखा करते थे और एक बार जिसकी टूटी हुई निब को बदलवाने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे और दूसरा, 80,000 रूपये की कीमत वाला मांटेब्‍लाक। वे कहते हैं कि पहला पेन उन्हें उनकी गरीबी के दिनों की याद दिलाता है जब उनकी मां कई बार इसलिए खाना नहीं खाती थीं ताकि अपने बच्चों का पेट भर सके। उनका कहना है कि इस पेन को देखते रहने से उनके पांव जमीन पर रहते हैं।

कल्पना सरोज ने अपनी पहली शादी के असफल हो जाने के बाद जान देने की ठान ली थी। उनकी शादी मुंबई में रहने वाले एक व्यक्ति से हुई थी, जिसका परिवार उन्हें बहू की

भगवान गवई

भगवान गवई

बजाए गुलाम समझता था। तब वे केवल 15 साल की थीं। कल्पना एक बार फिर मुंबई गईं – इस बार अपने बल पर। और फिर उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। वहां रहने वाले एक परिवार ने उन्हें एक फैक्ट्री में काम दिलवा दिया, जहां वे बनियान सिलती थीं। उन्होंने वहां सिलाई मशीन पर काम करना सीखा। स्पेशल मजिस्ट्रेट के कार्यालय की सहायता से उन्हें इलाहाबाद बैंक से 50,000 रूपये का कर्ज मिल गया। उन्होंने इससे फर्नीचर बनाने का छोटा सा कारखाना डाल दिया और कई दूसरे लोगों की कर्ज दिलवाने में मदद की। इसी बीच एक व्यक्ति उनसे मिला, जिसे अपनी लड़की की शादी के लिए पैसे की सख्त जरूरत थी और वो अपनी जमीन बेचना चाहता था। जमीन का वह टुकड़ा अब मुंबई के उपनगर कल्याण के बीचों-बीच है। परंतु उस समय वह सरकारी रिकार्ड में कृषि भूमि था और कई छोटे-मोटे व्यवसायियों ने उस पर अतिक्रमण कर लिया था। उन्होंने वह जमीन खरीद ली और चार साल तक सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने के बाद, उन्हें इस जमीन का आवासीय उपयोग करने की इजाज़त मिल गई। उस जमीन पर जो लोग अपना धंधा चला रहे थे, उन्होंने किसी तरह उनके लिए दूसरे स्थानों की व्यवस्था करवाई। इस जमीन पर कल्पना कंस्ट्रक्शन का पहला प्रोजेक्ट ‘‘कोहिनूर प्लाजा’’ बना। इसके बाद उन्होंने कई आवासीय और व्यावसायिक काम्पलेक्स बनाए। उनका व्यवसाय चल निकला। परंतु वे रूकी नहीं। उन्होंने हिम्मत कर ‘कमानी ट्यूब्स‘ नामक एक कंपनी को खरीद लिया जो कर्ज में डूबी हुई थी और दिवालिया होने की कगार पर थी। अपनी मेहनत और उद्यमशीलता से उन्होंने इस कंपनी की किस्मत पलट दी। अब उसमें 225 व्यक्ति काम करते हैं और उसका सालाना कारोबार 68 करोड़ रूपये है।

अशोक खाड़े

अशोक खाड़े

सन् 1990 के दशक की शुरूआत तक भारतीय अर्थव्यवस्था को लायसेंस-कोटा राज के नाम से जाना जाता था। परंतु इनमें से किसी भी दलित उद्यमी से पूछिए और वह आपको बताएगा कि उस समय अर्थव्यवस्था पर ब्राह्मण-बनिया राज भी था। रतिलाल मकवाना का तो मानना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था पर आज भी ब्राह्मण-बनिया राज है। दलित व्यवसायियों की दृष्टि में अर्थव्यवस्था को अनावश्यक सरकारी हस्तक्षेप से मुक्त करने से भी ज्यादा जरूरी है उसे ऊँची जातियों के नियंत्रण से मुक्त करवाना। समाज के उदारीकरण के बगैर अर्थव्यवस्था का उदारीकरण संभव नहीं है। दलितबहुजनों को उम्मीद थी कि मोदी सरकार के पहले पूर्ण बजट में इस वर्ग के उद्यमियों को प्रोत्साहित करने के लिए प्रावधान किए जायेंगे। इस संदर्भ में 20,000 करोड़ रूपये की शुरूआती पूंजी के साथ, मुद्रा (माइक्रो यूनिट्स डेव्लपमेंट रिफाइनेंस एजेंसी) बैंक की स्थापना की घोषणा से कुछ आशा बंधी है। अपने बजट भाषण में वित्त मंत्री अरूण जेटली ने कहा कि मुद्रा बैंक ‘‘अनुसूचित जातियों व जनजातियों के स्वामित्व वाली व्यावसायिक इकाईयों को कर्ज देने में प्राथमिकता देगा।’’ जेटली के अनुसार, देश में 5.27 करोड़ छोटी व्यावसायिक इकाईयां है, जिनमें से 62 प्रतिशत के मालिक अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों व अन्य पिछड़ा वर्गों के सदस्य हैं।

सन् 2010 में भारत की 1000 सबसे बड़ी (परिसंपत्तियों के लिहाज से) कंपनियों के बोर्ड आफ डायरेक्टर्स के सदस्यों में से 93 प्रतिशत ऊँची जातियों के थे। दलित उद्यमियों को नहीं पता कि वे हमेशा छोटी व्यावसायिक इकाईयां ही चलाते रहेंगे या उन्हें कभी कार्पोरेट बोर्डरूमों में भी जगह मिलेगी और वे सरकार के नीतिगत फैसलों को प्रभावित कर सकेंगे।

फारवर्ड प्रेस के अगस्त, 2015 अंक में प्रकाशित

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  1. Munish mittal Reply

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