कांशीराम आमजनों के नेता

दमित बहुसंख्यकों को प्रजातांत्रिक रास्ते से सत्ता पाने का तरीका सिखाना उनके जीवन का मिशन था

kanshi ram२०वीं सदी के बहुत कम नेता हैं, जिन्होंने भारतीय राजनीति को इतना प्रभावित किया, जितना कि कांशीराम ने। वे सच्चे अर्थों में जननेता थे। पंजाब के एक गांव में रामदासिया चमार परिवार में जन्मे कांशीराम ने जीवनभर समाज के वंचित तबकों के राजनीतिक सशक्तिकरण के लिए काम किया। ‘मान्यवर’ – जिस नाम से उनके अनुयायी उन्हें संबोधित करते थे – की कई उपलब्धियों में से एक थी, उत्तरप्रदेश, जो कि राजनीतिक दृष्टि से देश का सबसे महत्वपूर्ण राज्य है और जो ब्राह्मणवाद का अभेद्य किला हुआ करता था, के मुख्यमंत्री पद पर एक दलित महिला को बिठाना। कांशीराम के जीवन की लगभग सभी महत्वपूर्ण घटनाओं को जानेमाने सामाजिक इतिहासविद और सांस्कृतिक मानवविज्ञानी बद्री नारायण द्वारा लिखित कांशीराम की राजनीतिक जीवनी में समेटा गया है।

जीवनी का शीर्षक है ”कांशीराम लीडर ऑफ द दलित’’ (कांशीराम , दलितों के नेता)। पुस्तक आठ अध्यायों में विभाजित है, जिनमें उनके बचपन, महाराष्ट्र से उत्तरप्रदेश की उनकी राजनीतिक यात्रा व उनके राजनीतिक विचारों का विस्तार से वर्णन किया गया है। पुस्तक में कांशीराम और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की विभिन्न वर्गों द्वारा आलोचना की भी चर्चा की गई है।

छात्र व अध्येता के रूप में बद्री नारायण कई दशकों तक उत्तरप्रदेश में निवासरत रहे और उन्होंने कांशीराम की ‘यात्रा’ का ‘नजदीकी से अध्ययन’ किया। वे लिखते हैं कि उन्होंने जिन भी दलितों से इस सिलसिले में बात की, उन सभी ने यह ‘स्वीकार’ किया कि कांशीराम ने दलितों में आत्माभिमान, आत्मविश्वास और मुक्ति के भाव का सृजन किया। लेखक, कांशीराम को ‘मूलत: प्रजातांत्रिक’ बताते हैं। बद्री नारायण कहते हैं कि कांशीराम एक अत्यंत ‘निष्णात रणनीतिकार’ थे, जिन्होंने दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों और धार्मिक अल्पसंख्यकों को एक नए सामाजिक वर्ग- ‘बहुजन’ – के झंडे तले इकट्ठा किया और उन्हें ‘उनके मत की कीमत का अहसास कराया’। सन् 1984 में उन्होंने बसपा का गठन किया। यह पार्टी बहुजनों की मुक्ति और आत्मसम्मान का प्रतीक बनकर उभरी और इसने एक सामाजिक बदलाव की शुरूआत की।

पहला अध्याय पाठकों को कांशीराम के बचपन से परिचित करवाता है। 15 मार्च, 1934 को ‘तुलनात्मक रूप से समृद्ध’ परिवार में जन्मे कांशीराम की शुरूआती शिक्षा शासकीय प्राथमिक शाला मिलकपुर, पंजाब में हुई। अन्य अधिकांश दलित विद्यार्थियों की तरह, उन्हें भी अपने अध्यापकों के हाथों भेदभाव का शिकार होना पड़ा। दलित विद्यार्थियों को एक अलग मटके से पानी पीना पड़ता था। एक अन्य घटना, जिसने उन पर गहरा असर डाला वह थी एक बड़े अधिकारी का उनके पिता के साथ व्यवहार। कांशीराम स्वयं इस घटना का इन शब्दों में वर्णन करते हैं, ”जब मैं स्कूल में पढ़ता था, तब एक दिन मेरी मां ने मुझसे, मेरे पिता को खाना पहुंचाने के लिए कहा। वे उस समय रोपड़ कनाल गेस्ट हाउस में बेगार कर रहे थे…मैंने खाने की पोटली ली और गेस्ट हाउस के लिए निकल पड़ा। उस दिन बहुत गर्मी थी और जब मैं गेस्ट हाउस पहुंचा तो मैंने देखा कि मेरे पिता पसीने से लथपथ थे। मैं उनकी यह हालत नहीं देख सका और मैंने उनसे आराम करने को कहा। परंतु मेरे पिता ने कहा कि वे ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि एक बड़ा अधिकारी अंदर सो रहा है और उन्हें हाथ से खींचे जाने वाले पंखे की रस्सी को लगातार खींचना पड़ेगा ताकि अफसर को ठंडी हवा मिलती रहे…मेरे पिता यह काम बहुत कम पैसों के लिए कर रहे थे और उन्होंने मुझे समझाया कि अगर उन्होंने रस्सी खींचना बंद कर दी तो अफसर की नींद खुल जायेगी और वह उन्हें सजा देगा। तब मैंने उनसे कहा कि वे दूसरे हाथ में एक छोटा पंखा लेकर खुद को हवा कर लें। परंतु मेरे पिता ने ऐसा करने से इंकार कर दिया (पृष्ठ 17-18)’’।

जातिगत भेदभाव और तरह-तरह की मुसीबतों का मुकाबला करते हुए भी उन्होंने पढ़ाई में सफलता प्राप्त की और सन् 1956 में रोपड़ के सरकारी कालेज से बीएससी की डिग्री हासिल की।

राजनीति में पदार्पण

दूसरे अध्याय में कांशीराम की राजनीतिक यात्रा की चर्चा की गई है। यह राजनीतिक यात्रा आंबेडकर द्वारा उनके जीवन के अंतिम वर्षों में स्थापित की गई आरपीआई (द रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया) से शुरू होकर बामसेफ (ऑल इंडिया बैकवर्ड एण्ड माइनोरिटी कम्युनिटीज एम्प्लाइज फेडरेशन) के रास्ते बसपा तक पहुंची। लेखक ने कांशीराम के राजनीतिक जीवन को चार हिस्सों में विभाजित किया है। पहले चरण (1958-1964) की शुरूआत हुई उनके पुणे में एक नौकरी पाने से। वहीं वे आरपीआई से जुड़े। उन्होंने आंबेडकर द्वारा स्थापित ”पीपुल्स एजुकेशन सोसायटी’’ के लिए भी काम किया। दूसरे चरण (1964-1978) की शुरूआत हुई 1964 में उनके द्वारा नौकरी से इस्तीफा देकर आरपीआई की सदस्यता लेने से। बाद में उन्होंने आरपीआई की यह कहकर आलोचना की कि वह अनेक धड़ों में बंटी हुई थी और अपने मूल लक्ष्य से भटक गई थी। आरपीआई से मोहभंग के बाद कांशीराम ने सन् 1971 में एसएमसीईए (एससी/एसटी/ओबीसी/माइनोरिटीज कम्युनिटीज एम्प्लाईज एसोसिएशन) का गठन पुणे में किया। बाद में इसी संस्था का नामकरण बामसेफ कर दिया गया। तीसरे चरण (1978-1984) की शुरूआत हुई 6 दिसंबर 1978 को बामसेफ की औपचारिक स्थापना के साथ। बामसेफ ने अपने अनुयायियों से ”शिक्षा पाने, एक होने और संघर्ष करने’’ का आह्वान किया। चैथा चरण (1984 के बाद) नि:संदेह कांशीराम के राजनीतिक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा था। इसी दौरान देश में बसपा का उभार हुआ, जो बहुजनों के राजनैतिक उदय का प्रतीक थी।

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पुस्तक : कांशीराम : लीडर ऑफ द दलितस प्रकाशक : पैंग्विन इंडिया (फोन : 0124-4785600) पेज : 265

तीसरा अध्याय सन 1982 में प्रकाशित कांशीराम की पुस्तक ”द चमचा एज : एन इरा ऑफ स्टूजिस’’ (चमचा युग : कठपुतलियों का दौर) पर केंद्रित है। यह पुस्तक पुणे पैक्ट (1932) की 50वीं वर्षगांठ के अवसर पर प्रकाशित की गई थी। गांधी ने आंबेडकर को ”ब्लैकमेल’’ कर उन्हें इस समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर कर दिया था। इस समझौते के तहत, ब्रिटिश सरकार द्वारा दमित तबकों के लिए की गई पृथक निर्वाचन की व्यवस्था को खारिज कर दिया गया। मेरे विचार में लेखक ‘द चमचा ऐज’ का समुचित आलोचनात्मक विश्लेषण नहीं कर सके हैं। कांशीराम को यह उम्मीद थी कि इस पुस्तक से वे उन ‘नकली’ नेताओं के चेहरों पर से पर्दा उठा सकेंगे जो जन्मे तो दमित वर्ग के परिवारों में थे परंतु दमनकर्ताओं के हितपोषक थे।

चौथे अध्याय में यह बताया गया है कि कांशीराम ने किस तरह सबाल्टर्न संस्कृति, इतिहास और मिथकों का इस्तेमाल, दलितों और पिछड़ों में आत्मसम्मान जगाने के हथियार के रूप में किया। उदाहरणार्थ, बहुजनों को अपने साथ जोडऩे के लिए भाजपा ने बुद्ध, कबीर, रविदास, डारिया साहिब, जगजीवन दास, झलकारी बाई, बिजली महाराज, डालदेव महाराज, बालादीन, वीरापासी व महामाया जैसे व्यक्तित्वों का सृजन किया और उन्हें लोकप्रिय बनाया। जहां लेखक ने कांशीराम की सांस्कृतिक राजनीति का बेहतरीन विश्लेषण किया है वहीं गुरू रविदास पर एक अनुच्छेद खटकता है, ”इसके अलावा, मुगल शासक बहुत जोरशोर से नीची जातियों के लोगों को तरह-तरह के लोभ-लालच देकर मुसलमान बना रहे थे ताकि देश में मुसलमानों की संख्या में वृद्धि हो और मुगल शासन मजबूत हो सके। संत रविदास ने अपनी शिक्षाओं के जरिये हिंदू समाज में सुधार लाने का प्रयास किया ताकि नीची जातियां, इस्लाम की तरफ आकर्षित न हों और वर्ण व्यवस्था कायम रह सके (पृष्ठ 121)।’’ हिंदू दक्षिणपंथी हमेशा से यह प्रचार करते आ रहे हैं कि मध्यकालीन भारत में बड़ी संख्या में हिंदुओं को जबरदस्ती मुसलमान बनाया गया था। इसके विपरीत, धर्मनिरपेक्ष इतिहासविदों का कहना है कि चूंकि इस्लाम में ऊंचनीच नहीं थी, इसलिए ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था से पीडित नीची जातियां उसकी ओर आकर्षित हुईं।

पांचवा अध्याय, बसपा, सत्ता पाने के उसके प्रयास और इनमें कांशीराम की भूमिका पर केंद्रित है। लेखक बिलकुल ठीक कहते हैं कि कांशीराम में ”भीड़ इकट्ठा करने और उसे प्रभावित करने की असीम क्षमता थी।’’ कांशीराम को यह अच्छी तरह पता था कि प्रजातंत्र में अगर दमित बहुसंख्यकों को उनके वोट के मूल्य का एहसास करा दिया जाये तो सत्ता – जिसे वे गुरकिल्ली कहते थे – हासिल की जा सकती है। वे प्रजातंत्र की जटिल अवधारणा को इन सरल शब्दों में समझाते थे, ”लोकशाही में रानी और मेहतरानी की कीमत एक ही होती है (पृष्ठ 165)।’’ वामपंथियों के एक हिस्से द्वारा चलाये जा रहे क्रांतिकारी सशस्त्र संघर्ष के विपरीत, कांशीराम ने बहुजनों को संवैधानिक तरीकों और प्रजातांत्रिक प्रक्रियाओं से एक किया।

छठवे, सातवें और आठवें अध्यायों में कांशीराम और उनकी पार्टी की सीमाओं और उनकी आलोचनाओं पर चर्चा की गई है। उदाहरणार्थ, यह आरोप लगाया गया कि वे ”अवसरवाद को रणनीति की तरह इस्तेमाल करते हैं।’’ उन्होंने आरिफ मोहम्मद खान और अकबर एहमद ‘डंपी’ जैसे ‘दलबदलुओं’ का स्वागत किया और बसपा ने उसी भाजपा से गठबंधन करने में कोई गुरेज नहीं किया, जिसकी वह धुर विरोधी थी। ”कांशीराम को अपने राजनीतिक जीवन में सबसे कटु आलोचना तब झेलनी पड़ी जब बसपा, दो बार, भाजपा के समर्थन से उत्तरप्रदेश में सत्ता में आई (पृष्ठ 181)।’’

आलोचकों को यह नहीं भूलना चाहिए कि बसपा कितनी समस्याओं से जूझ रही थी। उसे दमनकारी सामाजिक व्यवस्था से लडऩे के लिए समाज के सबसे वंचित वर्गों को लामबंद करना था। यह कोई आसान काम नहीं था। बेज़ुबानों को ज़ुबान देने और उनमें आत्मसम्मान और आत्मविश्वास जगाने के अलावा, उत्तरप्रदेश में मायावती के शासनकाल में कुछ ठोस परिवर्तन भी हुए। एस.एम. माईकल द्वारा संपादित पुस्तक ”दलितस् इन माडर्न इंडिया : विजन एण्ड वैल्यूज़” (2007, पृष्ठ 262) में ”द बीएसपी इन उत्तरप्रदेश : हूज़ पार्टी इज इट’’ शीर्षक के अपने लेख में जानेमाने राजनीति विज्ञानी और समाजशास्त्री क्रिस्टोफर जेफरलाट लिखते हैं कि मायावती सरकार की आंबेडकर ग्राम योजना के अंतर्गत ऐसे 25,434 गांवों के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए धन आवंटित किया गया जिनके आधे या उससे अधिक रहवासी अनुसूचित जातियों के थे।

कांशीराम को पुस्तक के शीर्षक में ‘दलितों का नेता’ बताकर बद्री नारायण ने उनके योगदान के साथ न्याय नहीं किया है। यह विडंबना ही है कि जहां लेखक आमजनों को लामबंद करने और सामाजिक परिवर्तन लाने में कांशीराम की भूमिका की सराहना करते हैं वहीं वे उन पर ”दलित नेता’’ का लेबल भी चस्पा कर देते हैं। जहां तक मुझे पता है, जवाहरलाल नेहरू की किसी जीवनी में उन्हें ”ब्राह्मणों का नेता’’ नहीं बताया गया है। यह एक तरह से मुख्यधारा के समाज विज्ञानों के वर्चस्ववादी विमर्श का हिस्सा है जो फुले, पेरियार, आंबेडकर और इकबाल जैसे नेताओं को तो केवल समाज के कुछ तबकों के हितों का प्रतिनिधि बताता है, वहीं गांधी और नेहरू की स्तुति ऐसे नेताओं के रूप में की जाती जिन्होंने राष्ट्र के लिए संघर्ष किया।

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