h n

गाय पर सियासत

हिन्दुत्ववादी तत्वों के लिए मुस्लिम और दलित समुदायों का खानपान समस्या क्यों है? शाकाहारी भोजन या मांसाहारी भोजन, व्यक्ति की मर्जी या जरुरत है। उसमें अन्य किसी का दखल क्यों होना चाहिए? क्या कोई दावे के साथ यह कह सकता है कि हिन्दू गाय का मांस नहीं खाते?

dadri-murderपिछले दिनों दादरी में घटी दर्दनाक घटना ने हमारी सभ्यता को शर्मसार कर दिया है। यह घटना संविधान द्वारा सभी तबको को उनके खानपान और संस्कृति के संरक्षण की आजादी के अधिकार पर हमला है। इस घटना का इस्तेमाल, हिन्दुओं व मुसलमाओं के बीच घृणा पैदा करने के लिए किया जा रहा है। गाय को ले कर एक समुदाय को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है।

गाय को केंद्र में रख कर राजनीति करने वाले अति-हिंदूवादी, हिंदुत्व का कार्ड खेल रहे हैं और मासूम जनता की भावनाओं को भड़का कर साम्रदायिकता का माहौल बना रहे हैं। ऐसा क्यों होता है कि जब भी भाजपा का शासन आता है, इस तरह के विवाद, झगडे, हत्याएं और दंगे जगह-जगह होने लगते हैं? हाल ही में मुंबई में जैन समुदाय के त्योहारों के मद्देनजर, मांस की दुकानें बंद करने का आदेश वहां की भाजपा सरकार ने जारी किया। वह विवाद अभी थमा ही नहीं था कि दादरी काण्ड ने समाज में नये तरह का भय पैदा कर दिया। दैनिक जनसत्ता के अनुसार, पिछले 16 माह में गोवध को लेकर 330 साम्प्रदायिक फसाद हो चुके हैं। पूरे देश में तनाव व भय का वातावरण है।

हिन्दुत्ववादी तत्वों के लिए मुस्लिम और दलित समुदायों का खानपान समस्या क्यों है? शाकाहारी भोजन या मांसाहारी भोजन, व्यक्ति की मर्जी या जरुरत है। उसमें अन्य किसी का दखल क्यों होना चाहिए? क्या सारे हिन्दू शाकाहारी हैं? क्या कोई दावे के साथ यह कह सकता है कि हिन्दू गाय का मांस नहीं खाते? ये देश उन लोगो का है, जिन्हें सम्मानजनक भोजन करने का अधिकार नहीं था। वे मरे हुए पशुओं का मांस खाने के लिए मजबूर थे। अति-हिन्दुत्ववादियों से विद्रोह कर दलित हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई और बौद्ध बने। वे जिस धर्म में गए, उसकी संस्कृति का हिस्सा बन गये। उसके खानपान, पहनावे और त्योहारों को उन्होंने अपना लिया। ताजा उदाहरण है हरियाणा के भगाना गाँव के दमित दलित, जिन्होंने इस्लाम स्वीकार किया।

पश्चिमी देशों से हम बहुत कुछ सीखते हैं। उनकी नक़ल करने की कोशिश करते हैं। परन्तु उनकी तरह व्यक्ति की गरिमा और उसकी निजता का सम्मान करना हम नही सीखे और ना ही हमने उनसे श्रम का सम्मान करना सीखा। अक्सर हम अपने पडोसी के खानपान और पहनावे से ले कर उसकी निजी जिन्दगी को अपने नियंत्रण में लेने की प्रवृति के शिकार हैं यह प्रवृति राजनीति में भी हावी है और निरंकुशता की प्रतीक है। जरुरी है कि आवाम इस बात को समझे और सद्भाव से एक रह कर गाय पर राजनीति करने वालो को मुंहतोड़ जबाब दे।

लेखक के बारे में

रजनी तिलक

वरिष्ठ दलित साहित्यकार व सामाजिक कार्यकर्ता रजनी तिलक स्त्रीमुक्ति आन्दोलन की अग्रणीय नेता है। तिलक अखिल भारतीय आंगनवाडी वर्कर और हेल्पर यूनियन, आह्वान थियेटर, नेशनल फेडरेशन दलित वीमेन, नैकडोर, वल्र्ड डिग्निटी फोरम, दलित लेखक संघ और राष्ट्रीय दलित महिला आन्दोलन की संस्थापक सदस्य भी हैं

संबंधित आलेख

क्रिसमस : सभी प्रकार के दमन के प्रतिकार का उत्सव
यह प्रतीत होता है कि ‘ओ होली नाईट’ राजनैतिक प्रतिरोध का गीत था। ज़रा कल्पना करें कि गृहयुद्ध के पहले के कुछ सालों में...
छेल्लो शो : परदे पर ईडब्ल्यूएस
यह फिल्म, जिसे 95वें ऑस्कर पुरस्कारों के लिए बेस्ट इंटरनेशनल फीचर श्रेणी में भारत की आधिकारिक प्रविष्टि के रूप में चुना गया है, में...
सहजीवन : बदलते समाज के अंतर्द्वंद्व के निहितार्थ
विवाह संस्था जाति-धर्म की शुद्धता को बनाये रखने का एक तरीका मात्र है, इसलिए समाज उसका हामी है और इसलिए वह ऐसे जोड़ों की...
यात्रा संस्मरण : वैशाली में भारत के महान अतीत की उपेक्षा
मैं सबसे पहले कोल्हुआ गांव गयी, जहां दुनिया के सबसे प्राचीन गणतंत्र में से एक राजा विशाल की गढ़ी है। वहां एक विशाल स्नानागार...
शैक्षणिक बैरभाव मिटाने में कारगर हो सकते हैं के. बालगोपाल के विचार
अपने लेखन में बालगोपाल ने ‘यूनिवर्सल’ (सार्वभौमिक या सार्वत्रिक) की परिकल्पना की जो पुनर्विवेचना की है, उसे हम विद्यार्थियों और शिक्षाविदों को समझना चाहिए।...