आंबेडकर और मीडिया: सशक्तिकरण न कि व्यक्ति पूजा

पत्रकारिता का पहला कर्तव्य है ”बिना किसी प्रयोजन के समाचार देना, निर्भयतापूर्वक उन लोगों की निंदा करना जो गलत रास्ते पर जा रहें हों-फिर चाहे वे कितने ही शक्तिशाली क्यों न हों  व पूरे समुदाय के हितों की रक्षा करने वाली नीति को प्रतिपादित करना’’

आंबेडकर ने मीडिया व विशेषकर उनके स्वयं द्वारा प्रकाशित-संपादित समाचारपत्रों का, हिंदू धर्म के मिथकों, उसके रहस्यवाद और खोखली प्रथाओं का खुलासा करने के लिए प्रभावी इस्तेमाल किया। इन्हीं मिथकों, परंपराओं और प्रथाओं का इस्तेमाल, भारतीय समाज की अन्यायपूर्ण व्यवस्था को औचित्यपूर्ण ठहराने के लिए किया जाता था। आंबेडकर ने पारंपरिकता, धार्मिक दकियानूसीपन और अंधविश्वासों की जंजीरों को तोड़ा। उन्होंने ब्राह्मणवादी धर्म की संपूर्ण व्यवस्था को सिरे से खारिज किया। इसमें शामिल थे वेदों की अमोघता, धार्मिक कर्मकांडों की प्रभावोत्पादकता, पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति के बाद मोक्ष प्राप्ति की अवधारणा और इस ब्रह्मण्ड के रचियता के रूप में ईश्वर की स्वीकार्यता। उन्होंने उपनिषदों के दर्शन को काल्पनिक ठहराया। उन्होंने चातुरवर्ण की व्यवस्था – जिसे ‘पवित्र संस्था’ और ‘ईश्वरीय विधान’ की संज्ञा दी गई थी – का कड़ा विरोध किया। वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि चातुरवर्ण से अधिक घृणित सामाजिक संगठन की कोई व्यवस्था नहीं हो सकती। चातुरवर्ण व्यवस्था लोगों को अपमानित करती है, उन्हें लकवाग्रस्त और पंगु बनाती है और समाज की बेहतरी के लिए काम करने से रोकती है।

आंबेडकर प्रेस की स्वतंत्रता के जबरदस्त हामी थे। भारत के संविधान का निर्माण करते समय उन्होंने अभिव्यक्ति और वाणी की स्वतंत्रता को उसमें महत्वपूर्ण स्थान दिया। संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) में वाक् स्वातंत्र्य और अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य को मूल अधिकार का दर्जा दिया गया है और इस अधिकार पर राज्य द्वारा, इसी अनुच्छेद के उपखण्ड (2) के अंतर्गत, केवल युक्तियुक्त निर्बंधन ही लगाए जा सकते हैं।

आंबेडकर ने अपने क्रांतिकारी विचारों, अनुभवों और विभिन्न विषयों पर अपनी राय को अपने अखबारों द्वारा जनता के सामने रखा। इन अखबारों में शामिल थे ‘मूकनायक’, ‘बहिष्कृत भारत’, ‘समता’, ‘जनता’ व ‘प्रबुद्ध भारत’। आंबेडकर ने कोल्हापुर के राजा दत्तोबा पवार की आर्थिक मदद से 31 जनवरी, 1920 को ‘मूकनायक’ का प्रकाशन प्रारंभ किया। उन्हें किस तरह के कटु विरोध का सामना करना पड़ा, यह इससे जाहिर है कि तत्समय के प्रतिष्ठित समाचारपत्र ‘केसरी’ ने ‘मूकनायक’ का प्रकाशन प्रारंभ होने की खबर छापने तक से इंकार कर दिया। ज्ञातव्य है कि उस समय तिलक जीवित थे।

असमानता की भूमि

‘मूकनायक’ के पहले अंक में आंबेडकर ने अखबार के प्रकाशन के उद्देश्य को सरल भाषा में किंतु अत्यंत प्रभावी व तार्किक ढंग से प्रस्तुत किया। उन्होंने लिखा कि भारत असमानताओं की भूमि है। यहां का समाज एक ऐसी बहुमंजिला इमारत की तरह है, जिसमें एक मंजिल से दूसरी मंजिल पर जाने के लिए न तो कोई सीढ़ी है और ना ही दरवाजा। कोई व्यक्ति जिस मंजिल में जन्म लेता है, उसी में मृत्यु को प्राप्त होना उसकी नियति होती है। उन्होंने आगे लिखा कि भारतीय 192-babasaheb-ambedkar_bigसमाज के तीन हिस्से हैं-ब्राह्मण, गैर-ब्राह्मण और अछूत। उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसे लोगों पर दया आती है जो यह मानते हैं कि पशुओं और निर्जीव पदार्थों में भी ईश्वर का वास है परंतु अपने ही धर्म के लोगों को छूना भी उन्हें मंजूर नहीं होता। उन्होंने इस बात पर अफसोस जाहिर किया कि ब्राह्मणों का लक्ष्य, ज्ञान का प्रसार नहीं बल्कि उस पर अपना एकाधिकार बनाए रखना है। उनकी यह मान्यता थी कि गैर-ब्राह्मण, पिछड़े हुए इसलिए हैं क्योंकि वे न तो शिक्षित हैं और ना ही उनके हाथों में सत्ता है। दमितों को इस चिर गुलामी से मुक्त कराने और गरीबी व अज्ञानता के दलदल से बाहर निकालने के लिए, उनकी इन कमियों को दूर करना होगा और इसके लिए महती प्रयासों की आवश्यकता होगी।

‘मूकनायक’ के एक अन्य आलेख में कहा गया कि भारत के लिए केवल एक स्वतंत्र देश होना पर्याप्त नहीं है। उसे अपने सभी नागरिकों को धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक क्षेत्र में बराबरी की गारंटी देनी होगी। उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि हर रहवासी को आगे बढऩे के लिए अवसर प्राप्त हों और उन्हें यह अवसर उपलब्ध करवाने के लिए सभी ज़रूरी कदम उठाने होंगे। उन्होंने लिखा कि शायद ही कोई व्यक्ति इतना नीच होगा जो इस तर्क को गलत बताए कि अगर ब्राह्मणों द्वारा ब्रिटिश सरकार की अन्यायपूर्ण सत्ता का विरोध जायज़ है तो दमित वर्गों का, सत्ता के हस्तांतरण के समय, ब्राह्मणों के शासन का विरोध करना इससे भी सौ गुना जायज है। लेख में ज़ोर देकर यह कहा गया कि अगर ब्रिटिश सरकार द्वारा उपलब्ध कराई गई सुरक्षा समाप्त हो जाए तो जो लोग अछूतों को नीची निगाहों से देखते हैं, वे उन्हें अपने पैरों तले कुचल डालेंगे। एक अन्य लेख में आंबेडकर ने लिखा कि दमित वर्गों के लिए वह स्वराज, जिसमें उनके मूल अधिकारों की गारंटी न हो, स्वराज नहीं बल्कि दासत्व का एक दूसरा स्वरूप होगा।

‘मूकनायक’ के ज़रिये आंबेडकर ने सामाजिक न्याय-उन्मुखी जनसंचार के एक नए युग की शुरूआत की। वे अपने अखबार को लंबे समय तक नहीं निकाल सके क्योंकि उनके समक्ष एक अधिक महत्वपूर्ण कार्य था। और वह था दमित वर्गों में शिक्षा का प्रसार, जिससे वे दमनकारी ताकतों के चंगुल से मुक्त हो सकें।

पंखविहीन पक्षी

आंबेडकर ने दबे-कुचले वर्गों के उत्थान के अपने अभियान को आगे बढ़ाने के लिए ‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’ की स्थापना की। इस संस्था ने अछूतों सहित सभी जातियों की सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक व राजनैतिक समता के लिए कार्य करना शुरू किया। आंबेडकर को इतने कड़े विरोध का सामना करना पड़ा कि उन्हें लगा कि अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के लिए उन्हें किसी माध्यम की आवश्यकता है। उन्हें यह अहसास हुआ कि बिना अखबार के नेता, पंखविहीन पक्षी की तरह है। इसलिए, उन्होंने 3 अप्रैल, 1927 को बंबई से मराठी पाक्षिक ‘बहिष्कृत भारत’ का प्रकाशन शुरू किया।

आंबेडकर यह अच्छी तरह से समझते थे कि जो लोग सार्वजनिक हित के कार्य करते हैं उनके लिए आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर होना अतिआवश्यक है। इसलिए अखबार चलाते हुए आंबेडकर ने अपनी वकालत कभी बंद नहीं की। अखबार को चलाने के लिए आर्थिक संसाधन जुटाना तब भी उतना ही कठिन था जितना कि आज है। जो लोग यह तर्क देते थे कि देश के लोग किसी क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए तैयार नहीं हैं, उन्हें जवाब देते हुए आंबेडकर ने कहा कि अगर ऐसा है तो फिर वे देश की स्वतंत्रता के लिए क्यों संघर्ष कर रहे हैं, जबकि देश की जनता न तो स्वतंत्रता के लिए तैयार है और ना ही उसे पाने के लायक है।

आंबेडकर के निकट सहयोगी धनंजय कीर (डॉ. आंबेडकर : लाईफ एंड मिशन, 1981) ने आंबेडकर की ‘बहिष्कृत भारत’ के संपादक के रूप में भूमिका का वर्णन करते हुए लिखा कि, ”आंबेडकर ने अपने नए प्रकाशन का इस्तेमाल अपने विचारों को प्रतिपादित करने, अपने लक्ष्यों को परिभाषित करने और अपने आलोचकों को प्रतिउत्तर देने के लिए किया। उन्होंने कहा कि मंदिर और पीने के पानी के स्त्रोत अछूतों के लिए खुले होने चाहिए क्योंकि वे भी हिंदू हैं। उनके संपादकीय छोटे हुआ करते थे और वे निर्भयतापूर्वक अपनी विशिष्ट शैली में उनमें अपने विचारों को प्रतिपादित करते थे। उन्होंने सरकार से यह मांग की कि वह ‘बोल प्रस्ताव’ को लागू करे और स्थानीय संस्थाओं के भरोसे न रहे क्योंकि उन पर प्रतिक्रियावादियों का वर्चस्व है, जो कट्टरपंथी, संकीर्ण व पुरानी सोच वाले हैं और दमित वर्गों के हितों के विरोधी हैं। उन्होंने अपने अखबार के जरिए सरकार से यह अपील की कि वो उन लोगों को सज़ा दे जो इस प्रस्ताव को लागू किए जाने का विरोध कर रहे हैं।’’

आंबेडकर अपने इस अखबार को भी आर्थिक संसाधनों की कमी के कारण लंबे समय तक नहीं चला सके। वे पत्रकारिता के उच्च मानकों से समझौता करने के लिए तैयार नहीं थे। अपने समय के अन्य संपादकों की तरह वे कभी पूंजीवादियों के एजेण्ट नहीं बने। उन्होंने कभी अपने अखबार को धन कमाने का ज़रिया नहीं बनाया।

आंबेडकर ने अपने समय में सामाजिक, राजनीतिक व पत्रकारिता के क्षेत्रों में अपना एक विशिष्ट स्थान बनाया। उन्होंने समाज से बहिष्कृत लोगों की व्यथा को सामने लाकर देश में हलचल पैदा कर दी। अगले कदम के रूप में उन्होंने दमित वर्गों के उत्पीडऩ की भत्र्सना की और तत्पश्चात इन वर्गों की समानता पाने की महत्वाकांक्षा को स्वर दिया। उनका चौथा कदम था इस आशा का प्रकटीकरण की समानता, स्वतंत्रता व बंधुत्व के आधार पर सभी लोगों का हिंदू समाज में आत्मसात्करण हो।

आंबेडकर एक महान संप्रेषक थे। भारतीय प्रेस के बारे में उनके विचार और पत्रकार बतौर उनका आचरण, आज भी उन लोगों के लिए आदर्श हैं, जो मीडिया का मानव विकास के उपकरण के रूप में उपयोग करना चाहते हैं। उन्होंने लिखा कि ”भारत में पत्रकारिता पहले एक पेशा थी। अब वह एक व्यापार बन गई है। अखबार चलाने वालों को नैतिकता से उतना ही मतलब रहता है जितना कि किसी साबुन बनाने वाले को। पत्रकारिता स्वयं को जनता के जिम्मेदार सलाहकार के रूप में नहीं देखती। भारत में पत्रकार यह नहीं मानते कि बिना किसी प्रयोजन के समाचार देना, निर्भयतापूर्वक उन लोगों की निंदा करना जो गलत रास्ते पर जा रहें हों-फिर चाहे वे कितने ही शक्तिशाली क्यों न हों, पूरे समुदाय के हितों की रक्षा करने वाली नीति को प्रतिपादित करना उनका पहला और प्राथमिक कर्तव्य है। व्यक्ति पूजा उनका मुख्य कर्तव्य बन गया है। भारतीय प्रेस में समाचार को सनसनीखेज बनाना, तार्किक विचारों के स्थान पर अतार्किक जुनूनी बातें लिखना और जिम्मेदार लोगों की बुद्धि को जाग्रत करने की बजाए गैर-जिम्मेदार लोगों की भावनाएं भड़काना आम हैं।…व्यक्ति पूजा के खातिर देश के हितों की इतनी विवेकहीन बलि इसके पहले कभी नहीं दी गई। व्यक्ति पूजा कभी इतनी अंधी नहीं थी जितनी की वह आज के भारत में है। मुझे यह कहते हुए प्रसन्नता होती है कि इसके कुछ सम्मानित अपवाद हैं परंतु उनकी संख्या बहुत कम है और उनकी आवाज़ कभी सुनी नहीं जाती।’’

(साथ में दिलीप कुमार, डॉ. गोपाल और  एच.एस. शिवराजू)

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