फारवर्ड विचार, सितंबर 2015

फारवर्ड प्रेस, जाति जनगणना के पक्ष में रहा है और हमने इसकी आवश्यकता और उसमें हो रही अनावश्यक देरी के संबंध में कई लेख प्रकाशित किए हैं। गत 3 जुलाई को एनडीए सरकार द्वारा इस जनगणना के कुछ हिस्सों पर से पर्दा उठाने के बाद, हम इस विषय पर पुन: फोकस कर रहे हैं

भारत के जटिल समाज को समझने में आंकड़ों की कितनी कम उपयोगिता है, इस बारे में एक संस्मरण है। एक आदर्शवादी युवक हैरोल्ड कॉक्स, 1885-87 में उस संस्थान, जो अब अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय है, में गणित पढ़ाने आया। कॉक्स ने एक अंग्रेज जज को जब कुछ आंकड़ों का हवाला दिया तब जवाब मिला कि, ”कॉक्स, जब तुम कुछ समझदार हो जाओगे तब इतने विश्वास से भारतीय आंकड़ों को उद्धत नहीं करोगे। सरकार आंकड़े जुटाने की बहुत इच्छुक है…परंतु तुम्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि ये आंकड़े मूलत: गांव का चौकीदार इकट्ठा करता है, और वो वही लिखता है जो उसका मन करता है”।

हम यह मानकर चल रहे हैं कि 1871 में ब्रिटिश सरकार द्वारा दशकीय जनगणना शुरू किए जाने के बाद से बहुत कुछ बदल गया है और अब हम जनगणना के आंकड़ों को विश्वसनीय मान सकते हैं। कहते हैं कि झूठ तीन प्रकार के होते हैं – ”झूठ, सफेद झूठ और आंकड़े। परंतु इसके बाद भी, स्वतंत्रता के बाद से ओबीसी लगातार जाति जनगणना की मांग करते आ रहे हैं। पिछली जाति जनगणना 1931 में हुई थी। अंतत:, सन 2010 में, संसद में ”सर्वसम्मति” बनने के बाद, यूपीए सरकार ने सामाजिक-आर्थिक व जाति जनणगना (एसईसीसी) को मंजूरी दी। यह जनगणना एनएसएसओ द्वारा 2011 में की गई।

11782429_954522571278099_4166694483491318210_o copyफारवर्ड प्रेस, जाति जनगणना के पक्ष में रहा है और हमने इसकी आवश्यकता और उसमें हो रही अनावश्यक देरी के संबंध में कई लेख प्रकाशित किए हैं। गत 3 जुलाई को एनडीए सरकार द्वारा इस जनगणना के कुछ हिस्सों पर से पर्दा उठाने के बाद, हम इस विषय पर पुन: फोकस कर रहे हैं। हमारा इरादा इस मुद्दे पर केवल अभय कुमार की आवरण कथा प्रकाशित करने का था परंतु अंतत: यह पूरा अंक ही इस पर केन्द्रित हो गया। आवरणकथा, जाति जनगणना की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए उसके पक्ष और विपक्ष में दिए जा रहे तर्कों का सार प्रस्तुत करती है।

नवल किशोर कुमार के साथ साक्षात्कार में लालू प्रसाद ने अपनी टेड मार्क बेबाकी से जाति जनगणना पर अपने विचार रखे हैं। जहां राजनेताओं से यह अपेक्षा की जा सकती है कि वे आंकड़ों का उपयोग उसी तरह करेंगे जिस तरह शराबी लेम्प पोस्ट का करता है – ज्ञान का प्रकाश फैलाने के लिए नहीं बल्कि सहारा लेने के लिए – परंतु अभय कुमार का प्रोफेसर अमिताभ कुंडू के साथ साक्षात्कार इस मुद्दे के सूक्ष्म पहलुओं पर प्रकाश डालता है। अपनी आशंकाओं के बावजूद वे इसे ”ऐसी प्रक्रिया की शुरुआत के रूप में देखते हैं, जो आने वाले वर्षों में हमें जाति और धर्म-आधारित विश्वसनीय सामाजिक-आर्थिक डाटा उपलब्ध करायेगा”।

नागेश चौधरी, मंडल आंदोलनों के कुछ सबक को एसईसीसी 2011 के नतीजों को सार्वजनिक करने के संघर्ष से जोड़कर देख रहे हैं। उनका निष्कर्ष है कि ”सरकार को जाति जनगणना के आंकड़े जारी करने के लिए मजबूर करने की जिम्मेदारी ओबीसी पार्टियों और संगठनों को ही उठानी होगी”।

पूर्व सांसद व विमुक्त जनजातियों (डीएनटी) के राष्ट्रीय नेता हरिभाई राठौड़, एफपी के जुलाई 2015 अंक में प्रकाशित अशोक यादव की आवरणकथा को चुनौती देते हैं। जैसा कि उन्होंने नवम्बर 2011 के एफपी में भी लिखा था, उनका मानना है कि ओबीसी कोटे को विभाजित कर डीएनटी को अलग से आरक्षण दिया जाए।

अपने साक्षात्कार में लेखक व चिंतक प्रेमकुमार मणि, एसईसीसी 2011 के नतीजों को जारी करने की वकालत करते हैं। उन्होंने नीतीश और लालू दोनों के साथ काम किया है और वे दोनों की सोच पर कुछ तल्ख टिप्पणियां भी करते हैं। मैं पिछड़ों के वर्तमान नेतृत्व की उनकी कड़ी निंदा से पूरी तरह सहमत हूं और उनके हल से भी कि ”(ओबीसी) जातियों को जमात में तब्दील हो जाना चाहिए और इसके लिए हमें फुले-आंबेडकरवाद की राह पर चलना होगा। दलितों और ओबीसी का संयुक्त मोर्चा बनाने पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए”।

फारवर्ड प्रेस के सितंबर, 2015 अंक में प्रकाशित

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