जाति जनगणना के लिए जनहित अभियान

दिल्ली स्थित इस संस्था ने जाति जनगणना के समर्थक राजनेताओं, प्राध्यापकों और सामाजिक चिंतकों को एक मंच पर लाकर, मांग को आन्दोलन का स्वरुप दिया

आजाद भारत में जातिवार जनगणना करवाये जाने की मांग लंबे समय से उठती रही है। सन 2011 में जब 14वीं जनगणना शुरू हुई तो जाति को उसमें शामिल करने का सवाल एक बार फिर से सतह पर आया। दरअसल, पहले जाति जनगणना के समर्थन में आवाज सिर्फ राजनेताओं के एक तबके द्वारा ही उठाई जाती थी जबकि विरोध करने वालों में राजनेता, प्रोफेसर, नौकरशाह, समाजसेवी, पत्रकार, वकील या कहें कि पूरा प्रबुद्ध वर्ग शामिल रहता था। जाति जनगणना के पक्ष में आवाज चूंकि सिर्फ पिछड़े तबके के नेताओं की तरफ से उठाई जाती थी इसलिए वह कुछ दिनों में समाप्त हो जाती थी। लेकिन मण्डल आयोग की रपट के लागू होने की वजह से इस बार फिज़ा कुछ बदली हुई थी। मंडल आरक्षण के चलते पिछड़ी जातियों में एक बुद्धिजीवी तबका तैयार हुआ है। यह तबका दलित, अल्पसंख्यक व आदिवासी समाज के बुद्धिजीवियों के साथ मिलकर एक बड़ा शक्ति समूह बना लेता है। यदि हम इस बार जाति जनगणना पर संसद में हुई बहस की गुणवत्ता पर नजर डालें तो इस बुद्धिजीवी वर्ग का प्रभाव साफ दिखाई देता है।

cast census copyजाति जनगणना के पक्ष में राजनेताओं, प्रोफेसरों, पत्रकारों व सामाजिक चिंतकों को एक मंच पर लाकर इस मांग को एक आंदोलन की शक्ल दी दिल्ली स्थित एक संगठन – ‘जनहित अभियान’ ने। जनहित अभियान की शुरुआत 2007 में राज नारायण यादव ने डॉ चन्द्रशेखर यादव, राजेंद्र रवि, डॉ अनूप सराया व संजय कुमार के साथ मिलकर की थी। इस संगठन का प्रारम्भिक उद्देश्य सरकार की नीतियों को ठीक से क्रियान्वित करवाना था। इस संगठन ने सबसे पहले बिहार में ‘गेरुआ आंदोलन’ चलाया, जिसका मुख्य उद्देश्य टूटे हुए पुलों का पुनर्निर्माण करवाना था। उक्त आंदोलन के दौरान संगठन को यह अहसास हुआ कि किसी भी नीति के क्रियान्वन हेतु आंकडों का होना कितना जरूरी है। आंकड़े इकट्ठे करने हेतु इस संगठन ने ‘जनहित रिसर्च ग्रुप’ नामक अपनी शाखा का गठन किया। इस शाखा से जुड़े लोगों ने ‘सूचना का अधिकार’ कानून को अपना हथियार बनाया और भारत सरकार से पूछा कि क्या उसके पास देश के किसी भी गाँव के सम्बन्ध में सम्पूर्ण आंकड़े उपलब्ध है जिसमें जाति, धर्म, उम्र, शिक्षा, जमीन, जायदाद, गरीबी, आवास आदि का विवरण हो? सरकार की तरफ से नकारात्मक जवाब मिला। इसके बाद संगठन ने ‘योजना आयोग’ से पूछा कि क्या इस तरह के आंकड़े होने से योजना बनाने में कोई मदद मिलती है। योजना आयोग का जवाब सकारात्मक था। इसी बीच, सरकार की तरफ से जनगणना की अधिसूचना जारी हुई तो जनहित अभियान से जुड़े लोगों ने जनगणना में जाति का कालम शामिल करने की मुहिम छेड़ दी।

संगठन ने 2009 में जाति जनगणना पर पहला सम्मेलन दिल्ली में आयोजित किया, जिसमें समाजवादी चिंतक सुरेन्द्र मोहन, लोहियावादी चिंतक मस्तराम कपूर, समाजशास्त्री प्रो नंदुराम, इम्तियाज़ अहमद, पत्रकार दिलीप मण्डल आदि ने शिरकत की। अगले चरण में आयोजकों ने विभिन्न पार्टियों के सांसदों को जोडऩा शुरू किया। इस पूरे अभियान की खास बात यह रही कि आयोजक किसी से भी कोई पैसा नहीं लेते थे बल्कि लोगों से सीधे अपने स्तर पर खर्च उठाने के लिए कहते थे। धीरे-धीरे कारवां बढ़ता गया तथा दलित-पिछड़े समाज के सांसदों ने अपने-अपने राज्यों में जाति जनगणना पर जनहित अभियान के कार्यक्रम करवाये। इस प्रकार यह आंदोलन पूरे देश में फैल गया। राज नारायण के अनुसार शरद यादव, मायावती, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, कांग्रेस सांसद के. हनुमन्नता राव, छगन भुजबल, टीडीपी प्रमुख के. चंद्रबाबू नायडू, स्व गोपीनाथ मुंडे आदि ने सार्वजनिक तौर पर संगठन समर्थन तो दिया ही बल्कि व्यक्तिगत तौर पर मिलकर प्रोत्साहन भी दिया।

संगठन ने दिल्ली में 2010, 2011, 2012, 2013 में बड़े कार्यक्रम किए। अभी जुलाई में दिल्ली में एक बड़ा कार्यक्रम हुआ। समाज में जागरूकता फैलाने के लिए संगठन ने जाति आधारित जनगणना पर कई पुस्तिकाओं को भी प्रकाशन किया। संगठन की दृढ मान्यता है कि जातिवार गणना, जनहित में जरूरी है। बिना इसके वंचित तबकों उनके हक दिलवाना लगभग असंभव है।

जनहित अभियान के इस अथक परिश्रम के बाद भी यूपीए सरकार ने धोखा दिया और जनगणना में जाति को शामिल न करके अलग से सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण करवाया। लेकिन सरकार के नकारात्मक रवैये के बावजूद ‘जनहित अभियान’ के हौसले बुलंद हैं। संगठन, सर्वे के आंकड़ों का जारी करने के लिए दवाब बनाने और अगली जगगणना में जाति का कॉलम जुड़वाने के आंदोलन की तैयारी में जुटा है।

फारवर्ड प्रेस के सितंबर, 2015 अंक में प्रकाशित

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