आंबेडकर का ‘बंधुत्व’ बनाम आरएसएस की ‘एकता’

आंबेडकर ने गरिमा, न्याय और करुणा की तलाश में बौद्ध धर्म अपनाने का निर्णय लिया। हिन्दू सामाजिक व्यवस्था में विभिन्न समुदायों और समूहों में पारस्परिक आदान-प्रदान और एक दूसरे को सम्मान और मान्यता देने के लिए कोई स्थान नहीं था

दलितों को हिन्दू धर्म में आत्मसात करने से न केवल इस सम्बन्ध में भ्रम उत्पन्न हुआ है कि हिन्दू कौन है वरन दलितों और अन्य धर्मों के बारे में धारणाओं में भी परिवर्तन आया है। दलित संस्कृति को व्यापक हिन्दू समाज का हिस्सा बना लिया गया है और समानता पर विमर्श को मात्र वंचित समूहों को आरक्षण प्रदान करने तक सीमित कर गरिमा और समानता के मूल मुद्दों को दरकिनार कर दिया गया है। इसने एक तरह की बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक राजनीति को जन्म दिया है और बहुसंख्यक समुदाय यह मान बैठा है कि उसमें सार्वजनिक जीवन की विशिष्ट संस्कृति को आकार देने की क्षमता ही नहीं वरन अधिकार भी है।

मैत्री और बंधुत्व

fraternity v unityबी.आर. आंबेडकर राजनीति को एक ऐसे क्षेत्र के रूप में देखते थे, जो लोकतंत्रात्मक तरीके से आमूलचूल परिवर्तन ला सकता है। उन्होंने गरिमा, न्याय और करुणा की तलाश में बौद्ध धर्म अपनाने का निर्णय लिया। हिन्दू सामाजिक व्यवस्था में विभिन्न समुदायों और समूहों में पारस्परिक आदान-प्रदान और एक दूसरे को सम्मान और मान्यता देने के लिए कोई स्थान नहीं था। जैसा कि अपनी पुस्तक ‘श्रिलीजियस फेथ, आइडियोलोजी, सिटिजऩशिप द व्यू फ्रॉम बिलो’ में व्ही. गीता लिखतीं हैं, ‘डॉ आंबेडकर ने लिखा है कि एक हिन्दू के लिए उसकी जाति ही उसका लोक है, उसके बाहर वह झांकता ही नहीं। विभिन्न जातियों के बीच सामाजिक मेल-मिलाप के अभाव के चलते साझा वर्गीय मूल्यों का विकास नहीं हो पाता… बंधुत्व का अभाव उस व्यवस्था का नतीजा है, जो अनेक लोगों को ज्ञान प्राप्त करने से वंचित रखती है, उन्हें गुलाम बना कर रखती है और जो किसी को भी अपना पेशा बदलने की इज़ाज़त नहीं देती।’

आंबेडकर ने बुद्ध और उनके धम्म पर आधारित बंधुत्व की एक ऐसी अवधारणा प्रस्तुत की, जो एकता से एकदम भिन्न थी। आंबेडकर के लेखन से यह साफ़ है कि उनके लिए बंधुत्व का अर्थ था स्वतंत्रता और समानता के आधुनिक आदर्शों पर आधारित समानाधिकारवादी समाज। परंपरागत रूप से इस तरह के आदर्श कानून या धार्मिक नैतिकता से उधार लिए जाते थे परन्तु आम्बेडकर की अवधारणा न तो कानून से और न धर्म से ली गयी थी। बौद्ध मत को दलितों के वैज्ञानिक धर्म के रूप में प्रस्तुत कर आंबेडकर ने दलितों को एक आध्यात्मिक विकल्प दिया। उनका लक्ष्य था ‘आधुनिक जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम एक नयी तत्व मीमांसा उपलब्ध करवाना।’ नवायान बौद्ध धर्म, जैसा कि उन्होंने उसे नाम दिया था, में यह संकल्पना अन्तर्निहित थी कि समाज के सदस्य एक-दूसरे को कैसे देखेंगे। वह समावेशीकरण के जरिये ‘दूसरे’को आत्मसात करने में नहीं वरन अलग-अलग समूहों को करुणा के आधार पर स्वीकार करने और मान्यता देने में विश्वास रखती है।यह एक-दूसरे को पारस्परिक मान्यता देने पर आधारित संकल्पना है और करुणा के साथ-साथ संपूर्ण सृष्टि के प्रति मैत्री भाव रखने पर जोर देती है। गीता के अनुसार यह पूरे विश्व के साथ समान शर्तों पर सक्रिय सहचर्य की संकल्पना है। धम्म इस बंधुत्व का पथप्रदर्शक होगा क्योंकि वह नीतिपरक मतैक्य पर आधारित था। यह संकल्पना व्यक्तियों से यह अपेक्षा नहीं करती कि वे एक-से हों। बल्कि वह सभी की नैतिक समानता पर आधारित है और पारस्परिक आदरभाव पर जोर देती है।

परन्तु राष्ट्रीयता के मानक हिन्दू परंपरा को मतविभिन्नता के ‘समावेशीकरण’ स्वरूप में प्रस्तुत करते हैं- आत्मसात्करण की एक ऐसी परंपरा के रूप में, जो सहिष्णुता पर आधारित है और जिसके सम्बन्ध में बाद में यह दावा किया गया कि यह भारतीयता की निशानी है।

सहिष्णुता से तात्पर्य था विविध धार्मिक विश्वासों का हिन्दू धर्म के व्यापक विमर्श में आत्मसात्करण-उदाहरण के लिए बुद्ध को विष्णु का अवतार और जैन व सिक्ख धर्मों को हिन्दू धर्म का पंथ बताया जाना। सहिष्णुता की इस समावेशीकरण-आधारित अवधारणा के राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार का अर्थ था, अल्पसंख्यकों का आत्मसात्करण – जिसके केंद्र में थे धार्मिक अंतर न कि वे असंख्य तरीके, जिनसे धर्म सांस्कृतिक, सामाजिक व भाषाई परिदृश्यों को प्रभावित करता है।

नतीजे में, सन 1980 के बाद से देश में एक विशिष्ट प्रकार की पहचान की राजनीति का उदय हुआ। यह राजनीति जहाँ आम लोगों की मांगों और आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करती है, वहीं इसने सामाजिक न्याय के विमर्श को जटिल बनाया है। लोग एक-दूसरे से अलग होते हैं, यह तो वह स्वीकार करती है परन्तु वह समानता की आम्बेडकरवादी बंधुत्व-आधारित समझ को मान्यता नहीं देती। इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि हम भाजपा जैसी दक्षिणपंथी राजनैतिक पार्टियों के उदय के पीछे के कारणों को समझें। ये पार्टियाँ सबकेलिए विकास केजुमले केआवरण में हिन्दू राष्ट्र की स्थापना केअपने लक्ष्य को प्राप्त करने केप्रयास करती है। यह विभिन्न समूहों की राजनीति से आगे जाकर एकता की उनकी सोच को प्रदर्शित करने का उनका तरीका है।

एकता की वर्तमान अवधारणा

भाजपा सभी समूहों के व्यक्तियों को नागरिक मानती है, परन्तु जब वह नागरिक की बात करती है तो उसका तात्पर्य हिन्दू नागरिक से होता है। ‘संघ- जो कि उसकी राजनैतिक शाखा से पुराना सांस्कृतिक संगठन है – की मान्यता है कि सतयुग में हिन्दू धर्म, संस्कृति और भाषा अपने आदर्श स्वरुप में थीं। वे परम सत्य से उपजीं हैं और सनातन,अविभाज्य व अपरिभाष्य हैं’, क्रिस्टोफर जेफ्रेलॉट अपनी पुस्तक ‘द संघ परिवार’ में लिखते हैं। संघ के अखंड हिन्दू राष्ट्र में विविधता और उससे भी अधिक महत्वपूर्ण मतभेदों के लिए कोई जगह नहीं है। वे पारसियों को भारत का एकमात्र अल्पसंख्यक समूह मानते हैं और अन्य अल्पसंख्यकों को घरवापसी के जरिये हिन्दू धर्म के झंडे तले लाना चाहते हैं। उनके लिए भारतीय होना हिन्दू होना है। वे हिन्दू को केवल एक धार्मिक पहचान नहीं मानते वरन एक संस्कृति बताते हैं। वे आधुनिक विज्ञान के आविष्कारों और आधुनिक चिकित्सा पद्धति को पौराणिक स्त्रोतों के आधार पर अपना बताते हैं।

rss-drillजेफ्रेलॉट के अनुसार भाजपा जब सत्ता में होती है तब वह ‘नस्लीय-धार्मिक आधार पर लामबंदी और मध्यमार्गी राजनीति के दो विपरीत ध्रुवों के बीच झूलती रहती है। उसकी मध्यमार्गी राजनीति, तीन कारकों पर निर्भर करती है -हिन्दू स्वयं को कितना असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, अन्य राजनैतिक शक्तियों का रवैया क्या है और पार्टी के कार्यकर्ता व आरएसएस, जिससे पार्टी कार्यकताओं का गहरा जुड़ाव रहता है, क्या सोच रहे हैं।’ ऐसा प्रदर्शित किया जाता है मानो नागपुर में बैठे आरएसएस के कर्ताधर्ताओं का भाजपा की राजनैतिक रणनीतियों से कोई लेनादेना ही नहीं है परन्तु संघ को संस्कृति के क्षेत्र में घुसपैठ करने की खुली छूट दी जाती है। जबसे भाजपा सत्ता में आयी है, आरएसएस ने हिन्दू राष्ट्र के अपने एजेंडे पर जोरशोर से काम करना शुरू कर दिया है और इसके लिए वह उन ‘साधुओं और साध्वियों’ का इस्तेमाल कर रहा है, जो भाजपा सांसद भी हैं। अनेक संसद सदस्यों ने कहा है कि उन्हें अपनी संघी जड़ों पर गर्व है। आरएसएस ऐसा अभिनय करता है मानो वह कोई आधुनिक एनजीओ हो। वह भाजपा को वोट दिलवाने का काम तो करता ही है, आदिवासियों और समाज के अन्य कमज़ोर तबकों के बीच कई वर्षों से ‘सामजिक कार्य’ कर उसने एक प्रकार की वैधता हासिल कर ली है, जिसके चलते वह आक्रामक तरीके से संस्कृति के रक्षक के रूप में स्वयं को प्रस्तुत कर पा रहा है। उसकी सांप्रदायिक और संकीर्ण सोच पृष्टभूमि में चली गयी है। लोग इस तथ्य को भुला बैठे हैं कि संघ के एक विचारक ने महात्मा गाँधी की हत्या की थी क्योंकि, उसके अनुसारए राष्ट्रपिता ने पाकिस्तान के निर्माण की मांग को स्वीकृत कर अखंड भारत की स्थापना के आरएसएस के स्वप्न को मटियामेट कर दिया था।

तो, एक ओर सरदार बल्लभभाई पटेल की ‘स्टेच्यु ऑफ़ लिबर्टी’ आकार ले रही है तो दूसरी ओर इस एकता के स्वरुप का निर्धारण आरएसएस के साधु और साध्वियां कर रहे हैं। भाजपा चुप्पी साधे हुए है।

फारवर्ड प्रेस के सितंबर, 2015 अंक में प्रकाशित

 

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