फारवर्ड विचार, जनवरी 2016

आवश्यकता इस बात की है कि सामाजिक न्याय के विमर्श को अधिक व्यापक और गहरा बनाया जाए। जब हम ऐसा करेंगे तो हमारा इस कटु सत्य से सामना होगा कि भारतीय -विशेषकर ब्राह्मणवादी-विश्वदृष्टि समानता और सामाजिक न्याय को बहुत महत्व नहीं देती

”जो लोग सोचते-समझते हैं और एक बेहतर समाज का स्वप्न देखते हैं…”, यह प्रमोद रंजन के संपादकीय लेख, जो इस सामाजिक न्याय विशेषांक का पहला आलेख है-की शुरूआती पंक्ति है। अक्सर, समाचारों और ब्रेकिंग न्यूज़ का फोकस व्यक्तियों पर होता है – चाहे वे गुजरात के पटेल-पाटीदारों के नेता हार्दिक पटेल हों या आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत, जिन्होंने हालिया बिहार विधानसभा चुनाव के अधबीच में आरक्षण पर ‘पुनर्विचार’ करने संबंधी विवादित बयान दिया था। परंतु हमें यदि भारत में सामाजिक न्याय की बहुआयामी अवधारणा को समझना है तो हमें उसकी गहराई में जाना होगा। हमें विचार करना होगा, मंथन करना होगा और नए स्वप्न देखने होंगे।
फारवर्ड प्रेस के इस विशेषांक में हम सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों की सुर्खियों के पीछे और उनके आगे जाकर, बहुत कुछ प्रस्तुत कर रहे हैं। जम्मू-कश्मीर के ओबीसी पर केंद्रित एके बसोत्रा के लेख से लेकर दक्षिण भारत में सामाजिक न्याय आंदोलनों पर नजऱ डालने वाले टी थमराईकन्नन के आलेख तक, हमने पूरे भारत पर दृष्टिपात किया है। कश्मीर और दक्षिण भारत के बीच, हमने गुजरात के पाटीदार आंदोलन और मराठाओं की आरक्षण की अब तक लंबित मांग का विश्लेषण भी किया है। कुल मिलाकर जो तस्वीर उभरती है वह यह है कि वर्तमान में सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों के केंद्र में ओबीसी व वे समूह हैं, जो इस श्रेणी में शामिल होना चाहते हैं।
इस विमर्श के एक नए पहलू को अनूप पटेल और युवराज सखारे, क्रमश: पटेल-पाटीदारों व मराठाओं पर केंद्रित अपने लेखों में उद्घाटित कर रहे हैं। पटेल का निष्कर्ष है कि ”पिछले एक दशक से गैर-द्विज जातियां, अपने लिये आरक्षण की मांग कर रही हैं। ये समुदाय सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक क्षेत्र में द्विज सवर्णो से इतर अपना वजूद बनाने की कोशिश कर रहे हैं। महाराष्ट्र में मराठाओं तथा हरियाणा और अखिल भारतीय स्तर पर जाटों द्वारा आरक्षण पाने की असफल कोशिशों को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।” सखारे, ”सेव ओबीसी रिजर्वेशन कमेटी” के सचिव श्रवण देवरे को उद्धृत करते हुए कहते हैं कि एकमात्र रास्ता यह है कि महाराष्ट्र विधानसभा, आरक्षण पर 50 प्रतिशत की सीमा को हटाने के लिए संकल्प पारित करे।
परंतु इस सबके बावजूद भी सामाजिक न्याय पर विमर्श अभी भी आरक्षण की चहारदीवारी से बाहर नहीं निकल पाया है। सभी समुदाय शासकीय शिक्षण संस्थाओं और नौकरियों में घटते अवसरों का ज्यादा से ज्यादा बड़ा हिस्सा पाने के लिए रास्ते खोजने में लगे हैं। आवश्यकता इस बात की है कि सामाजिक न्याय के विमर्श को अधिक व्यापक और गहरा बनाया जाए। जब हम ऐसा करेंगे तो हमारा इस कटु सत्य से सामना होगा कि भारतीय -विशेषकर ब्राह्मणवादी-विश्वदृष्टि समानता और सामाजिक न्याय को बहुत महत्व नहीं देती। अगर बहुजन परिवार के हम सदस्य ही इस सामाजिक रूग्णता की जड़ के बारे में एकमत नहीं होंगे तो हम इस कैंसर का इलाज कभी नहीं ढूंढ सकेंगे। मानव के सृजन संबंधी भारतीय मिथक और कर्म-आधारित पुनर्जन्म पर आस्था, असमान और अन्यायपूर्ण समाज को बनाए रखने के लिए जिम्मेदार है।
सामाजिक पुनर्निमाण के कुछ मूलभूत कार्यो की शुरूआत, चिंतन और अलग तरह के सपने देखने से हुई। जब तक भारत यह स्वीकार नहीं कर लेता कि सभी पुरूष व महिलाएं बराबर हैं, तब तक हम मार्टिन लूथर किंग ‘जूनियर’ की तरह स्वप्न नहीं देख पाएंगे, जिन्होंने 1963 के अपने प्रसिद्ध भाषण में कहा था, ”मेरे मित्रों, मैं आपसे आज कहता हूं कि यद्यपि अभी हम कई समस्याओं से रूबरू हैं, तथापि फिर भी, मेरा एक सपना है…मेरा एक सपना है कि एक दिन यह देश उठ खड़ा होगा और हम अपने सिद्धांतों को व्यावहारिक स्वरूप दे सकेंगे-‘सभी मनुष्य बराबर हैं, हम इसे स्वयंसिद्ध सत्य मानते हैं’।”
क्या हमारी पीढ़ी में गैरद्विज-बहुजनों का कोई (मार्टिन लूथर) किंग होगा? आईए, तब तक हम चिंतन करें, स्वप्न देखें और सामाजिक न्याय की राह पर आगे बढ़ें।
फारवर्ड प्रेस के जनवरी, 2016 अंक में प्रकाशित

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