पिछले ओबीसी आंकड़ों की विश्वसनीयता संदिग्ध

साफ़ है कि तीन एजेंसियां अलग-अलग आंकड़े पेश कर रही हैं। ऐसे में हम समझ सकते हैं कि कुछ समय से जिस सामाजिक, आर्थिक, जाति जनगणना 2011 का शोर है, उसकी विश्वनसनीयता भी संदिग्धि ही रहेगी

census vs surveyविभिन्न जातियों की आबादी की गणना कोई नई चीज नहीं है। एक सामाजिक समूह के रूप में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के आकार को जानने का प्रयास विभिन्न सर्वेक्षणों के माध्यम से होता रहा है। ये सर्वेक्षण अलग-अलग स्तरों पर अलग-अलग एजेंसियों द्वारा या राज्य सरकारों द्वारा कराये जाते रहे हैं।

बी पी एल सर्वे 2002 – सन 2009 में बीपीएल सर्वे, 2002 के आंकड़े आये। इस सर्वे के अनुसार, देश में ओबीसी जातियां ग्रामीण जनसंख्या की 38.5 प्रतिशत हैं। राज्यों में तमिलनाडु ओबीसी जनसंख्या के लिहाज से नंबर एक है, जहां कुल ग्रामीण जनसंख्या के 54.37 प्रतिशत ओबीसी हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार और छतीसगढ़ में ओबीसी जनसंख्या का क्रमश: 51.78 प्रतिशत, 50.37 प्रतिशत और 37 प्रतिशत हैं।

एनएसएसओ के आंकड़े – 2007 में नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस (एनएसएसओ) ने देश की जनसंख्या में ओबीसी का प्रतिशत 41 बताया। सर्वे के अनुसार तमिलनाडु की शहरी और ग्रामीण आबादी के 74.4 प्रतिशत ओबीसी हैं। बिहार में क्रमश: 59.39 और 57.64 प्रतिशत ग्रामीण और शहरी आबादी ओबीसी है। उत्तरप्रदेश में 54.64 प्रतिशत ग्रामीण आबादी ओबीसी है, जबकि शहरों में कुल आबादी में ओबीसी का प्रतिशत 50 से कम है। जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, पंजाब आदि राज्यों में ओबीसी आबादी राष्ट्रीय प्रतिशत 41 से काफी कम-मात्र 25 प्रतिशत है।

उत्तर प्रदेश में रैपिड सर्वे – इसी वर्ष (2015) में उत्तरप्रदेश में एक रैपिड सर्वे के जरिये ओबीसी की गिनती की गई। इसके पहले राज्य में 2005 में भी जातिवार संख्या का सर्वे हुआ था। इस वर्ष हुए सर्वे के अनुसार सूबे की कुल ग्रामीण जनसंख्या में ओबीसी 53.33 प्रतिशत हैं।

साफ़ है कि तीन एजेंसियां अलग-अलग आंकड़े पेश कर रही हैं। ऐसे में हम समझ सकते हैं कि कुछ समय से जिस सामाजिक, आर्थिक, जाति जनगणना 2011 का शोर है, उसकी विश्वनसनीयता भी संदिग्धि ही रहेगी। ऐसे ही अन्य सर्वेक्षण भी सरकारी एजेंसियों द्वारा होते रहे हैं, जिनके संपूर्ण आंकडे सार्वजनिक नहीं किये गए। इसलिए आज आवश्यककता है जातिवार संपूर्ण जनगणना की, जिसके आंकडे न सिर्फ विश्वसनीय हों बल्कि जिसकी पूरी रपट को सार्वजनिक किया जाए। – एफपी डेस्क

फारवर्ड प्रेस के सितंबर, 2015 अंक में प्रकाशित

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