प्रेम का बदला बलात्कार

पिछले 25 वर्षों से समाजवादियों द्वारा शासित इस प्रदेश में अब भी ज़मींदार कानून से ऊपर हैं

अगस्त के पहले ही दिन यह खबर आयी कि बीते 26 जुलाई को बिहार के खगडिय़ा जिले के परबत्ता प्रखंड के नयागांव के शिरोमणि टोला में भूमिहार जाति के दबंगों ने हमला बोलकर कई महिलाओं के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया। खबर चौंकाने वाली थी। खबर का स्रोत था भाकपा-माले के प्रदेश कार्यालय के सचिव कुमार परवेज द्वारा भेजा गया ई-मेल। खबर की पुष्टि के लिये जिले के तत्कालीन महिला एसपी दुरंत सियाली सबलाराम को फ़ोन किया। जानकारी मिली कि दो पक्षों के बीच मारपीट की घटना हुई है। सामूहिक दुष्कर्म जैसा कुछ नहीं घटा। इससे पहले कि मैं उनसे कुछ और जानकारी हासिल कर पाता, उन्होंने फ़ोन काट दिया। स्थानीय मीडिया में तो कोई ऐसी खबर थी ही नहीं।

अधूरी जानकारी को पूरी करने के लिए स्थानीय थाना प्रभारी आशुतोष सिंह से संपर्क किया। उन्होंने भी वही कहा जो एसपी ने कहा था। अलबत्ता एक नयी बात सामने यह आयी कि मामला प्रेम प्रसंग से जुड़ा है। ओबीसी के अंतर्गत आने वाले तांती जाति के एक लड़के प्रीत कुमार शर्मा ने एक विवाहित युवती के साथ विवाह कर लिया था। इसी कारण भूमिहारों ने शिरोमणि टोला पर हमला बोला था। पटना के किसी भी अखबार ने इस खबर को प्रकाशित ही नहीं किया था। मैंने पूरे मामले की जानकारी हासिल करने के लिये खगडिय़ा जाने का निर्णय लिया।

DSC00666 copyरात करीब 11 बजे पटना के बस पड़ाव से खगडिय़ा जाने के लिए बस पर सवार हुआ। सुबह करीब साढ़े चार बजे मैं महेशखूंट में था। सावन अपना काम कर रहा था। किसी तरह खुद को बचाते हुए एक चाय की दुकान में घुस गया और चाय पीने के बहाने नयागांव जाने का मार्ग दुकानदार से पूछा। जानकारी मिली कि मानसी जाने के लिये जीप मिलती है, रास्ते में नयागांव पड़ता है। करीब एक घंटा समय लगेगा। ठीक 15 मिनट बाद एक जीप मेरे सामने आकर लगी। एक व्यक्ति मानसी-मानसी की आवाज लगा रहा था। मैं जीप में बैठ गया।

सूर्योदय के साथ ही मैं नयागांव जाने के लिये निकल पड़ा था। चालक को नयागांव आने पर बताने के लिए कह रखा था इसलिये निश्चिंत था। करीब सवा घंटे की यात्रा के बाद मैं नयागांव जाने वाली सड़क पर खड़ा था। जीप आगे बढ चुकी थी। कुछ लोग नजर आये। वे मजदूर लग रहे थे। एक से नयागांव के बारे में पूछा। वह चौंक गया। उसने कहा कि ‘वहां मत जाइये, बहुत खतरा है। बवाल मचा हुआ है वहां’।

मैंने अपना परिचय दिया और आने का कारण बताया तो उसने एक और रास्ता दिखाते हुए कहा कि करीब चार किलोमीटर की दूरी पर एक बस्ती है रेहमा, जहां शिरोमणि टोले के लोग भागकर शरण ले रहे हैं। मैं उसके बताये रास्ते पर बढ़ चला। थोडा आगे जाने पर वही मजदूर फिऱ मेरे पास आया और बोला, ‘मैं आपको ले चलता हूं।’ मेरे पास इन्कार करने की कोई वजह नहीं थी। मैं उसकी साईकल पर सवार हो गया।

प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के तहत वर्ष 2013 में बनी सड़क पर चलते हुए उसने नयागांव के सामाजिक गणित के बारे में जानकारी दी। उसने बताया कि नयागांव, भूमिहार बहुल है, जिसके शिरोमणि टोला में तांती समाज के लोग रहते हैं। करीब 10 घर ब्राह्मणों और 20-25 यादवों के हैं। घटना के बारे में उसने बताया कि तांती जाति के एक लड़के और भूमिहार जाति की लड़की के बीच स्कूल के दौरान ही प्यार हो गया था। दोनों पिछले वर्ष घर से भाग गये और कोर्ट में शादी कर ली। करीब पन्द्रह दिन बाहर रहने के बाद दोनों वापस आ गये। लड़की के पिता ने उसकी शादी बेगूसराय में एक अधेड़ से कर दी। इस बीच लड़की और उसका प्रेमी एक-दूसरे से फ़ोन पर संपर्क में थे। इसी महीने दोनों एक बार फिऱ भाग गये। इसी को लेकर बवाल मच गया।

करीब आठ बज चुका था और मुझे भूख लग रही थी। बीती रात मैंने कुछ भी नहीं खाया था। रास्ते में एक नाश्ते की दुकान को देखकर मैंने उससे रुकने का अनुरोध किया। उसने कहा कि अभी नाश्ता नहीं केवल चाय मिल सकती है यहां। फिऱ उसने कुछ देर सोचा और साइकिल रोक दी। मुझे दतवन लाकर दिया। और फिर अपने झोले से एक पोटली निकाली और मेरी तरफ़ बढा दी। ‘सर, आज आप खा लें। मैं घर जाकर खा लूंगा’।

हम नयागांव से करीब एक किलोमीटर दूर उस बस्ती में थे, जहां शिरोमणि टोला के पीडित पनाह लिये हुए थे। मुझे देखते ही कई लोगों ने घेर लिया और अपने-अपने तरीके से घटना की चर्चा करने लगे। मैंने अनुरोध किया, तब लोगों ने तांती समाज के उसे परिवार से मिलावाया जिसके लड़के ने भूमिहार समाज की लड़की से प्रेम करने का साहस किया था। एक महिला आयी। उसने कहा कि वह उसकी मां है। रोते हुए उसने कहा कि ‘हरामियों ने सब बर्बाद कर दिया। घर का खपरा तक नोंच दिया है। बड़ी पतोहू के साथ गंदा काम किया और 12 वर्ष की बेटी के साथ भी।’ फिऱ उसने अपने पैरों पर लाठी का निशान दिखाया। मुझे लगा कि यह निशान केवल उसके घुटनों तक सीमित नहीं था। उसके बाद कई और महिलायें आयीं। घर वापस जाने के बारे में पूछा तो लोगों ने बताया कि जहाँ इज्जत ही सलामत नहीं है, ऐसे गांव में जाकर क्या करेंगे। पीडितों ने यह भी बताया कि जदयू विधायक आर एन सिंह भी जाति के भूमिहार हैं और नया गांव के ही रहने वाले हैं। इसलिये स्थानीय विधायक भी अपनी जाति के लोगों के साथ है और पुलिस भी। हमारी कोई सुनने वाला नहीं है।

मैंने वहीं से थाना प्रभारी आशुतोष सिंह को फ़ोन किया। उन्होंने फ़ोन रिसीव नहीं किया तब एक एसएमएस भेज दिया कि मैं शिरोमणि टोला के पीडितों के बीच हूं। कोई जवाब नहीं आया। फिऱ मैंने स्थानीय जदयू विधायक आरएन सिंह को फ़ोन किया। उनका फ़ोन नहीं लगा। इस बीच एक सरकारी गाड़ी आयी। गांव के मुखिया ने उसकी अगवानी की। मालूम चला कि बीडीओ साहब ने अनाज भेजा है। फिऱ अनाज लेने की होड़ लग गयी।

मैं लौट रहा था। एक बार उसी साइकिल सवार के साथ। सोच रहा था कि क्या यह उसी बिहार की धरती है, जहां पिछले 25 वर्षों से वे लोग राज कर रहे हैं, जो स्वयं को समाजवादी कहते हैं।

फारवर्ड प्रेस के सितंबर, 2015 अंक में प्रकाशित

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