शहरों ने दलित-बहुजनों को किया निराश – फुले-आंबेडकर का स्वप्न ध्वस्त!

क्या कोई अन्य ताकतें दलित-शोषित समाज को शहरी अवसरों का लाभ उठाने से रोक रही हैं ?

ambedkar-cityशहरीकरण भारत के दलितों, मुसलमानों और मुख्यधारा के समाज के लिए भी एक नई अवधारणा है। हालाँकि भारतीय सभ्यता के इतिहास में सुदूर अतीत में नगर और नगरीय सभ्यता के चिन्ह मिलते हैं, लेकिन औद्योगीकरण और वैश्वीकरण ने जिस तरह के शहरों और शहरीकरण को आकार दिया- वह भारत के लिए एकदम नई परिघटना है। इसीलिए नगरीय समाजशास्त्र की दृष्टि से शहरीकरण और शहर के सामाजिक ताने-बाने – दोनों का अध्ययन नए विषय हैं। स्वभावत:, इस नयेपन के साथ, भारत की रुढि़वादी सामाजिक और पारिवारिक संरचनाओं के टकराव का परिणाम भी कुछ नया ही होना था; और वस्तुत: ऐसा हुआ भी है। अभी तक के समाजशास्त्रीय व आर्थिक अध्ययनों ने न केवल मुख्यधारा के भारतीय समाज के शहरीकरण के सन्दर्भ में प्रवृत्तियों को नए ढ़ंग से देखने का प्रयास किया है बल्कि अल्पसंख्यकों, आदिवासियों व दलितों की सामाजिक समस्याओं का भी अध्ययन किया है।

इसे समझने के लिए हमें भारत के शहरीकरण और उससे उद्भूत अवसरों और चुनौतियों को समझना होगा। इस परिघटना को आर्थिक दृष्टिकोण से के दर्शन और ऐतिहासिक विश्लेषण की उनकी पद्धति से समझा जा सकता है। मार्क्स के ही प्रवाह में डेविड हार्वे और हेनरी लेफेब्र्वे ने भी शहरीकरण सहित शहरों में पूँजी के व्यवहार और नागर समुदाय के विभिन्न घटकों की सामाजिक अंत:क्रियाओं इत्यादि पर बहुत गहराई से प्रकाश डाला है। लेकिन क्या भारतीय समाज के विशिष्ट सन्दर्भ में माक्र्स, हार्वे या लेफेब्र्वे का विश्लेषण सही हो सकता है? क्या ये तीनों, आर्थिक प्रक्रियाओं के समानांतर, भारत में कहीं गहराई में आकार लेने वाली धार्मिक, जातीय और सांस्कृतिक प्रक्रियाओं की व्याख्या कर सकते हैं? इस प्रश्न का सीधा उत्तर है -नहीं।

आंबेडकर, दलित और शहरीकरण

आंबेडकर के लिए शहरीकरण और इससे जुडी समस्या, दलितों-वंचितों की एक केंद्रीय समस्या है। इसे इस रूप में कम ही देखा गया है। यह आंबेडकर के लिए कितना आधारभूत विषय है, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपनी महत्वपूर्ण पुस्तक ‘द अनटचेबिल्स’ (1948)  में अस्पृश्यता की उत्पत्ति के कई कारणों में से एक शहरी व्यवस्था के विकास और उसकी सुरक्षा से जुडी आवश्यकताओं को भी बताया था। न सिर्फ अस्पृश्यता, बल्कि दलित (ब्रोकन मेन) को भी उन्होंने इसी आधार पर समझाया है। उनके अनुसार, जब आदिम समाज कृषि कार्य में सक्षम हुआ और एक स्थान पर रहने लगा तब भी कुछ जनजातियों ने घुमंतू रहना ही पसंद किया। कालान्तर में उन्होंने, इन एक जगह टिक गये खेतिहर समुदायों पर आक्रमण कर उन्हें लूटना शुरू कर दिया। तब स्थायी बस गए लोगों को सुरक्षा की आवश्यकता पड़ी और उन्होंने इन ‘ब्रोकन मेन’, जो कि असल में हारे हुए घुमंतू लोग थे, को अपने नगरों के ठीक बाहर स्थान और आवास देकर बसा दिया। ये उनकी निजी सेना बन गये लेकिन उन्हें पूरी तरह से नगरों और नागर समाज की प्रक्रियाओं में शामिल नहीं किया गया क्योंकि वे मूलत: अन्य जनजातीय समाज से आते थे।

डॉ. आंबेडकर ने अपने इस विश्लेषण को अन्य उदाहरणों से भी सिद्ध किया है, विशेष रूप से आयरलैंड और वेल्स के। हालाँकि उन देशों में और भारतीय समाज में अंतर है। उन समाजों में ये निजी सैन्य समूह उनके मालिक नागर समाज द्वारा कालांतर में अपने में शामिल कर लिए गए परन्तु भारतीय समाज में वे अभी भी बहिष्कृत बने हुए हैं (एस.एम माइकल, ‘दलित्स इन मॉडर्न इंडिया: विजऩ एंड वैल्यूज’,2007)। इस तरह, आंबेडकर के लिए अस्पृश्यता की उत्पत्ति प्रजातीय और सांस्कृतिक अंतर के साथ-साथ एक बंद आर्थिक वर्ग की असुरक्षा से भी जुडी हुई है। इसी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा जा सकता है कि इन हारे हुए रक्षक जनजातीय समूहों को अन्य स्थायी हो चुके समाजों ने निकृष्ट कामों में लगाया और फि र यह एक परिपाटी बन गयी (स्टीफेन फुच्स, ‘एट द बॉटम ऑफ़ इंडियन सोसाइटी: द हरिजन एंड अदर लो कास्ट्स’, 1981)।

दलितों को अंबेडकर-फुले की सलाह

आंबेडकर और उनसे पूर्व जोतिबा फुले ने शूद्रों-अतिशूद्रों को शहरों की तरफ  कूच करने की सलाह दी थी। जोतिबा के दादा शेतिबा और पिता गोविंदराव के शहरी और ग्रामीण अनुभवों की तुलना से जनमे सहजबोध ने उन्हें शहर की स्वतंत्रता का प्रशंसक बनाया। खुद जोतिबा का जीवनयापन शहर में ठेकेदारी करने के अवसर मिलने से ही संभव हुआ (गोविन्द गणपत काले, ‘महात्मा फु लेयांच्या अप्रकाशित अथावनी’)।’आंबेडकर ने भी शहर की तरफ  जाने की सलाह दलितों को मुख्यत: शहरों में जातीय पहचान के दंश और जातिगत पेशे से छुटकारे की संभावना के कारण दी थी। इसलिये गांधी के ग्राम स्वराज और पंचायत-आधारित माडल से उनका विरोध था क्योंकि इनमें इससे छुटकारे की संभावना नहीं थी। गांधीवादी दर्शन, ग्रामीण व्यवस्था और जीवन को एक आत्मनिर्भर इकाई के रूप में महिमामंडित करता है लेकिन उसमें जातीय संघर्षों की संभावना को नजरअंदाज करता है। इसीलिये आंबेडकर ने गांधी के ग्राम स्वराज का ओरिएंटलिस्ट समझ पर आधारित विकल्प प्रस्तुत किया (ओम्वेट डी। ‘दलित्स एंड द डेमोक्रेटिक रेवोल्युशन : डॉ. आंबेडकर एंड द दलित मूवमेंट इन कोलोनियल इंडिया’ 2004)।

आधुनिक काल की विचारधाराएँ और दलित

इस बिंदु पर हमें चार महत्वपूण विचारकों के दर्शन और उनके विचारों पर दृष्टिपात कर लेना चाहिये –

विषय गांधी मार्क्स आंबेडकर डेविड हार्वे
ग्रामीण जीवन की कल्पना धार्मिक और पौराणिक स्त्रोतों पर आधारित वर्ण एवं जाति व्यवस्था पर आधारित ग्रामीण जीवन उत्पादन के पुराने तरीकों पर आधारित बंद व्यवस्था है ग्रामीण जीवन असल में जाति और जातिगत पेशों को बनाये रखता है और मानव संसाधन सहित मनुष्य की गरिमा की ह्त्या करता है.
शहरी जीवन के प्रति दृष्टिकोण मशीनीकरण और उपभोक्तावाद आधारित व्यवस्था खतरनाक है मशीनीकरण और औद्योगीकरण तथा इससे जन्मा शहरीकरण संचित हुई अतिरिक्त पूंजी का शोषण करता है शहरीकृत व्यवस्था मानव श्रम को स्वतंत्रता और बेहतर पारिश्रमिक उपलब्ध कराती है. शहरीकरण अपरिहार्य है. इसमें पूँजी के संचय और अवसरों की समानता में सामंजस्य होना चाहिए
शहरी जीवन से उम्मीद शहरीकरण (मशीनों और बड़े उद्योगों के साथ) एक खतरनाक पहल है प्रकृति के संतुलन और धर्म सम्मत सादगीपूर्ण  जीवनयापन के लिए यह घातक है. शहरीकृत और औद्योगीकृत समाज हालाँकि श्रम का शोषण करता है लेकिन इस समाज में समानता और समान बंटवारे पर आधारित व्यवस्था बनाई जा सकती है भारत के विशेष सन्दर्भ में जातिगत पहचान और जातिगत पेशे से मुक्ति शहरों में ही संभव है, शहरीकरण असल में आर्थिक समता का ही नहीं बल्कि सामाजिक सांस्कृतिक समता का भी उपकरण है. शहर में अवसरों की समानता का अधिकार  मानवाधिकारों का ही विस्तार है.

 

स्पष्ट है कि गांधीवादी रास्ते पर चलकर दलितों को कोई लाभ होने वाला नहीं है। आंबेडकर और माक्र्सवादी दृष्टिकोणों में समानताएं हैं परन्तु अंतत: वे भारतीय सन्दर्भ में जाति और वर्ग संघर्ष के दो अलग-अलग कोणों पर खडीं हैं। भारत में शहरीकरण की प्रक्रिया में दलित खेतिहर मजदूर, शहरों में जाकर पूरी तरह से वर्ग का हिस्सा नहीं बन जाता। एक अस्पष्ट किस्म के वर्ग का हिस्सा होने के बावजूद वह कई अर्थों में जाति का हिस्सा भी रहता है। इसीलिये दलित और दमित समुदायों के लिए शहरीकरण के सन्दर्भ में जोतिबा और आंबेडकर की सलाह अधिक व्यावहारिक सिद्ध हो रही है। आंबेडकर एक अन्य ढंग से भी शहरों में दलित सशक्तिकरण को संभव बना रहे हैं। वे कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को स्थापित करते हैं और उसके आधारभूत फ्रे मवर्क की बुनाई में ही अवसरों की समानता, समाजवाद और सामाजिक लोकतंत्र की प्रेरणा भर देते हैं।

शहरों में दलितों मुस्लिमों का वास्तविक प्रतिनिधित्व

आईये, अभी तक जिस तरह से भारत में शहरीकरण हुआ है और दलितों का जिस तरह शहरों में पलायन हुआ है, उसके परिणामों को गौर से देखते हैं। अनुसूचित जाति और जनजाति के शहरी प्रतिनिधित्व का मुद्दा यहाँ महत्वपूर्ण है। इस प्रतिनिधित्व से ही इन समुदायों के सशक्तिकरण की हकीकत को समझा जा सकता है।

 

शहरी व ग्रामीण जनसंख्या में अनुसूचित जाति/ जनजाति का प्रतिशत
अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति
वर्ष 2001 2011 2001 2011
कुल जनसंख्या 16.2 16.6 8.2 8.6
ग्रामीण जनसंख्या 17.9 18.5 10.4 11.3
शहरी जनसंख्या 11.8 12.6 2.4 2.8

 

जाहिर है इन दस सालों में हुई वृद्धि बहुत उत्साहजनक नहीं है। शहरी जीवन की स्वतंत्रता और सुविधाओं के बावजूद कई कारण कमजोर समुदायों को शहरों में आने से रोक रहे हैं। आर्थिक कारणों के साथ-साथ सामाजिक कारण भी यहाँ महत्वपूर्ण हैं।

ambedkar-memorial-lucknowजनसंख्या के वितरण और इसके सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण के असंतुलन को एक अन्य कोण से भी देखा गया है। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में मुस्लिमों को केंद्र में रखते हुए एक तुलना दी गयी है जो इस प्रकार है:

”वर्ष 2004-05 के लिए अखिल भारतीय स्तर पर औसत आय प्रति व्यक्ति व्यय (एमपीसीई), शहरी इलाकों में 1105 रुपये रहा है, सवर्ण जातियों के लिए यह 1469 रुपये, अन्य अल्पसंख्यकों के लिए 1485 रुपये, पिछड़ा वर्ग के लिए 955 रुपये, मुसलमानों के लिए 804 रुपये और अ।जा। / ज।जा। के लिए यह 793 रुपये रहा है। इस तरह उच्च जातियों का एमपीसीई, मुस्लिम और अजा। /जजा। की तुलना में 80 प्रतिशत अधिक रहा है। (पृष्ठ 153)। इसी रिपोर्ट में पृष्ठ 192 पर इस बात की चर्चा है कि मुसलामानों में भी जाति विभाजन हैं और उनके अशराफ, अजलाफ और अरज़ाल में अजलाफ, हिन्दुओं के ओबीसी की तरह हैं और अरज़ाल, हिन्दुओं की अनुसूचित जातियों की तरह हैं।

भारत में, 31 राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों के 1241 एथनिक समूह अनुसूचित जातियों के रूप में सूचीबद्ध की गयी हैं। इसी तरह, अनुसूचित जनजातियों के रूप में चिन्हित समूहों की संख्या 705 है, जो 30 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में फैले हैं। इसी रिपोर्ट के अनुसार, प्रशासनिक सेवाओं में सामान्य हिन्दू, अ.जा।/अ.जा.जा। ओबीसी, सवर्ण हिन्दू, मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यको का प्रतिशत इस प्रकार रहा है।

 

राज्य प्रशासनिक सेवाओं में विगत पांच वर्षों में विभिन्न समुदायों का प्रतिनिधित्व
(कुल अनुशंसित/ चयनित उम्मीदवारों की संख्या ६३६०२)*
श्रेणी कुल सभी हिन्दू अनुसूचित जाति/ जनजाति ओबीसी ऊंची जातियां मुसलमान अन्य अल्पसंख्यक
उच्च पद 25.4 88.8 20.9 22.7 45.3 3.2 (20.7) 8.0
निम्न पद 74.6 98.0 35.2 29.0 33.9 1.6(10.4) 0.3

 

ग्रुप ए 5.8 82.2 19.3 23.7 39.2 7.5(48.6) 10.3

 

ग्रुप बी 12.4 86.4 19.8 21.2 45.3 2.2(14.3) 11.5

 

ग्रुप सी 21.1 95.8 12.6 20.8 62.4 3.0(19.4) 1.2

 

ग्रुप डी 53.4 98.9 44.1 32.2 22.6 1.1(7.1) 0.0

 

*यह आंकलन 2004-05 का है

 

वर्ष 2011 की जनगणना में जो तस्वीर उभर रही है वह इस प्रकार है:

ग्रामीण व शहरी अ.जा. और अ.ज.जा. जनसंख्या  जनगणना २०११
समुदाय विवरण कुल ग्रामीण शहरी
अनुसूचित जाति कुल 20,13,78,086 15,38,50,562 4,75,27,524
पुरुष 10,35,35,165 7,91,18,138 2,44,17,027
  महिलाएं 9 ,78,42,921 7,47,32,424 2,31,10,497
अनुसूचितजनजाति कुलयोग 10,42,81,034 9,38,19,162 1,04,61,872
पुरुष 5 ,24,09,823 4,71,26,341 52,83,482
महिलाएं 5 ,18,71,211 4,66,92,821 51,78,390

 

निष्कर्ष

इन आंकड़ों और प्रवृत्तियों से क्या जाहिर होता है? दलितों और मुसलमानों की इतनी बड़ी जनसंख्या, जो कि मूल रूप से पारम्परिक कौशल-आधारित पेशों पर निर्भर रहती आई है और जिसे उसकी कुशलता और रुझान के कारण पुरस्कृत नहीं बल्कि प्रताडि़त किया गया है – उसे शहरों में भी उचित स्थान नहीं मिल रहा है। दलित संघर्ष के विमर्श में गांधी के ग्राम स्वराज तो भूल जाना ही श्रेयस्कर होगा। साथ ही, माक्र्स और उनके परवर्ती हार्वे और लेफेब्र्वे का दर्शन भी चूँकि भारतीय जाति व्यवस्था को नहीं समझता इसलिए उनकी स्थापनाओं को भी भारत के संदर्भ में लागू नहीं किया जा सकता। फिर भी, वैश्विक समुदाय के अंग के रूप में, भारतीय समाज को वैश्वीकरण और उदारीकरण के समानांतर विकसित हो रहे खुले समाज के प्रति सुग्राह्य बनना होगा। अगर यह नहीं हो पाता है तो भारत स्वयं अपनी जनसंख्याओं के सबलीकरण के अंतर्विरोधों में फंसकर कमजोर होता जाएगा, जैसा कि अभी हो रहा है। जनसंख्या का बड़ा हिस्सा उसकी जातीय और धार्मिक पहचान के आधार पर रोजगार, शिक्षा, शासन, प्रशासन, राजनीति और सबसे महत्वपूर्ण – न्यायपालिका/न्याय व्यवस्था में उचित प्रतिनिधित्व नहीं पा रहा है। क्या यह अपने आप हो रहा है?

क्या कोई अन्य ताकतें दलित-शोषित समाज को शहरी अवसरों का लाभ उठाने से रोक रही हैं ? यह प्रश्न लोक-कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को लागू करने में आ रही दिक्कतों से भी जुड़ा हुआ है और संविधान और नीति निदेशक तत्वों की मूल प्रेरणा को कमजोर करने वाली शक्तियों से भी। ऊपर दिए गए आंकड़ों के विश्लेषण से साफ है कि सामंती और कर्मकांडी मानसिकता ने शहरों में नए अवतार ले लिए हैं और अस्प्रश्यता और जातिवाद नए ढंग से काम कर रहा है। यह मानना कठिन है कि ग्रामीण समाज में प्रचलित सामंती और छुआछूत भरी मानसिकता शहरों में में प्रवेश नहीं कर गयी होगी। यह मानना अयार्थपूर्ण होगा कि किसी व्यक्ति के गाँव छोड़कर शहर में आ जाने मात्र से उसकी मानसिकता बदल जाएगी। रोज़मर्रा का अनुभव बतलाता है कि नौकरी और शिक्षा के लिए साक्षात्कारों में उपनाम के आधार पर भेदभाव होता है। उच्च वर्णों का सामाजिक नेटवर्क बहुत चतुराई से अपने लोगों को चुनता है और दलित आदिवासियों को कई तरीकों से प्रतियोगिता से बाहर कर देता है। क्या इन ब्राह्मणवादी ताकतों का षडय़ंत्र, फुले-आंबेडकर ने दलितबहुजनों के शहरों में सुनहरे भविष्य का जो स्वप्न देखा था, उसे ध्वस्त कर देगा?

(फारवर्ड प्रेस के अप्रैल, 2016 अंक में प्रकाशित )

 

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