डॉ. आंबेडकर : एक अभावुक इतिहासविद्

आंबेडकर की इतिहास-पद्धति यदि आज भी प्रासंगिक और आर्कषक है तो वह इसलिए क्योंकि उन्होंने कल्पना और फंतासी, कयास व संभावना और विश्वास करने योग्य वृतांत व बाल की खाल निकालने के बीच के महत्वपूर्ण राजनीतिक अंतर पर प्रकाश डाला

इस शोध प्रबंध में मेरी स्थापनाओं में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिनके बारे में पाठकों से मेरी यह अपेक्षा हो कि वे उन्हें आंख बंद कर स्वीकार कर लें। मैंने कम से कम यह तो साबित किया ही है कि जो कुछ भी मैं कह रहा हूं, उसमें संभाव्यता का प्राबल्य है। यह कहना कि संभाव्यता का प्राबाल्य, किसी वैध निर्णय पर पहुंचने का पर्याप्त आधार नहीं है, अपनी विद्या पर मिथ्याभिमान करना होगा…मैं इतना अभिमानी नहीं हूं कि मैं यह दावा करूं कि मेरी स्थापना अंतिम है…अगर किसी स्थापना की वैधता की कसौटी यह है कि वह तथ्यों से मेल खाए, उनकी व्याख्या करे और उन्हें वह अर्थ दे, जो उस स्थापना की अनुपस्थिति में संभव न हो, तो मेरे आलोचकों को इस पर विचार करना चाहिए कि मेरी स्थापनाएं व्यावहारिक है या नहीं और इसलिए कम से कम अभी के लिए वैध हैं या नहीं। मैं अपने आलोचकों से निष्पक्ष व पूर्वाग्रहमुक्त आंकलन से अधिक कुछ नहीं चाहता।

– बी.आर. आंबेडकर, ‘द अनटचेबिल्स, 1948, भूमिका

 

DR. BHIM RAO AMBEDKAR7इतिहास के परिप्रेक्ष्य से राजनीति का आंबेडकर के अध्ययन को भारत के इतिहासविदें ने अब तक अभिस्वीकृति नहीं दी है। एक इतिहासविद् के रूप में आंबेडकर को समझने के लिए उत्तर-औपनिवेशिक भारत के बौद्धिक वातावरण को समझना आवश्यक है। सन 1940 के दशक में भारतीय इतिहाविद्, इतिहास को खोजने-परखने के तरीकों पर बहस-मुबाहीसे नहीं किया करते थे। उनकी कल्पनाशक्ति पर सरकारी अभिलेखागार हावी थे। अधिकांश इतिहासविद् अपने अंग्रेज़ प्रोफेसरों द्वारा उन्हें सिखाए गए इतिहास-लेखन के सिद्धांतों से संतुष्ट थे। विभिन्न भारतीय राष्ट्रवादी इतिहाविद्, उन्हीं सिद्धांतों के आधार पर इतिहास लेखन करते थे, जिन सिद्धांतों ने उनके दिमागों को गुलाम बनाया था। इसके अपवाद थे डीडी कौसांबी जैसे मार्क्सवादी इतिहासविद्, जिन्होंने उत्तर-औपनिवेशिक काल में भारतीय इतिहास का मार्क्सवादी नज़रिए से अध्ययन किया। सन 1940 के दशक में भारतीय इतिहास-लेखन का जाति, जनजाति व लिंग से जुड़े मुद्दों से कोई लेनादेना नहीं था। इन पर समाजशास्त्री विचार करते थे। इस पृष्ठभूमि में आंबेडकर की इतिहास की अवधारणा व उसके लेखन के संबंध में उनके अभिनव विचार, चकित करने वाले हैं। एक ऐसे दौर में, जब भारतीय इतिहासविद् अपने लेखन में ऐतिहासिक किरदारों और घटनाओं के आख्यान से आगे नहीं बढ़ते थे, आंबेडकर ने इतिहास-लेखन के उन पहलुओं पर विचार किया जो आज हमारे दिमागों को झंझोड़ रहे हैं। सन 1948 में उन्होंने इतिहास की परिकल्पना, कथावाचन, विज्ञान और कला के एक ऐसे सम्मिश्रण के रूप में की, जिसमें इतिहासविद् की उर्वर व रचनात्मक कल्पनाशीलता एक नया रंग भर देती है। उनका यह सुझाव कि इतिहासविदें को हमेशा यह ध्यान में रखना चाहिए कि अपने पाठकों में वैज्ञानिक चेतना का विकास करना उनका कार्य है, आज भी वैध है।

आंबेडकर के लिए रस्साकशी

आज डॉ. आंबेडकर की विरासत एक अजीब से बौद्धिक व राजनीतिक परिवेश में फंसी प्रतीत हो रही है। जाति व हिंदू कोड बिल जैसे अन्य मसलों पर कांग्रेस से उनके मतभेदों के बावजूद, कांग्रेस नेताओं ने उनकी एक झूठी छवि का निर्माण किया और उनपर अपना ठप्पा लगा दिया। सन 2014 के आमचुनाव में मुंह की खाने के बाद, कांग्रेस जी-जान से भारत की प्रमुख मध्यमार्गी-उदारवादी पार्टी के रूप में अपनी छवि को बनाए रखने के संघर्ष में प्राणपन से जुटी हुई है। वह किसी भी तरह से आंबेडकर को, मुख्यत: संवैधानिक विशेषज्ञ के रूप में, अपना साबित करने पर आमादा है। दूसरी ओर, भारत पर शासन कर रही हिंदुत्ववादी शक्तियां, आंबेडकर का इस्तेमाल अपने हितसाधन के लिए करना चाहती हैं। सन 1997 में दक्षिणपंथी पत्रकार अरूण शौरी ने आंबेडकर को एक ऐसा ब्रिटिश-समर्थक झूठा भगवान बताया था, जो आराधना के काबिल नहीं है। अब हिंदुत्ववादी शक्तियों ने अपना रंग बदल लिया है। अब भाजपा-आरएसएस, बाबा साहेब के करोड़ों दलित और शूद्र अनुयायियों का इस्तेमाल, हिंदू राष्ट्र के निर्माण के अपने मिशन को सफ ल बनाने के लिए करना चाहते हैं। परंतु इसके समानांतर, हिंदुत्ववादी रंग में रंगा भारतीय राज्य और उसके शैक्षणिक संस्थान, दलित विद्यार्थियों और कार्यकर्ताओं को प्रताड़ित करने व उन्हें समाज की मुख्यधारा से अलग-थलग करने के अपने अभियान में जुटे हुए हैं। भाजपा का ताज़ा आंबेडकर प्रेम हमें ”मुंह में राम, बगल में छुरी’’ मुहावरे की बरबस याद दिला देता है। हिंदुत्ववादी विचारक यह अच्छी तरह से जानते हैं कि केवल मुसलमानों का दानवीकरण करने से हिंदू राष्ट्र नहीं बन सकेगा। आरएसएस के अहंकारी मुखिया द्वारा आरक्षण के संबंध में बिना सोचे-समझे की गई टिप्पणियां और उसके बाद सन 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार ने पार्टी को इस बात के लिए मजबूर कर दिया है कि वह आंबेडकर के प्रति अपने शत्रुता भाव पर पुनर्विचार करे। कहने की आवश्यकता नहीं कि आंबेडकर के व्यक्तित्व, विचारों और लेखन के चुनिंदा अंशों का इस्तेमाल कर उन्हें अपना बताने की ये कोशिशें भारतीय इतिहास की आंबेडकर की समझ से मेल नहीं खातीं।

आंबेडकर पर कब्ज़ा जमाने की इन मुहिमों को समझने के लिए हमें बाबा साहेब की बहुआयामी व असाधारण मेधा की ओर लौटना होगा। अब तक उन्हें मुख्यत: भारतीय जाति व्यवस्था और संविधानवाद की राजनीति के विशेषज्ञ के रूप में और भारतीय अछूतों और नीची जातियों के बुद्धिजीवी के रूप में ही स्वीकार किया जाता रहा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि ये सारे पहलू उनके व्यापक विचारों का हिस्सा हैं परंतु मेरा तर्क यह है कि उनकी चमत्कारिक मेधा ने उन्हें केवल एक विचारक से आगे बढ़कर एक दार्शनिक बना दिया था। एक दार्शनिक के रूप में जिस ऊँचाई तक वे पहुंचे, उस ऊँचाई तक औपनिवेशिक और स्वतंत्र भारत में भी, शायद ही कोई भारतीय विद्वान पहुंचा हो। वे आधुनिकतावादी थे, उनकी आस्था ज्ञान के वैश्विक मूल्यों में थी और वे आजन्म हिंदू धर्म के कट्टर विरोधी रहे। इतिहास की उनकी समझ में रूमानियत के लिए कोई जगह नहीं थी। भारतीय इतिहास की उनकी विवेचना, गांधी के हिंदू वर्णाश्रम धर्म व पूर्व-आधुनिक आदर्शग्राम के प्रति भावुकतापूर्ण आग्रह का ज़ोरदार खंडन करती थी। गांधी के ये दोनों मिथक, सवर्ण वर्चस्ववादियों को प्रिय थे। यही कारण है कि आंबेडकर पर एक उदारवादी-हिंदू का ठप्पा लगाकर उनपर कब्ज़ा जमाने के कांग्रेस के प्रयास कभी सफल नहीं हो सकेंगे। आंबेडकर भारतीय समाज और गांव को नीचे से देखते थे। गांधी व कांग्रेस के अन्य नेताओं की तरह वे विभिन्न जातियों के बीच मेल-मिलाप के पक्षधर नहीं थे। वे जाति के समूल उन्मूलन के पक्षधर थे। भारतीय आधुनिकता व आंबेडकर की सोच के उलझनपूर्ण पारस्परिक संबंधों के अध्ययन से यह स्पष्ट हो जाता है कि ज्ञानोदय के उदारवादी मूल्यों से उनका जुड़ाव-जो अंतद्र्वंदों, तर्कों व विवेक पर आधारित था-आंबेडकर को एक अद्वितीय ‘मिथक-विरोधी ’इतिहासविद्’ बनाता है और यहां यह याद रखा जाना चाहिए कि यह 1947 के बाद, चुनिंदा भारतीय विश्वविद्यालयों में इतिहास के समालोचनात्मक अध्ययन की शुरूआत से बहुत पहले की बात है (डोरोथी एम फ्यूजैरा, ‘आर्यन्स, ज्यूज़, ब्राम्हिन्स: थियोराइजिंग एथोरिटी – मिथ्स ऑफ  आइडेन्टिटी’)। आंबेडकर की सोच, वाल्टेयर, गेटे व गोर्की से प्रभावित थी और इतिहासविद् व निबंधकार के रूप में उनका लेखन, हिंदू धर्म का इतना कटु आलोचक था कि जिन लोगों पर उन्होंने, उनके समय में दुर्लभ तार्किकता के साथ, तीक्ष्ण हमले किए थे, उन लोगों के वंशज आंबेडकर पर किसी भी तरह कब्ज़ा नहीं कर सकते। चूंकि उनकी राजनीति, भारतीय इतिहास की उनकी भावुकता-मुक्त समझ पर आधारित थी और उनकी यह समझ ही उनकी राजनीति का आधार थी, इसलिए इतिहास संबंधी उनके विचारों और पद्धतियों का पुनरावलोकन आवश्यक है, विशेषत: इसलिए क्योंकि वैश्वीकरण के इस युग में आम लोगों की इतिहास की समझ, गोभक्ति, जातिगत-अभिमान और दलित-विरोधी वैदिक पुनर्भूत राष्ट्रवाद (एक प्राचीन मिथकीय रूमानी राष्ट्र की खोज पर आधारित) के इर्द-गिर्द घूम रही है।

‘द अनटचेबिल्स’की भूमिका

इतिहासविद् के रूप में आंबेडकर के दृष्टिकोण को समझने के लिए, हजारों पृष्ठों में फैले उनके संपूर्ण वांग्मय का अध्ययन इस आलेख का विषय नहीं है, यद्यपि इस तरह का प्रयास भविष्य में लाभप्रद साबित हो सकता है। मेरे हाथों में उनकी एक पुस्तक है – ‘द अनटचेबिल्स’जिसकी भूमिका आंबेडकर की इतिहास पद्धति पर एक संक्षिप्त टिप्पणी है-उस पद्धति पर, जिसके सहारे आंबेडकर ने जाति के पौराणिक अभिज्ञान, जो कि हिन्दू धर्म का आधार है, को विखंडित किया। ‘द अनटचेबिल्स’में शामिल लेखों और उसकी भूमिका में इतिहास-पद्धति का विवरण हमें आंबेडकर के इतिहास संबंधी विचारों की कम से कम तीन महत्वपूर्ण विशेषताओं से परिचित करवाता है। पहली, हमें आर जी कोलिंगवुड के इतिहास संबंधी विचारों की याद आती है। बाबा साहेब की इतिहास की पड़ताल, सत्ता से सीधे जुड़े तत्कालीन राजनीतिक प्रश्नों से शुरू होती है। इतिहास को राजनीतिक दृष्टिकोण से समझने का उनका प्रयास, उन्हें मार्क्सवादी , अंतोनियो ग्राम्शी व मिशेल फूको जैसे अध्येताओं की श्रेणी में रख देता है, जिनके लिए इतिहास – अर्थात कारणों, परिणामों और विमर्श का अध्ययन – शासक वर्गों द्वारा सत्ता के उपयोग और उसे वैधता प्रदान करने के सत्ताधारियों के प्रयासों से सीधा जुड़ा हुआ था। इतिहास के प्रति यह दृष्टिकोण, सामाजिक विरोधाभासों से उत्पन्न तनावों और इन विरोधाभासों के समाधान पर केन्द्रित था। मूल राजनीतिक प्रश्न और उनसे संबद्ध विषयों पर लोगों की राय, आंबेडकर के अध्ययन के विषय थे और इन प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए उन्होंने कठिन प्रयास किए। दूसरी – और इस मामले में आंबेडकर मार्क ब्लाक के नजदीक हैं – वे इतिहास की विवेचना के लिए परिणाम से कारण की ओर बढ़ते हैं। उनका इतिहास लेखन अंत:विषय था। उसका लक्ष्य भारतीय समाज के वर्तमान और उसके संभावित भविष्य के संबंध में आम धारणाओं को सही या गलत साबित करना था। उनके शोध का लक्ष्य यह दिखाना था कि किस तरह वर्तमान, भूत का उत्पाद है – उनके लिए इतिहास केवल गुजरे हुए कल का अध्ययन या मनोरंजन का साधन नहीं था। वे भारतीय समाज को संरचनात्मक दृष्टि से देखते थे, जिसमें जाति एक दीर्घकालिक ऐतिहासिक परिघटना थी। उनके लेखों से यह पता चलता है कि उन्हें भूतकाल और वर्तमानकाल के पारस्परिक प्रभावों की कितनी गहरी समझ थी। यही एक अच्छे इतिहासविद् की निशानी होती है। वह अपने युग की राजनीति के प्रति हमेशा सजग और सचेत रहता है। तीसरी, उनके लेख उनकी उर्वर कल्पनाशक्ति और भाषा पर उनके अद्भुत अधिकार को प्रतिबिंबित करते हैं। ये दोनों गुण किसी भी समाजविज्ञानी के लिए आवश्यक हैं। यहां यह महत्वपूर्ण है कि न्यूयार्क के कोलंबिया विश्वविद्यालय में पीएचडी की अपनी पढ़ाई के दौरान, आंबेडकर ने इतिहास और समाजशास्त्र का गंभीर अध्ययन किया था। उनकी पैनी लेखनी से यह साबित होता है कि उन्होंने एक वकील के प्रतिपरीक्षण कौशल का इस्तेमाल, इतिहास और परंपरा के स्त्रोतों को परखने और त्रुटिहीन निष्कर्षों तक पहुंचने के लिए किया। इनमें से कुछ निष्कर्ष आज हमें पुराने अथवा अतिश्योक्तिपूर्ण जान पड़ सकते हैं परंतु इससे इन निष्कर्षों पर पहुंचने के लिए जिस व्याख्यात्मक पद्धति का उपयोग किया गया, उसका महत्व कम नहीं हो जाता।

चूंकि आंबेडकर का भारतीय समाज के इतिहास का अध्ययन, हिन्दू धर्म और जाति के उनके नकार से जुड़ा हुआ था इसलिए भूमिका की शुरूआत में ही वे सीधे मुद्दे पर आ जाते हैं और उस राजनीतिक प्रश्न को उठाते हैं, जिसने उन्हें इतिहास में शोध करने के लिए प्रेरित किया। भूमिका से यह पता चलता है कि आंबेडकर हिन्दू धर्म के लिए वही थे जो माक्र्स पूंजीवाद के लिए थे। भूमिका में वे कहते हैं, ”हिन्दू सभ्यता’’मानवता का दमन करने और उसे दास बनाने की एक धूर्ततापूर्ण युक्ति है। यह, दरअसल, एक कलंक है’’। हिन्दुओं ने कभी अपनी सभ्यता अर्थात जाति व्यवस्था के उदय का तार्किकतापूर्ण अध्ययन नहीं किया। इसलिए पहला प्रश्न यह है कि हिन्दुओं ने अपनी तथाकथित सभ्यता का वैज्ञानिक अनुसंधान क्यों नहीं किया? ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि हिन्दुओं ने कभी भी जाति व्यवस्था और अछूत प्रथा को ”शर्मनाक या अनुचित’’नहीं माना। आंबेडकर लिखते हैं, ”हिन्दुओं ने कभी उनपर पश्चाताप करने या उनके उदय व विकास की पड़ताल करने की कोशिश नहीं की’’। उन्होंने लिखा कि ”हर हिन्दू को यह सिखाया जाता है कि उसकी सभ्यता न केवल सबसे प्राचीन है बल्कि कई अर्थों में अनूठी है।…कोई हिन्दू इन दावों को दोहराते नहीं थकता…हिन्दू सभ्यता की पवित्रता, श्रेष्ठता और विवेकशीलता के संबंध में ये झूठे विश्वास, हिन्दू अध्येताओं के अजीब सामाजिक मनोविज्ञान के कारण है’’। आम्बेडकर का यह कथन अलबरूनी ने हिन्दुओं के संबंध में अपनी पुस्तक ”इंडिया’’में जो कहा है, उसकी याद दिलाता है। यह सामाजिक मनोविज्ञान, सदियों से भारत में ज्ञान पर ब्राह्मणों के वर्चस्व का नतीजा था। इस वर्चस्व ने उन्हें भारतीय समाज की धार्मिक पुस्तकों पर एकाधिकार दिया और इस एकाधिकार को ब्रिटिश औपनिवेशिकों ने और मजबूती दी। इसमें कोई संदेह नहीं कि ब्राह्मण ज्ञानी थे परंतु वे असली अर्थों में बौद्धिक नहीं थे। इन ज्ञानियों के अपने ही इतिहास के प्रति अज्ञान को समझने के लिए आंबेडकर ने तुलनात्मक इतिहास और विचारों के इतिहास का अध्ययन किया। ”आज’’, उन्होंने 1948 में लिखा, ”सारा ज्ञान ब्राह्मणों तक सीमित है परंतु दुर्भाग्यवश किसी ब्राह्मण अध्येता ने वाल्टेयर की भूमिका नहीं निभाई, जिसमें अपने ही कैथोलिक चर्च के सिद्धांतों का विरोध करने की बौद्धिक ईमानदारी थी और ना ही ऐसे ब्राह्मण अध्येता के भविष्य में कभी उभरने की संभावना है। यह तथ्य कि वे एक भी वाल्टेयर नहीं दे सके, ब्राह्मणों की विद्वता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है।’’किसी भी समाज में किसी बौद्धिक के उभरने और समाज का सम्मान हासिल करने के लिए कुछ अनिवार्य पर्याप्त ऐतिहासिक स्थितियां होनी चाहिए। ये स्थितियां भारतीय इतिहास में अनुपस्थित थीं। समालोचनात्मक आत्मचिंतन, विशिष्ट ऐतिहासिक परिस्थितियों में ही संभव हो सकता है और अपने पारंपरिक ज्ञान पर आत्ममुग्ध ब्राह्मण, ऐसा कोई भी प्रयास करने में अक्षम थे। इसलिए ब्राह्मण विद्वान ”केवल ज्ञानी थे, बौद्धिक नहीं’’यद्यपि औपनिवेशिक शासन में वे समाज सुधारक होने का दावा करते थे। आंबेडकर ने बौद्धिक शब्द का विस्तार से अर्थ समझाने के लिए यूरोप और वहां हुए पुनर्जागरण के इतिहास का सहारा लिया। ”एक ज्ञानी और बौद्धिक में जमीन आसमान का अंतर होता है। ज्ञानी में वर्गीय चेतना होती है और वह अपने वर्ग के हितों की रक्षा के प्रति सचेत होता है। बौद्धिक एक पूर्णत: स्वतंत्र व्यक्ति होता है, जो अपने वर्ग के हित-अहित से ऊपर होता है। ब्राह्मण यदि एक भी वाल्टेयर पैदा नहीं कर सके तो उसका कारण यह है कि वे केवल ज्ञानी थे बौद्धिक नहीं’’।

इतिहास की पड़ताल

आंबेडकर के अनुसार, ब्राह्मणों और उनसे जुड़े तथाकथित अध्येताओं के अनौचित्यपूर्ण दावों को गलत सिद्ध करने का एक ही तरीका है और वह यह है कि उन दावों पर प्रश्न उठाए जाएं और उनका उत्तर ”पुरानी चीजों को देखने के नए तरीके’’का विकास कर ढूंढा जाए। निश्चय ही भारत में अछूत प्रथा से जन्मे प्रश्नों के उनके उत्तर, उनके ”इतिहास के शोध’’का ”परिणाम’’थे। आंबेडकर ने पूरी संजीदगी से जर्मन राजनेता, इतिहासविद्, दार्शनिक व कवि गेटे द्वारा प्रतिपादित वस्तुनिष्ठ इतिहास-लेखन के सिद्धांतों का पालन किया। गेटे के सिद्धांतों और उनके चिंतन से आंबेडकर परिचित थे। गेटे के अनुसार, इतिहासविद् का यह कर्तव्य है कि वह ”सच को झूठ से, निश्चित को अनिश्चित से और संदेहास्पद को अस्वीकार्य से अलग करे’’। गेटे ने इतिहासविद् को जूरी के सदस्य की तरह बताया और आंबेडकर ने इस रूपक को गंभीरता से लिया: ”हर जांचकर्ता को सबसे पहले स्वयं को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखना चाहिए जिसे जूरी का सदस्य नियुक्त किया गया हो’’। उसे सिर्फ यह विचार करना होता है कि किसी चीज को साबित करने के लिए पर्याप्त सुबूत मौजूद हैं या नहीं। इस आधार पर वह अपने निष्कर्ष पर पहुंचता है और अपना वोट देता है, फिर चाहे उसकी राय जूरी के अध्यक्ष से मेल खाती हो या नहीं। गेटे से आंबेडकर ने प्रेरणा तो ग्रहण की परंतु उन्होंने गेटे को अपने पैरों की बेड़ी नहीं बनने दिया। वे इस संभावना से वाकिफ  थे कि अतीत का अध्ययन करते समय हमें कई कडिय़ां गायब मिल सकती हैं। ऐसे मामलों में जहां ”प्रासंगिक व आवश्यक तत्व’’व ”महत्वपूर्ण घटनाओं के पारस्परिक संबंध के प्रत्यक्ष प्रमाण’’उपलब्ध न हों, इतिहासविद् को क्या करना चाहिए? क्या उसे तब तक के लिए अपना काम स्थगित कर देना चाहिए जब तक कि ”गुम कड़ी की खोज न कर ली जाए?’’इस प्रश्न का आंबेडकर का उत्तर, अकादमिक क्षेत्र में बाल की खाल निकालने की प्रवृत्ति का वैध नकार है।

मेरी यह मान्यता है कि ऐसे मामलों में उसे अपनी कल्पनाशक्ति और सहजबोध का इस्तेमाल कर, तथ्यों की श्रृंखला की उन कडिय़ों को जोडऩे की इजाजत होनी चाहिए, जिन्हें अब तक खोजा नहीं जा सका है। यह भी जायज होगा कि वह यह दर्शा कर, कि जो तथ्य ज्ञात तथ्यों के आधार पर एक-दूसरे से नहीं जोड़े जा सकते, किस तरह जुड़़े हो सकते हैं, एक कामचलाऊ परिकल्पना प्रतिपादित करे।

आंबेडकर के अनुसार, कोई स्थापना ”इतिहास में शोध के सिद्धांतों’’ का उल्लंघन करती है या नहीं, यह पता लगानेे के लिए प्रत्यक्ष व अनुमानों पर आधारित प्रमाणों के बीच अंतर पर अंतहीन बहस करने की बजाए हमें ”शुद्धत: अनुमानों पर आधारित’’स्थापना को खारिज करना चाहिए। इस तरह, उनकी इतिहास पद्धति, रचनात्मक कल्पनाशीलता और फं तासी में अंतर करती थी। विशुद्ध कयासों और तार्किक संभाव्यता के बीच के महत्वपूर्ण अंतर ने उन्हें इतिहास के स्त्रोतों का विखंडन कर यह पता लगाने की प्रेरणा दी ”जो ग्रंथ छुपाते हैं’’और ”भूतकाल के अवशेषों को इकट्ठा कर, उन्हें एकसाथ जोड़कर, उनसे उनके जन्म की कहानी सुननेे’’का प्रयास करने की भी। इतिहासविद् का यह कार्य, आंबेडकर के शब्दों में:-

उस पुरातत्वशास्त्री के सदृश है जो टूटे हुए पत्थरों से एक शहर का पुनर्निर्माण करता है या उस जीवाश्मविज्ञानी की तरह, जो किसी लुप्त हो चुके जीव को बिखरी हुई हड्डियों और दांतों से दुबारा जीवित करता है या एक चित्रकार की तरह है, जो क्षितिज की रेखाओं को पढ़कर और पहाड़ी की ढ़लान के चिह्नों को देखकर, चित्र बनाता है। इस अर्थ में यह पुस्तक, इतिहास से अधिक कलाकृति है…। कल्पना और परिकल्पनाएं, इस तरह के ग्रंथ का महत्वपूर्ण हिस्सा होती हैं, परंतु केवल इस आधार इस स्थापना की आलोचना नहीं की जा सकती क्योंकि अनुशासित कल्पनाशीलता के बगैर कोई वैज्ञानिक पड़ताल सफल नहीं हो सकती और परिकल्पनाएं, विज्ञान की आत्मा है।

निष्कर्ष के रूप में यह कहा जा सकता है कि आंबेडकर का क्रांतिकारी दर्शन, उन मूल स्त्रोतों के धैर्यपूर्ण, श्रमसाध्य व समालोचनात्मक अध्ययन पर आधारित था, जिन्हें उन्होंने जाति व्यवस्था और विशेषकर अछूत प्रथा की असलियत से लोगों को वाकिफ  कराने के लिए चुना था। उनके लेखों से यह साबित होता है कि शासक वर्गों/जातियों के विमर्श का विखंडन, इतिहासविद् का मूल लक्ष्य है। अपनी स्थापनाओं को ”अंतिम’’न बताकर और इतिहास की विवेचना पद्धति में विशुद्ध कयासों और जो बात सैद्धांतिक दृष्टि से संभव हो सकती है, उनके बीच अंतर को रेखांकित कर, आंबेडकर ने सामाजिक इतिहास के प्रति खुला दृष्टिकोण अपनाया। आंबेडकर उस युग में ऐसा करने वाले पहले इतिहासविद् थे। यह वह दौर था, जब भारतीय इतिहासविद् राष्ट्रवाद की विचारधारा और अतीत के युद्धक्षेत्रों से आगे नहीं बढ़ते थे। आंबेडकर की इतिहास-पद्धति यदि आज भी प्रासंगिक और आर्कषक है तो वह इसलिए क्योंकि उन्होंने कल्पना और फंतासी, कयास व संभावना और विश्वास करने योग्य वृतांत व बाल की खाल निकालने के बीच के महत्वपूर्ण राजनीतिक अंतर पर प्रकाश डाला। बतौर आधुनिकतावादी, वे चाहते थे कि तार्किक ज्ञान, ना कि एक और मिथक, वर्चस्वशालियों के कुतर्कों का स्थान ले। आंबेडकर का युग वह युग था जब भारतीय इतिहासविद् ‘लीओपायट वॉन रांके’की प्रशियन बेडिय़ों में जकड़े हुए थे और तथ्यवाद की पद्धतियां उनके संकीर्ण मस्तिष्कों पर हावी थीं। अतीत के अवशेषों के समालोचनात्मक अध्ययन के आधार पर कल्पनाशील इतिहासविद् द्वारा इतिहास को विश्वसनीय, कलात्मक व वैज्ञानिक स्वरूप देने के आंबेडकर के इस प्रयास ने इतिहास लेखन के क्षेत्र में अनेक नए द्वार खोले। यह दु:खद है कि शायद अनजाने में या सुविधा के लिए, आंबेडकर को भारतीय विश्वविद्यालयों ने केवल एक ”दलित’’ बौद्धिक-दार्शनिक बना दिया है। सच तो यह है कि विखंडन के इस मिथक-विरोधी भारतीय प्रवर्तक को भारतीय इतिहासकारों द्वारा दशकों पहले गंभीरता से लिया जाना था।

(फारवर्ड प्रेस के अप्रैल, 2016 अंक में प्रकाशित )

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