फारवर्ड विचार, मार्च 2016

लेखक प्रेमकुमार मणि ने प्रधानमंत्री को एक लंबा, खुला पत्र लिखा है। कई ऐतिहासिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक तर्क प्रस्तुत करते हुए, मणि ने मोदी से यह अपील की है कि वे अपनी आंखें खोलें और असलियत से मुख़ातिब हों

इन दिनों संसद और मीडिया में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र नेताओं के विरूद्ध पुलिसिया कार्यवाही और तत्पश्चात का घटनाक्रम article-lpsywlcsnq-1456405599छाया हुआ है। शुरूआत में पुलिस और सरकार का फोकस इन छात्र नेताओं के कथित राष्ट्रद्रोही कृत्यों पर था। परंतु केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने इस मामले में सरकार के बचाव में जो कुछ कहा, उसने सच को उजागर कर दिया। संसद के दोनों सदनों में ईरानी का उन्मादी और नाटकीय भाषण, मुख्यत दो मुद्दों पर केंद्रित था : हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में रोहित वेमूला की आत्महत्या और जेएनयू में महिषासुर शहादत दिवस का आयोजन।

अपनी कान्वेन्ट स्कूली अंग्रेज़ी और टेलीविजन धारावाहिकों की हिंदी में ईरानी ने जाति से जुड़े इन मुद्दों व जेएनयू के वामपंथी छात्र नेताओं की कथित राष्ट्रविरोधी गतिविधियों का सम्मिश्रण करने का जो प्रयास किया, उससे स्थिति साफ  होने की बजाय और गडमड हो गई। झूठ का जाल बुनने में कितने माहिर हैं ये लोग! सौभाग्यवश, फारवर्ड प्रेस सफेद झूठ व अर्द्धसत्यों  के इस पुलिंदे से सच को ढूंढ निकालने में सक्षम है। जैसा कि हमारे पाठक जानते हैं, हम हमेशा से सत्य, पूर्णसत्य और केवल सत्य के प्रति प्रतिबद्ध रहे हैं-हे ईश्वर, मेरी मदद करो।

हमारी अब तक की सबसे लंबी आवरणकथा में एफ पी के संपादक प्रमोद रंजन ने तथ्यों और विश्लेषण के आधार पर जेएनयू की छात्र राजनीति व बौद्धिक संस्कृति में  बहुजन पहचान और विमर्श के हाशिए से केंद्र में आने की अंतर्कथा प्रस्तुत की है। इस प्रक्रिया में हिंदू बहुजन विद्यार्थियों का जो ”अब्राह्मणीकरण हो रहा है, उसे संघ अपने लिए एक बड़े खतरे के रूप में देखता है। फुले-आंबेडकर-पेरियर की विचारधारा व जेएनयू में प्रभावशाली मार्क्स-लेनिन-माओ के विचारों के संगम ने संघ और उसकी विद्यार्थी शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) को और उद्विग्न कर दिया है। यह संयोग मात्र नहीं है कि अक्टूबर 2014 में महिषासुर मुद्दे पर एफ पी और मुझ पर हमले और जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष व डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स यूनियन (डीएसयू) पर हालिया हमले का तानाबाना एबीवीपी द्वारा जेएनयू में बुना गया था। रोहित वेमूला की आत्महत्या के पीछे भी एबीवीपी के कार्यकर्ता द्वारा उनके विरूद्ध की गई एक झूठी शिकायत थी। ऐसी स्थिति में, एबीवीपी को कटघरे में होना था। परंतु मोदी-राजनाथ राज में इसका ठीक उलट हो रहा है।

परंतु कुछ आशा अब भी बाकी है। और इसलिए हमारी पत्रिका के नियमित लेखक प्रेमकुमार मणि ने प्रधानमंत्री को एक लंबा, खुला पत्र लिखा है। कई ऐतिहासिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक तर्क प्रस्तुत करते हुए, मणि ने मोदी से यह अपील की है कि वे अपनी आंखें खोलें और असलियत से मुख़ातिब हों। पत्र के अंत में प्रधानमंत्री से भावुकतापूर्ण व व्यक्तिगत अनुरोध करते हुए वे लिखते हैं : ”आप ही के शब्दों में, आप नीच जात हो, पिछड़ी जमात के आदमी हो, मार्क्सवादी शब्दावली के सर्वहारा हो…कुछ समय पहले, आंबेडकर की मूरत पर जब आप माला चढ़ा रहे थेे तब मेरे मन में ख्याल आया था कि काश उनके विचारों की माला आप अपने गले में डाल लेते। एक मौन क्रांति हो जाती…तुम मनुवादियों के घेरे से विद्रोह करो, उन्हें ध्वस्त करो। उनका देश झूठा है, राष्ट्र झूठा है, धर्म झूठा है। आप झूठ के लाक्षागृह से निकल जाओ मोदी जी। आपका तो कम, राष्ट्र का ज्यादा भला होगा।”

मूल बात यह है कि केवल सत्य ही हमें आज़ादी दे सकता है। स्मृति ईरानी के संसद में भाषण के झूठों का खुलासा मीडिया व सोशल मीडिया में किया जा चुका है। ऐसे में यह सचमुच दु:खद है कि प्रधानमंत्री ने ट्वीट कर इस भाषण की प्रशंसा की और अंत में भारतीय गणराज्य के ध्येय वाक्य ”सत्यमेव जयते” को उद्धृत किया। हमारी यह कामना है कि सत्य, पूर्णसत्य और केवल सत्य की विजय हो।

अगले माह तक…, सत्य में आपका

 

 

(फारवर्ड प्रेस के मार्च, 2016 अंक में प्रकाशित )

 

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