ओबीसी आरक्षण को विभाजित करो

हरीभाऊ राठोड महाराष्ट्र के उन प्रमुख नेताओं में शुमार हैं, जो विमुक्त व घुमंतू जनजातियों की लडाई लम्बे समय से लडते चले आ रहे हैं। इन दिनों वे विमुक्त व घुमंतू जनजातियों तथा अति पिछड़े वर्ग का सांझा मोर्चा बनाने के लिए प्रयासरत हैं

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हरीभाऊ राठोड

हरीभाऊ राठोड महाराष्ट्र के उन प्रमुख नेताओं में शुमार हैं, जो विमुक्त व घुमंतू जनजातियों की लडाई लम्बे समय से लडते चले आ रहे हैं। इन दिनों वे विमुक्त व घुमंतू जनजातियों तथा अति पिछड़े वर्ग का सांझा मोर्चा बनाने के लिए प्रयासरत हैं। राठोड कांग्रेस से संबद्ध हैं तथा पूर्व में सांसद भी रहे हैं। इन दिनों वे महाराष्ट्र विधानपरिषद के सदस्य हैं।

प्रस्तुत हैं श. राळे से उनकी बातचीत के सम्पादित अंश:

अन्य पिछड़े वर्गों को प्रदत्त आरक्षण पर आप सवाल उठा रहे हैं। इसका क्या औचित्य है?

मंडल आयोग के सिफारिशों के अनुसार, अन्य पिछड़े वर्गों को केंद्र सरकार ने 27 प्रतिशत आरक्षण दिया है। केंद्र सरकार की पिछड़े वर्गो की सूची में विमुक्त-घुमंतू, बाराबलुतेदार और अन्य अत्यंत पिछड़ी जातियां सम्मिलित हैं। मंडल आयोग की सिफारिशें लागू हुए 22 बरस गुजर गए हैं। इस अवधि में इन विमुक्त-घुमंतू तथा बाराबलुतेदार जातियों को इस आरक्षण से कोई लाभ नहीं मिला है। इन जातियों का एक भी सदस्य भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय पुलिस सेवा, डाक विभाग, रेलवे, राष्ट्रीयकृत बैंकों, केंद्र सरकार के कार्यालयों इत्यादि में पद नहीं पा सका है। इसलिए, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश की तरह, ओबीसी आरक्षण का विभाजन केंद्रीय स्तर पर भी होना आवश्यक है। बाराबलुतेदार यानि नाई, खाती, वाडी, लुहार, सुतार, सुनार, कुम्हार, धोबी, रामोशी, गुरव, तांबोळी, कासार, भाट, जिनगर, सनगर, बुरुड, शिंपी, गोवारी, डवरी-गोवारी, कोष्टी, बुनकर, बेलदार, कुमावत, भोई, केवट, कलवार, कहार, तांती, सूडी, पटवा, बेलदार, बिंद, धामिन, धोबी (मुस्लिम), धुनिया, कोली, गडरिया, तेली, धनगर आदि जैसे अत्यंत पिछड़े वर्गो की अलग श्रेणी बननी चाहिए। इसके लिए हम पूरे देश में आंदोलन करेंगे।

आपका यह आंदोलन कब और कहां से शुरू होगा?

यह आंदोलन 27 मार्च को दिल्ली में जंतर-मंतर से शुरू होगा। देश में विमुक्त-घुमंतू लोगों की 666 जातियां (आबादी 22 करोड़) और बाराबलुतेदार और अत्यंत पिछड़े वर्ग की 540 जातियां (आबादी 18 करोड) हैं। अर्थात 40 करोड़ की कुल आबादी वाली 1206 जातियां। आन्दोलन की तैयारी जारी है। इसमें भाग लेने के लिए बहुत बडी संख्या में देश भर से लोग दिल्ली के लिए कूच करेंगे।

इन सब जातियों को 27 प्रतिशत आरक्षण मिला हुआ है। फिर आप और आरक्षण क्यों माँग रहे है?

हमें ओबीसी का 27 प्रतिशत आरक्षण नहीं चाहिए, हमें तो इसमें से 9-9 प्रतिशत का हिस्सा चाहिए। हम इस आंदोलन के जरिए यह माँग करनेवाले है कि अन्य पिछड़े वर्ग को प्राप्त आरक्षण को तीन हिस्सों में विभाजित किया जाना चाहिए क्योंकि 27 प्रतिशत आरक्षण का लाभ इन विमुक्त-घुमंतू लोगों को नहीं मिल रहा है। वह इसलिए क्योंकि अन्य पिछडे वर्गों की केंद्रीय सूची में कुछ उच्च वर्गीय, प्रगत जातियां सम्मिलित हैं और ये जातियां आरक्षण का लाभ उठा रही हैं। वंचितों को कुछ भी नहीं मिल रहा है।

लम्बे समय से आप मांग कर रहे थे कि विमुक्त-घुमंतू जातियों को अनुसूचित जनजातियों में शामिल किया जाना चाहिए। क्या आपने वह मांग छोड़ दी है?

नहीं। वह माँग हम करते रहेंगे, किन्तु अभी उसका पूरा होना संभव नहीं दिखता। लोकसभा में 40 आदिवासी सांसद हैं, जो यह माँग पूरी नहीं होने देंगे। इसके पहले, इंदिरा जी ने 1967, 1972 और 1976 में इस आशय के विधेयक संसद में पेश किये थे। उस समय आदिवासी समुदाय के सभी सांसदों ने अपना इस्तीफे इंदिराजी को सौंप दिए थे। यह इतिहास है।

अन्य राज्य में आरक्षण की स्थिति क्या है?

कुछ राज्यों ने इस तरह का आरक्षण दिया है। उदाहरण के तौर पर महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश ने पहले ही विमुक्त-घुमंतू जातियों को अलग से आरक्षण देकर उन्हे सामाजिक न्याय दिया है। अन्य कुछ राज्यों में इसी तरह के प्रस्ताव विचाराधीन हैं जैसे मध्यप्रदेश, उत्तराखंड आदि में। हमारी माँग है कि जिन राज्यों ने अब तक ओबीसी आरक्षण का विभाजन नहीं किया है, वे सब महाराष्ट्र पैटर्न (वसंतराव नाईक) को अमल में लायें। हम दिल्ली के साथ-साथ अन्य राज्यों में भी यह आंदोलन शुरु करेंगे।

क्या 27 प्रतिशत आरक्षण के विभाजन की आपकी माँग वैधानिक है?

हाँ। सर्वोच्च न्यायालय ने इंद्रा साहनी बनाम भारत सरकार (1993) मामले में अन्य पिछडे वर्गों को आरक्षण को वैध ठहराते हुए इसे न्यायोचित बताया था।

यह सही है परन्तु आप तो कोटे के अन्दर कोटे की बात कर रहे हैं।

हाँ। केंद्रीय ओबीसी सूची को तीन भागों में विभाजित किया जाना चाहिए। अ) अनुसूचित डीएनटी (विमुक्त-घुमंतू जनजातियां) ब) अनुसूचित एमबीसी (अति पिछड़े हुए बाराबलुतेदार) व स) अनुसूचित बीसी (पिछड़ी हुई जातियां)। आगे चलकर इस प्रवर्ग को एसटी (अ) कहा जा सकता है।

कुछ राज्यों में विमुक्त-घुमंतू समाज की कुछ जातियां अनुसूचित जातियों में है और कुछ अनुसूचित जनजातियों में। इन जातियों का समावेश कहाँ होगा?

जो जातियां एससी में हैं या एसटी में है, उन्हे जो आरक्षण मिल रहा है, वह मिलता रहेगा। यहाँ सवाल उनका नहीं है। केंद्र की सूची में जो ओबीसी हैं, उनके विभाजन की हम माँग कर रहें हैं। राष्ट्रीय ओबीसी आयोग ने भी ऐसा ही प्रस्तावित किया है।

आपकी माँग का और क्या आधार है?

मंडल आयोग के एक सदस्य एलआर नाईक ने मंडल आयोग की सब लोगों को एक साथ 27 प्रतिशत आरक्षण देने का विरोध किया था और उसे दो भागों में बांटने का आग्रह किया था। किन्तु उस समय अन्य सदस्यों ने उनकी बात नहीं मानी। मंडल आयोग के ऐतिहासिक प्रतिवेदन के साथ एलआर नाईक का असहमति पत्र जोड़ा गया है। यदि सरकार इस दमित-वंचित वर्ग के साथ न्याय करना चाहती है तो नाईक का असहमति पत्र, इंदिरा साहनी मामले में सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय और राष्ट्रीय ओबीसी आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति वी एस्वराय्या द्वारा हाल में ही की गईं सिफारिशें काफी हैं। एलआर नाईक का मानना था कि अन्य पिछड़े वर्गों में से प्रगत जातियां पिछड़ी हुई जातियों को आगे आने नहीं देगीं और इसलिए भविष्य में अत्यंत पिछड़ी हुई जातियां संगठित होकर अपने नेतृत्व का खुद ही निर्माण करेंगी। यदि ऐसा नहीं हुआ तो अन्य पिछड़े हुए वर्गों में से अत्यंत पिछडा वर्ग और दबी हुई पिछड़ी जातियों के लोग केंद्रीय आरक्षण का लाभ नहीं उठा सकेंगे। महाराष्ट्र ने टाटा इन्स्टिट्यूट ऑफ  सोशल साइंसेज व योजना आयोग की सिफारिश के अनुसार 1961 में अन्य पिछड़े वर्गों को विभाजन करके आरक्षण दिया है। महाराष्ट्र में विमुक्त-घुमंतू जातियों ने इसका लाभ उठाया है और आज भी उठा रहें है।

इंद्र साहनी मामला संक्षेप में बताएं

मंडल आयोग की सिफारिश के अनुसार 27 प्रतिशत आरक्षण देने के बारे में सर्वोच्च न्यायालय ने इंद्रा साहनी बनाम भारत सरकार मामले में निर्णय दिया है कि संविधान की धारा 16(4) के अंतर्गत पिछड़े हुए वर्गों का पिछड़े वर्ग और अधिक पिछड़े वर्ग में वर्गीकरण करने में कोई संवैधानिक बाधा नहीं है। ऐसा वर्गीकरण (उस वर्गका) सामाजिक पिछड़ापन कितना है, उस पर निर्भर होना चाहिए। पिछड़े वर्गों के बीच समान विभाजन होना आवश्यक है, जिसे एकत्रीकरण न हो और एक या दो वर्ग आरक्षण का सब लाभ खुद न ले लें। सुनार और वडार (जिनका पारंपारिक व्यवसाय पत्थर फोडऩा है) यदि इन दोनों को एक ही वर्ग में समाविष्ट किया गया तो सुनार ही सब सुविधाएँ ऐंठ लेंगे और वडार के लिए कुछ भी नहीं बचेगा। यदि मुमकिन हो तो राज्य सरकारें इन अन्य पिछड़े वर्गों का उपवर्गीकरण करें, जिससे पिछड़े वर्गों में अधिक पिछड़े वर्गों को उनको देय प्राप्त हो सके।

राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने पिछले दिनों क्याी सिफारिश की है?

राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने सिफारिश की है कि अन्य पिछड़े वर्ग के 27 प्रतिशत आरक्षण को निम्नानुसार विभाजन करें: 1) विमुक्त-घुमंतू 2) बाराबलुतेदार और आत्यंतिक पिछड़े वर्ग जैसे तेली, माळी, कोळी, गवारी आदि व 3) अन्य पिछडे वर्ग। पिछले 20 बरस से हमारी यहीं माँग है।

(फारवर्ड प्रेस के मार्च, 2016 अंक में प्रकाशित )

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