उठाने ही होंगे अभिव्यक्ति के खतरे

आज हमारे देश में सुधार – जिसकी हमें बहुत ज़रुरत है – के प्रयासों को कुचला जा रहा है। जो भारत दाभोलकर, पंसारे और कलबुर्गी जैसे लोगों की जान लेगा, जो भारत कांचा आयलैया और प्रोफेसर गुरु जैसे लोगों को प्रताड़ित करेगा, वह भारत प्रजातान्त्रिक, धर्मनिरपेक्ष, बहुवादी और सभ्य नहीं रह जायेगा

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एक कार्यक्रम को संबोधित करते महेशचंद्र गुरू

  भारत के सांस्कृतिक फासीवाद के सबसे ताज़ा शिकार हैं प्रोफेसर महेश चन्द्र गुरु। उन्हें भगवान राम का ‘अपमान’ करने के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है। ऐसे लगता है कि हमारे वर्तमान असहिष्णु शासक, जल्द ही बौद्धिक असहमति, सत्य की खोज और समालोचना – जो कि प्रजातान्त्रिक समाज के प्रमुख लक्षण हैं – का गला घोंटने के लिए देश में ईशनिंदा कानून लागू कर देंगें। वाक्स्वातंत्र्य आघात पहुंचाता है, सुधार का वाहक होता है और हमें आगे ले जाता है। अन्दर की सड़ांध को सबके सामने लाने से निश्चित रूप से उन लोगों को चोट पहुँचती है जो इसे छुपाये रखना चाहते हैं। परन्तु यही ललित कलाओं, वाक्स्वातंत्र्य, वैकल्पिक आख्यानों और असहमति की सबसे बड़ी ताकत, सबसे बड़ा गुण भी है।

मानवता की सबसे बड़ी त्रासदी यह है की सत्यान्वेषण और वाक्स्वातंत्र्य पर हमलों की शुरुआत इन दोनों के अभ्युदय से ही होगी गयी थी। सुकरात वाक्स्वातंत्र्य के प्रवर्तक थे और वे ही उसकी खातिर सबसे पहले शहीद भी हुए।

जब सुकरात से कहा गया कि अगर वे प्रश्न पूछना और लोगों से चर्चा करना बंद कर दें तो उन्हें छोड़ दिया जायेगा और अन्यथा उन्हें जहर पी कर मृत्यु का आलिंगन करना होगा तो उन्होंने उन पर आरोप लगाने वालों और न्यायाधीशों को संबोधित करते हुए कहा, “अगर मुझे बरी करने की आपकी शर्त यह है कि मैं सत्य की अपनी खोज छोड़ दूं तो हे एथेंसवासियों मैं आपको धन्यवाद देता हूँ परन्तु जब तक मेरी सांस में सांस है और जब तक मेरे शरीर में ताकत है तब तक मैं दर्शनशास्त्र से अपना नाता नहीं तोड़ सकता। जो भी मुझसे मिलेगा, मैं उससे यह कहना नहीं छोड़ूगा कि ‘क्या तुम्हें शर्म नहीं आती कि तुम धन और प्रसिद्धी की पीछे भाग रहे हो और ज्ञान, सत्य और अपनी आत्मा की बेहतरी का तुम्हें कुछ ख्याल ही नहीं है?’ मैं नहीं जानता कि मौत क्या है – हो सकता है कि वह बहुत अच्छी चीज़ हो – और मैं उससे डरता नहीं हूँ परन्तु मैं यह अच्छी तरह से जानता हूँ कि भगोड़ा होना बुरा है। और जिस चीज़ के बारे में मैं जानता हूँ कि वह बुरी है उसके मुकाबले मैं उसे चुनना पसंद करूंगा जो अच्छी हो सकती है।”

सुकरात ने ज़हर (हेम्लॉक नामक पौधे का रस) पी लिया और शांतिपूर्वक मौत की गोद में सो गए।

जब तक धरती पर मनुष्य हैं, सुकरात उनके दिलों में जिंदा रहेंगे परन्तु उन पर आरोप लगाने वाले और उन्हें दण्डित करने वाले कब के विस्मृत कर दिए गए हैं।

परन्तु आज भी सुकरात को प्रताड़ित करने वालों के भाईबंद हमारी दुनिया में मौजूद हैं। वे कभी अयातुल्ला खुमैनी के रूप में प्रगट होते हैं तो कभी तालिबान के रूप में। कभी वे शिक्षा बचाओ आन्दोलन का रूप धर लेते हैं तो कभी सनातन संस्था का। उनके कई जाने-अनजाने रूप हैं और वे हमारे आसपास घात लगा कर बैठे हुए हैं।

हमारे अन्दर ढेर सारी सड़ांध है। अगर हमने उसे साफ़ नहीं किया तो वह हमें नष्ट कर देगी। वाक्स्वातंत्र्य और कलम की ताकत हमें चोट पहुंचा सकती है परन्तु उसका लक्ष्य हमारा परिमार्जन होता है। और हम, अपने को साफ़ करने की बजाय उस कलम को तोड़ देना चाहते हैं, वाक्स्वातंत्र्य का गला घोंट देना चाहते हैं।

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नरेन्द्र दाभोलकर, गोविन्द पंसारे और एमएम कलबुर्गी

वाक्स्वातंत्र्य पर हमले जारी हैं। अज्ञानता, असहिष्णुता, कट्टरता और मतांधता एक दूसरे को मजबूती देते हैं और दुनिया को मध्यकाल में वापस घसीट ले जाना चाहती हैं – इनक्विज़िशन (कैथोलिक न्यायाधिकरण) के युग में। जिन शक्तियों ने नरेन्द्र दाभोलकर, गोविन्द पंसारे और एमएम कलबुर्गी की हत्या की, वे देश को अन्धकार के युग में ले जाना चाहती हैं।

अगर हमें हमारी दुनिया को इस तरह की ताकतों से बचाना है तो हमें दूसरों को चोट पहुँचाने और खुद चोट सहने के लिए तैयार रहना होगा।

जैसा कि आम्बेडकर ने अपनी पुस्तक ‘एनीहीलेशन ऑफ़ कास्ट’ में लिखा था, “किसी व्यक्ति द्वारा उसकी राय और विश्वासों, उसकी स्वतंत्रता और हितों को समूह के मानकों, समूह के अधिकारों और समूह के हितों से ऊपर रखना ही हर सुधार की शुरुआत है। परन्तु यह सुधार जारी रहेगा या नहीं, यह इस पर निर्भर करता है कि समूह उसे अपनी बात रखने का कितना मौका देता है। अगर समूह इस तरह के व्यक्तियों के प्रति सहिष्णु और निष्पक्ष है तो वे अपनी बात कहते रहेंगे और अंततः अपने साथियों के विचारों को बदलने में कामयाब हो जायेंगे। दूसरी ओर, अगर समूह असहिष्णु है और किसी भी तरीके से इन व्यक्तियों को कुचल देने पर आमादा है तो वे समाप्त हो जायेंगे और सुधार न हो सकेगा।”

आज हमारे देश में सुधार – जिसकी हमें बहुत ज़रुरत है – के प्रयासों को कुचला जा रहा है। जो भारत दाभोलकर, पंसारे और कलबुर्गी जैसे लोगों की जान लेगा, जो भारत कांचा आयलैया और प्रोफेसर गुरु जैसे लोगों को प्रताड़ित करेगा, वह भारत नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा दिखाए जा रहे आर्थिक और तकनीकी प्रगति के तमाम स्वप्नों के बाद भी, प्रजातान्त्रिक, धर्मनिरपेक्ष, बहुवादी और सभ्य नहीं रह जायेगा।

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