भाजपा ब्रांड की राजनीति के दार्शनिक हैं आदि शंकराचार्य

धर्म की राजनीति, शोषण पर आधारित सामाजिक संबंधों को बनाये रखना चाहती है और स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्यों के खिलाफ है. राम पुनियानी मानते हैं कि राजनीति के इस ब्रांड को शंकर ने दार्शनिक आधार प्रदान किया है

भारत ने दुनिया को समृद्ध और विविधताओं से भरपूर दर्शन और विचार दिए हैं। भारत की दार्शनिक परम्पराओं की मुख्यतः दो धाराएं रहीं हैं– आदर्शवादी और भौतिकवादी। ये दोनों धाराएं, दो प्रमुख धार्मिक परम्पराओं के समानांतर बहती रहीं हैं – ब्राह्मणवाद और श्रमणवाद। ब्राह्मणवादी परम्पराओं के केंद्र में हैं वेद, स्मृतियाँ और श्रुतियां। आदर्शवादी दर्शन, इसी धार्मिक परंपरा से जुड़े हुए हैं। श्रमणवादी परम्पराएं, इस दुनिया के आसपास बुनी गयीं हैं, वे जातिगत पदक्रम की विरोधी हैं और साधारण मनुष्यों के आचरण और आस्थाओं के नज़दीक हैं। नाथ, तंत्र, भक्ति, सिद्ध, शैव, सिद्धांत इत्यादि भौतिकवादी दर्शन हैं और वे इन परम्पराओं से जुड़े हुए हैं।

ब्राह्मणवाद अपेक्षाकृत लम्बे समय तक वर्चस्वशाली रहा है। ‘‘हिन्दू धर्म में मुख्यतः ब्राह्मणों का बोलबाला रहा है और इसका चरित्र मूलतः  पैतृक था। इसमें बौद्ध, जैन, वैष्णव, शैव और शाक्त पंथ शामिल थे” (रोमिला थापर, कल्चरल पास्ट्स। पृ 966, ओयूपी, दिल्ली, 2000)। आंबेडकर ने भी लिखा है कि हिंदू धर्म मूलतः ब्राह्मणवादी धर्मशास्त्र है। श्रमणवादी परम्पराएं, हिन्दू धर्म के अलावा, बौद्ध, जैन और आजीवक धर्मों में भी हैं।

शंकर

adi-guru-shankaracharya-jiशंकर, ब्राह्मणवादी परंपरा के सबसे बड़े दार्शनिक-धर्मशास्त्री थे।  ‘‘शंकर ने ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म को दार्शनिक विचारों, अनुष्ठानों व प्रतीक-पुरुषों के आधार पर परिभाषित किया। उन्होंने उपमहाद्वीप के सभी हिस्सों में विद्यालयों व मंदिरों की स्थापना की। उन्होंने वैदिक परम्पराओं को मजबूती दी और उनके पालन पर जोर दिया। उन्होंने अन्य धार्मिक सम्प्रदायों, जो लोकप्रिय हो रहे थे, के विरुद्ध ब्राह्मणवाद को खड़ा करने का प्रयास किया। वे वेदांत एवं अद्वैत दर्शन के प्रचारक थे। उनका जोर ब्राह्मणवाद को उन अनुष्ठानों से मुक्त करने पर था, जो ब्राह्मणों के आचरण का भाग थे। वे दर्शन की आदर्शवादी धारा के वाहक थे। उनका मानना था कि हमारे आसपास की दुनिया दरअसल माया है। वास्तविक दुनिया को मानवीय इन्द्रियों द्वारा देखा-समझा नहीं जा सकता। केवल वैराग्य से ही हम हमारी इन्द्रियों पर इस तरह नियंत्रण कर सकते हैं जिससे हम असली दुनिया की झलक पा सकें।” (रोमिला थापर, अ हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया, खंड 1, पृ 185, पेंगुइन, दिल्ली, 1992)। उन्होंने अनेक मठों की स्थापना की: अथर्ववेद पर आधारित उत्तर भारत में बद्रीनाथ में ज्योतिर मठ, यजुर्वेद पर आधारित दक्षिण भारत के श्रृंगेरी में शारदा मठ; ऋग्वेद पर आधारित पूर्वी भारत में जगन्नाथपुरी में गोवर्धन मठ और सामवेद पर आधारित पश्चिमी भारत में द्वारका में कालिका मठ। इस मामले में उन्होंने बौद्ध मठों के सांगठनिक ढांचे का अनुसरण किया। ये मठ शंकराचार्यों की पीठ बने।  ‘‘प्रत्येक मठ एक गोत्र विशेष से जुड़ा हुआ था (उदाहरण के लिए पुरी का गोवर्धन मठ, कश्यप गोत्र से)। मठ के सदस्य उस मठ का गोत्र अपना लेते थे और यह एक तरह का संस्कृतिकरण था’। (एच. चक्रवर्ती, रोमिला थापर द्वारा कल्चरल पास्ट्स, ओयूपी, पृ 896 में उद्धत) ।

शंकर का मुख्य फोकस ब्राह्मणवाद को स्वच्छ करना और बौद्ध दर्शन और श्रमण परम्पराओं को निशाना बनाना था। उन्होंने ब्राह्मणवाद को बौद्ध धर्म से मुकाबला करने के लिए तैयार किया।  ‘‘वे संपूर्ण उपमहाद्वीप में बौद्ध दार्शनिकों से वाकयुद्ध में रत रहे – उन दार्शनिकों से जो बुद्ध के सिद्धांतों जैसे दुनियावी वस्तुओं की क्षणभंगुरता व ईश्वर के आस्तित्व से इंकार शामिल हैं, की शिक्षा देते थे (सुनील खिलनानी, इन्कारनेशंस: इंडिया इन 50 लाइवस, पृ 84, एलन लेन, यूके)। शंकर यथास्थिति को बनाये रखने के हामी थे। वे विश्व को माया बताते थे। बुद्ध के लिए ये दुनिया ही असली दुनिया थी, जिसकी बुराईयों के विरुद्ध हमें संघर्ष करना है और असमानता व शोषण पर आधारित व्यवस्था को बदलना है। दूसरी ओर शंकर ब्राह्मणवाद के हामी थे और उनकी मान्यता थी कि  ‘‘केवल ब्राह्मण ही दुनिया का त्याग कर सकते हैं (और मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं)।’ सुनील खिलनानी लिखते हैं,  ‘‘जैसा कि शिकागो विश्वविद्यालय में धर्मों की इतिहास की प्राध्यापक वेंडी डोनीगिर लिखती हैं, ‘‘यह विचार कि यह दुनिया अवास्तविक है, हममें  सामाजिक अन्याय, गरीबी और क्रूरता के खिलाफ संघर्ष करने की इच्छा को समाप्त कर देता है’(खिलनानी, पूर्वोक्त, पृ 85)।

शंकर की विचारधारा

शंकर ने अनेक ग्रंथ लिखे, जिनमें वेदों को दैवीय, अनादि, अमोघ और ज्ञान का एकमात्र स्त्रोत बताया गया। यही अद्वैतवाद है। उन्होंने द्रव्य के अस्तित्व से इंकार किया और कहा कि वेद तर्क-वितर्क से परे हैं। उनका कहना था कि केवल ऊँची जातियों को वेदों का अध्ययन करने का अधिकार है। इस तरह, उच्च जातियों का सत्य तक पहुंच पर एकाधिकार हो गया। एक तरह से शंकर का दर्शन सत्ताधारियों का दर्शन था। वह वेदों में आस्था पर ज़ोर देता था, ब्राह्मणों के विशेषाधिकारों को वैधता प्रदान करता था और केवल उन्हें और अन्य ऊँची जातियों को मोक्ष प्राप्त करने का अधिकारी बताता था। वेद नीची जातियों के लिए नहीं थे। वे दैवीय और ज्ञान के एकमात्र स्त्रोत थे।

शंकर के पहले ब्राह्मणवादी विचारधारा का विरोध चार्वाक और बुद्ध ने किया था। शंकर के बाद उपमहाद्वीप में शक्तिशाली भक्ति परंपरा का उदय हुआ और उसके बाद जोतिराव फुले और बाबसाहेब आंबेडकर की विचारधाराएं उभरीं। श्रमणवाद और उससे जुड़ी धाराओं के दार्शनिकों की एक लंबी सूची है, जिसमें कई प्रतिष्ठित नाम शामिल हैं।

चार्वाक

लोकायत परंपरा ने बहुत पहले इस ब्राह्मणवादी विश्वास को चुनौती दी थी कि वेद दैवीय और ब्रह्मवाक्य हैं। लोकायत परंपरा का समाज पर गहरा प्रभाव पड़ा। शंकर जिस आदर्शवादी धारा के दार्शनिक थे, उस धारा के विपरीत लोकायत भौतिकवादी धारा थी। वह तर्क और विवेक का उपयोग करने में विश्वास रखती थी और उसे केवल इस दुनिया से मतलब था। ब्राह्मणवाद इस परंपरा का विरोधी था और उसने तर्क के इस्तेमाल को विभिन्न तरीकों से हतोत्साहित किया। इंद्र को तार्किक ढंग से सोचने का ‘अपराध’ करने के कारण सियार के रूप में जन्म लेना पड़ा। “(अपने पिछले जीवन में) मैं तार्किकता की ओर आकर्षित हुआ। अनावश्यक तर्क करने के कारण मैं निम्न कोटि का विद्वान बन गया। स्वतंत्र चिंतक के रूप में मैं वेद-निंदक बन गया। मैं ब्राह्मणों की बातों का खंडन करता था, मैं नास्तिक था और हर चीज़ पर संदेह करता था। इस तरह मैं एक ऐसा मूर्ख था जिसे यह भ्रम था कि वह ज्ञानी है’ (गंगोपाध्याय एमके, 1990, फिलोस्फी इन इंडिया, नवकर्नाटक, बैंगलोर)।

लोकायत परंपरा को चार्वाक या ब्रहस्पत्य भी कहा जाता था। इसका अर्थ था तार्किक या भौतिकवादी दर्शन । ‘‘इसे लोकायत इसलिए कहा जाता था क्योंकि वह लोगों में प्रचलित थी’ (चटोपाध्याय, 1981)। यह लोगों का दर्शन था। उसे अनैतिक, मूर्खतापूर्ण व उपभोक्तावादी दर्शन बताया जाता था परंतु वह इस अर्थ में भौतिकवादी नहीं था कि वह अनियंत्रित, अनैतिक उपभोग में विश्वास करता था बल्कि वह इस अर्थ में भौतिकवादी था कि वह इस दुनिया को भौतिक व चैतन्य का स्त्रोत मानता था। वह इस दुनिया को ही असली दुनिया मानता था और इसके आगे या इसके ऊपर किसी दूसरी दुनिया के अस्तित्व से इंकार करता था। महिभद्र ने लोकायत को परिभाषित करते हुए लिखा कि  ‘‘लोक का अर्थ है पदार्थसर्था या पदार्थसमूह’।  ‘‘इस तरह लोकायत का अर्थ न केवल लोगों का दर्शन था बल्कि इस दुनिया या भौतिकवाद का दर्शन भी था’ (चटोपाध्याय डी, लोकायत, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, 1998)।

बुद्ध और कबीर

The ‘Buddha Samy’ of Thiyaganur, Tamil Nadu

बुद्ध

ब्राह्मणवादी विचारधारा की दूसरी सबसे बड़ी विरोधी दार्शनिक धारा थी गौतमबुद्ध की। ब्राह्मणवाद के विरूद्ध बुद्ध ने   ‘‘अस्थायित्व” का सिद्धांत प्रतिपादित किया। उनका विचार था कि सामाजिक उत्पादन और सामाजिक रिश्तों में निरंतर बदलाव आता रहता है। वे अंधश्रद्धा के हामी नहीं थे। वे मुक्ति की तलाश में तर्क और व्यक्तिगत प्रयासों की भूमिका पर ज़ोर देते थे। यह दिलचस्प है कि जहां ब्राह्मणवादी शूद्रों और महिलाओं को ज्ञान प्राप्ति के योग्य नहीं मानते थे और श्रेष्ठि वर्ग की भाषा संस्कृत का इस्तेमाल करते थे, वहीं बुद्ध का कहना था कि उनकी बताई राह सभी के लिए खुली है और वे आमजनों की भाषा पाली और प्राकृत में संवाद करते थे। उनके संघों के द्वार सभी जातियों और दोनों लिंगों के लिए खुले हुए थे। आत्मा और ब्रह्म पर बहस में पड़ने की बजाए उन्होंने अपना ध्यान दुनियावी समस्याओं पर केन्द्रित किया। बुद्ध का आष्टागिंक मार्ग था सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाक, सम्यक कर्म, सम्यक जीविका, सम्यक प्रयास, सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि।

इस आसानी से समझ में आने वाले संदेश को बड़ी संख्या में लोगों ने पसंद किया। यह श्रेष्ठि-केन्द्रित ब्राह्मणवादी विमर्ष से एकदम अलग था। वह नीची जातियों के लोगों को ऊँची जातियों के दमन से मुक्ति की राह दिखाता था और महिलाओं को यह बताता था कि उनकी सामाजिक स्थिति कैसे बेहतर बन सकती है। बुद्ध की शिक्षाओं का एक महत्वपूर्ण पहलू था प्रजातांत्रिक सिद्धांतों पर उनका ज़ोर। सामूहिक निर्णयों को बौद्ध दर्शन, समुदाय के अस्तित्व को बचाए रखने की गारंटी मानता है। उसके अनुसार ऐसे निर्णय समुदाय के सभी सदस्यों के हित में होते हैं। प्रजातांत्रिक सिद्धांत, सामाजिक न्याय और लैंगिक समानता बुद्ध की शिक्षाओं के भाग थे।

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कबीर

मध्यकाल में कबीर ने अत्यंत दुरूह दार्शनिक सिद्धांतों को साधारण भाषा में प्रस्तुत किया। वे जातिगत पदक्रम के विरोधी थे और सामाजिक मुद्दों पर उनके विचारों का आमजनों पर गहरा प्रभाव पड़ा। भारत में उभरी एक अन्य प्रमुख श्रमणवादी धारा-सिक्ख धर्म-पर कबीर का गहरा प्रभाव था। उन्होंने वर्णाश्रम धर्म को मान्यता देने से इंकार कर दिया। “कबीर का लेखन केवल एक दूसरे से भिन्न अनेक तत्वों का सम्मिश्रण नहीं था। वह मूलतः हमारी संस्कृति में व्याप्त घोर असमानताओं का नकार था (इरफान हबीब, रिलीजन एंड इंडियन हिस्ट्री, कबीर, पृ 153, तूलिका, दिल्ली, 2007)”।

कबीर ने जाति और सामाजिक पदक्रम के खिलाफ विद्रोह किया। कबीर के समय इस्लाम भारत में आ चुका था। कबीर यह देख पा रहे थे कि हिंदुओं में ब्राह्मण जाति व्यवस्था को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं और मुस्लिम समाज में मौलाना यथास्थिति के पोषक हैं। उन्होंने दोनों ही धर्मों के पुरोहित वर्ग के खिलाफ आवाज़ उठाई। कबीर समाज के शक्तिशाली वर्गों द्वारा किए जाने वाले उस अन्याय के कटु विरोधी थे, जिसे पुरोहित वर्ग वैधता प्रदान करता था। उन्होंने नीची जातियों और पददलितों के विद्रोह को स्वर दिया। आश्चर्य नहीं कि आंबेडकर उन्हें अपने गुरूओं में से एक मानते थे।

अतः यह स्पष्ट है कि शंकर, भारतीय उपमहाद्वीप के दर्शन के प्रतिनिधि नहीं हैं। उनका दर्शन सत्ताधारी जातियों और वर्गों का दर्शन था। इस भूमि का असली प्रतिनिधित्व करती है लोकायत परंपरा और बुद्ध और कबीर की विचारधाराएं। तो फिर शंकर को एक ऐसे दार्शनिक के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास क्यों किया जा रहा है जो भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं?

संघ-भाजपा और हिंदू राष्ट्रवाद

इस प्रश्न के उत्तर को दो भागों में बांटा जा सकता है। देश पर वर्तमान में शासन कर रही आरएसएस-भाजपा भारत को हिंदुत्व पर आधारित हिंदू राष्ट्र बनाना चाहती है। हिंदुत्व की विचारधारा, जन्म-आधारित पदक्रम के ब्राह्मणवादी मूल्यों के आसपास बुनी गई है। शंकर, ब्राह्मणवादी मूल्यों के प्रतिपादक थे। धर्म के नाम पर की जा रही राजनीति का लक्ष्य क्रूर, शोषण-आधारित सामाजिक रिश्तों को बनाए रखना है और यह राजनीति स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्यों की विरोधी है। शंकर, इस ब्रांड की राजनीति को दार्शनिक आधार प्रदान करते हैं।

इस उत्तर का दूसरा भाग अतीत में हिंदू राष्ट्रवाद ढूंढने के प्रयासों से जुड़ा हुआ है। एक मिशनरी और धर्मोपदेशक के बतौर, शंकर अपने दर्शन का प्रचार-प्रसार करना चाहते थे। उन्होंने उपमहाद्वीप के चारों कोनों पर मठों की स्थापना की। यह उपमहाद्वीप एक राष्ट्र नहीं था क्योंकि, जैसा कि आंबेडकर ने लिखा है, हिंदू राष्ट्र नहीं हो सकते। राष्ट्रों के नागरिकों में किसी न किसी प्रकार की समानता होनी चाहिए। शंकर और ब्राह्मणवाद, जिनकी विचारधाराओं पर हिंदुत्व आधारित है- समानता के विचार के विरोधी थे। भारत को केवल इसलिए एक राष्ट्र नहीं माना जा सकता क्योंकि शंकर ने इस भूमि के चारों कोनों पर मठों की स्थापना की थी। भारत के राष्ट्र बनने की प्रक्रिया ब्रिटिशकाल में शुरू हुई, जब आधुनिक उद्योग और आधुनिक शिक्षा ने समानता के मूल्यों को यहां जडें जमाने में मदद की। जोतिराव फुले, सावित्री फुले, आंबेडकर और पेरियार के अभियानों ने इस प्रक्रिया को मज़बूती दी।

आज हम इस देश में एक बार फिर दो विचारधाराओं का टकराव देख रहे हैं। एक ओर ब्राह्मणवादी मूल्य हैं, जिनका प्रतिनिधित्व संघ व भाजपा की राजनीति करती है। दूसरी ओर लोकायत, बुद्ध, कबीर, फुले, आंबेडकर व अन्य धर्मनिरपेक्ष व आधुनिक नेता हैं। चूंकि शंकर कमज़ोर वर्गों को पराधीन रखने की राजनीति को दार्शनिक आधार प्रदान करते हैं इसलिए संघ व भाजपा के चिंतकों को वे प्रिय हैं।

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