महिलाएं उन्हें कहती थीं पेरियार-‘महान’

आत्माभिमान विवाहों के मूल में थी लैंगिक समानता और अपने निर्णय स्वयं लेने का अधिकार। यह विचार और सोच के क्षेत्र में एक क्रांति और जागरूकता व आत्म-चेतना की एक लम्बी छलांग। ललिता धारा लिखती हैं कि पेरियार ने एक नयी महिला और एक नए पुरुष का सृजन किया

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मैनियामाई और पेरियार

      तमिलनाडू में २०वीं सदी के गैर-ब्राह्मण द्रविड़ आन्दोलन का लम्बा और उथल-पुथल से भरा इतिहास था. इसकी शुरुआत १९१६ में जारी गैर-ब्राह्मण घोषणापत्र से मानी जा सकती है. इस अवधि में महिलाओं की स्थिति और जाति व्यवस्था से सम्बंधित सुधार हुए तो परन्तु वे बहुत सीमित थे. सन १९१७ में गैर-ब्राह्मणों की राजनीतिक और शैक्षणिक बेहतरी के लिए ‘जस्टिस पार्टी’ का गठन किया गया. सन १९२० के प्रांतीय चुनावों में यह पार्टी सत्ता में आयी और तमिलनाडू में पहली बार गैर-ब्राह्मण सरकार बनी. ईव्ही रामासामी, जिन्हें पेरियार के नाम से जाना जाता है, इतिहास के इसी दौर के प्रमुख पात्र थे.

पेरियार की नेतृत्व क्षमता सन १९२५ में शुरू हुए आत्माभिमान आन्दोलन में सामने आयी. इस आन्दोलन का लक्ष्य था गैर-ब्राह्मण जातियों को उनके द्रविड़ मूल पर गर्व करना सिखाकर उन्हें एक सूत्र में पिरोना. आन्दोलन के मूल सिद्धांत थे – ईश्वर, धर्म, कर्मकांडों व जाति का नकार. पेरियार ने इसमें एक और सूत्र जोड़ा – पितृसत्तामकता का नकार! आत्माभिमान आन्दोलन का अंतिम लक्ष्य था जाति-मुक्त समाज का निर्माण. इसके लिए उसे जाति व्यवस्था की सभी संरचनाओं से मुकाबला करना पड़ा. इनमें शामिल थीं ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म और ब्राह्मणवादी पितृसत्तामकता. पेरियार के संघर्ष की सबसे प्रमुख विशेषता यह थी कि अपने जीवन में उन्होंने इन सभी संस्थाओं से अलग-अलग समय पर व्यक्तिगत स्तर पर लोहा लिया. हर लड़ाई अलग-अलग तरीकों से लड़ी गयी. पेरियार ने जहाँ ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म के विरुद्ध लड़ाई में तार्किकता को अपना हथियार बनाया वहीं पितृसत्तामकता का विरोध उन्होंने इस अपने इस दृढ विश्वास के आधार पर किया कि महिलाएं अपने आप में स्वतंत्र है और किसी के अधीन नहीं हैं.

अपने पूर्ववर्ती उच्च जातियों के समाज सुधारकों – जो महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर पितृसत्तामकता के मूल ढ़ांचे को चुनौती दिए बगैर विचार करते थे – के विपरीत, पेरियार ने एकपत्निक परिवार और सतीत्व के मानकों को चुनौती दी, जो महिलाओं को गुलाम बनाते थे. चूँकि विवाह, महिलाओं के दासत्व का प्रतीक था, इसलिए उन्होंने जोर देकर कहा कि विवाह की संस्था को ही समाप्त कर दिया जाना चाहिए.

A self-respect marriage held in 2014

एक आत्म सम्मान विवाह 2014 में आयोजित

पेरियार ने १९२९ में आत्माभिमान विवाह (सेल्फ-रिस्पेक्ट मैरिज या एसआरएम) की जिस अवधारणा का विकास और प्रतिपादन किया, वह एक अनूठा मास्टर स्ट्रोक था. यह अवधारणा विवाह को दो व्यक्तियों के बीच एक ऐसे समझौते के रूप में देखती थी, जिसमें जाति, वर्ग या धर्म के लिए कोई जगह नहीं थी और जिसके लिए न तो पुरोहितों की आवश्कता थी और ना ही अभिवावकों की सहमति की. इसमें विवाह सदा के लिए पवित्र बंधन न होकर दो समकक्ष व्यक्तियों के बीच समझौता था, जिसे दोनों में से कोई भी पक्ष जब चाहे समाप्त कर सकता था. विवाह स्वर्ग में ईश्वर द्वारा नहीं वरन धरती पर दो व्यक्तियों द्वारा परस्पर समझौते से निर्धारित किये जाते थे. आत्माभिमान विवाहों के मूल में थी लैंगिक समानता और अपने निर्णय स्वयं लेने का अधिकार. यह विचार और सोच के क्षेत्र में एक क्रांति और जागरूकता व आत्म-चेतना की एक लम्बी छलांग थी. कुल मिलाकर, पेरियार ने एक नयी महिला और एक नए पुरुष का सृजन किया.

पेरियार के जन्म के चार दशक पूर्व, फुले दम्पती ने महाराष्ट्र के पुणे में ‘सत्यशोधक विवाह संस्कार’ के नाम से एक क्रंतिकारी सोच प्रस्तुत की थी. इन विवाहों में कोई पंडित नहीं होता था और हिन्दू धार्मिक मंत्रों की जगह, वर और वधु, अपने लिए निर्धारित धर्मनिरपेक्ष मंत्रों का स्वयं जाप करते थे. इन मंत्रों में कोई लैंगिक भेदभाव नहीं था. यद्यपि पेरियार ने फुले का नाम भी नहीं सुना था, तथापि उन्होंने फुले के काम को ही आगे बढ़ाया.

आत्माभिमान विवाह समारोहों की अध्यक्षता पेरियार स्वयं करते थे और इससे उन्हें अपने स्त्रीवादी विचारों का प्रसार करने का मौका मिलता था. स्त्री-पुरुष संबंधों का कोई ऐसा पक्ष नहीं था जो उनकी नज़रों से छूटा हो. वे महिलाओं को सेक्स व प्रजनन के मामलों में असीमित व बिना शर्त स्वतंत्रता दिए जाने के हामी थे.  उन्होंने पित्रसत्तामकता के ध्वंस के लिए वह सब कुछ किया जो वे कर सकते थे. सोये हुए समाज को झकझोर कर उठाने के लिए उत्तेजक बयान देने में उन्हें विशेषज्ञता हासिल थी. एक बानगी देखिये: “अगर इससे उनकी स्वतंत्रता में बाधा पड़ती हो तो महिलाओं को बच्चों को जन्म देना बंद कर देना चाहिए”. वे बिना लागलपेट के कहते थे कि जब तक ‘पितृसत्तात्मक पुरुषत्व’ है तब तक महिलाएं स्वतंत्र नहीं हो सकतीं. वे चाहते थे कि ‘सतीत्व’ और ‘चरित्र’ जैसे मानक या तो महिला और पुरुष दोनों पर लागू होने चाहिए या किसी पर भी नहीं.

उनका कहना था कि माता-पिता को अपनी लड़कियों का पालनपोषण उसी तरह करना चाहिए जैसा कि वे लड़कों का करते हैं. यहाँ तक कि लड़कों और लड़कियों के नाम और उनका पहनावा भी एक जैसे होने चाहिये और लड़कियों को मुक्केबाजी और कुश्ती जैसों खेलों का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए.

जहाँ तक महिलाओं के लिए गर्भनिरोधकों  के इस्तेमाल का सवाल है, उनकी मान्यता थी ये महिलाओं को स्वतंत्रता और उनके जीवन पर अधिकार देने के उपकरण हैं. पेरियार की यह सोच, उनके समकालीन अन्य सुधारकों से एकदम अलग थी जो यह मानते थे कि महिलाओं के लिए गर्भनिरोधक उपायों का इस्तेमाल परिवार, समुदाय और राष्ट्र के हित में होना चाहिए. पेरियार का यह मानना था कि केवल और केवल महिलाओं को यह तय करने का अधिकार है कि वे बच्चे चाहतीं हैं या नहीं, यदि हां तो कब और विवाह बंधन के अन्दर या उसके बाहर. उन्होंने अपने ये विचार अलग-अलग भाषणों और लेखों में व्यक्त किये और इन्हें संकलित कर एक पुस्तिका की शक्ल में प्रकाशित किया गया, जिसका शीर्षक था, ‘व्हाई द वुमन वाज एनस्लेव्ड’ (महिला क्यों गुलाम बनी).

वे उस काल में क्रांतिकारी स्त्रीवाद की भाषा में बात करते थे, जब पश्चिम के स्त्रीवादियों की दूसरी लहर ने इस शब्द को गढ़ा ही नहीं था.

आत्माभिमान विवाहों के अतिरिक्त, आत्माभिमान सम्मेलनों और युवा सम्मेलनों में भी पेरियार ने  लैंगिक मुद्दों पर अपने विचार रखे. इन आयोजनों में पारित प्रस्ताव, महिला-समर्थक और लैंगिक न्याय पर आधारित हुआ करते थे.

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मैनियामाई और पेरियार छोटे बच्चों के साथ

इस आन्दोलन का एक अनूठा पक्ष यह था कि महिलाएं केवल महिला सम्मेलनों में ही नहीं, बल्कि सामान्य आत्माभिमान सम्मेलनों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं. उनकी आयोजन में तो भूमिका होती ही थी, वे सम्मेलनों की अध्यक्षता भी करती थीं और प्रस्ताव भी प्रस्तुत करती थीं. आन्दोलन की महिला कार्यकर्ता, जाति और पितृसत्तामकता के परस्पर अन्योन्याश्रित संबंधों से अनभिज्ञ नहीं थीं. वे ब्राह्मणों के जातिगत दमन और पुरुषों के लैंगिक दमन को सदृश पाती थीं. वे यह मानती थीं कि धर्म, जातिगत और लैगिक असमानताओं को वैध व औचित्यपूर्ण ठहरता है. आन्दोलन के साहित्य में उन्होंने अपने इन विचारों को स्वर दिया. ईवी रामासामी को ‘पेरियार’ या महान की उपाधि मद्रास में १९३८ में आयोजित तमिलनाडू विमेंस कांफ्रेंस में दी गयी.

पेरियार घर और सार्वजनिक जीवन दोनों में महिलाओं को किसी घेरे में बंद रखने के हामी नहीं थे. वे जो कहते थे, वह करते भी थे. उन्होंने अपनी १३ वर्षीय नवविवाहिता पत्नी नगम्मल को उसकी ‘थाली’ या मंगलसूत्र का त्याग करने के लिए राजी किया. वे अपनी पत्नी से कहते थे कि वे उन्हें कामरेड कहकर संबोधित करें और जिन भी सभा-सम्मेलनों में वे जाते, उनकी पत्नी उनकी साथ होतीं थीं. उन्होंने ठीक यही व्यवहार अपनी बहन कन्नामल के साथ भी किया. यहाँ तक कि जब गांधीजी ने सन १९२१ में शराबबंदी के समर्थन में ताड़ी की दुकानों पर धरना देने का आव्हान किया, तब इरोड में आन्दोलन का नेतृत्व नगम्मल और कन्नामल ने किया. इस सबके के बावजूद, सन १९३३ में अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद उन्होंने इस बात पर गहन खेद व्यक्त किया कि वे अपने वैवाहिक जीवन में अपनी स्त्रीवादी विचारों का एक छोटा सा अंश भी लागू नहीं कर सके.

पेरियार के जीवन की एक अन्य महत्वपूर्ण घटना थी सन १९४९ में ७० वर्ष की आयु में अपने से चालीस वर्ष छोटी मनिअम्मै से उनका पुनर्विवाह. मनिअम्मै छह वर्ष से उनकी निजी सचिव थीं. इस विवाह के लिए उनकी घोर निंदा और भर्त्सना हुई. परन्तु वे अविचलित रहे. पेरियार ने कहा कि उन्होंने यौन सुख के लिए विवाह नहीं किया है और यह भी कि यौन सुख प्राप्त करने के लिए विवाह करना आवश्यक भी नहीं है. उन्होंने कहा कि विवाह के पीछे उनका उद्देश्य अपनी वैचारिक, सांगठनिक और भौतिक विरासत को सुरक्षित हाथों में सौंपना है ताकि उनका काम आगे बढ़ सके. उन्होंने रूढ़ीवाद के खिलाफ अपनी लम्बी और अथक लड़ाई की विरासत एक युवा महिला को सौंपी.

यह स्त्रीवाद के प्रति उनकी आचरणगत प्रतिबद्धता का सबसे बड़ा प्रमाण था.

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  1. विवेक बंजारे Reply

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