भारत की हैरियट स्टो : महाश्वेता देवी

महाश्वेता देवी ने अस्पृश्यों की तो उपेक्षा की, किन्तु अपना रचना कर्म अस्पृश्यों की भाँति ही शोषित, उपेक्षित आदिवासियों पर केन्द्रित कर भारत की हैरियट स्टो बन गयीं। जिस तरह हैरियट स्टो कालों को दास-प्रथा से निजात दिलाने के ले लिए तन-मन-धन से उनके साथ जुड़ गयीं, वही काम भारत में महाश्वेता देवी ने आदिवासियों के लिए किया

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महाश्वेता देवी

भारत के किसानों और आदिवासियों के अधिकारों के लिए अपनी कलम को अविराम सक्रिय रखने तथा संस्कृतिकर्मियों का दशकों तक मार्ग दर्शन करने वालीं प्राख्यात लेखिका महाश्वेता देवी नहीं रहीं। 28 जुलाई को अपरान्ह 3.16 पर उन्होंने कोलकाता के मशहूर नर्सिंग होम, बेल व्यू में अंतिम सांस ली। 14 जनवरी, 1926 को अपने जन्म से अविभाजित भारत के ढाका को धन्य करने वाली महाश्वेता देवी ख्यातिप्राप्त साहित्यकार पिता मनीष घटक और उपन्यास लेखिका माँ धारित्री देवी की पुत्री, भारत के सर्वकालीन सर्वश्रेष्ठ फिल्म निर्देशक सत्यजित राय के समकक्ष गण्य ऋत्विक घटक की भतीजी तथा ‘इकॉनोमिक एंड पॉलिटिकल वीकली’ के संस्थापक सचिन चौधरी की भांजी थीं। बाद में घटक परिवार की कन्या महाश्वेता का सुप्रसिद्ध रंगकर्मी बिजन भट्टाचार्य से विवाह हो जाने के बाद उनके सरनेम में ‘घटक’ की जगह ‘भट्टाचार्य’ जुड़ गया। इन्ही की इकलौती संतान रहे प्रख्यात लेखक-एक्टिविस्ट नवारुण भट्टाचार्य। बहरहाल कला-साहित्य के लिए चर्चित परिवार में जन्म लेने वाली महाश्वेता घटक को छात्र जीवन में रवीन्द्रनाथ का सानिध्य लाभ प्राप्त हुआ। ऐसे में मनीष घटक और धारित्री देवी की पुत्री और ऋत्विक घटक की भतीजी तथा रवि ठाकुर की शिष्या को लेखन– एक्टिविज्म में उतरना ही था और वह उतरी भीं लेखन और सामाजिक सक्रियता के लिए उन्हें पद्मभूषण, ज्ञानपीठ, मैग्ससे और अन्य कई सम्मान से सम्मानित किया गया। दुनिया से जाने के बाद भी उनके असंख्य गुणानुरागियों की स्मृति में उनकी छवि महाअरण्य की माँ, जनांदोलनों की माँ ,हजार चौरासी की माँ के रूप अटूट रहेगी, ऐसा मेरा विश्वास है।

महाश्वेता देवी को पहली बार 1993 में तब देखा, जब लेखन से मेरा दूर-दूर तक न कोई संपर्क था और न ऐसा होने की कोई संभावना ही थी। आज के रोहित वेमुला की भांति 1993 में जब शबर समाज की पहली ग्रेजुएट युवती चुन्नी कोटाल को मनुवादियों ने आत्म हत्या के लिए विवश किया था, तब कोलकाता के एस्प्लानेड में जो शोकसभा हुई थी, उसमें उनकी मुखरता देख कर मैं मुग्ध हुए बिना नहीं रह सका। परवर्तीकाल में जब मैंने अपने मोक्ष-पिपासु मित्र गोसाइ जी के छः पृष्ठीय पत्र का जवाब देने के लिए सन 2000 जो 674 पृष्ठीय ‘आदि भारत मुक्ति : बहुजन समाज (हिन्दू साम्राज्यवादियों के खिलाफ मूलनिवासियों के संघर्ष की दास्तान)’लिखा, उसके 12 वें अध्याय ’प्रचारतंत्र और बहुजन समाज’ के पृष्ठ 441 पर उनके सम्मान में यह लिखे बिना न रह सका- ‘प्रेमचंद और शरत चटर्जी के पदचिन्हों पर चलते हुए महाश्वेता देवी ने आदि भारतीय सभ्यता संस्कृति को विदेशागत आर्य आक्रमणकारियों से सुरक्षित रखने के उद्देश्य से जंगलों और पहाड़ों की कंदराओं में वास करते जनजाति समाज की समस्यायों को, जंगलों के घने अन्धकार से बाहर लाना अपने जीवन का ध्येय बनाया। अरण्य अधिकारियों के अधिकारों के अधिकार हनन या उत्पीड़न के विरुद्ध आवाज बुलंद करने में वृद्धावस्था में भी उन्हें अग्रिम पंक्ति में देखा जा सकता है।’

Harriet Stowe

हैरियट बीचर स्टो

वास्तव में महाश्वेता देवी ने जिस तरह अपना रचना कर्म मुख्यतः आदिवासियों पर केन्द्रित रखा, उसने उन्हें मुख्यधारा के साहित्यकारों के मध्य एक अलग सम्मान देने के लिए मुझे प्रेरित किया। मुख्यधारा के हिन्दू साहित्यकारों की यथास्थितवादी सोच पर तो मुझे करुणा होती ही रही है, किन्तु इस बात से मेरा मन बराबर खिन्न होता रहा है कि इस देश का कोई साहित्यकार अमेरिकी  साहित्यकार हैरियट बीचर स्टो की भूमिका में क्यों नहीं अवतरित हो पाया? मैं इस बात से आज भी खिन्न होता होता हूं कि तालस्ताय, गोर्की इत्यादि साहित्यकारों से प्रेरणा लेने वाले भारतीय प्रभुवर्ग के साहित्यकार हैरियट का भूले से भी जिक्र नहीं करते, जबकि उनकी ‘अंकल टॉम्स केबिन’ ने ‘माँ,’ ‘टवार एंड पीस’ सहित दुनिया की अन्यान्य क्लासिक रचनाओं के मुकाबले मानव जाति पर कई गुना असर डाला है! 1852 में प्रकाशित हैरियट की ‘अंकल टॉम्स’ केबिन से ही प्रेरित हो कर मानव जाति के इतिहास का सर्वश्रेष्ठ युद्ध ‘अमेरिकी गृह-युद्ध’ संगठित हुआ, जिसमें अमेरिकी गोरों ने उठा लिया था हाथों में बन्दूक अपने ही उन भाइयों के खिलाफ, जिनमें वास कर रही थी उनके उन पुरुखों की आत्मा, जिन्होंने कालों का पशुवत इस्तेमाल कर मानवता को शर्मसार किया था। इस हथियार उठाने के परिणाम स्वरूप ही 1865 में अमेरिकी संविधान के तेरहवें संशोधन द्वारा अमानवीय दास-प्रथा का अवसान हुआ। हैरियट की उस रचना ने अमेरिकी प्रभुवर्ग को प्रायश्चित के लिए तो प्रेरित किया ही, यूरोप के फ्यूडल भी इसके प्रभाव से सेर्फों को आजाद करने में होड़ लगाने लगे।

हैरियट स्टो जन्मजात लेखिका नहीं, एक श्वेत अमेरिकी पादरी की पुत्री और सामान्य गृहिणी थीं, किन्तु नीग्रो स्लेवरी के तहत अश्वेतों की दुर्दशा देखकर कलम थाम लीं। चूँकि उनके कलम थामने का एक मेन मकसद दास-प्रथा से अश्वेतों को मुक्ति दिलाना रहा, इसलिए ताउम्र वह अपना रचना कर्म सिर्फ और सिर्फ अश्वेतों की दुर्दशा पर केन्द्रित रखीं। इसी क्रम में दास-प्रथा विरोधी ‘ड्रेड : ए टेल ऑफ़ द ग्रेट डीस्मल स्वाम्प’, दी पर्ल ऑफ़ ओर्स आइलैंड’,  ‘ओल्ड टाउन फोक’ रचनाओं का सिलसिला अटूट रखा। किन्तु ‘अंकल टॉम्स’ जैसा प्रभाव किसी और में पैदा न हो सका। हैरियट स्वयं इस कृति से इतना अभिभूत रहीं कि उन्होंने कह डाला ‘अंकल टॉम्स’ मैंने नहीं गॉड ने लिखा है।

उनकी रचनाओं ने संगदिल गोरों में करुणा का झरना बहा दिया। कुदरत ने हैरियट में साहित्यिक प्रतिभा कम, एक मानवीय संवेदना का विशाल ह्रदय दिया था, जिसका दर्शन अंततः हिन्दू साहित्यकारों में नहीं मिलता। डॉ. आंबेडकर ने साबित किया है कि गुलामी की तुलना में अस्पृश्यता ज्यादा बदतर है और यह अस्पृश्यता भारतीय प्रभुवर्ग के साहित्यकारों को स्पर्श नहीं कर पायी। अगर इनको हैरियट का संवेदनापूर्ण ह्रदय मिला होता तो गले में थूकदानी और कमर में झाड़ू लटकाए मानवेतरों की करुणतर स्थिति जरुर स्पर्श करती और दलितों की अस्पृश्यता मोचन के लिए इनमें से कोई जरुर हैरियट स्टो की भूमिका में अवतरित होता। लेकिन प्रभुवर्ग में ऐसा कोई भी साहित्यकार पैदा नहीं हुआ, जो अपना रचना कर्म सिर्फ और सिर्फ दलित मुक्ति पर केन्द्रित रखता। दलित इनके लिए रचना में वैविध्य लाने की सामग्री मात्र रहे। इस मामले में एक मात्र कुछ हद तक अपवाद बनीं महाश्वेता देवी। उन्होंने अस्पृश्यों की तो उपेक्षा की, किन्तु अपना रचना कर्म अस्पृश्यों की भाँति ही शोषित, उपेक्षित आदिवासियों पर केन्द्रित कर भारत की हैरियट स्टो बन गयीं। जिस तरह हैरियट स्टो कालों को दास-प्रथा से निजात दिलाने के ले लिए तन-मन-धन से उनके साथ जुड़ गयीं, वही काम भारत में महाश्वेता देवी ने आदिवासियों के लिए किया।

nelson-mandela-president-jnanpith-award-devi-mahaswetaमहाश्वेता देवी ने सिर्फ भारत के आदिवासियों की मुक्ति के लिए लेखन ही नहीं किया, इससे आगे बढ़कर वे उनके सुख-दुःख में इस हद तक शामिल हो गयीं कि कुलीन परिवार में जन्म लेकर भी उनके बीच खैनी, बीडी का बेहिचक इस्तेमाल करने लगीं। उन्होंने अपने साथ–साथ आदिवासियों की बेहतरी के लिए काम करने के ढेरों ख्यात-अख्यात संस्कृतिकर्मियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को जोड़ा। किन्तु सामंतवाद, साम्राज्यवाद विरोध के साथ ही किसानों और आदिवासियों के अधिकारों के लिए अक्लांत संघर्ष चलाने वालीं महाश्वेता देवी में बंगाल के साहित्य सम्राट बंकिम चटर्जी, शरत चटर्जी, ताराशंकर बंदोपाध्याय, विभूति बंदोपाध्याय, माणिक बंदोपाध्याय, विमल मित्र इत्यादि की भाँति ही सामाजिक न्याय की दृष्टि का नितांत अभाव रहा। 33 वर्ष कला और संस्कृति पोषिका बंग-भूमि में रहने के दौरान इस लेखक पर बांग्ला साहित्य का जो प्रभाव पड़ा, उससे हिंदी पट्टी के साहित्य के प्रति कभी श्रद्धा पैदा न हो सकी। किन्तु मंडल उत्तर काल में जिस तरह हिंदी पट्टी के साहित्य में सामाजिक न्याय का उच्च उद्घोष सुनाई पड़ रहा, बांग्ला साहित्य काफी परिपक्व होने के बावजूद अब बहुत पिछड़ा हुआ लगता है। वहां का साहित्य पढने पर लगता है कि यह दुनिया के एक मात्र जाति समाज भारत नहीं, किसी श्रेणी समाज का साहित्य है।

बहरहाल सामाजिक न्याय की दृष्टि के अभाव के चलते महाश्वेता देवी डॉ. आंबेडकर की भाँति इस बात को नहीं समझ सकीं कि आदिवासियों की समस्या की जड़ें जाति-प्रथा से जुड़ी हैं। जाति-प्रथा में विश्वास के कारण ही हिन्दू अनार्य आदिवासियों को न तो इसाई मिशनरियों की भांति उनका जीवन समुन्नत बनाने में रूचि लिए और न ही परिजनों की भांति अपनापन का भाव प्रदर्शित किया ;विपरीत इसके निर्ममता से उनका शोषण किया। अगर उन्होंने आदिवासी समस्या के समाधान के लिए आंबेडकर की दृष्टि उधार लिया होता, शायद उनका प्रयास बेहतर परिणाम दिया होता। एक खास नजरिये से आदिवासी समस्या को देखने के कारण, वह इक्कीसवीं सदी के आदिवासियों की आकांक्षा की उपलब्धि न कर सकीं। इसलिए वह झारखण्ड के आधुनिक आदिवासी प्रोफेसर राम दयाल मुंडा की भांति इस बात की पुरजोर वकालत न कर सकीं कि आदिवासियों को बिजली और आधुनिक जीवन शैली की सुविधाएं मिले; वे भी कोट-टाई लगा कर हवाई-यात्रा करें और कारों में सवार होकर शॉपिंग मॉल में जायें। सामाजिक न्याय की दृष्टि के अभाव में ही वह आदिवासियों के बीच काम करने वाले मध्यम वर्ग के एनजीओ वालों की भांति उन्हें ‘प्राकृतिक परिवास’ में रखने की वकालत प्रायः पूरी आस्था से करती रहीं ।

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2 Comments

  1. ओमप्रकाश Reply
  2. umesh prasad bhagat Reply

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