हिंदू जातिवाद के कारण बना पूर्वी पाकिस्तान

जहां पारंपरिक रूप से मुस्लिम लीग को बंगाल के विभाजन के लिए दोषी ठहराया जाता रहा है, वहीं आंबेडकर के इस सम्बन्ध में अलग विचार थे। बता रहे हैं एके बिस्वास

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आंबेडकर (प्रथम पंक्ति, बायें से दूसरे) व जोगेंद्र नाथ मंडल (प्रथम पंक्ति, दायें से तीसरे), जो आगे चल कर पाकिस्तान के संस्थापकों में से एक बने

सन 1905 में बंगाल के पूर्वी और पश्चिमी बंगाल में विभाजन के पश्चात एक बड़ा राजनीतिक आंदोलन शुरू हो गया। गवर्नर जनरल लार्ड कर्जन द्वारा लागू किए गए प्रशासनिक सुधारों का बंगालियों ने व्यापक विरोध किया। उन्होंने यह आरोप लगाया कि ब्रिटिश शासकों ने बंगाली हिन्दुओं और मुसलमानों, जिनकी मातृभाषा तो एक थी ही, जिनकी सांझा सांस्कृतिक पहचान भी थी, की एकता को तोड़ने का प्रयास किया है। परन्तु आंबेडकर ने अपनी पुस्तक ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’(1941) में इस घटनाक्रम का गहराई से विश्लेषण कर इसका दूसरा पक्ष प्रस्तुत किया। कट्टरपंथियों की ओर से कड़े विरोध की आशंका के बावजूद उन्होंने लिखा, “बंगाली हिन्दुओं के लिए पूरा बंगाल, बिहार, उड़ीसा, असम और यहां तक कि उत्तरप्रदेश भी चारागाह था। उन्होंने इन राज्यों की सभी सरकारी सेवाओं पर एकछत्र राज कायम कर लिया था। विभाजन का अर्थ था उनके इस चारागाह के आकार में कमी; इसका अर्थ था कि पूर्वी बंगाल से बंगाली हिन्दू बाहर हो जाएंगे और उनका स्थान लेंगे बंगाली मुसलमान, जिनके लिए अब तक सरकारी सेवाओं में कोई स्थान न था। बंगाल के विभाजन का विरोध मुख्यतः बंगाली हिन्दुओं ने किया, जिन्हें यह बिलकुल मंजूर नहीं था कि पूर्वी बंगाल में उनका स्थान मुसलमान लें’।[1]

इस 380-पृष्ठीय पुस्तक में साफ शब्दों में यह कहा गया है कि ऊंची जातियों के हिन्दुओं ने, हिन्दू आमजनों का नेतृत्व किया और हिन्दू जनमत को आकार दिया। ‘‘दुर्भाग्यवश, हिन्दुओं के लिए ऊंची जाति के हिन्दू बुरे नेता थे।’’ उनका ‘‘चरित्र ही ऐसा है कि वे हिन्दुओं को मुसीबत की ओर ले जाते हैं और उनके इस चरित्र का कारण है हर चीज पर कब्जा करने की उनकी लिप्सा और जीवन की अच्छी चीजों को दूसरों के साथ बांटने की उनकी अनिच्छा। शिक्षा और संपत्ति पर तो उनका एकाधिकार था ही, वे राज्य पर भी कब्जा कर लेना चाहते थे। हर चीज पर एकाधिकार जमाना उनके जीवन की एकमात्र महत्वाकांक्षा और लक्ष्य था। वर्गीय वर्चस्व के इस स्वार्थी विचार से प्रेरित उनके हर कदम का उद्देश्य हिन्दुओं के निचले वर्गों को सम्पत्ति, शिक्षा और सत्ता से दूर रखना है और इसके लिए सबसे प्रभावकारी हथियार हैं धर्मग्रंथ, जो हिन्दुओं के निचले वर्गों के दिमाग में यह भर देते हैं कि उनका एकमात्र कर्तव्य उच्च वर्गों की सेवा करना है। अपने एकाधिकार को कायम रखने और निचले वर्गों को सम्पत्ति, सत्ता और शिक्षा से दूर रखने में उच्च जातियों के हिन्दुओं को लंबे समय से आशातीत सफलता मिलती रही है।’’[2]

क्या आंबेडकर स्थिति की ठीक व्याख्या कर रहे थे या वे बंगाली ऊँची जातियों पर बेजा आरोप लगा रहे थे? बंगाल सरकार में विभिन्न पदों पर काबिज व्यक्तियों की जाति, नस्ल या धर्म का विवरण हमें सही स्थिति से परिचित करवाएगा। सन 1901 में बंगाल सरकार में 492 डिप्टी मजिस्ट्रेट थे, जिनमें से 122 ब्राह्मण, 70 वैद्य, 144 कायस्थ और 67 मुस्लिम थे। सरकार के 387 सब-जजों और मुन्सिफों में से 136 ब्राह्मण, 40 वैद्य, 160 कायस्थ और 20 मुसलमान थे। साठ पुलिस इंस्पेक्टरों में से 15 ब्राह्मण, 5 वैद्य, 24 कायस्थ और 4 मुसलमान थे। शिक्षा अधिकारियों में ब्राह्मणों की संख्या 46, वैद्यों की 13, कायस्थों की 48 और मुसलमानों की 9 थी।[3] बंगाल सरकार में कुल 181 शिक्षाधिकारी थे। ये सरकारी अधिकारी अपने विचारों, इरादों और कार्यों से सार्वजनिक जीवन पर गहरा प्रभाव डालते थे। सुसंग के महाराज ने 19वीं सदी में औपनिवेशिक शासकों से यह वायदा ले लिया था कि ‘‘दुर्गापुर का मुन्सिफ, ब्राह्मण ही होना चाहिए’’। आईसीएस अधिकारी और जानेमाने बंगाली साहित्यकार आनंद शंकर रे ने इस शर्मनाक समझौते की चर्चा अपने संस्मरणों में की है।[4] देशी विधिक अधिकारी, जिन्हें हिन्दू ‘जज पंडित’कहते थे, अपनी शक्तियों का घोर दुरूपयोग करते थे। मुकदमे जूरी की मौजूदगी में चलाए जाते थे। जूरी की व्यवस्था भारत में 19वीं सदी से लेकर 1964 तक रही। इस व्यवस्था का उपयोग सभी प्रांतों में जातिगत और सांप्रदायिक हितों की रक्षा करने के लिए किया गया। जूरी के अधिकांश सदस्य ऊँची जातियों के हुआ करते थे और वे अपनी जाति के लोगों का ही साथ देते थे।

बंगाली हिन्दुओं के बारे में आंबेडकर के विचार सामने आने के लगभग छः दशक पहले कलकत्ता से निकलने वाले एक बहुप्रसारित अंग्रेज़ी दैनिक ‘द इंग्लिशमेन’ने 27 नवंबर, 1879 के अपने अंक में लिखाः

‘‘बिहार में लगभग हर ऐसा पद जो महत्वपूर्ण है, बंगालियों के हाथों में है और अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण पदों में भी उनका खासा हिस्सा है…भागलपुर दरभंगा, गया, मुज़फ्फरपुर, सारन, शाहबाद और चम्पारण जिलों में 25 डिप्टी मजिस्ट्रेटों और कलेक्टरों में से 20 बंगाली हैं। दोनों कमिश्नरों के निजी सचिव बंगाली हैं। पटना के 7 में से 6 मुन्सिफ बंगाली हैं। सारन के 4 में से 3 मुन्सिफ बंगाली हैं। आधे से ज्यादा सब-डिप्टी बंगाली हैं…10 में से 9 मेजिस्ट्रेसी और कलेक्टोरेटों में ज्यूडिशियल हैड क्लर्क बंगाली हैं। यह स्थिति न केवल जिला मुख्यालयों में है वरन सब-डिवीजनों में भी यही हालात हैं। सरकारी कोषालयों में बंगालियों की भीड़ है और वे ही नगरपालिकाओं का संचालन कर रहे हैं। दस में से 9 डिस्पेंसरियों के प्रभारी असिस्टेंट सर्जन और डाक्टर बंगाली हैं। अकेले पटना में 8 बंगाली गजटेड चिकित्सा अधिकारी हैं। जो थोड़े बहुत भारतीय इंजीनियर हैं, वे सब बंगाली हैं। पथकर अकांउटेंट, ओवरसियर और लिपिकों में तीन चैथाई बंगाली हैं। सभी ढंग के शहरों और कस्बों में पोस्टमास्टर और पर्यवेक्षण करने वाले अधिकारी बंगाली हैं…अगर बिहारी कभी कोई नौकरी पा पाता है, तो वह ऐसे पद पर होता है, जिसे बंगाली स्वीकार करना नहीं चाहते। अगर कोई सुशिक्षित बिहारी आगे बढ़ना शुरू करता है तो ऐसा आरोपित है कि उसके हर काम की बंगाली हैड क्लर्कों, डिप्टी कलेक्टरों और निजी सचिवों द्वारा गहन विवेचना की जाती है और हर गलती को अंग्रेज़ अधिकारियों की नज़र में लाया जाता है।’’[5]

‘द इंग्लिशमेन’ ने बिना किसी लाग लपेट के कहा कि ‘‘वे (बंगाली) उतने ही विदेशी और घुसपैठिये हैं, जितने कि हम’’।

एक बंगाली समाचारपत्र ने 3 मार्च, 1838 के अपने अंक में लिखा कि बंगाल की सरकार ने उड़ीसा के कटक जिले में 24 डिप्टी मजिस्ट्रेटों की नियुक्ति की है। उनमें से 18 पहले से ही वहां तैनात थे। अधिकांश की शिक्षा कलकत्ता में हुई थी और वे बंगाली थे।[6] जानेमाने बंगाली बुद्धिजीवी निरद सी चौधरी ने यह स्वीकार किया कि कलकत्ता के रक्षा लेखा विभाग में उनकी नियुक्ति भाई-भतीजावाद के चलते ही हुई थी। इस भाई भतीजावाद का अलिखित नियम यह था कि ‘‘एक चटर्जी, एक बेनर्जी की नियुक्ति करता है और एक मित्रा, एक बोस की’’। उन्होंने इस बारे में संदेह की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी कि बंगाल, बिहार, उड़ीसा और असम में सरकारी भर्तियों में किसका बोलबाला है। बंगालियों के अतिरिक्त उस काल में कोई भी अन्य व्यक्ति सरकारी पद पाने की आशा नहीं रख सकता था।

कलकत्ता में 31 जनवरी, 1929 को साईमन कमीशन ने आल बेंगाल डिप्रेस्ड क्लासेस एसोसिएशन व आल बेंगाल नामशूद्र एसोसिएशन के प्रतिनिधि मंडल की सुनवाई की। कमीशन को बताया गया कि ढाका सिविल कोर्ट में लिपिकों की नियुक्ति में एक अधिकारी के मैट्रिकुलेट पुत्र और एक हैड क्लर्क के पूर्वस्नातक साले को पिछड़ी वर्गों के स्नातकों पर प्राथमिकता दी गई। ढाका संभाग में उपपंजीयकों की नियुक्ति में पिछड़े वर्ग के एक एमए पास उम्मीदवार को नज़रअंदाज कर, बीए पास एक कायस्थ को नियुक्त किया गया। इस प्रतिनिधिमंडल ने साईमन आयोग के सामने कंट्रोलर ऑफ़  करेन्सी, बंगाल और बंगाल के महालेखाकार के कार्यालयों में भर्ती में भाई-भतीजावाद और पक्षपात के कई उदाहरण दिए। [7]

Dr. BR Ambedkar at the inspection of Kolkata Employement Exchange. Seen in the photograph are Bengal's Govt. Labour Commissioner A Huegus and assistant Commissioner S Lal. *** Local Caption *** Dr. BR Ambedkar at the inspection of Kolkata Employement Exchange. Seen in the photograph are Bengal's Govt. Labour Commissioner A Huegus and assistant Commissioner S Lal. Express archive photo

कलकत्ता रोज़गार कार्यालय का निरीक्षण करते डॉ बी.आर. आंबेडकर. साथ हैं बंगाल सरकार के श्रमायुक्त ए. ह्यूगस और सहायक आयुक्त एस. लाल

यहां मुख्य मुद्दा केवल रोज़गार का नहीं था बल्कि सरकारी पद पर नियुक्ति से सत्ता के गलियारों तक मिलने वाली पहुंच का था। और इसलिए सत्ता के गलियारों और शासन तंत्र में अछूतों के प्रवेश का हमेशा से प्रतिरोध होता रहा। गुजरा ज़माना उतना सुनहरा नहीं था जितना कि इतिहासकार हमें बताते हैं। मुजीबुर रहमान ने लिखा ‘‘सरकारी और वाणिज्यिक कार्यालयों में यह आम शिकायत है कि जहां भी हिन्दू कर्मचारियों का प्रभाव है वहां किसी भी बंगाली मुसलमान के लिए नौकरी पाना लगभग असंभव है। हमारे हिन्दू भाई सार्वजनिक रूप से यह कहते हैं कि सरकारी सेवाओं में नियुक्ति के मामले में जाति या धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए परंतु जब नियुक्ति देने का समय आता है, और अगर हिन्दुओं की इसमें निर्णायक भूमिका होती है, तो दबेछिपे ढंग से भेदभाव किया जाता है और मुसलमानों को बाहर रखा जाता है। ऐसे कई विभाग हैं जिनके दरवाजे मुसलमानों के लिए बंद हैं। व्यापारिक कार्यालयों में अगर बड़ा बाबू हिन्दू है तो लगभग सभी पदों पर इस समुदाय का एकाधिकार होता है।’’[8]

डा. आंबेडकर ने 1941 में लिखा कि बंगाल में मुसलमानों की आबादी 2.74 करोड़ और हिन्दुओं की 2.15 करोड़ है। दूसरे शब्दों में, मुसलमानों की आबादी हिन्दुओं से 12 प्रतिशत ज्यादा है। उन्होंने पंजाब में भी लगभग यही स्थिति पाई और उनका अंतिम निष्कर्ष यह था कि ‘‘मुझे ऐसा लगता है कि समय आ गया है कि बंगाल और पंजाब के ऊंची जातियों के हिन्दुओं को यह बता दिया जाना चाहिए कि अगर वे पाकिस्तान का विरोध इस आधार पर करने जा रहे हैं कि इससे उनके रोजगार में कमी आएगी तो वे भारी भूल कर रहे हैं…।’’ उन्होंने आगे लिखा, ‘‘मुस्लिम बहुसंख्यकों के अधीन रहकर अपने हिस्से से ज्यादा पाने की आशा रखना साहस का काम हो सकता है परंतु निश्चय ही यह बुद्धिमत्ता नहीं है क्योंकि संभावना यही है कि आप सब कुछ खो बैठेंगे।‘‘

जनसांख्यिकीय आंकड़े मुस्लिम वतन के पक्ष में थे

कोई भी समुदाय अंनत काल तक अपमान, वंचना और भेदभाव नहीं झेल सकता। वंचना के प्रति शिकायत क्रोध में बदल जाती है। शिकायतों को दूर करने के लिए यदि निष्पक्ष और न्यायपूर्ण हस्तक्षेप नहीं किया जाता तो विरोध प्रदर्शन और हिंसा होते हैं। भारत की सन् 1901 की जनगणना के आंकड़ों से जातीय पूर्वग्रहों और घृणा की जो सामाजिक-राजनीतिक कीमत अदा करनी होती है, उसकी झलक मिलती हैः ‘‘नामशूद्रों की आबादी लगभग 18,861,000 है और पोड की लगभग पांच लाख। पंरतु इन दोनो की वास्तविक आबादी का पता इसलिए नहीं चलता क्योंकि इन जातियों के सदस्यों ने बड़ी संख्या में इस्लाम कबूल कर लिया है…। ढाका और चिटगांव संभागों में लगभग 1 करोड़ 5 लाख मुसलमान हैं…। यह कहना गलत नहीं होगा कि इनमें से कम से कम 90 लाख इन जातियों के हैं।’’[9] अछूत, नामशूद्र और पोड ‘‘सामाजिक कोढी’’ थे। हिन्दुओं की अनवरत प्रताड़ना के चलते उनके सामने इस्लाम को अंगीकार करने के सिवाय कोई रास्ता नहीं था।

बंगाल के ऊंची जातियों के हिन्दुओं ने कभी इस प्रश्न पर विचार नहीं किया कि जातिगत श्रेष्ठता के भाव और अछूत प्रथा व नीची जातियों के प्रति हिंसा की उन्हें क्या राजनैतिक कीमत चुकानी पड़ी। डा. आम्बेडकर ने बंगाल के जनसांख्यिकीय यथार्थ की विवेचना की। बंगाल में मुसलमानों की आबादी 27,497,624 और हिन्दुओं 21,570,407 थी। इन मुसलमानों में उर्पयुक्त अछूत जातियों की संख्या 90,00,000 थी। सन् 1901 से लेकर सन् 1947 तक इनकी संख्या में वृद्धि होती रही और इससे बंगाल में मुस्लिम वतन के समर्थकों की संख्या बढ़ती गई। पूर्वी पाकिस्तान के निर्माण का श्रेय हिन्दू उच्च जातियों के नेताओं को जाता है परंतु शायद वे इस तथ्य को स्वीकार करने में शर्मिंदगी महसूस करते हैं।

 

[1] आम्बेडकर, बीआर, थाट्स आन पाकिस्तान, ठाकर एंड कंपनी लिमिटेड, बंबई, 1941, पृष्ठ 118

[2] वही, पृष्ठ 117-118

[3] भारत की जनगणना, 1901, खण्ड 6, भाग 1, पृष्ठ 506

[4] रे, आनंद शंकर, एन ओल्ड स्टोरी, द स्टेट्समेन, फेस्टिवल, 1991, कलकत्ता पृष्ठ 51

[5] द इंग्लिशमेन, कलकत्ता, 27 नवंबर 1879

[6] बंदोपाध्याय, बृजेन्द्र नाथ, संबादपत्रे सेकालेर कथा, बंगीय साहित्य परिषद, कलकत्ता 1948, पृष्ठ 386

[7] विश्वास, एके, द नामशूद्रास ऑफ़ बेंगाल, प्रोफाइल ऑफ़ ए पर्सिक्यूटिड पीपुल, ब्लूमून बुक्स, दिल्ली, 2000, पृष्ठ 84-85

[8] रहमान, मुजीबुर, इंडियन यूनिटी एज एविडेंसड बाय हिन्दू-मुसलमान रिलेशन्स इन बेंगाल, द हिन्दुस्तान रिव्यू, खण्ड 18, जुलाई-दिसंबर 1908, पृष्ठ 423-424।

[9] भारत की जनगणना, 1901, खण्ड 6, पृष्ठ 396

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