हिंदू जातिवाद के कारण बना पूर्वी पाकिस्तान

जहां पारंपरिक रूप से मुस्लिम लीग को बंगाल के विभाजन के लिए दोषी ठहराया जाता रहा है, वहीं आंबेडकर के इस सम्बन्ध में अलग विचार थे। बता रहे हैं एके बिस्वास :

सन 1905 में बंगाल के पूर्वी और पश्चिमी बंगाल में विभाजन के पश्चात, कलकत्ता और बंगाल प्रेसीडेंसी के अन्य शहरों में एक बड़ा राजनैतिक आंदोलन शुरू हो गया। इसी विभाजन के साथ, बिहार और  उड़ीसा भी अस्तित्व में आये और बिहार और बंगाल के लोगों ने, बंगाली भद्रलोक के वर्चस्व से अपनी मुक्ति का जश्न मनाया। यह वर्चस्व  उनके गले कीं फाँस था और उससे उनका भौतिक और आध्यात्मिक विकास बाधित हुआ था।

आंबेडकर (प्रथम पंक्ति, बायें से दूसरे) व जोगेंद्र नाथ मंडल (प्रथम पंक्ति, दायें से तीसरे), जो आगे चल कर पाकिस्तान के संस्थापकों में से एक बने

गवर्नर जनरल लार्ड कर्जन द्वारा लागू किए गए प्रशासनिक सुधारों का कलकत्ता में प्रमुख बंगाली नेताओं के नेतृत्व में व्यापक विरोध हुआ। उन्होंने यह आरोप लगाया कि ब्रिटिश शासकों ने बंगाली हिन्दुओं और मुसलमानों, जिनकी मातृभाषा तो एक थी ही, जिनकी सांझा सांस्कृतिक पहचान भी थी, की एकता को तोड़ने का प्रयास किया है। परन्तु आंबेडकर ने अपनी पुस्तक “”थॉट्स ऑन पाकिस्तान”(1941) में इस घटनाक्रम का गहराई से विश्लेषण कर इसका दूसरा पक्ष प्रस्तुत किया। उन्होंने लिखा :

“बंगाली हिन्दुओं के लिए पूरा बंगाल, बिहार, उड़ीसा, असम और यहां तक कि उत्तरप्रदेश भी चारागाह था। उन्होंने इन राज्यों की सभी सरकारी सेवाओं पर एकछत्र राज कायम कर लिया था। विभाजन का अर्थ था उनके इस चारागाह के आकार में कमी। इसका अर्थ था कि पूर्वी बंगाल से बंगाली हिन्दू बाहर हो जाएंगे और उनका स्थान लेंगे बंगाली मुसलमान, जिनके लिए अब तक सरकारी सेवाओं में कोई स्थान न था। बंगाल के विभाजन का विरोध, मुख्यतः बंगाली हिन्दुओं ने किया, जिन्हें यह बिल्कुल मंजूर नहीं था कि पूर्वी बंगाल में उनका स्थान मुसलमान लें।[1]

अपनी शर्मिदगी को छुपाने के लिए ऊंची जातियों के हिन्दू लार्ड माउंटबैटन (मध्य), ब्रिटिश सरकार की फूट डालो और राज करो की नीति और मोहम्मद अली जिन्ना (दाहिने) को देश के विभाजन के लिए दोषी ठहराते हैं

जहाँ तक विभाजन के सम्बन्ध में सामान्य धारणा का प्रश्न है, आंबेडकर की 380 पृष्ठ की पुस्तक में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ऊंची जाति के हिन्दूए आम हिन्दुओं को बहकाकर, उनकी भावनाओं को गलत दिशा में ले जाते थे। हिन्दुओं का एक बहुत छोटा सा तबका उनकी ओर से बोलता था। इन लोगों का यह दावा था कि वे आम हिन्दुओं के नेता हैं परन्तु सच यह है कि वे केवल वही बात कहते थे, जो उनके हित में होती थी और उसे हिन्दुओं की राय बताते थे। सन 1928 में ‘आल बंगाल नामशूद्र एसोसिएशन’ ने सर जॉन साइमन की अध्यक्षता वाले आयोग को संबोधित ज्ञापन में “जनता के स्वर्ग से अवतरित संरक्षक” बनकर आम लोगों के निर्णय लेने के अधिकार को उनसे छीनने के लिए ऊंची जातियों की कड़ी निंदा की। नामशूद्रों का कहना था कि ऊंची जातियों की, जनता की भलाई में कोई रूचि नहीं है।

 अच्छी चीजों को दूसरों के साथ बांटने की अनिच्छा

“आंबेडकर के अनुसार, दुर्भाग्यवश ऊंची जातियों की हिन्दू उतने ही बुरे हैं जितने कि उनके नेता। उनका चरित्र ही ऐसा है कि वे हिन्दुओं को मुसीबत की ओर ले जाते हैं और उनके इस चरित्र का कारण है हर चीज पर कब्जा करने की उनकी लिप्सा और जीवन की अच्छी चीजों को दूसरों के साथ बांटने की अनिच्छा। शिक्षा और संपत्ति पर तो उनका एकाधिकार था ही, वे राज्य पर भी कब्जा कर लेना चाहते थे। हर चीज पर एकाधिकार जमाना उनके जीवन की एकमात्र महत्वाकांक्षा और लक्ष्य था। वर्गीय वर्चस्व के इस स्वार्थी विचार से प्रेरित उनके हर कदम का उद्देश्य हिन्दुओं के निचले वर्गों को सम्पत्ति, शिक्षा और सत्ता से दूर रखना था और इसके लिए सबसे प्रभावकारी हथियार थे धर्मग्रंथ, जो हिन्दुओं के निचले वर्गों के दिमाग में यह भर देते हैं कि उनका एकमात्र कर्तव्य उच्च वर्गों की सेवा करना है। अपने एकाधिकार को कायम रखने और निचले वर्गों को सम्पत्ति, सत्ता और शिक्षा से दूर रखने में उच्च जातियों के हिन्दुओं को लंबे समय से आशातीत सफलता मिलती रही है।‘‘[2] 

अपनी “थॉट्स ऑन पाकिस्तान” में आंबेडकर ने बंगाली हिदुओं की “हर चीज़ पर कब्ज़ा करने की लिप्सा और जीवन की अच्छी चीज़ों को दूसरों के साथ बांटने की अनिच्छा” की प्रवृत्ति की आलोचना की

क्या आंबेडकर स्थिति की ठीक व्याख्या कर रहे थे या वे बंगाली ऊँची जातियों पर बेजा आरोप लगा रहे थे? बंगाल सरकार में विभिन्न पदों पर काबिज व्यक्तियों की जाति, नस्ल या धर्म का विवरण हमें सही स्थिति से परिचित करवाएगा। सन 1901 में बंगाल सरकार में 492 डिप्टी मजिस्ट्रेट थे, जिनमें से 122 ब्राह्मण, 70 वैद्य, 144 कायस्थ और 67 मुस्लिम थे। सरकार के 387 सब-जजों और मुन्सिफों में से 136 ब्राह्मण, 40 वैद्य, 160 कायस्थ और 20 मुसलमान थे। साठ पुलिस इंस्पेक्टरों में से 15 ब्राह्मण, 5 वैद्य, 24 कायस्थ और 4 मुसलमान थे। बंगाल सरकार के कुल 181 शिक्षा अधिकारियों में ब्राह्मणों की संख्या 46, वैद्यों की 13, कायस्थों की 48 और मुसलमानों की 9 थी।[3]  ये सरकारी अधिकारी अपने विचारों, इरादों और कार्यों से सार्वजनिक जीवन पर गहरा प्रभाव डालते थे। उनकी सत्यनिष्ठा पर प्रश्नचिन्ह लगाये बगैर हम उस समझौते को देख सकते हैं जो सुसंग के महाराज ने 19वीं सदी में औपनिवेशिक शासकों के साथ किया था। इससे महाराज की जातिगत प्राथमिकताओं का पता चलता है। समझौते में कहा गया था कि “दुर्गापुर का मुन्सिफ, ब्राह्मण ही होना चाहिए’’। दुर्गापुर, सुसंग के जमींदार के अधीन था। सुसंग, पूर्वी बंगाल के मेमनसिंग जिले में स्थित था। (https://en.wikipedia.org/wiki/HistoryofMymensingh)। आईसीएस अधिकारी और जानेमाने बंगाली साहित्यकार आनंद शंकर रे ने इस शर्मनाक समझौते की चर्चा अपने संस्मरणों में की है।[4]  ऐसा कोई भी व्यक्ति, जो जाति व्यवस्था को ठीक से समझता है, यह जानता है कि किसी भी हिन्दू की पहली प्राथमिकता उसके जाति का व्यक्ति होती है।

भ्रष्ट जज-पंडित

ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारतीयों को न्यायिक प्रणाली का हिस्सा बनाया था। सन 1773 के रेगुलेशन 12 के अधीन, कंपनी को हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों को न्याय अधिकारी के रूप में नियुक्त करने का अधिकार प्रदान किया गया था। पहले को पंडित कहते थे और दूसरे को काजी। बंगाल में आम बोलचाल की भाषा में पंडित को जज.पंडित कहा जाता था। रेगुलेशन में कहा गया था कि ऐसे व्यक्तियों को इस पद पर नियुक्त किया जाये “जो ईमानदार हों और कानूनों का अच्छा ज्ञान रखते होंण्ण्ण्ताकि वे सत्यनिष्ठा से अपने कर्तव्यों का पालन कर सकें”। उन्हें “उचित ढ़ंग से न्याय प्रदान करने के लिए नियुक्त किया गया था”। परन्तु उनकी अनियंत्रित चरित्रहीनता, दुराचरण, लंपटता और जबरदस्त भ्रष्टाचार ने ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासन को बहुत बदनाम कर दिया और उसके उच्चाधिकारी बैकफुट पर आ गए। पंडित ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, जिन्होंने 19वीं सदी के बंगाल में अनेक समाजसुधार आन्दोलन चलाये थे, ने न्याय करने के लिए नियुक्त इन व्यक्तियों की तीखी आलोचना की।

बांग्ला में लिखे अपने एक निबंध में पंडित विद्यासागर ने कहारू “कुछ समय पहले तक, बंगाल के हर जिले में विभिन्न प्रकरणों में कानून के अनुसार न्याय करने के लिए अदालतों को परामर्श देने हेतु एक पंडित हुआ करता था। उन्हें अदालत का जज-पंडित कहा जाता था। परन्तु ये वेतनभोगी पंडित अत्यंत भ्रष्ट, लोभी, अनैतिक, सिद्धांतविहीन और दुष्ट थे। वे पीठासीन जज को जो भी सलाह देते थे, उसके पीछे उनके निजी स्वार्थ के अलावा कुछ नहीं होता था। दूसरे शब्दों में, वे रिश्वत लेते थे और कभी शास्त्रों के वचनों और आत्मा के अनुरूप काम नहीं करते थे। यद्यपि वे शास्त्रों के असाधारण ज्ञाता थे, तथापि वे मुकदमों में दोनों पक्षों में से उसका साथ देते थे जो उन्हें ज्यादा रकम देता था। उनके घोर दुराचरण, दुराग्रह और अनैतिक व्यवहार से सरकार को इतनी शर्मिंदगी उठानी पड़ी कि उसने उक्त रेगुलेशन को ही रद्द कर दिया और जज-पंडित का पद समाप्त कर दिया गया”। न्याय प्रशासन के अनैतिक, भ्रष्ट और विकृत होने की धारणा के मूल में ये देशी विधि अधिकारी थे। जज-पंडितों में से अधिकांश ब्राम्हण थे। उस समय उन्हें किसी धर्मनिरपेक्ष कानून को लागू नहीं करना होता था। उन्हें अदालतों का पथ प्रदर्शन करने के लिए शास्त्रों की व्याख्या करनी होती थी।[5]  कंपनी द्वारा खड़े किए गए इस संस्थागत ढांचे से किसे लाभ हुआ, यह स्पष्ट है। कंपनी इतनी शर्मिंदा और बदनाम हो गई कि उसने भारतीयों को न्यायालयों में नियुक्त करने की व्यवस्था ही समाप्त कर दी।

ऊँची जातियों की जूरी

जूरी द्वारा मुकदमे की सुनवाई की व्यवस्था, जिसे भारत में 19वीं सदी में शुरू किया गया था और जो सन् 1964 तक जारी रही, का विभिन्न प्रांतों में जातिगत और साम्प्रदायिक हित साधन के लिए जमकर इस्तेमाल किया गया। मुख्यतः ऊँची जातियों के हिन्दुओं को जूरी में नियुक्त किया जाता था और वे केवल अपनी जाति के लोगों का साथ देते थे। हुबली के जिला मजिस्ट्रेट एचजी कुकी ने बर्धमान संभाग के कमिश्नर को भेजी गई अपनी रपट (पत्र क्रमांक 1276 दिनांक अगस्त 9-11, 1890) में बताया कि जूरी की व्यवस्था का दुरूपयोग करने वाले लोग कौन थे और वे ऐसा किस तरह करते थे।

जूरियों के भारतीय सदस्य उन मामलों में आरोपी को दोषसिद्ध घोषित करने के प्रति अनिच्छुक रहते थे, जिन मामलों में उसे मृत्युदंड दिए जाने की संभावना होती थी। परंतु मेरी यह मान्यता है कि यह अनिच्छा सभी मामलों में नहीं होती थी और कुछ अपवादों को छोड़कर, इसका संबंध किसी मनुष्य की जान लेने के प्रति अनिच्छा से नहीं था। विचाराधीन अवधि में एक भी ऐसा वर्ष नहीं गुजरा जिसमें हुबली की किसी जूरी ने किसी आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के अधीन दोषी घोषित न किया हो। परंतु इनमें से किसी भी प्रकरण में आरोपी ब्राह्मण नहीं था और ना ही वह उस “भद्रलोक” वर्ग का सदस्य था, जिसकी कोई सुस्पष्ट परिभाषा नहीं है। मुझे ऐसा लगता है कि किसी मुसलमान या नीची जाति के हिन्दू के मामले में, अन्य परिस्थितियां समान होने पर, जूरी उसके साथ वही व्यवहार नहीं करेगी, जो “भद्रलोक” के साथ किया जाएगा और इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि किसी ब्राम्हण का बरी किया जाना लगभग सुनिश्चित है… मुझे ऐसा लगता है कि जहां तक भद्रालोक का प्रश्न है, बलात्कार, मिथ्या साक्ष्य देने, जालसाजी, धोखाधड़ी या चोरी के मामलों में भी जूरी का रूख यही रहेगा।

सामाजिक दृष्टि से केवल तीन जातियों को भद्रलोक में गिना जाता था – ब्राम्हण, वैद्य और कायस्थ। भद्रलोक शब्द सम्मानीय या सज्जन व्यक्ति का परिचायक नहीं था, बल्कि यह केवल कुछ उच्च जातियों का समूह भर था। जूरियों द्वारा इन तीन जातियों के सदस्यों का आंख बंद कर साथ देने के बावजूद सन् 1911 की जनगणना ने कुछ चौंका देने वाले खुलासे किएः

बंगाल में मुसलमान और हिन्दू दोषसिद्ध अपराधियों की संख्या आबादी में उनके अनुपात के लगभग बराबर है और इसलिए यह कहना गलत होगा कि अपराध किसी समुदाय विशेष की सहजवृत्ति है। हिन्दू अपराधियों में कायस्थों और ब्राम्हणों की संख्या सबसे ज्यादा है। सन् 1911 में जेलों में सजा काट रहे हर दस हजार लोगों में सात कायस्थ और चार ब्राम्हण थे। [6]

बिहार और उड़ीसा में बंगाली भद्रलोक

आंबेडकर के जन्म से भी पहले, कलकत्ता से निकलने वाले एक बहुप्रसारित अंग्रेज़ी दैनिक “द इंग्लिशमेन” ने 7 नवंबर, 1879 के अपने अंक में लिखाः

“बिहार में लगभग हर ऐसा पद, जो महत्वपूर्ण है, बंगालियों के हाथों में है और अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण पदों में भी उनका खासा हिस्सा है… भागलपुर, दरभंगा, गया, मुज़फ्फरपुर, सारण, शाहबाद और चम्पारण जिलों में 25 डिप्टी मजिस्ट्रेटों और कलेक्टरों में से 20 बंगाली हैं। दोनों कमिश्नरों के निजी सचिव बंगाली हैं। पटना के 7 में से 6 मुन्सिफ बंगाली हैं। सारण के 4 में से 3 मुन्सिफ बंगाली हैं। आधे से ज्यादा सब-डिप्टी बंगाली हैं… 10 में से 9 मेजिस्ट्रेसी और कलेक्टोरेटों में ज्यूडिशियल हैड क्लर्क बंगाली हैं। यह स्थिति न केवल जिला मुख्यालयों में है वरन सबडिवीजनों में भी यही हालात हैं। सरकारी कोषालयों में बंगालियों की भीड़ है और वे ही नगरपालिकाओं का संचालन कर रहे हैं। दस में से 9 डिस्पेंसरियों के प्रभारी असिस्टेंट सर्जन और डाक्टर बंगाली हैं। अकेले पटना में 8 बंगाली गजटेड चिकित्सा अधिकारी हैं। जो थोड़े बहुत भारतीय इंजीनियर हैं, वे सब बंगाली हैं। पथकर अकांउटेंट, ओवरसियर और लिपिकों में तीन-चौथाई बंगाली हैं। सभी ढंग के शहरों और कस्बों में पोस्टमास्टर और पर्यवेक्षण करने वाले अधिकारी बंगाली हैं… अगर बिहारी कभी कोई नौकरी पा जाता है, तो वह ऐसे पद पर होता है जिसे बंगाली स्वीकार करना नहीं चाहते। अगर कोई सुशिक्षित बिहारी आगे बढ़ना शुरू करता है तो, ऐसा आरोपित है कि उसके हर काम की बंगाली हैड क्लर्कों, डिप्टी कलेक्टरों और निजी सचिवों द्वारा गहन विवेचना की जाती है और हर गलती को अंग्रेज़ अधिकारियों की नज़र में लाया जाता है।“

“द इंग्लिशमेन” ने बिना किसी लाग लपेट के स्वयं को दोषी ठहराने की हिम्मत दिखाते हुए कहा कि “वे  (बंगाली) उतने ही विदेशी और घुसपैठिये हैं, जितने कि हम”। निर्भीकता से सत्य को उजागर करने का यह गुण भारतीयों में दुर्लभ था।

कलकत्ता रोज़गार कार्यालय का निरीक्षण करते डॉ बी.आर. आंबेडकर. साथ हैं बंगाल सरकार के श्रमायुक्त ए. ह्यूगस और सहायक आयुक्त एस. लाल

एक बंगाली समाचारपत्र ने 3 मार्च, 1838 के अपने अंक में लिखा कि बंगाल की सरकार ने उड़ीसा के कटक जिले में 24 डिप्टी मजिस्ट्रटों की नियुक्ति की है ।[7] उनमें से 18 पहले से ही वहां तैनात थे। अधिकांश की शिक्षा कलकत्ता में हुई थी और वे बंगाली थे। जानेमाने बंगाली बुद्धिजीवी निराद सी चौधरी ने यह स्वीकार किया कि कलकत्ता के रक्षा लेखा विभाग में उनकी नियुक्ति भाई-भतीजावाद के चलते ही हुई थी। इस भाई-भतीजावाद का अलिखित नियम यह था कि “एक चटर्जी, एक बनर्जी की नियुक्ति करता है और एक मित्रा, एक बोस की”।[8]  उन्होंने इस बारे में संदेह की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी कि बंगाल, बिहार, उड़ीसा और असम में सरकारी भर्तियों में किसका बोलबाला है। हमें यह बताया जाता है कि ब्राम्हणों और कायस्थों का सरकारी पदों पर लगभग पूर्ण कब्जा था। उनके अतिरिक्त, औपनिवेशिक काल में, इस प्रेसिडेंसी में कोई भी अन्य व्यक्ति सरकारी पद पाने की आशा नहीं रख सकता था। किसी को यह आश्चर्य हो सकता है कि निराद बाबू भद्रालोक त्रिमूर्ति के तीसरे सदस्य वैद्यों के बारे में चुप्पी क्यों साधे हुए हैं। क्या वे ब्राम्हणों और कायस्थों से कुछ अलग थे? जोगेन्द्र नाथ भट्टाचार्य नाम के एक सम्मानित अध्येता ने उनके बारे में लिखा। नाडिया के पंडितों के कालेज के इस अध्यक्ष के अनुसारः

वैद्य अपनी जाति के प्रति बहुत वफादार होते हैं। जैसे ही किसी वैद्य को कोई उच्च पद मिलता है वह उस विभाग में अपनी जाति के ज्यादा से ज्यादा लोगों को भर लेता है। जैसा कि पहले बताया जा चुका है, बैंक ऑफ़ बंगाल के दीवान बाबू कमल सेन ने एक समय बैंक में अपने कुटुम्ब के ढेर सारे लोगों की भर्ती कर ली थी। जामलपोर का ईस्ट इंडियन रेलवे कार्यालय वैद्यों से ठसाठस भरा है और इसके पीछे हैं वहां के स्वर्गीय बड़े बाबू बाबू मधुसूधन राय, जो बाबू अमृतालाई राय के पिता थे।[9]

जमालपुर लोकोमोटिव वर्कशॉप का 1887 में लिया गया एक चित्र. इस वर्कशॉप में वैद्यों की भरमार थी

जमालपुर लोकोमोटिव वर्कशाप की स्थापना 8 फरवरी, 1862 को की गई थी। यह ईस्ट इंडियन रेलवे द्वारा भारत में स्थापित पहली पूर्ण रूप से विकसित रेलवे वर्कशाप थी। यह आज के मुंगेर के नजदीक थी, जिसे उस समय पूरब का बरमिंघम कहा जाता था। जमालपुर को वैद्य बाती में बदल दिया गया था। यह वही शब्द है जिसका इस्तेमाल कलकत्ता की राईटर्स बिल्डिंग के संबंध में व्यंग्य में किया जाता था। जैसा कि निराद सी चौधरी ने बताया है, वर्कशाप में काम करने वाले सभी लोगों की सोच और मिशन बाबू मधूसूदन राय जैसी ही थी। स्थानीय लोगों में रेलवे वर्कशाप में उन्हें रोजगार न मिलने के कारण वैद्यों के प्रति जबरदस्त गुस्सा था। इस तरह बंगाली आसपास के प्रांतों में घृणा के पात्र बन गए। वे कपट, मक्कारी और कुतर्क के प्रतीक थे और 19वीं सदी की यह विरासत आज भी जीवित है।

कलकत्ता में 1 जनवरी, 1929 को साईमन कमीशन ने ऑल बेंगाल डिप्रेस्ड क्लासेस एसोसिएशन व ऑल बंगाल  नामशूद्र एसोसिएशन के प्रतिनिधिमंडल की सुनवाई की। कमीशन को बताया गया कि ढाका सिविल कोर्ट में लिपिकों की नियुक्ति में एक अधिकारी के मैट्रिकुलेट पुत्र और एक हैड क्लर्क के पूर्वस्नातक साले को पिछडे़ वर्गों के स्नातकों पर प्राथमिकता दी गई। ढाका संभाग में उपपंजीयकों की नियुक्ति में पिछड़े वर्ग के एक एमए पास उम्मीदवार को नज़रअंदाज कर, बीए पास एक कायस्थ को नियुक्त किया गया। इस प्रतिनिधिमंडल ने साईमन आयोग के सामने कंट्रोलर ऑफ़ करेन्सी, बंगाल और बंगाल के महालेखाकार के कार्यालयों में भर्ती में भाई-भतीजावाद और पक्षपात के कई उदाहरण दिए।[10]

सरकारी पदों पर नियुक्ति से, अन्य चीजों के अतिरिक्त, सत्ता के गलियारों तक पहुंच मिलती थी। सत्ता के गलियारों और शासनतंत्र में अछूतों का प्रवेश, ऊँची जातियों को मंजूर न था। गुजरा ज़माना उतना सुनहरा नहीं था जितना कि इतिहासकार हमें बताते हैं।

“सरकारी और वाणिज्यिक कार्यालयों में यह आम शिकायत है कि जहां भी हिन्दू कर्मचारियों का प्रभाव है वहां किसी भी बंगाली मुसलमान के लिए नौकरी पाना लगभग असंभव है। हमारे हिन्दू भाई सार्वजनिक रूप से यह कहते हैं कि सरकारी सेवाओं में नियुक्ति के मामले में जाति या धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए परंतु जब नियुक्ति देने का समय आता है, और अगर हिन्दुओं की इसमें निर्णायक भूमिका होती है, तो दबे छिपे ढंग से भेदभाव किया जाता है और मुसलमानों को बाहर रखा जाता है। ऐसे कई विभाग हैं जिनके दरवाजे मुसलमानों के लिए बंद हैं। व्यापारिक कार्यालयों में अगर बड़ा बाबू हिन्दू है तो लगभग सभी पदों पर इस समुदाय का एकाधिकार होता है।“[11]

“हर चीज पर कब्जा करने की लिप्सा और जीवन की अच्छी चीजों को दूसरों के साथ बांटने की अनिच्छा”, जिसकी आंबेडकर बात करते हैं, ने ऊँची जातियों के हिन्दुओं – जिनकी आबादी में बहुत कम संख्या थी – को संख्या में उनसे बहुत ज्यादा अन्य लोगों की राह में दीवारें खड़ी करने के लिए प्रेरित किया। इस असहिष्णुता और अहंकार को सांस्कृतिक श्रेष्ठता और अनूठी उपलब्धि के रूप में प्रचारित किया गया।

डा. आम्बेडकर ने 1941 में लिखा कि बंगाल में मुसलमानों की आबादी 2.74 करोड़ और हिन्दुओं की 2.15 करोड़ है। दूसरे शब्दों में बंगाल में मुसलमानों की आबादी हिन्दुओं से 12 प्रतिशत ज्यादा थी। उन्होंने पंजाब में भी लगभग यही स्थिति पाई और उनका अंतिम निष्कर्ष यह था कि “मुझे ऐसा लगता है कि समय आ गया है कि बंगाल और पंजाब के ऊंची जातियों के हिन्दुओं को यह बता दिया जाना चाहिए कि अगर वे पाकिस्तान का विरोध इस आधार पर करने जा रहे हैं कि इससे उनके रोजगार में कमी आएगी तो वे भारी भूल कर रहे हैं…। उन्होंने आगे लिखा, “मुस्लिम बहुसंख्यकों के अधीन रहकर अपने हिस्से से ज्यादा पाने की आशा रखना साहस का काम हो सकता है परंतु निश्चय ही यह बुद्धिमत्ता नहीं है क्योंकि संभावना यही है कि आप सब कुछ खो बैठेंगे।“ हिन्दू नेताओं को विभाजन अधिक सुविधाजनक और लाभदायक लगा और इसलिए लाखों पुरूषों, महिलाओं और बच्चों, बूढों और बीमारों को मजबूर होकर अपने घर-बार छोड़कर एक नई, अंजान, अनुपयुक्त और प्रतिकूल भूमि पर नए सिरे से जीवन प्रारंभ करना पड़ा। विभाजन के कई दशकों बाद तक, सीमा के दोनों ओर के करोड़ों लोगों की पहचान एक शरणार्थी के रूप में बनी रही। यह आश्चर्य की बात है कि 1947 में पंजाब और पूर्वी बंगाल में अछूतों का प्रतिशत सबसे अधिक था।

जनसांख्यिकीय आंकड़े मुस्लिम वतन के पक्ष में थे

कोई भी समुदाय अंनत काल तक अपमान, वंचना और भेदभाव नहीं झेल सकता। वंचना के प्रति शिकायत, क्रोध में बदल जाती है। शिकायतों को दूर करने के लिए यदि निष्पक्ष और न्यायपूर्ण हस्तक्षेप नहीं किया जाता तो विरोध प्रदर्शन और हिंसा होते हैं। जातीय पूर्वाग्रहों और घृणा की जो सामाजिक-राजनैतिक कीमत अदा करनी होती है, उसकी झलक भारत की सन् 1901 की जनगणना के आंकड़ों से मिलती हैः “नामशूद्रों की आबादी लगभग 18,861,000 है और पोड की लगभग पांच लाख। पंरतु इन दोनों की वास्तविक आबादी का पता इसलिए नहीं चलता क्योंकि इन जातियों के सदस्यों ने बड़ी संख्या में इस्लाम कबूल कर लिया है…। ढाका और चिटगांव संभागों में लगभग 1 करोड़ 5 लाख मुसलमान हैं… और यह कहना गलत नहीं होगा कि बंगाल के मुसलमानों में से कम से कम 90 लाख इन जातियों के हैं”।[12]  अछूत, नामशूद्र और पोड “सामाजिक कोढी” थे। हिन्दुओं की अनवरत प्रताड़ना के चलते उनके सामने इस्लाम को अंगीकार करने के सिवाय कोई रास्ता नहीं था।

पूर्वी पाकिस्तान के निर्माण का श्रेय हिन्दू उच्च जातियों के नेताओं को जाता है परंतु शायद वे इस तथ्य को स्वीकार करने में शर्मिंदगी महसूस करते हैं।

सन्दर्भ – 

[1] आम्बेडकर, बीआर, थाट्स आन पाकिस्तान, ठाकर एंड कंपनी लिमिटेड, बंबई, 1941, पृष्ठ  118

[2] वही, पृष्ठ 117-118

[3] भारत की जनगणना, 1901, खण्ड 6, भाग 1, पृष्ठ 506

[4] रे, आनंद शंकर, एन ओल्ड स्टोरी, द स्टेट्समेन, फेस्टिवल, 1991, कलकत्ता पृष्ठ 51

[5] बिस्वास, एके, ‘द अंकल जज सिंड्रोम शेडो ओवर लक्ष्मणपुर बाथे‘, मेनस्ट्रीम खण्ड 51, अंक 49, 23 नवंबर 2013

[6] बिस्वास, एके,उपरोक्त

[7] बंदोपाधयाय, ब्रिजेन्द्र नाथ, संबलपत्रे, सीकालेर कथा, बांगीय साहित्य परिषद, कलकत्ता, 1948 पृ. 386

[8] बिस्वास, एके, उपर उल्लेखित

[9] भट्टाचार्य, जोगेन्द्र नाथ, ‘हिन्दू कास्ट एंड सेक्ट्स‘, 1896, ठाकर स्पिंक एंड कंपनी, कलकत्ता

[10] बिस्वास, एके, द नामशूद्रास ऑफ़ बंगाल, प्रोफाइल ऑफ़ ए पर्सिक्यूटिड पीपुल, ब्लूमून बुक्स, दिल्ली, 2000, पृ 84-85

[11] रहमान, मुजीबुर, इंडियन यूनिटी एज एविडेंसड बाय हिन्दू-मुसलमान रिलेशन्स इन बेंगाल, द हिन्दुस्तान रिव्यू, खण्ड 18, जुलाई-दिसंबर 1908, पृष्ठ 423-424।

[12] भारत की जनगणना, 1901, खण्ड 6, पृष्ठ 396


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