गाँधी, गौरक्षा और हिन्दू पहचान

अभय कुमार का तर्क है कि “उदारवादी-प्रगतिशील” बुद्धिजीवियों का बड़ा तबका, गांधीवाद से इतना गहरे तक प्रभावित है कि वह इस प्रश्न पर निरपेक्षता से विचार कर ही नहीं सकता कि क्या गाँधी ने ‘पवित्र गाय’ के विमर्श को केंद्र में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी

स्वनियुक्त गौरक्षकों ने देश में आतंक मचा रखा है। विभिन्न स्थानों से गौरक्षा के नाम पर, दलितों और मुसलमानों पर हमलों की खबरें आ रहीं हैं। हिन्दुत्ववादी गुंडों के लिए कानून का कोई अर्थ ही नहीं रह गया है। वे खुलेआम लोगों की मुंह में गोबर ठूंस रहे हैं, मारपीट कर रहे हैं और कुछ मामलों में हत्याएं भीं। इसमें कोई संदेह नहीं कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के सत्ता में आने के बाद से गौरक्षकों की गुंडागर्दी बढ़ी है परन्तु यह भी सच है कि गौरक्षा के नाम पर निर्दोषों, विशेषकर मुसलमानों और दलितों, के विरुद्ध हिंसा का लम्बा इतिहास है। गौरक्षा आन्दोलन 19 वीं सदी में शुरू हुआ था और आगे चल कर, राष्ट्रवादी आन्दोलन में लोगों को एकजूट करने के लिए इसका उपयोग किया गया। गौरक्षा के पैरोंकारों में से एक थे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी।

una_dalit_cow

मरी हुई गाय की खाल उतारने के कारण ‘ गो-रक्षकों’ ने दलित-युवकों को जुलाई, 2016 में पीटा

गाँधी के देश के राजनीतिक परिदृश्य पर छाने के लगभग चार दशक पूर्व, आर्य समाज के संस्थापक दयानंद सरस्वती द्वारा 1882 में आयोजित पहली गौरक्षण सभा से देश में पवित्र गाय पर विमर्श की शुरुआत हुई। कहने की ज़रुरत नहीं कि गौरक्षा अभियानों ने देश में हिन्दू-मुस्लिम तनाव बढ़ाया जिसके नतीजे में उत्तर भारत, विशेषकर आजमगढ़ (1893), अयोध्या (1912-13) और शाहाबाद (1917), में दंगे हुए[1]

इतिहासकारों का मत है कि दंगों का एक महत्वपूर्ण कारण था हिन्दू सम्प्रदयिक्तावादियों का मुसलमानों के विरुद्ध आक्रामक अभियान। इस अभियान में उत्तेजक भाषा और हिंसा का खुलकर इस्तेमाल होता था।

गाँधी, गौरक्षा के नाम पर हिंसा को घोर अनुचित मानते थे और इस मुद्दे पर उनके हिन्दू सांप्रदायिक ताकतों से गहरे मतभेद थे।   गाँधी का कहना था कि गौरक्षा के लिए केवल अहिंसक तरीकों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। वे उन हिन्दुओं की कड़े आलोचक थे जो गौरक्षा के नाम पर मुसलमानों के विरुद्ध हिंसा करते थे। “अगर कोई मुसलमान भाई, उदाहरण के लिए, ईद  पर, एक गाय का वध कर भी देता है, तो कोई हिन्दू किस हक़ से उस पर हाथ उठा सकता है? क्या शास्त्र यह कहते हैं कि गाय को बचाने के लिए हम अपने साथी मनुष्य की हत्या कर दें?”[2]

गौ सेवकों को मुसलमानों पर हमले करने के खिलाफ चेताते हुए वे कहते हैं, “शास्त्रों में ऐसा कहीं नहीं कहा गया है।  उलटे, ऐसा करना शास्त्रों के विरुद्ध है। गाय को बचाने के लिए तुम अपनी जान तो कुर्बान कर सकते हो; किसी दूसरे की जान ले नहीं सकते और न ही तुम उसके खिलाफ कोई गुस्सा अपने मन में रख सकते हो[3]“। वे आगे लिखते हैं, “हिंसा से गौरक्षा करने का प्रयास, हिन्दू धर्म को शैतानी धर्म बना देगा”[4]

हिन्दू साम्प्रदायिकतावादियों के विपरीत, गाँधी यह अच्छी तरह से जानते थे कि अगर मुसलमानों को गौवध करने से रोका गया तो इसके उलटे परिणाम हो सकते हैं। इस सिलसिले में गाँधी अपने एक मुसलमान मित्र द्वारा उन्हें लिखे पत्र का हवाला देते हैं।  “जैसा कि एक मुसलमान मित्र ने लिखा है, अगर हिन्दुओं द्वारा जबरदस्ती की गई तो गौमांस का भक्षण, जो अभी इस्लाम में केवल जायज है, मुसलमानों के लिए कर्त्तव्य बन जायेगा”[5]

मुसलमानों को गौरक्षा के लिए राजी करने के अलावा, गाँधी ने इस मसले पर उनसे राजनीतिक सौदा करने से भी परहेज नहीं किया। गाँधी ने यह साफ़ कर दिया कि खिलाफत के मुद्दे पर मुसलमानों को समर्थन देने के बदले, हिन्दू उनसे यह उम्मीद करते हैं कि वे गौरक्षा में उनका साथ देंगे। “गाय को बचाने का एकमात्र और सबसे बेहतर तरीका है खिलाफत को बचाना”, उन्होंने कहा।  [6]

खिलाफत और असहयोग आंदोलनों ने सन 1920 के दशक में देवबंदी उलेमा के संगठन जमीअत उलेमा-ए-हिंद और कांग्रेस को अंग्रेज सरकार के खिलाफ संघर्ष में एक मंच पर ला दिया। तुर्की में खलीफा के राज की पुनर्स्थापना के लिए चलाये गए आन्दोलन का समर्थन करने के लिए गाँधी की निंदा की गयी परन्तु वे जानते थे कि यह एक ऐसा अवसर था, जिसका इस्तेमाल गौरक्षा के लिए मुसलमानों का समर्थन हासिल करने के लिए किया जा सकता था।

जहाँ गाँधी गौरक्षा के लिए संवाद, समझाने-बुझाने और राजनीतिक सौदे करने के हामी थे, वहीं वे इसके लिए राज्य या कानून का इस्तेमाल करने के सख्त खिलाफ थे। वे सरकारी तंत्र की ताकत और कानून के जरिये गौवध को प्रतिबंधित करने के विरुद्ध थे।

गाँधी का कहना था कि स्वतंत्र भारत में भी इस तरह की ज़बरदस्ती के लिए कोई जगह नहीं होगी।  “भारत में स्वराज में भी, हिन्दू बहुसंख्यकों के लिए यह अनुचित और मूर्खतापूर्ण होगा कि वे कानून के ज़रिये मुसलमान अल्पसंख्यकों को गौवध न करने के लिए मजबूर करें”। [7]

परन्तु, भारत के स्वतंत्र होने के बाद, एक के बाद एक राज्यों ने गौवध प्रतिबंधित करना शुरू कर दिया। इससे लाखों लोगों को अपने भोजन और रोज़ी-रोटी से हाथ धोना पड़ा।

भाजपा के नेतृत्व वाली महाराष्ट्र सरकार द्वारा हाल में बनाए गया गौवध प्रतिषेध कानून, ऐसे ही एक भयावह कानून का उदाहरण है। जहाँ गौरक्षा के लिए हिंसा और कानून का सहारा लिए जाने के गाँधी की खिलाफत और हिन्दू सांप्रदायिक तत्वों का उनका विरोध प्रशंसनीय हैं, वहीं यह भी सच है कि उन्होंने पवित्र गाय पर विमर्श को मजबूती देने और उसे हिन्दू पहचान का केंदीय तत्त्व बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। दुर्भाग्यवश, “उदारवादी-प्रगतिशील” बुद्धिजीवियों का बड़ा तबका, गांधीवाद से इतना गहरे तक प्रभावित है कि वह इस प्रश्न पर निरपेक्षता से विचार कर ही नहीं सकता। [8]

गाँधी अपने पूरे राजनीतिक जीवन में गौरक्षा आन्दोलन से जुड़े रहे। उन्होंने इस विषय पर अनेक लेख लिखे और गौरक्षा सम्मेलनों में भाषण दिए। वे गौसेवा संघ की स्थाई समिति के अध्यक्ष भी थे। इस समिति के सदस्यों में उद्योगपति जमनालाल बजाज भी शामिल थे, जिससे यह पता चलता है कि गौरक्षा मे मुद्दे पर ब्राह्मणवादी और पूंजीपति एकमत थे।

अपने लेखों में गाँधी लगातार यह कहते थे कि “गौरक्षा हिन्दू धर्म का केंद्रीय तत्त्व है” और यह भी कि “गौरक्षा विश्व को हिन्दू धर्म की देन है। हिन्दू धर्म तब तक जीवित रहेगा जब तक गोरक्षक हिन्दू मौजूद हैं”।[9] गौरक्षा की प्रति अपने प्रेम के चलते वे इस बात को भी भुला बैठे कि हिन्दुओं में बहुत विविधता है और राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक मुद्दों में उनमें परस्पर टकराव भी होता रहता है।  हिन्दू की उनकी परिभाषा बहुत सरल थी। “हिन्दुओं की परख उनके तिलक, मंत्रों के शुद्ध उच्चारण, तीर्थयात्राओं तथा जात-पात के नियमों के अत्यौपचारिक पालन से नहीं की जाएगी, बल्कि गाय की रक्षा करने की उनकी योग्यता के आधार पर की जाएगी।”।[10]

gandhi-and-malaviya-with-a-cow

एक गाय के साथ गांधी और मदन मोहन मालवीय

गाँधी की हिन्दू की इस मिथकीय परिभाषा के बावजूद, तथ्य यह कि ‘हिन्दू कौन है’ इस प्रश्न का उत्तर देना लगभग असंभव है।  कथित “हिन्दू समुदाय”, जिसका निर्माण मुख्यतः औपनिवेशिक काल में “जनगणना” और चुनावी राजनीति के चलते हुआ, जाति, वर्ग और क्षेत्रीय आधारों पर विभाजित है। आश्चर्य नहीं कि जहाँ देश में बड़ी संख्या में शाकाहारी हिन्दू हैं, वहीं गाय या भैंस का मांस खाने वाले हिन्दुओं की संख्या करीब 1.25 करोड़ है”। [11]

न केवल आज के हिन्दू बल्कि प्राचीन भारतीय भी गौमांस खाते थे। जानेमाने इतिहासकारों डी.डी. कोसंबी और डी. एन. झा ने यह साबित किया है प्राचीन भारत में गौमांस, भोजन का आवश्यक भाग था। ग्रंथों और ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर झा लिखते हैं, “प्राचीन भारत में माँसाहार भोजन की संस्कृति थी और एक लम्बे समय तक, कम से कम समाज के उच्च वर्गों में, गौमांस आहार का अनिवार्य हिस्सा बना रहा”। [12]

बी. आर.आंबेडकर, जो गाँधी के समकालीन थे, और स्वामी विवेकानंद, जो उनसे कुछ बड़े थे और जिनके विचारों का गाँधी पर गहरा प्रभाव था, मानते थे कि प्राचीन भारत में गौमांस भक्षण आम था। विवेकानंद, जिन्हें हिंदुत्व शक्तियां, “हिन्दू प्रतीक” बताती हैं, ने बिना किसी लागलपेट के कहा था, “इसी भारत में एक समय ऐसा था जब बिना गौमांस खाए कोई ब्राह्मण, ब्राह्मण नहीं रहता था। तुम वेदों में पढ़ो कि जब भी घर में कोई सन्यासी या राजा या कोई बड़ा आदमी आता था, तो सबसे अच्छे बैल को काटा जाता था।”[13]

परन्तु गाँधी ने इन सब तथ्यों को नज़रंदाज़ कर दिया। उन्होंने आधुनिक हिन्दू धर्म को परिभाषित करने के लिए गाय की प्रतीक का दोहन किया और कहा कि हिन्दू को गाय की ‘रक्षा’ करने की उसकी ‘क्षमता’ से परखा जायेगा। ‘क्षमता’, ‘रक्षा’ व ‘रक्षा करने’ जैसे शब्दों में यह अंतर्निहित है कि गाय (हिन्दुओं) को कसाई के छुरे (मुसलमानों) से ‘खतरा’ है। चंद मौकों पर गाँधी ने मुसलमानों पर भी निशाना साधा। उन्होंने लिखा कि “वे निसंदेह मूर्ख और जिद्दी हैं अगर वे गाय को काट कर अकारण ही हिन्दुओं की भावनाओं को चोट पहुंचाते हैं”। [14]

इसमें कोई संदेह नहीं कि गाय के मुद्दे पर गाँधी ने कभी मुसलमानों को दोष नहीं दिया। गायों की हालत के लिए उन्होंने हिन्दुओं को ही कठघरे में खड़ा किया। गाँधी ने कहा कि “हिन्दू, मवेशियों और विशेषकर गायों को भूखा मारते हैं, उनकी उस ढ़ंग से देखभाल नहीं करते जैसी कि करनी चाहिए और जब गाय दूध देना बंद कर देती है, तब वे उसे बेच देते हैं। बिना इस बात पर विचार किये कि क्या वे गाय को कसाईखाने में बेच रहे हैं, वे उस व्यक्ति को गाय बेचते हैं जो उन्हें उसकी सबसे ज्यादा कीमत देता है। वे बैलों के साथ क्रूरता करते हैं और उन्हें ‘आर’ चुभा कर चलाते हैं”[15]

गाँधी द्वारा हिन्दुओं को “क्रूर” बताने से भी मुसलमानों के मन से डर और असुरक्षा का भाव समाप्त नहीं हुआ। मुसलमानों की दृष्टि में गौरक्षा की नींव ही मुस्लिम-विरोध पर रखी गयी थी।

गाँधी ने गाय के आसपास मिथकीय इतिहास का जाल बुन दिया। वे लिखते हैं, “भागवत में एक स्थान पर लेखक उन चीज़ों का वर्णन करता है, जो भारत के पतन का कारण बनीं। जो कारण बताये गए हैं, उनमें से एक यह है कि हमने गौरक्षा करनी बंद कर दी”। [16]

गाँधी अक्सर अपनी बात कहने के लिए मिथकों का सहारा लेते थे। अपने विचारों के औचित्यपूर्ण ठहराने के लिए वे कहा करते थे कि “जैसा कि ग्रन्थ कहते हैं” या “जैसा कि महान या पवित्र व्यक्ति कहते हैं”। ऐसा करके, गाँधी यह सुनिश्चित करते थे कि उस मुद्दे पर आगे बहस या समालोचनात्मक अध्ययन की कोई गुंजाइश ही न बचे।

जैसा कि विद्वान कहते हैं, “पतन” एक ऐसा शब्द है जिसका कोई स्पष्ट अर्थ नहीं हो सकता। जब भी कोई अध्येता किसी समाज के पतन के कारणों का अध्ययन करे तो उसे सबसे पहले अपने से यह प्रश्न पूछना चाहिए, “किसका पतन?” परन्तु गाँधी ने पतन के कारणों की गंभीरता से विवेचना नहीं की और उन्होंने इस तथ्य को नज़रंदाज़ किया कि सामाजिक परिवर्तन राजनीतिक, ऐतिहासिक और आर्थिक मंथन का नतीजा होते हैं।

अपनी बात को वैधता प्रदान करने के लिए गाँधी कहते हैं, “गौ रक्षा का वास्तविक अर्थ है ईश्वर की समस्त मूक सृष्टि की रक्षा।  गाय करुणा का काव्य है। गौरक्षा का अर्थ है कमज़ोर और असहाय की रक्षा”[17]

इसके विपरीत, गौरक्षा आन्दोलन का कमज़ोर और असहाय की रक्षा से कोई लेनादेना नहीं है। इसका नियंत्रण ऊंची जातियों के हाथों में है और इसे हिन्दू जमींदार और व्यवसायी धन उपलब्ध करवाते हैं। उना (गुजरात) की हालिया घटना, जिसमें सात दलितों को कथित रूप से एक मरी हुयी गाय की खाल उतारने के ‘अपराध’ में बुरी तरह मारा-पीटा गया, इस आन्दोलन के असली चरित्र की व्याख्या करता है।

गाय के अतिरिक्त, गाँधी ने भैंस पर भी विचार किया। परन्तु गाय को पवित्र दर्जा देने के अपने अभियान के चलते, वे भैंस का तिरस्कार कर बैठे। बिना किसी ठोस आधार के उन्होंने यह घोषणा कर दी कि “चिकित्साशास्त्र की दृष्टि में, गाय का दूध, भैंस के दूध से श्रेष्ठ है”।[18] वे लिखते हैं, ‘मैंने वैद्यों से सुना है कि भैंस के दूध में कुछ कमियां होती हैं और उसमें वह स्वास्थ्यकर गुण कभी नहीं लाये जा सकते जो गाय के दूध में होते हैं। पुण्यात्मा लोगों ने मुझे बताया है कि गाय का दूध सात्विक होता है और भैंस का तामसिक”। [19]

शोध से यह सिद्ध हो चुका है कि गाँधी के विचार सही नहीं थे। “भैंस का दूध उतनी ही आसानी से पचता है, जितना कि गाय का दूध और दोनों की पौष्टिकता समान होती है”। इसके अलावा, भैंस के दूध में ‘कम कोलेस्ट्रोल होता है”, “अधिक प्रोटीन होते हैं”, “अधिक विटामिन ए होता है” और गाय की तुलना में, “महत्वपूर्ण खनिज अधिक होते हैं”। [20]

भैंस को अपमान की दृष्टि से क्यों देखा जाता है? दलितबहुजन विचारक कांचा आयलय्या कहते हैं कि भैंसों को ‘पवित्र’ दर्जा न मिलने का कारण ब्राह्मणवादी वर्चस्व है। वे भैंसों की स्थिति की तुलना दलितबहुजनों से करते हैं, जो भारतीय समाज का असली उत्पादक वर्ग हैं। “दलितबहुजनों की हालत काली और सुन्दर भैंसों जैसी है, जो गाय से अधिक दूध – जो गाय के दूध की तरह सफ़ेद होता है – देतीं हैं परन्तु उन्हें न तो समाज में पवित्र दर्जा प्राप्त है और ना ही संवैधानिक सुरक्षा।  इस तरह की स्थिति में हमें मजबूर होकर पूछना पड़ता है कि आखिर यह भारत किसका है?”[21]

जैसा कि पहले कहा जा चुका है, 19 वीं सदी में ‘पवित्र गाय’ का विमर्श हिन्दू पहचान को मजबूती देने के लिए शुरू किया गया था।  यद्यपि गाँधी हिन्दू संप्रदायवादियों के द्वारा हिंसा का सहारा लिए जाने के विरुद्ध थे तथापि उन्होंने इस ब्राह्मणवादी विमर्श को भरपूर खाद-पानी दिया।

[1] डी. एन.  झा, द मिथ ऑफ द होली काउ, वर्सो, लन्दन, 2004, पृष्ठ 19-20 ।

[2] एम. के.  गाँधी; हाउ टू सर्व द काऊ; संपादक: भरत कुमारप्पा; नवजीवन पब्लिशिंग हाउस, अहमदाबाद; 1954; पृष्ठ 14

[3] एम. के. गाँधी; उपरोक्त, पृष्ठ 13

[4] उपरोक्त, पृष्ठ 13

[5]उपरोक्त, पृष्ठ 13

[6]उपरोक्त, पृष्ठ 13

[7] उपरोक्त, पृष्ठ 14

[8] ऐसे ही एक अध्येता हैं दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास के प्राध्यापक अनिरुद्ध देशपांडे।  गौवध के मामले में जबरदस्ती किये जाने के गाँधी के विरोध को तो वे मान्यता देते हैं परन्तु गाय को हिन्दू पहचान का केंद्र बनाने में उनकी भूमिका को नज़रंदाज़ करते हैं।  देखें अनिरुद्ध देशपांडे, “प्यारी हिंदू पवित्र गाय का मृत्युलेख“, फॉरवर्ड प्रेस, 18 जुलाई 2015 https://www। forwardpress। in/2015/07/the-dear-hindu-holy-cow-an-obituary-hindi/ 15 अगस्त, 2016

[9] उपर्युक्त पृष्ठ 3-4

[10]उपर्युक्त पृष्ठ 3-4

[11]रोशन किशोर व इशान आनंद, ‘हू आर द बीफ ईटर्स इन इंडिया”, लाइव मिंट, 20 अक्टूबर, 2015  http://wwwlivemintcom/Politics/RhPVLUFmclIDWRIiSoTC7N/Who-are-the-beef-eaters-in-Indiahtml, 15 अगस्त, 2016, यह रपट राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण की ताज़ा रपट पर आधारित है।  

[12] डी. एन, झा, पृष्ठ 23 ।

[13]अनिरुद्ध देशपांडे, “प्यारी हिंदू पवित्र गाय का मृत्युलेख“ फॉरवर्ड प्रेस, 18 जुलाई 2015; https://www। forwardpress। in/2015/07/the-dear-hindu-holy-cow-an-obituary-hindi/ 15 अगस्त, 2016। यही उद्धरण एक अन्य वेबसाइट पर भी उपलब्ध है, जिसमें स्वामी विवेकानंद के उद्धरण दिए गए हैं- http://wwwswamivivekanandaquotesorg/2013/12/swami-vivekanandas-quotes-and-comments_25html,; 15 अगस्त, 2016

[14] एम.के. गाँधी; उपरोक्त, पृष्ठ 17-18

[15] उपरोक्त, पृष्ठ 26

[16] उपरोक्त, पृष्ठ 8

[17] उपरोक्त, पृष्ठ 3

[18] उपरोक्त, पृष्ठ 52

[19] उपरोक्त, पृष्ठ 53

[20] http://wwwindiadairycom/info_buffalo_milk_vshtml, 15 अगस्त, 2016

[21] कांचा आयलय्या, “द बफेलोस अनहोली मिल्क”, कांचा आयलय्या, “बफेलो नेशनलिजम: अ क्रिटीक आफ स्पिरिचुअल फासिज्म, साम्य, कोलकाता, 2012, यह लेख पहले बार आउटलुक, 20 अगस्त, 2001, पृष्ठ 71 पर प्रकाशित हुआ था।


 फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +919968527911, ईमेल : info@forwardmagazine.in

About The Author

Reply