h n

भूटान राज्य नहीं जाऊंगी

रोज केरकेट्टा की दो कविताएं

भूटान राज्य नहीं जाऊंगी

मत डॉटना मां, मत डॉंटना पिता
मैं, तो दादा नहीं जाऊंगी भूटान राज्य
यहीं जन्मभूमि, यहीं मृत्यु भी
भुईंहरी स्थान यह दादा, नहीं मैं नहीं जाऊंगी भूटान राज्य

वनराज यहीं वन भैंसा भंइस
बाघ-बाराह मित्रा, झरने, नदियां खुशी-हंसी
कुही, तोता, कौवा-मैना, रूनिया और बेसरा,
मैं, मैं तो दादा नहीं जाऊंगी भूटान राज्य।

गूलर, बार, केंद-चिरौंजी, बेहरा और आंवला
जिरहुल, सखुआ, तिरियो-कोरोया, आसन-कोयनार;
तुम्हारे मेरे संगी खेलते हैं झाक-झूमर (झूमते हैं)
मैं तो दादा नहीं जाऊंगी भूटान राज्य

नहीं मैं ललचाती सोना चांदी, ढेर-ढेर-सा पैसा
अक्ल, बुद्धि, ज्ञान, पाऊंगी, सजाऊंगी
यत्न से समेटना इन्हें अवश्य है,
छोड़ जाओ दादा मैं नहीं जाऊंगी भूटान राज्य


पहली बारिश

पहली बरसात में ही
नदी उमड़ी थी
और मछलियां मानो जलपरियां
तेजी से गहराई से लदगद-लदगद करते जल में
ऊंचाई की ओर उड़ी थी
थिरक रही थीं, रोशनी में चमक रही थीं
क्या तुमने देखा है
मछलियों का नृत्य, मछलियों का थिरकना?

बारिश में खेत-गड्ढे
छलके छपाछप भर उठे
कतार में ऊपर उठती मछलियां
फैल जातीं छिछले पानी में

और निष्ठुर मानव
जवान बूढ़े बच्चे सब
छोटे-बड़े निकल पड़े जाल लेकर
खेतों, नालों, झरनों और नदियों में
छा जाते काल बनकर।

वे मछलियां
बेखौफ मौत से अठखेलियां करतीं
फंस गईं, फंसा ली गईं जालों में
मछलियों की प्रणय लीला
उमंग का उत्कर्ष
पल में परिवर्तित होता मौत में

उनकी मौत
नहीं करती द्रवित मानव को
इतना निष्ठुर, इतना निर्मम
आज का मानव
सृजन काल में मछलियां मारी जाती हैं।

(फारवर्ड प्रेस, बहुजन साहित्य वार्षिक, मई, 2014 अंक में प्रकाशित )


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +919968527911, ईमेल : info@forwardmagazine.in

लेखक के बारे में

रोज केरकेट्टा

रोज केरकेट्टा देश की जानी-मानी साहित्यकार और आंदोलनकारी अगुआ हैं। आपकी कई किताबें प्रकाशित हैं और 75 वर्ष की आयु में भी सृजन और संघर्ष के मोर्चे पर डटी हुई हैं

संबंधित आलेख

इतिहास पर आदिवासियों का दावा करतीं उषाकिरण आत्राम की कविताएं
उषाकिरण आत्राम इतिहास में दफन सच्चाइयों को न सिर्फ उजागर करती हैं, बल्कि उनके पुनर्पाठ के लिए जमीन भी तैयार करती हैं। इतिहास बोध...
हिंदी दलित कथा-साहित्य के तीन दशक : एक पक्ष यह भी
वर्तमान दलित कहानी का एक अश्वेत पक्ष भी है और वह यह कि उसमें राजनीतिक लेखन नहीं हो रहा है। राष्ट्रवाद की राजनीति ने...
‘साझे का संसार’ : बहुजन समझ का संसार
ईश्वर से प्रश्न करना कोई नई बात नहीं है, लेकिन कबीर के ईश्वर पर सवाल खड़ा करना, बुद्ध से उनके संघ-संबंधी प्रश्न पूछना और...
दलित स्त्री विमर्श पर दस्तक देती प्रियंका सोनकर की किताब 
विमर्श और संघर्ष दो अलग-अलग चीजें हैं। पहले कौन, विमर्श या संघर्ष? यह पहले अंडा या मुर्गी वाला जटिल प्रश्न नहीं है। किसी भी...
व्याख्यान  : समतावाद है दलित साहित्य का सामाजिक-सांस्कृतिक आधार 
जो भी दलित साहित्य का विद्यार्थी या अध्येता है, वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे बगैर नहीं रहेगा कि ये तीनों चीजें श्रम, स्वप्न और...