सहारनपुर दंगा : दलितों के खिलाफ एक राजनीतिक साजिश

बाबासाहेब आंबेडकर के जन्मोत्सव पर निकाली गई शोभायात्रा को लेकर दलित और मुसलमान तथा महाराणा प्रताप की जयंती के उपलक्ष्य में निकाली गई शोभायात्रा को लेकर राजपूत और दलित एक-दूसरे के सामने हैं। व्यापक दृष्टिकोण से देखा जाए तो ऐसा लगता है कि दोनों ही फसाद किसी न किसी रूप में पूर्व-नियोजित हैं। पढ़ें तेजपाल सिंह ‘तेज’ का विश्लेषण :

उत्तर प्रदेश में योगी सरकार बनने के तुरन्त बाद सहारनपुर जिले में 13 अप्रैल, 2017 को डॉ. भीमराव आंबेडकर शोभा यात्रा निकालने के दौरान बवाल हो गया था। इस बवाल ने कुछ ही देर में साम्प्रदायिक रूप ले लिया। दलित-मुसलमान आमने सामने आ गए और पथराव व आगजनी हुई। कहा यह गया कि यह शोभायात्रा प्रशासन की अनुमति के बिना निकाली जा रही थी। पथराव में कुछ लोगों को चोटें आई लेकिन पुलिस ने मौके पर पहुंच कर हालात को काबू में कर लिया। तनाव के मद्देनजर इलाके में पुलिस बल तैनात कर दिया गया। इस प्रशासनिक भूमिका से सरकार ने मान लिया कि अब शांति हो गई। गौरतलब है कि पथराव में चार भाजपा कार्यकर्तां भी घायल हुए। इसका सीधा सा अर्थ यह है कि भाजपा के लोग भी दंगे में शामिल थे। इस पक्ष से या उस पक्ष से या फिर फसाद को हवा देने के मूड में।

भाजपा सांसद की अगुआई में कमिश्नर की गाड़ी तोड़ दी गई। तोड़-फोड़ के चलते सहारनपुर-रुड़की-देहरादून हाईवे पर आवागमन भी बाधित हो गया। प्रदेश के अपर पुलिस महानिदेशक (कानून व्यवस्था) दलजीत चौधरी ने कहा कि स्थिति नियंत्रण में है। और कहते भी क्या? उनका कहना था कि वहां शोभा-यात्रा को निकालने के लिए अनुमति नहीं दी गई थी। घटना में जो भी दोषी हैं, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, सड़क दूधली में डा. भीमराव आंबेडकर शोभायात्रा निकालने को लेकर भाजपा सांसद राघव लखन पाल शर्मा, पूर्व विधायक राजीव गुंबर आदि भाजपा नेता गुरुवार सुबह से ही प्रशासन से अनुमति लेने के लिए प्रयासरत थे। दो घंटे तक चली बैठक में तय हुआ कि शोभायात्रा गांव के बाहर से ही निकाली जाएगी। दरअसल, उस समय भाजपा के सांसद द्वारा बाबासाहेब आंबेडकर के जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में एक शोभायात्रा निकालकर बाबासाहेब को भी साम्प्रदायिक रंग में रंगने का काम किया था।

बाबासाहेब आंबेडकर के जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में निकाली गई शोभायात्रा के समय हुए दंगे थमे भी नहीं थे कि उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में जुलूस और शोभायात्राओं को लेकर 15 दिन के भीतर दूसरी बार उपद्रव हुआ। ताज़ा मामले में 5 मई, 2017 को महाराणा प्रताप जयंती के अवसर पर निकाली गई शोभायात्रा को लेकर राजपूत-दलित आपस में भिड़ गए अथवा भिड़ा दिए गए। मारपीट और दंगे के दौरान ठाकुरों ने दलितों के साथ जमकर मारपीट की। दलितों के क़रीब दो दर्जन घरों में आग भी लगा दी। इस उपद्रव में एक व्यक्ति की मौत हो गई और 15 से ज़्यादा लोग घायल हो गए। पुलिस ने अब तक 17 लोगों को गिरफ्तार किया है। किंतु अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि गिरफ्तार हुए लोग कौन से पक्ष के हैं।

इस घटना के बाद, वहीं 9 मई, 2017 को मुख्यमंत्री योगी का मेरठ दौरा हुआ। इस दौरान योगी दलितों की बस्ती शेरगढ़ी गए किंतु इस मौंके पर उन्होंने शेरगढ़ी घुसने वाले मार्ग के शुरु में लगी बाबासाहेब की मूर्ति पर माल्यार्पण नहीं किया। जबकि भाजपा जन सभाओं में बार-बार बाबासाहेब आंबेडकर के नाम की माला जपने से बाज नहीं आती। योगी द्वारा बाबासाहेब की उपेक्षा किए जाने से दलितों में नाराजगी का ज्वार आ गया और योगी के विरूद्ध न केवल नारेबाजी हुई, अपितु रोष भरा प्रदर्शन भी किया। घटना की आग सहारनपुर तक पहुँची कि दलितों और पुलिस के बीच झड़प हो गई। कई गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया गया। इस पर योगी ने सहारनपुर की घटनाओं पर नाराजगी तो जाहिर की किंतु शेरगढ़ी में बाबासाहेब की प्रतिमा पर माल्यार्पण न करने पर खेद प्रकट नहीं किया। दरअसल, दोनों ही बार की सहारनपुर घटनाओं में दलितों को साधा गया है और उनके आक्रोश को दबाने के लिए राजनीति ने गैर-दलितों को इस्तेमाल किया है। इससे जातीय वैमनस्य फैलाने की साजिश प्रतीत होती है।

अमर उजालाके मुताबिक, यह बवाल आंबेडकर की मूर्ति तोड़ने को लेकर हुआ है। ‘इंडियन एक्सप्रेस का कहना है, ‘पुलिस पर भी हमला किया गया। क़रीब दो हज़ार ठाकुरों ने शब्बीरपुर के 25 घर जला दिए। शब्बीरपुर की तरफ़ जा रही पुलिस को रास्ते में ही ठाकुरों ने रोड जाम करके रोक दिया। पुलिस और फायर ब्रिगेड को शब्बीरपुर पहुंचने में दो घंटे लग गए।’ सोचने की बात ये है कि अखबार ने यह खुलासा नहीं किया कि घर किनके जलाए गए। जाहिर है कि ये काम ठाकुरों ने ही किया जिन्होंने पुलिस तक को नहीं बख्शा। पुलिस और फायर ब्रिगेड को शब्बीरपुर पहुंचने में दो घंटे लग गए। क्यों?

बाबासाहेब आंबेडकर के जन्मोत्सव पर निकाली गई शोभायात्रा को लेकर दलित और मुसलमान तथा महाराणा प्रताप की जयंती के उपलक्ष्य में निकाली गई शोभायात्रा को लेकर राजपूत और दलित एक-दूसरे के सामने हैं। व्यापक दृष्टिकोण से देखा जाए तो ऐसा लगता है कि दोनों ही फसाद किसी न किसी रूप में पूर्व-नियोजित हैं।

भारतीय समाज में होने वाले तमाम दंगे अब तक तो भाजपा को ही लाभ पहुचाने वाले सिद्ध हुए हैं लेकिन यहाँ क्या कहा जा सकता है?

यूँ सहारनपुर वाले दूसरे दंगे में जिस एक और संगठन का नाम सबसे आगे आ रहा है, वो है भीम आर्मी। इस संगठन स्थापना एडवोकेट चंद्रशेखर आजाद ने दलित समुदाय के सम्मान और अधिकार की रक्षार्थ जुलाई 2015 में किया था। इस संगठन का पूरा नाम ‘भीम आर्मी भारत एकता मिशन’  है। भीम आर्मी पहली बार अप्रैल 2016 में हुई जातीय हिंसा के बाद सुर्खियों में आई थी। दलितों के लिए लड़ाई लड़ने का दावा करने वाले चंद्रशेखर की भीम आर्मी से आसपास के बहुत से  दलित युवा जुड़ गए हैं। चंद्रशेखर का कहना है कि भीम आर्मी का मकसद दलितों की सुरक्षा और उनको उनका हक दिलवाना है, लेकिन इसके लिए वह हर तरीके को आजमाने का दावा भी करते हैं। यही दावा तो आरएसएस द्वारा पोषित सैनिक दल जैसे शिव सेना, हनुमान सेना, हिन्दु युवा वाहिनी, हिन्दु रक्षक दल और न जाने ही कितने सैनिक दल भी तो करते हैं। केन्द्र और कई राज्यों में भाजपा की सरकार आने के बाद तो न जाने कितने ही हिन्दू सैनिक दल पैदा हो गये जिनमें से खास हैं –  गोरक्षा के नाम पर जन्मते कुकुरमुत्ते आतंकवादी घटक।

इन हालातों में यह समझने की जरूरत है कि यदि भाजपा और इसके समर्थक आंतकी घटकों का सहारनपुर जैसा ही उपक्रम रहा तो वो दिन दूर नहीं कि जब दलित और मुसलमानों के भी बीच ऐसी ही  अनेक जातीय सेनाएं उत्पन्न हो जाएंगी।


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