राजद विधायक की मौजूदगी में पत्रकार पर जानलेवा हमला

बिहार में एक बार फिर एक पत्रकार पर जानलेवा हमला किया गया है। पिछली दिनों पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या में राजद के बाहुबली नेता शाहाबुद्दीन का नाम सामने आया था। ताजा घटना भी राजद के ही एक अन्य विधायक वीरेंद्र कुमार सिन्हा की मौजूदगी में अंजाम दी गई है। नवल किशोर कुमार की रिपोर्ट :

अति पिछडा समुदाय से आने वाले उपेन्द्र कश्यप उन पत्रकारों में शामिल हैं जो सुदूर इलाके में रहकर निष्पक्ष पत्रकारिता करने के साथ ही बहुजनों के हितों के लिए निरंतर संघर्ष करते हैं। बिहार के औरंगाबाद जिले के दाऊद नगर के रहने वाले उपेंद्र पर 11 मई 2017 को जानलेवा हमला किया गया। घटना के समय वे जातीय उन्माद के कारण हुए एक दोहरे हत्याकांड के बाद ग्रामीणों के आक्रोश पूर्ण प्रदर्शन को कवर कर रहे थे। उपेंद्र एक राष्ट्रीय हिंदी दैनिक तथा एक टीवी चैनल के साथ-साथ फारवर्ड प्रेस से भी बतौर फ्रीलांस संवाददाता जुडे हुए हैं।

दाऊदनगर में ईलाज करवा रहे उपेंद्र कश्यप

दाऊदनगर में हुए हमले के समय मौके पर ओबरा विधानसभा क्षेत्र से राजद विधायक वीरेन्द्र कुमार सिन्हा भी मौजूद थे। सबसे अधिक चिंताजनक है कि न तो मौके पर मौजूद पुलिस ने उन्हें बचाने की कोई कोशिश की और न ही राजद विधायक ने।

उपेंद्र कश्यप गंभीर पत्रकार माने जाते हैं। फारवर्ड प्रेस के प्रबंध संपादक प्रमोद रंजन अपने फेसबुक पेज पर कश्यप के लेखन के संबंध में बताते हैं कि वे  “बिहार के उन गिने-चुने पत्रकारों में हैं, जो न सिर्फ विषयों की गहन समझ रखते हैं, बल्कि सामाजिक न्याय के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के लिए भी जाने जाते हैं। लक्ष्मणपुर बाथे, मियांपुर, बथानी टोला आदि नरसंहारों पर न सिर्फ उन्होंने संवेदनशील रिर्पोटिंग की है, बल्कि इन नरसंहारों के जो फोटोग्राफ आज हम इंटरनेट पर तैरते देखते हैं, उनमें से कई दुर्लभ फोटोग्राफ उनके ही आर्काइव के हैं। क्षेत्र की जनता उन्हें एक बेहद ईमानदार पत्रकार तथा एक सांस्कृतिक कार्यकर्ता के रूप में जानती है।श्री रंजन ने बहुजन संस्कृति के प्रति उनके योगदानों को भी चिन्हित करते हुए लिखा है किदाऊदनगर जिऊतिया नामक बहुजन-त्योहार का जनक रहा है। इसकी खो रही विरासत को संजोने तथा उसे प्रगतिशील रूप देने में भी उपेंद्र की प्रमुख भूमिका रही है।  वे न सिर्फ इस त्योहार की प्रबंधन-मंडली का हिस्सा रहे हैं, बल्कि उन्होंने इस त्योहार के बहुजन तत्वों को रेखांकित करती हुए एक किताब भी लिखी है।”

असल में औरंगाबाद की राजनीति के कई आयाम हैं। पहले सवर्णों के वर्चस्व के बाद अब औरंगाबाद में यादव जाति के लोग निर्णायक भूमिका में हैं। इस पैटर्न पर यहां की राजनीतिक आबोहवा भी बदली है। सत्ता के साथ ही सवर्णों का सामंती आचरण भी हस्तांतरित हुआ है, जिसमें गंभीरता व संवेदनशीलता का घोर अभाव दिखता है।

उपेंद्र कश्यप : निडर लेखन, ईमानदारी और बहुजन-सरोकारों के कारण है साख

जिस घटना की रिपोर्टिंग करते समय उपेन्द्र कश्यप भीड़ की हिंसा के शिकार हुए, वह घटना भी औरंगाबाद जिले  में बढते जातीय उन्माद की ओर ईशारा करता है। घटना की शुरुआत करीब एक महीना पहले हुई । दाऊद नगर बस पड़ाव पर एजेंट धर्मेंद्र कुमार और एक टेंपो चालक सुनील कुमार के बीच यात्रियों को बिठाने को लेकर कहासुनी हुई थी। यह कहासुनी 11 मई 2017 को खूनी संघर्ष में तब्दील हो गया जब सुनील कुमार ने अपने दो दोस्तों के साथ मिलकर धर्मेंद्र को गोली मार दी। घटना को अंजाम देकर भागते समय वह धर्मेंद्र के पैतृक गांव उमरचक के पास ग्रामीणों के हत्थे चढ गया और लोगों ने पीट-पीटकर उसकी हत्या कर दी। उपेन्द्र इसी घटना की रिपोर्टिंग करने दाउदनगर के भखरुआ मोड़ पहुंचे थे जहां धर्मेंद्र को गोली मारी गयी थी।

अपने उपर हुए हमले की जानकारी देते हुए उपेन्द्र कश्यप ने बताया कि 25 वर्ष की पत्रकारिता में यह पहला मौका है जब उनपर इस प्रकार हमला किया गया। उन्होंने बताया कि उनके द्वारा एक प्राथमिकी दर्ज करायी गयी है। प्राथमिकी के मुताबिक घटनास्थल पर लोग आक्रोशपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे और उत्पात मचा रहे थे। इसी बीच एक अज्ञात व्यक्ति ने कहा कि मीडिया के लोग सामाजिक न्याय के खिलाफ़ रिपोर्टिंग करते हैं। इन्हें मारो। इसके बाद लोग उपेन्द्र पर टूट पड़े। किसी तरह उपेन्द्र ने एक पेट्रोलपंप के दफ़्तर में घुसकर अपनी जान बचायी। उपेन्द्र के मुताबिक इस घटना में उन्हें सिर में गंभीर चोटें आयीं और टांके लगाये गये।

अपने परिवार के साथ फुर्सत के क्षण : हमले के बाद दशहत में हैं उपेंद्र के परिजन

घटना के संबंध में स्थानीय राजद नेता अरुण यादव (इनके बारे में उपेन्द्र कश्यप ने जिक्र किया है) ने दूरभाष पर बताया कि जिस वक्त उपेन्द्र जी के साथ मारपीट हो रही थी, उस समय  वे करीब 250 मीटर दूर भखरुआ चौक पर पुलिस अधिकारियों की मौजुदगी में लोगों को शांत कराने का प्रयास कर रहे थे। उन्होंने उपेन्द्र कश्यप के प्रति किसी भी तरह के पूर्वाग्रह से इन्कार किया।

विधायक के दावों से इतर सच्चाई यह है कि उपेन्द्र कश्यप के साथ हिंसा केवल भीड़ की हिंसा नहीं है बल्कि यह एक जातीय उन्माद का परिणाम भी है जिसकी अनदेखी करना खतरनाक होगा। औरंगाबाद पुलिस के मुताबिक श्री कश्यप द्वारा दर्ज कराये गये मामले की जांच की जा रही है और उनकी निशानदेही पर दोषियों की गिरफ़्तारी के लिए खोजबीन की जा रही है।


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