डॉ. आंबेडकर : एक अप्रतिम विधिवेत्ता

जब आंबेडकर विधि महाविधालय के प्राचार्य थे तब खुशमिजाजी में कहा करते थे, “हम भी न्यायाधीश बनेंगे”। आंबेडकर के पास अवसर और काबिलियत दोनों थे लेकिन वे एक पद तक सीमित रहकर पहले की तरह सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक परिवर्तनों को अंजाम नहीं दे पाते। इसलिए वे स्वयं तो न्यायाधीश के पद पर आसीन नहीं हुए, परंतु ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापन में सफल रहे जिसमें समानता एवं न्याय के अवसर समाहित हैं

डॉ. बी. आर. आंबेडकर

डॉ. आंबेडकर कई विषयों के विशेषज्ञ थे। उनमें से एक विषय कानून भी था। आंबेडकर ने अपने अध्ययन का पर्याप्त समय देश-दुनिया के कानूनों को जानने समझने में व्यतीत किया था। वे छात्र जीवन में तत्परता के साथ नवीन-प्राचीन कानूनों की समझ विकसित करने में लगे थे। बीतते समय के साथ उन्होंने कानून के विविध पहलुओं पर महारत हासिल कर ली। शीघ्र ही वे समकालीन कानूनविदों व विधिवेत्ताओं से आगे निकल गए। इस निबंध में विधिवेत्ता आंबेडकर के जीवन के विलक्षण कानूनी पहलुओं को केंद्र में रखा गया है। मुख्यतया आंबेडकर की कानूनी शिक्षा, कानूनी शिक्षा उपरांत वकालती पेशे में पदार्पण, कानून के प्राध्यापक बनने और एक अप्रतिम विधिवेत्ता के रूप में संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया गया है।

समकालीन राजनीति के बरक्स आंबेडकर

सर्वप्रथम एक विषय के रूप में कानून के उभरने और भारत में एक पेशा बनने की संक्षिप्त पृष्ठभूमि पर नजर डालते है। तथ्यतः 19वी. शताब्दी की शुरुआत में विश्व भर में कानूनी पेशा एक व्यापक पेशे के रूप में उभर रहा था। विषय के तौर पर कानूनी अध्ययन की रूपरेखा निर्धारित की जाने लगी। जिससे कानून के बेहतर विशेषज्ञ बनाए जा सके। नए नियम, कायदे, कानूनों को गढ़ा जाने लगा। साम्राज्यवाद से मुक्त हो रहे देशों ने अपना संविधान लिखने की ओर कदम बढ़ाये। भारत में भी 19वी. शताब्दी के उत्तरार्ध में कानूनी अध्ययन व कानूनी पेशे के साथ सम्मान व प्रभावशीलता के तत्व जुड़ने लगे। प्रतिभाशाली एवं संसाधन संपन्न विशेषकर उच्च वर्गों से संबंधित भारतीय कानूनी अध्ययन की ओर अग्रसर होने लगे। पहले पहल कानून के अध्ययन के लिए भारतीयों ने विदेश की ओर रुख किया क्योंकि भारत में नए कानूनी शिक्षा संस्थान न के बराबर थे। 20वी. शताब्दी तक आते-आते भारत में कानूनी पेशा अत्यधिक सम्माननीय व प्रभावशाली पेशा बन गया। इस दौर में वकालत की डिग्री प्राप्त करना विशिष्ट अहर्ता समझी जाने लगी। कानूनी शिक्षा प्राप्त करना अवश्य सभी छात्रों का स्वप्न भी रहा होगा। भारत में कानून की डिग्री धारक नेता स्वतंत्रता आंदोलन में सर्वाधिक सक्रिय एवं शीर्ष पंक्ति में थे। ये नेता भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में अत्यंत प्रभावशाली रहे। इनमें बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, मोहनदास करमचंद गाँधी, मोतीलाल नेहरू, जवाहर लाल नेहरू, मोहम्मद अली जिन्ना, वल्लभ भाई पटेल, गोविन्द बल्लभ पंत, मदन मोहन मालवीय, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर इत्यादि शामिल थे। कानून के इन विशेषज्ञों ने मजबूत भारत की नींव रखी। आंबेडकर सीधे तौर पर स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल नहीं थे क्योंकि उनके द्वारा उठाये गए विभिन्न सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक मुद्दों पर अन्य राष्ट्रीय नेताओं की बेरुखी थी। आंबेडकर जीवन पर्यंत ब्रिटिश साम्राज्यवादियों और भारत के राष्ट्रीय नेताओं की जबरदस्त आलोचना करते रहे। वे अछूतों (दलित), पिछड़ों, महिलाओं, मजदूरों के मुद्दों के साथ-साथ अन्य समसामायिक मुद्दों पर स्पष्ट राय रखते रहे। उन्होंने उन मुद्दों को राष्ट्रीय मुद्दा बनाया और संघर्ष कर विकल्प सुझाये जिन पर अन्य राष्ट्रीय नेता चर्चा करना भी पसंद नहीं करते थे। यह स्वीकारने में कोई अतिशयोक्ति न होगी कि इन नेताओं में आंबेडकर उच्च कोटि के कानूनी विद्वान थे।

औरंगाबाद के मिलिंद कॉलेज में आंबेडकर

ज्ञान की प्यास व कानूनी शिक्षा/अध्ययन

आंबेडकर की प्रारंभिक शिक्षा सतारा के उच्च विधालय, दसवीं एलफिंस्टन उच्च विधालय, बॉम्बे (अब मुंबई) और बॉम्बे विश्वविधालय के एलफिंस्टन महाविद्यालय से क्रमशः 1909, 1913 में कला विषयों में बारहवीं व स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की। अंग्रेजी भाषा पर मजबूत पकड़ की वजह से बड़ौदा राज्य (अब वडोदरा) के महाराज सयाजीराव गायकवाड़ ने अन्य विधार्थियों के साथ उन्हें भी चयनित कर 230 पौंड वार्षिक छात्रवृति पर अमेरिका के कोलंबिया विश्वविधालय में अध्ययन के लिए भेजा। कोलंबिया विश्वविधालय से मुख्यतः अर्थशास्त्र व समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर और अर्थशास्त्र में डॉक्ट्रेट के अध्ययन उपरांत आंबेडकर ने लंदन जाने का निश्चय किया। वे वकील बनना चाहते थे, जो आर्थिक स्वावलंबन के लिए जरुरी था। आंबेडकर ने अक्टूबर 1916 में ‘ग्रेज इन बार सोसाइटी’ से बार-एट-लॉ (बैरिस्टर) में प्रवेश प्राप्त कर नवंबर से कानूनी अध्ययन शुरू कर दिया। जिज्ञासू आंबेडकर लंदन के पुस्तकालयों में गंभीर मुद्रा में अध्ययनरत रहते थे। लंदन संग्रहालय में सुबह 8 से शाम 5 बजे तक किताबों में तल्लीन रहते थे। ‘ज्ञान की प्यास’ ऐसी थी कि कभी दोपहर तो कभी रात्रि भोजन भी छोड़ देते थे। यह प्यास आखरी श्वास तक बनी रही। उनका पूरा जीवन ही गहन शिक्षण, बहादुराना आत्मसम्मान, असीम महत्वाकांक्षा, महान विचार, विशाल बुद्धि, निरंतर परिश्रम और बेदाग नैतिक चरित्र से परिपूर्ण था। वे बड़ौदा के महाराज द्वारा अनुमोदित शैक्षिक छात्रवृति पर पढ़ रहे थे। इसलिए अर्थशास्त्र में एक और डिग्री हासिल करना चाहते थे। छात्रवृति की अवधि केवल तीन वर्ष निर्धारित की गई थी। आग्रह करने पर उन्हें एक वर्ष की अतिरिक्त अनुमति मिल गई। लेकिन बड़ौदा से मिलने वाली छात्रवृति की अवधि दो साल के लिए और बढ़ाये जाने की अनुमति नहीं मिली। ज्ञान के प्यासे आंबेडकर को विवश होकर अध्ययन बीच में छोड़ भारत लौटना पड़ा। परन्तु आंबेडकर अधूरे अध्ययन को पूर्ण करने के लिए संबद्ध विश्वविधालयी संस्थान से चार वर्ष की अनुमति ले आये थे। लंदन में अध्ययन के लिए शाहू महाराज ने भी उनकी वित्तीय सहायता की।

वर्ष 1950 में औरंगाबाद कोर्ट में भ्रमण करते आंबेडकर

30 सितंबर 1920 को आंबेडकर वापस लंदन गए और ‘ग्रेज इन’ में अध्ययन शुरू किया। यूनिवर्सिटी जनरल लाइब्रेरी, गोल्डस्मिथ लाइब्रेरी ऑफ़ इकॉनोमिक्स, ब्रिटिश म्यूजियम और इंडिया ऑफिस लाइब्रेरी में गहन एवं व्यापक अध्ययन किया। सिनेमा, रेस्तरां और इधर-उधर की गतिविधियों की बजाए उन्होंने अध्ययन को प्राथमिकता दी। कार्ल मार्क्स, लेनिन, मैजिनी, सावरकर ने भी ब्रिटिश म्यूजियम लाइब्रेरी में गहन अध्ययन किया था जिसकी विरासत में एक और दार्शनिक आंबेडकर भी जुड़ गए। 28 जून 1922 में आंबेडकर को बार-एट-लॉ की डिग्री प्रदान की गई। यह रोचक बिंदु है कि स्नातक, स्नातकोत्तर, अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की दो डिग्री (पीएच. डी., डी. एससी.), बार-एट-लॉ के साथ डॉ. आंबेडकर तब ‘सबसे अधिक अहर्ता प्राप्त’ भारतीय और एशियाई व्यक्ति थे। महाद्वीप में शैक्षिक उपलब्धियों में उनके समकक्ष कोई नहीं था। आंबेडकर शिक्षा प्राप्ति के बाद सीधे विश्व के सामाजिक आर्थिक चिंतन से जुड़ गए। निस्संदेह उनकी शिक्षा अवधि संघर्षपूर्ण थी। ओमवेट (2005) ने उनकी अध्ययन शैली को ‘प्रोमैथियन संघर्ष’(भगीरथ) से जोड़ा है अर्थात विद्रोही सृजनात्मक और नवीन।

न्यायप्रिय वकील के रुप में आंबेडकर

1923 में लंदन से शिक्षा प्राप्त कर भारत लौटे आंबेडकर के सामने पत्नी, बच्चे, भाभी, भतीजे की देखभाल संबंधी गृहस्थ समस्याएं थी। वे वकालती पेशा अपनाना चाहते थे, जिसके लिए बॉम्बे उच्च न्यायालय में पंजीकरण आवश्यक था। सनद लेने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे। न्यायालय में वकालत करने के लिए 500 रूपये सनद देकर उनके मित्र नवल भथेना ने मदद की। वे 1923 में बार के सदस्य बने। वकील आंबेडकर ने भारत में बॉम्बे उच्च न्यायालय और जिला स्तरीय अन्य अदालतों(ठाणे, नागपुर, औरंगाबाद आदि) में वकालत शुरू कर दी। अर्थशास्त्री आंबेडकर पर वकील आंबेडकर ने तुरंत प्रधानता ले ली। क्योंकि यह सामाजिक कार्य करने के लिए आज़ादी और खाली समय प्रदान करता था। कानूनी पेशे में लगन की वजह से उन्होंने ब्रिटिश सरकार की 2500 रूपये महीने की नौकरी और कोल्हापुर राज्य की राज्य सेवा के प्रस्ताव को भी अस्वीकृत कर दिया। आंबेडकर वकालत के लिए एक कार्यालय खोलना चाहते थे। धन के अभाव में कोर्ट के बाहर कार्यालय खोलना सरल कार्य नहीं था। मित्रों की सहायता से आंबेडकर ने वकालत के लिए पहला कार्यालय एक छोटे कमरे में सोशल सर्विस लीग, पोयाबावडी, बॉम्बे में खोला जो बाद में दामोदर हॉल प्रथम तल, परेल में स्थानांतरित किया गया जिसमें नेपोलियन बोनापार्ट का चित्र लगा था। नेपोलियन एक महान प्रशासक थे। यधपि आंबेडकर ने कार्यालय तो खोल लिया था लेकिन हिंदू जातियों के पेशे में असहयोग की वजह से उन्हें अदालती मुकदमे नहीं मिलते थे। उनके कुछ सहयोगियों ने मुकदमे दिलवाने में उनकी मदद की। शुरुआती मुकदमा मिलने में कई महीने लग गए। लंबे अरसे के बाद एक महार का मुकदमा मिला। लोकमान्य तिलक के भतीजे से उन्हें वकालत के काम में सहायता मिली। गोरे (ब्रिटिश, यूरोपियन) वकीलों पर अधिक विश्वास करना, उच्च जातीय हिन्दुओं द्वारा असहयोग और आंबेडकर का तथा-कथित निम्न जाति में पैदा होना वकालती पेशे में बाधक था। इन बाधाओं के बावजूद वे कानून के क्षेत्र में सफलता व कीर्ति प्राप्त करने का निश्चय कर चुके थे। वे दृढ़ता से कहते थे कि “मैं उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का पद भी प्राप्त करूँगा।” पुस्तकें खरीदने की आदत और परिवार चलाने में उनकी पत्नी रमाबाई संघर्षरत रहती थी। बावजूद इसके कार्यालय, ग्रंथालय स्थापित होने, महारों व मित्रों की भीड़ से उनके जीवन में रौनक आने लगी थी। परिवार की जरूरतों को पूरा करने के आलावा उन्हें गरीबी तथा जातिगत भेदभाव के कटु अनुभव हुए। नेहरू या उनके साथियों द्वारा स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रियता की वजह से सरकारी नौकरी और न्यायालय से संबंध तोड़ना कठिन कार्य नहीं था क्योंकि उनके पास धनाढ्य वर्ग व परिवार से आर्थिक सहायता मिलने का एक विकल्प था। लेकिन आंबेडकर जैसे नीची जाति के गरीब व्यक्ति के लिए परिवार चलाना संभव कार्य नहीं था। उनके सामने नौकरी के अलावा अन्य विकल्प नहीं थे।

वर्ष 1950 में अहमदाबाद कोर्ट में सुनवाई के दौरान उपस्थित आंबेडकर

1926 मे आंबेडकर को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण दो मुकदमे मिले। एक दिनकरराव जावलकर द्वारा लिखित पुस्तक ‘देशाचे दुश्मन’ (देश के दुश्मन) और दूसरा मुकदमा फिलिप स्प्रैट की पुस्तिका ‘इंडिया एंड चाइना’ से संबंधित था। लोकमान्य तिलक, विष्णुशास्त्री चिपलूनकर और उनके समर्थक ज्योतिराव गोविंदराव फुले के विरुद्ध दुष्प्रचार करने में लगे हुए थे। जावलकर ने तिलक और चिपलूनकर जैसे घोर ब्राह्मणवादियों को ‘देश के दुश्मन’ कहा और गाँधी को बेहतर विकल्प माना था। जावलकर ने फुले के अपमान का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए पुस्तक लिखी थी। कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है कि फुले ने वास्तव में ईसाई धर्म स्वीकार किया या नहीं। जबकि जज ने फैसला तिलक समर्थित खेमे के पक्ष में दिया था। जावलकर और उनके साथी मुकदमा हार चुके थे। आंबेडकर ने दलील दी कि पहले वाले न्यायाधीश पूर्वाग्रही थे जो फुले को भी ईसाई मानते थे। अक्टूबर 1926 में आंबेडकर ने प्रसिद्ध ब्राह्मण और गैर-ब्राह्मणों का ‘देश के दुश्मन’ मुकदमा जीत लिया। इस रोमांचक मुकदमे के कारण वकील आंबेडकर की ख्याति और बढ़ गई। तिलक के पुत्र श्रीधरपंत तिलक आंबेडकर के अनुयायी/मित्र बन गए। क्योंकि तिलक ब्राह्मण समर्थक थे। जबकि आंबेडकर द्वारा स्थापित ‘समाज समता संघ’ की एक शाखा के अध्यक्ष श्रीधरपंत तिलक अपने पिता के विपरीत छुआछूत, चातुर्वर्ण्य व्यवस्था के खिलाफ थे। बाद में उनके सगे संबंधियों व ब्राह्मणवादियों द्वारा प्रताड़ित श्रीधरपंत तिलक ने आत्महत्या कर ली थी। आंबेडकर ने तिलक की बजाए उनके पुत्र को ‘सच्चा लोकमान्य’ कहा। आंबेडकर फिलिप स्प्रैट का मुकदमा भी जीत गए। भारत में साम्यवादी आंदोलन के आधार निर्माण के लिए आये फिलिप स्प्रैट एक ब्रिटिश साम्यवादी थे।

वर्ष 1953 में मोतियाबिंद के आपरेशन के बाद दिल्ली में अपनी पत्नी सविता आंबेडकर के साथ बाबा साहब

आंबेडकर ने 1933 में एक अन्य ऐतिहासिक मुकदमा लड़ा जिसका राष्ट्र के साथ-साथ वैश्विक महत्व था। यह मुकदमा था रघुनाथ धोंडो कर्वे का जो धोंडो केशव कर्वे के पुत्र थे। र. धो. कर्वे अपनी पत्रिका ‘समाजस्वास्थ’ में यौन मामलों पर जागरूकता फैलाने का काम करते थे। वे ‘रीज़न’ पत्रिका के भी संपादक रहे। कर्वे पर अश्लीलता फैलाने के आरोप लगाकर एक मुकदमा दायर किया गया। आंबेडकर ने प्रतिक्रियावादियों के उग्र विरोध के बावजूद कर्वे के बचाव में मुकदमा लड़ा। आंबेडकर ने दलील दी की “अश्लीलता अर्थ पर निर्भर नहीं करती है बल्कि अभिव्यक्ति की भाषा पर।” आंबेडकर के दृष्टिकोण से देखें तो अश्लीलता अर्थ पर कम बल्कि अभिव्यक्ति के लिए प्रयुक्त लिखित व मौखिक भाषा प्रयोग पर अधिक निर्भर करती है। वे अश्लीलता की परिभाषा, अर्थ व दलीलों के बावजूद मुकदमा नहीं जीत सके। आंबेडकर की उक्ति दर्शाती है कि वे विभिन्न प्रकार के विषयों पर समझ विकसित कर रहे थे। स्वतंत्र रूप से चिंतन मनन करते थे। सदैव सभी प्रगतिशील क्रियाओं को समर्थन देते थे। आंबेडकर ने बॉम्बे उच्च न्यायालय में साम्यवादी लेखक स्प्रैट के मुकदमे का बचाव किया, घोर ब्राह्मणवादियों से मुकदमा हार चुके जावलकर के बचाव के लिए आगे आये, रूढ़िवादियों की उग्र प्रतिक्रियाओं से अस्थिर हुए बिना कर्वे का मुकदमा लड़ा और उनके यौन जागरूकता के मुद्दों का समर्थन किया। इस प्रकार के तथ्य उनकी न्यायप्रियता, गहरी कानूनी समझ, अपने पेशे के प्रति समर्पण व नैतिकता को दर्शाते है।

तर्कशील वकील आंबेडकर की तर्कसंगत दलीलें सुनने के लिए अनगिनत लोग उच्च न्यायालय के कक्ष में और बाहर खड़े रहते थे। एक प्रतिष्ठित वकील के रूप में आंबेडकर का कानूनी पेशे का कार्य ऐतिहासिक और प्रेरणादायक है। वे मुवक्किलों के प्रति उदार थे। इसी उदारता की वजह से हिंदू, ईसाई, मुस्लमान, विभिन्न सामुदायिक वर्गों व जातियों, श्रमिक वर्ग, कारखाना मजदूर, दुकानदार इत्यादि मुकदमा लड़ने की मांग करते थे। यहाँ तक की वेश्याएं भी मुकदमा लड़ने की मांग करती थी। वकील के रूप में उनकी प्रतिष्ठा खोखली नहीं थी, क्योंकि उनके पास देश-दुनिया के नवीन-प्राचीन दस्तावेजों में संचित कानूनी ज्ञान व सूझबूझ का भंडार था। उनके कार्यालय में सभी देशों के उच्च न्यायालयों के फैसलों व कानून की रिपोर्ट मौजूद रहती थी।

महार सत्याग्रह के स्वागत समिति के सदस्यों के साथ आंबेडकर

शुरू-शुरू में बॉम्बे उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जॉन न्यूमॉन्ट की राय आंबेडकर के विरुद्ध थी। लेकिन आंबेडकर ने स्वयं को एक प्रख्यात वकील के तौर पर स्थापित कर लिया था। न्यूमॉन्ट ने उनकी आपराधिक अपीलीय मुकदमों की प्रशंसा की। आपराधिक अपील के मामलों में उनका बेहतरीन काम देखकर बेहद खुश हो गए और उनका आदर करने लगे। कभी-कभी आंबेडकर को चाय पर भी आमंत्रित करते थे। बॉम्बे से निकलने वाली पत्रिका ‘बॉम्बे लॉ जरनल’ के संयुक्त संपादक अटॉर्नी-एट-लॉ एन. एच. पांडिया और बी. जी. खेर ने आंबेडकर को लिखा कि वे उन्हें संपादकीय मंडल का सदस्य बनाना चाहते है ताकि पत्रिका को और अधिक बेहतर किया जा सके। वे 1927-28 में ‘बॉम्बे लॉ जरनल’  की सलाहकार व संपादकीय समिति के विशिष्ठ सदस्य रहे। अक्टूबर 1928 में उन्होंने समिति छोड़ दी। इस दौरान वे अन्य परिवर्तनकारी कार्यों में भी व्यस्त थे।

बींसवी शताब्दी में स्मृति कानूनों का स्थान निरपेक्ष कानून लेने लगे। ‘मनुस्मृति’ के क़ानूनों के स्थान पर आंबेडकर के कानून स्थापित होने लगे। रूढ़िवादी और पुरातन कानूनों को सबसे बड़ी सांस्कृतिक चुनौती तब मिली जब आंबेडकर के नेतृत्व में 25 दिसम्बर 1927 को हिंदुओं और दलितों ने सार्वजनिक रूप से मनुस्मृति को जलाया। ब्राह्मणवाद, जातिवाद और सांस्कृतिक दासता के इस बड़े प्रतीक और स्रोत को जलाने के ऐतिहासिक कार्य के बाद आंबेडकर राजनीति में गाँधी के समकक्ष आ गए। हालांकि वे एक प्राध्यापक बनना और विद्वान जैसा जीवन व्यतीत करना चाहते थे, परंतु परिस्थितिवश राजनीति में आना पड़ा।

कानून के प्रख्यात प्राध्यापक

वकालत से आजीविका के लिए पर्याप्त आय प्राप्त नहीं हो रही थी। इसलिए वे अध्यापन कार्य भी तलाशने में लगे थे। जून 1925 से मार्च 1928 तक ‘बेटलिबोइस एकाउंटेंसी इंस्टिट्यूट’ में एक अंशकालिक व्याख्याता की नौकरी की जहाँ वे व्यापारिक कानून पढ़ाते थे। साथ ही बॉम्बे विश्वविधालय में परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाएं जांचने से भी कुछ आय प्राप्त हुई। जून 1928 में आंबेडकर सरकारी विधि महाविद्यालय, बॉम्बे में प्राध्यापक बने। 1920 के दशक के दौरान राष्ट्रवादी भावना चरम पर थी। ब्रिटिश सरकार के खिलाफ राष्ट्रवादी भावना का शिकार उनको भी होना पड़ा। क्योंकि वे 1928 में ‘भारतीय सांविधिक आयोग’ अर्थात ‘साइमन कमीशन’ के समक्ष दलितों के प्रतिनिधि के तौर पर साक्ष्य ज्ञापन प्रस्तुतिकरण के लिए गए थे। जबकि अन्य राष्ट्रीय नेता उनका विरोध कर रहे थे। राष्ट्रवादी भावना से ओत-प्रोत माहौल में विधार्थी उनकी विधि की कक्षा से विरोधस्वरूप उठ कर चले जाते थे। इसके विपरीत उनके समर्थकों ने उनके द्वारा प्रस्तुत ज्ञापन को ‘दलित मानव अधिकारों का घोषणापत्र’  कहा था।

बंबई में आचार्य अतरे की फिल्म ‘महात्मा जोती राव फुले’ की शुटिंग शुरू होने के समय आंबेडकर

1933 में आंबेडकर को बांबे विश्वविद्यालय के कानून और कला, विभाग में एक ‘अध्येता’  के तौर पर नियुक्त किया गया। जून 1934 में उन्होंने बॉम्बे विश्वविद्यालय के सरकारी विधि महाविद्यालय में अंशकालिक प्राध्यापक के पद पर पढ़ाया। इस दौरान छात्रों को भाषण देने के लिए इंग्लिश संविधान पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां भी लिखी। आंबेडकर के आपराधिक अपील के मामलों में बेहतरीन काम देखकर जॉन न्यूमॉन्ट बेहद खुश थे और उनको विधि महाविधालय के प्राचार्य पद पर नियुक्ति करना चाहते थे। सरकार द्वारा 2 जून 1935 को उनकी नियुक्ति महाविद्यालय के प्राचार्य पद पर की गई। जहाँ वे न्यायशास्त्र पढ़ाते थे। उन्हें प्राचार्य पद पर नियुक्त कर न्यूमॉन्ट गर्व अनुभव कर रहे थे। उन दिनों इस पद को उच्च न्यायालय न्यायाधीश पद तक पहुँचने की एक सीढ़ी माना जाता था। विधि महाविद्यालय में पढ़ाते समय उनके बारे में कहा जाता था कि अगर वे यहाँ शिक्षा देते रहे तो उनके विचारों से महाविद्यालय की दीवारें ढह जायेंगी। आचार्य ईश्वरदत्त मेधार्थी ने उन्हें ‘युवकों का निडर नेता’  कहा।

महाविद्यालय की प्रतिष्ठा बढ़ाने की दृष्टि से उन्होंने बंबई सरकार को एक योजना भी प्रस्तुत की थी। उन्होंने ‘बंबई प्रांत की कानूनी शिक्षा के सुधार संबंधी विचार’ लेख में कानूनी शिक्षा के विभिन्न पहलुओं पर विचार प्रकट किये। इसमें पाठ्यक्रम, पाठ्यक्रम के विषय, कानूनी शिक्षा की शुरुआत के लिए उपयुक्त उम्र, भाषा शैली तार्किकता, विशेषज्ञता का विकास प्रमुख थे। वे कानूनी शिक्षा को स्नातक व स्नातकोत्तर अध्ययन मानने की बजाए दसवीं कक्षा उपरांत दी जाने वाली शिक्षा एवं इसमें सुधार के लिए पाठ्यक्रम में विषयों के चयन को सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानते थे। इससे विद्यार्थी अध्ययन के निर्धारित लक्ष्य बना सके और व्यवसाय चयन कर अपने पेशे में दसवीं के बाद ही विशेषज्ञ हो सके। कानूनी शिक्षा योजना में अन्य विषयों के अध्ययन को विशेष महत्वपूर्णता दी। जैसे:- समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, तर्क, वाक्पटुता या सार्वजनिक बोलने की कला, भाषा पर काबू। इनमें से किसी भी विषय को कानून के पाठ्यक्रम का भाग नहीं बनाया गया था। विधि महाविद्यालय के मासिक पत्र, अक्टूबर 1936 में एक लेख ‘1829-31 के प्रिवी काउंसिल द्वारा दिया गया निर्णय और डॉ. आंबेडकर का विवेचन’ में आंबेडकर के कानूनी समझ विकसित करने संबंधी विचार थे। वे विषयों के पारंपरिक संबंध की महत्वपूर्णता पर जोर देते थे। जनवरी 1936 की महाविद्यालय पत्रिका में आंबेडकर की कानूनी गहरी गूढ़ समझ और विशेषज्ञता के गुणों की प्रशंसा करते हुए लिखा गया कि “आंबेडकर ख्यातकीर्त और अर्थशास्त्र का आस्थापूर्वक अध्ययन करने वाले एक व्यासंगी व्यक्ति है। वे संविधानशास्त्र के अधिकारी व्यक्ति है, ऐसी उनकी हिंदुस्तान और अन्यत्र कीर्ति है।”

प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ नयी दिल्ली में अपना जन्मदिन मनाते आंबेडकर

मई 1938 में उन्होंने विधि महाविद्यालय के प्राचार्य पद से त्यागपत्र दे दिया। उनकी प्रशंसा में विधि महाविद्यालय की मासिक पत्रिका में लिखा गया कि “डॉ. आंबेडकर के ज्ञान और कार्य-कौशल के बारे में विद्यार्थियों में बहुत आदर था। उनके व्याख्यान अध्ययन का निचोड़ और मनोयोगपूर्ण होते थे। विधिशास्त्र के विषय में उनके विचार हमेशा क्रांतिकारी हुआ करते थे।” उनकी प्रशंसा ऊपरी तौर पर थी या वे प्रशंसा के योग्य थे? इसके उत्तर में कहा जा सकता है कि विधिशास्त्रीय क्रांतिकारी विचार उनके लेखनों और भाषणों में स्पष्ट दिखाई पड़ते है। क्रांतिकारी विचारों से परिपूर्ण ‘एन्निहिलेशन ऑफ़ कास्ट’(1936) में वे स्पष्ट तौर पर लिखते है कि “कानून का विचार परिवर्तन के विचार से जुड़ा हुआ है। धर्म कानून है और लोग जाने व स्वीकार करें कि कानून बदले जा सकते है।… हिंदुओं को यह समझ जाना चाहिए कि कुछ भी स्थाई, शाश्वत और ‘सनातन’ नहीं है।

अप्रतिम विधिवेत्ता

आंबेडकर केवल कानून और न्यायशास्त्र के प्रख्यात प्राध्यापक व एक प्रसिद्ध वकील ही नहीं थे बल्कि उनके पास विशाल विधायी अनुभव भी था। 1927 से 1939 तक बॉम्बे विधान परिषद/sविधान सभा में विधायक और 1942-46 में ब्रिटिश सरकार में ‘वाइसराय की आधिकारिक/कार्यकारिणी परिषद’  में श्रम सदस्य/मंत्री थे। आंबेडकर ने श्रम सदस्य के पद पर रहते हुए श्रमिकों की बेहतरी के लिए तो कार्य किए ही, साथ ही यह तथ्य भी ध्यान में रखना चाहिए कि पूंजीपतियों और सरकार द्वारा श्रमिकों के शोषण के विरुद्ध एक दशक पूर्व से ही कल्याणकारी कार्यों में लगे हुए थे। उन्होंने जाति की व्याख्या भी श्रम को केंद्र में रख कर की। एक सभ्य समाज के लिए श्रम के विभाजन को आवश्यक माना। लेकिन जन्म आधारित श्रम विभाजन को अप्राकृतिक सिद्ध किया। शोषण पर आधारित जाति, जो व्यवस्था की बजाए एक कुव्यवस्था है, व्यक्ति की योग्यता, कौशल के दायरे को सीमित करती रही। आंबेडकर के शब्दों में:- “जाति व्यवस्था केवल श्रम का विभाजन नहीं है। यह मजदूरों का भी एक विभाजन है।” अवसर मिलने पर उन्होंने भारत में मजदूरों के अधिकारों की सुरक्षा करने वाले कानूनों की नींव रखी। उन्होंने 1934 में ‘बॉम्बे कामगार संघ स्थापित किया’, 1936 में ‘नगर पालिका श्रमिक संघ’ के अध्यक्ष रहे और अपनी पहली राजनैतिक पार्टी का नाम ‘स्वतंत्र मजदूर पार्टी’ रखा। खोती व्यवस्था, महार वतन, हलाई व्यवस्था जैसी जातीय सामंती धार्मिक गुलामी की व्यवस्था के उन्मूलन के लिए 1937 में विधान सभा में विधेयक प्रस्तुत किये और बाहर संघर्ष किया। ब्रिटिश सरकार द्वारा मजदूरों के हड़ताल के अधिकार हनन के लिए लाये गए 1938 के ‘औद्योगिक विवाद विधेयक’ के विरोध में मुंबई में आंबेडकर, साम्यवादियों व अन्य दलों ने मिलकर विरोध कर ऐतिहासिक सफलता पाई। उनके पास श्रमिक, सिंचाई, विधुत ऊर्जा, सामाजिक कार्य और खदानों का प्रभार था। श्रम सदस्य रहते औधोगिक मजदूरों के कार्य का समय 14 से 8 घंटे करवाया और श्रमिकों के लिए सवैतनिक अवकाश की व्यवस्था, कुशल और अर्ध कुशल श्रमिकों के लिए रोजगार कार्यालय की स्थापना, कर्मचारी राज्य बीमा (ईएसआई), कर्मचारियों के वेतन के पैमाने की समीक्षा, श्रम कल्याण निधि कोष, न्यूनतम मजदूरी, महिलाओं के लिए प्रसव काल के दौरान अवकाश व कई अन्य लाभार्थी विधेयक, त्रिपक्षीय श्रम परिषद की स्थापना आदि से संबंधित महत्त्व के विधेयकों को पारित करवाने, कानूनों को लागू करवाने, कार्यालयों को स्थापित करवाने में उनकी निर्णायक भूमिका थी। उन्होंने किसी राजनैतिक लाभ की लालसा के लिए कार्य नहीं किया। न ही उनकी कथनी और करनी में कोई अंतर था। श्रमिक कानूनों और नीति निर्माण के अतिरिक्त आंबेडकर द्वारा जल और ऊर्जा नीति, आर्थिक योजना में किये गए पथप्रदर्शक कार्यों ने उन्हें ‘आधुनिक वैज्ञानिक भारत का जनक’ बना दिया। (अधिक देखें:- बाबासाहेब आंबेडकर संपूर्ण वाङ्मय खंड-18)

बंबई के कुपारगे में डॉ. आंबेडकर स्पोर्टिंग क्लब द्वारा आयोजित फुटबॉल मैच देखते आंबेडकर

वे स्वतंत्र भारत के प्रथम कानून मंत्री चुने गए। कानून मंत्री के पद पर रहते हुए उन्होंने सदियों तक गुलाम रहे भारत, भारत के वंचित वर्गों के अधिकारों, उनकी स्वतंत्रता के स्थाइत्व, ऊँच-नीच का भेद मिटा कर समानता स्थापित करने वाले कानून पारित करवाए। ये भारतीय इतिहास में मील का पत्थर साबित हुए। 29 अगस्त 1947 को वे संविधान लिखने वाली प्रारूप समिति के अध्यक्ष चुने गए। इस संवैधानिक सभा में सभी वर्गों के प्रतिनिधि मौजूद थे। मनु द्वारा शिक्षा के लिए अयोग्य माने गए शूद्रों व अछूतों के साथ मिलकर महिलाओं ने भी विश्व का सबसे उत्तम संविधान रचा जिसे विश्व का सबसे बड़ा लिखित, कठोर व परिस्थितियों के अनुसार ढलने के लिए लचीला भी बनाया गया। छात्र जीवन, वकालत करने और प्राध्यापक बनने के दौरान अछूतपन, अपमान, तिरस्कार भोगा, गाँधी का आलोचक होने के कारण निंदा की गई और अंग्रेजों का पिट्ठू कहकर भी जिसकी निंदा की जाती रही। जिसने बीस वर्ष पूर्व वर्ण-व्यवस्था, जातिवाद, सामाजिक विद्वेष की प्रतीक मनुस्मृति को जलाया था, और भारत के नए कानूनी-विधान अर्थात संविधान को रचने के लिए उन्ही हाथों में कलम थी। सदियों पूर्व मनु ने अछूतों, शूद्रों, महिलाओं को शिक्षा के साथ-साथ अन्य अधिकारों से वंचित करने के लिए मनुस्मृति नामक षड्यंत्रकारी सामाजिक दंड संहिता लिखी थी। अब शिक्षा से वंचित अछूत (अछूत पूर्ववर्ती अस्मिता अब दलित, लेकिन वर्तमान आधुनिक समाज में भी छुआछूत के अनेक रूप में विद्यमान है) समाज का एक व्यक्ति(आंबेडकर) स्वतंत्र भारत का संविधान निर्माता बन गया। संविधान लिखने में बड़ी भूमिका निभाते हुए भारत को विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक गणराज्य बनाया। आंबेडकर के वैचारिक विरोधी भी उनके उत्कृष्ट, अद्वितीय कार्य की प्रशंसा किये बिना न रह सके।

वर्ष 1950 में अपनी पत्नी सविता और श्रीलंका से आये तमिल प्रतिनिधियों के साथ आंबेडकर

कुछेक हिंदूवादी नेताओं ने आंबेडकर की तुलना मनु से करते हुए संविधान को ‘भीम-स्मृति’, ‘महार का कानून’ कहकर ‘आधुनिक मनु’ की संज्ञा दी। मनु से तुलना अनुचित थी। आंबेडकर और मनु द्वारा रचे गए कानूनों की प्रकृति व अर्थ में विविध आधारभूत भिन्नताएं थी। कानून की प्रकृति और मानव समाज के कानूनों के विषय में आंबेडकर की संकल्पनाएँ सुस्पष्ट थी। वास्तव में मनु ने ब्राह्मण वर्ण (अब जाति) के विशेषाधिकार के लिए असमान सामाजिक कानूनों की रचना कर भगवान(दैवीय) द्वारा बनाए जाने का षडयंत्र रचा, जबकि आंबेडकर ने इसे पूरी तरह मानवीय रचना कहा। मनु की दृष्टि में कानून अपरिवर्तनीय, शाश्वत, अपतनशील थे, जबकि आंबेडकर के लिए कानून जीवन की आवश्यकताओं के अनुसार परिवर्तनशील और संयोज्य थे। मनु ने केवल ब्राह्मणों, क्षत्रिय वर्णों(वर्गों) के लाभ के लिए कानून रचे, जबकि आंबेडकर ने हिंदू, मुसलमान, ईसाई, बौद्ध, सिख आदि के लिए कानून रचे, जिसमें जाति, वर्ण, धर्म, जन्म, लिंग, नस्ल, वर्ग, क्षेत्र आदि के आधार पर भेदभाव नहीं था। भारतीय संविधान के मूल में समाहित न्याय, स्वतंत्रता, समानता व बंधुत्व के सिद्धांतों की विश्व ने मुक्त हृदय से प्रशंसा की। नए स्वतंत्र और उभरते राष्ट्रों द्वारा संविधान लिखने के दौरान भारतीय संविधान को मार्गदर्शक के तौर पर प्रयोग किया गया। यह दस्तावेज मानवता का विशिष्ट प्रतीक बन गया।

बंबई में रेलवे स्टेशन पर शांताराम अन्नाजी उपाश्यन गुरूजी के साथ आंबेडकर। गुरूजी आंबेडकर द्वारा गठित बंबई अनुसूचित जाति इम्प्रुवमेंट ट्रस्ट के सचिव थे

महिलाओं को मिलने वाले अधिकारों को सुनिश्चित करने वाले कानूनों की नींव भी डॉ. आंबेडकर ने रखी थी। पितृसत्ता का दंश झेल रही महिलाओं को मुक्ति दिलाने में आंबेडकर की भूमिका सर्वोपरि थी। ‘हिंदू विधि संहिता’ का अध्ययन करने के लिए आंबेडकर की अध्यक्षता में 9 अप्रैल 1948 को एक समिति गठित की गई। बेनेगल नरसिंग राव द्वारा तैयार किये गए विधेयक के साथ-साथ महिला अधिकारों से संबंधित पहले के कई विधेयकों के अतिरिक्त आंबेडकर ने धर्म ग्रंथों, प्राचीन ग्रंथों, स्मृतियों, संहिताओं का गहन अध्ययन कर विधेयक को और अधिक पुख्ता बनाया। पुत्रों के साथ पुत्रियों को भी संपत्ति में अधिकार, घरेलु हिंसा व दांपत्य विश्वासघात पर तलाक़, पुरुषों द्वारा बहुपत्नीत्व की जगह एक पत्नी विवाह, अंतर्जातीय विवाह और दत्तकता आदि के लिए प्रारूप तैयार करने और महिलाओं को समानता का अधिकार दिलाने में आंबेडकर ने दिन रात एक कर दिए। महिला शोषण के विरुद्ध अधिकारों के युगांतकारी कार्यों से विचलित रूढ़िवादी हिन्दुओं ने पुरजोर विरोध किया। शरुआत में आंबेडकर और नेहरू ही संसद में रूढ़िवादियों के विरोध को तर्कों से धराशाही करने में लगे थे। लेकिन बाद में नेहरू ने कदम पीछे खींच लिए। महिलाऐं भी उनके विरोध में आ गई, जबकि वे सदियों से दास बना कर रखी गई महिलाओं के अधिकारों के लिए ही संघर्षरत थे। संसद के बाहर रूढ़िवादियों का विरोध, संसद के अंदर अपर्याप्त समर्थन और नेहरू द्वारा विधेयक को पारित करवाने के लिए कभी व्हिप  जारी न करने के कारण आंबेडकर ने नेहरू को विधेयक के प्रति अनिच्छुक, विधेयक को कई खंडों में तोड़ने और रूढ़िवादियों के सामने घुटने टेकने वाला कह कर त्याग पत्र दे दिया। आंबेडकर ने त्यागपत्र में कई अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे भी सामने रखे जिनमे अन्य पिछड़ा आयोग का गठन न करना, विधि मंत्रालय के साथ योजना मंत्रालय का प्रभार न देना व नेहरू सरकार की विदेश नीति आदि। एक वर्ष पूर्व विश्व का श्रेष्ठ संविधान लिखने वाले आंबेडकर को लोक सभा में त्यागपत्र पढ़ने तक की अनुमति नहीं दी गई। वे लोक सभा को छोड़ते हुए अन्य सदस्यों और पत्रकारों को त्यागपत्र की प्रतियां देते हुए चले गए। ‘हिंदू विधि संहिता’ को अब तक का सबसे बड़ा सुधारवादी उपाय कहते हुए आंबेडकर ने त्याग-पत्र में लिखा कि:-

हिंदू संहिता इस देश में विधानमंडल द्वारा अभी तक किए गए सामाजिक सुधार उपाय में सबसे महानतम था। अतीत में भारतीय विधानमंडल द्वारा कोई कानून पारित नहीं किया गया या भविष्य में पारित होने की संभावना है, उसकी महत्व के बिंदु पर इसके साथ तुलना की जा सकती है। वर्ग और वर्ग एवं लिंग के बीच असमानता छोड़ना जोकि हिंदू समाज की आत्मा है, को अछूता छोड़ देना और आर्थिक समस्याओं से संबंधित विधेयक पारित करते जाना हमारे संविधान का मजाक उड़ाना और गोबर के ढेर पर महल खड़ा करना है।” (मेरे द्वारा अनुवाद)

भारत के पहले गणतंत्र दिवस परेड के मौके पर अन्य सम्मानित जनों के साथ डॉ. बी. आर. आंबेडकर

कुछेक वर्ष बाद नेहरू के प्रयत्नों से ही आंबेडकर द्वारा महिला अधिकारों के लिए बनाए गए कानूनों को टुकड़ों- टुकड़ों में पारित किया गया। मई 1955 में हिंदू विवाह अधिनियम, मई 1956 में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, दिसंबर 1956 में हिंदू दत्तक ग्रहण और रखरखाव अधिनियम और जुलाई 1961 में दहेज निषेध अधिनियम पारित किये गए।

1951-52 के लोकसभा चुनाव में अप्रत्याशित असफलता के बाद भारत के राजनैतिक परिदृश्य में आंबेडकर का प्रभाव अवश्य कम हो रहा था, लेकिन इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनका महत्व और सम्मान बढ़ता ही जा रहा था। उनकी शैक्षिक संपत्ति में दो रत्न और जुड़ने वाले थे। उन्हें 5 जून 1952 में कोलंबिया विश्वविधालय ने ‘कानून में डॉक्टरेट’  की मानद डिग्री प्रदान की। प्रशस्ति में उनकी डिग्रियों का उल्लेख किया गया और उन्हें संविधान का निर्माता, मंत्रिमंडल व राज्यसभा का सदस्य, भारत का अग्रणी नागरिक, एक महान समाज सुधारक और मानवाधिकारों का सजग समर्थक बताया गया। उनकी उपलब्धियों, नेतृत्व और भारत का संविधान लिखने के ‘मानार्थ’  12 जनवरी 1953 को उस्मानिया विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें ‘साहित्य में डॉक्टरेट’ की डिग्री प्रदान की गई।

संसद के अंदर व बाहर विभिन्न मुद्दों पर लोगों को कर्तव्यों, अधिकारों व कानून के प्रति सचेत करने में लगे रहते थे। इसी क्रम में 22 दिसंबर 1952 को पुणे में आंबेडकर ने पुणे जिला विधि ग्रंथालय का उद्घाटन कर पुणे बार के समक्ष ‘लोकतंत्र के सफल कामकाज के लिए पूर्ववर्ती परिस्थितियां’ विषय पर भाषण दिया। इस भाषण पर समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में कई दिनों तक खूब चर्चा होती रही। इस भाषण में उन्होंने लोकतंत्र के सफल संचालन के लिए सामाजिक असमानता न हो, उत्पीड़ित वर्ग और दबा वर्ग(दलित) न हो, अल्पसंख्यक पर बहुसंख्यक का कोई अत्याचार नहीं, सरकार की गलती दिखाने के लिए विपक्ष की आवश्यकता, कानून के समक्ष और प्रशासन में व्यक्ति की समानता, संवैधानिक नैतिकता का पालन, लोकतंत्र में अंतर्निहित सामाजिक नैतिक व्यवस्था का पालन, सार्वजनिक सदविवेक की आवश्यकता और खूनखराबे के बिना क्रांतिकारी परिवर्तन आदि पर जोर दिया। अपवादों को छोड़ दिया जाए तो किसी भी दल की सरकार में जमीनी स्तर पर यह विचार दिखाई नहीं दिए और न ही भारतीय सरकारों ने व्यवहार का हिस्सा बनाया।

बॉम्बे विधानसभा के विधायक, ब्रिटिश सरकार में श्रम मंत्री, स्वतंत्र भारत में कानून मंत्री और राज्य सभा का सदस्य रहते हुए विधानसभा, संसद की बहस प्रक्रियाओं के दौरान आंबेडकर के अंतिम व्यक्ति को दृष्टि में रखते हुए राष्ट्र की प्रगति, राष्ट्र को मजबूत करने और राष्ट्र को एक सूत्र में जोड़ने संबंधी विचार होते थे। उदाहरण स्वरूप बॉम्बे विधानसभा में पृथक कर्णाटक प्रांत के गठन को लेकर बहस के दौरान आंबेडकर ने सभी हितों से ऊपर राष्ट्र हित को रखते हुए अति महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किये। जिसमें नए समृद्ध राष्ट्र की स्पष्ट संकल्पना थी। दृढ़तापूर्वक अपनी बात रखते हुए आंबेडकर ने कहा:-

“मैं नहीं मानता कि इस देश में किसी विशेष संस्कृति के लिए कोई जगह है, चाहे वह हिंदू संस्कृति हो, या मुस्लिम संस्कृति, या कन्नड़ संस्कृति, या गुजराती संस्कृति। ये ऐसी चीजें है जिन्हें हम नकार नहीं सकते हैं, पर उनको वरदान नहीं मानना चाहिए, बल्कि अभिशाप की तरह मानना चाहिए, जो हमारी निष्ठा को डिगाती हैं और हमें अपने लक्ष्य से दूर ले जाती हैं। यह लक्ष्य है एक ऐसी भावना को विकसित करना कि हम सब भारतीय हैं। मुझे अच्छा नहीं लगता, जैसा कि कुछ लोग कहते हैं, कि हम हिंदू या मुसलमान पहले हैं और भारतीय बाद में हैं। मैं इस बात से संतुष्ट नहीं हूं। मैं नहीं चाहता हूं कि भारतीय के रूप में हमारी निष्ठा किसी भी तरह की किसी प्रतियोगी निष्ठा से प्रभावित हो, चाहे वह हमारा धर्म हो, हमारी संस्कृति हो या हमारी भाषा हो। मैं चाहता हूं कि समस्त लोग पहले भारतीय हों, और अंततः भारतीय हों तथा भारतीय के सिवाय और कुछ भी नहीं हों।”(बॉम्बे विधानसभा,1938)

वर्ष 1936 में इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी के प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ आंडबेडकर

वे भारत में धर्मभेद, वर्गभेद, जातिभेद, उच्च संस्कृति व निम्न संस्कृति और अन्य भेदभावों से रहित सांझी अस्मिता चाहते थे। ‘केवल एक अस्मिता हो – भारतीय।’ वे निरंतर ऐसी युक्तियों की खोज में लगे रहे जिससे असमानताओं की जगह एकरूपता लाई जा सके। जन्म के आधार पर व्यक्ति का भाग्य तय करने वाले जातियों में खंडित ब्राह्मणवादी हिंदू धर्म में बड़े सुधार की आशा न रखते हुए इसे त्याग कर एक ऐसी विचारधारा/धर्म के साथ जुड़ना चाहते थे, जो रुढ़िवादिताओं, जड़ताओं से मुक्त कर मानव को प्रकृति की श्रेष्ट कृति बनाए, मानव व राष्ट्र की प्रगति में सहायक हो, केवल कानूनों को थोपने वाला न हो, सिद्धांततः न्याय, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व के आदर्शों पर टिका हो- वह था बुद्धवाद। जब आंबेडकर ने मानव इतिहास का सबसे बड़ा ‘धम्म परिवर्तन” (14 अक्टू. 1956 को 5 लाख, परिनिर्वाण 6  दिस. तक 10 लाख, परिनिर्वाण पर लगभग 5 लाख, और बाद में धम्म परिवर्तन की कुल संख्या 16 -17 लाख तक अनुमानित) किया, तब उनका उद्देश्य भेदभाव रहित राष्ट्र निर्माण करना था। बुद्ध धम्म में परिवर्तन से पहले उन्होंने लगभग सभी धर्मों का गहराई से अध्ययन किया और बुद्ध धम्म की ओर मुखित हो गए। उन्होंने ‘बुद्धवाद’ को ज्यों का त्यों स्वीकार नहीं किया, क्योंकि वे संघ में व्याप्त भ्रष्टाचार, बुद्धवाद के हीनयान, महायान और वज्रयान आदि में बंटे होने से भली भांति अवगत थे। धम्म दीक्षा के दौरान आंबेडकर ने स्वलिखित 22 प्रतिज्ञाएँ ली। ये प्रतिज्ञाएँ बंधन की बजाए मुक्ति का मार्ग थी। प्रगतिशीलता, जिज्ञासा व मुक्ति के लिए मार्गदर्शक थी। इस मुक्ति के मार्ग को वे ‘नवयान’ कहते थे, अर्थात जीवन जीने का नया यान। उन्होंने सभी तरह के बंधनों से मुक्त स्वतंत्र विचारशील मानव की संकल्पना की। अंधश्रद्धा, आस्था, विश्वास की बजाए मार्गदर्शन लेकर स्वविवेक से आगे बढ़े।

निष्कर्ष की ओर

जब आंबेडकर विधि महाविधालय के प्राचार्य थे तब खुशमिजाजी में कहा करते थे, “हम भी न्यायाधीश बनेंगे”। आंबेडकर के पास अवसर और काबिलियत दोनों थे लेकिन वे एक पद तक सीमित रहकर पहले की तरह सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक परिवर्तनों को अंजाम नहीं दे पाते। इसलिए वे स्वयं तो न्यायाधीश के पद पर आसीन नहीं हुए, परंतु ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापन में सफल रहे जिसमें समानता एवं न्याय के अवसर समाहित है। इस व्यवस्था में कोई भी काबिल व्यक्ति न्यायाधीश बन सकता है। योग्यता और काबिलियत के बल पर ही उन्हें संवैधानिक सभा में प्रारूप समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था। यह आंबेडकर की कानूनी विद्वता ही थी कि उन्होंने विश्व के सर्वाधिक विविधतायुक्त क्षेत्रों में से एक भारत का संविधान लिखने में सबसे बड़ी भूमिका का निर्वाह किया और अत्यधिक सताए गए लोगों दलितों सहित आदिवासियों, पिछड़ों, महिलाओं, मजदूरों, अल्पसंख्यकों आदि के लिए शोषण से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त किया। उनके कानून किसी बंधन में बांधने वाले नहीं बल्कि स्वतंत्रता और मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करने वाले थे। वे एक अस्मिता भारतीयता को सबसे ऊपर रखते थे। मानव की मानव से स्वतंत्रता और मुक्ति के लिए जीवन पर्यंत संघर्ष करते रहे।

अतः आंबेडकर परिवर्तनकारी व मुक्तिदायी कार्यों को अंजाम तक पहुँचाने में अतिशय सफल रहे। पुरातन और दकियानूसी कानूनों के स्थान पर ‘राष्ट्र के कल्याण व भले के लिए निरपेक्ष कानून बनाए व बनवाए एवं अथक परिश्रम से लागू करवाएं।’ इन आधारभूत परिवर्तनों और मुक्तिदायी कार्यों के पीछे उनकी कानूनी विद्वता थी। विनियोग, हेरफेर, गलत व्याख्या व भेदभाव कर उनकी समृद्ध विरासत को सीमित करने के प्रयास किये गए। आंबेडकर के मानवतावादी, मुक्तिदायी, समानता आधारित समाजवादी लोकतांत्रिक मूल्यों को सीमित परिप्रेक्ष्य में समेट दिया गया। ‘व्यक्ति से संस्था बन चुके आंबेडकर की समृद्ध ज्ञान की विरासत पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।’ आंबेडकर ने अर्थशास्त्र, इतिहास, राजनीति, धर्म, समाजशास्त्र संवैधानिक कानून व अधिकार, शिक्षा आदि पर व्यापक रूप से लिखा है। उनके दर्शन की प्रासंगिकता भारत के लिए ही नहीं बल्कि वैश्विक है।

समेकित संदर्भ ग्रंथ सूची

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  1. RAM KRIT YADAV Reply
  2. Amit Indurkar Reply

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