पाखंड छोड़ थामी विकास की राह

बिहार के सुदूर गोगो गांव में चन्द्रदेव साहू की प्रतिमा इस बात का प्रमाण है कि बेहतर समाज के निर्माण के लिए ब्राह्मणवाद का विरोध जरूरी है और इसकी शुरूआत सभी को अपने घर से करनी चाहिए। वजह यह कि समाज का मूल आधार परिवार है और परिवार का वृहतर स्वरूप ही समाज है

ब्राह्मणवाद का पाखंड विकास के सभी रास्तों को अवरूद्ध कर देता है। खासकर दलित-बहुजनों को जिनके पास उत्पादन के संसाधनों का घोर अभाव होता है। परंतु बिहार के औरंगाबाद के नवीनगर के ठेंगो पंचायत के गोगो गांव के चन्द्रदेव साहू एक नजीर हैं। उन्होंने अपने जीवन में ब्राह्मणवाद के पाखंड का परित्याग कर विकास के मार्ग को प्रशस्त किया।

उनकी सफलता इस मायने में भी महत्वपूर्ण है कि औरंगाबाद पाखंडवादी व्यवस्था का शिकार होने के साथ ही उग्रवाद के साये में भी सहमा था। लेकिन अब पहले वाली बात नहीं रही। हालांकि यह कहा जाना अतिश्योक्ति नहीं कि नक्सलवाद के जन्मने और गहरे पैठ बनाने व विस्तारित होने में सामाजिक गैरबराबरी, सामंती ऐंठन, सोच व भेदभाव के व्यवहार की बड़ी भूमिका है। वर्तमान में जो सामाजिक बदलाव दिखता है उसके लिए नक्सल आंदोलन की बड़ी भूमिका है।

चन्द्रदेव साहू की प्रतिमा

गोगो गांव नक्सल इलाके की कोख में, सुदूर सन्नाटे में, बिहार-झारखंड के सीमावर्ती इलाके में दो हिस्से में बंटा बसा हुआ गांव है। उत्तर दिशा में मिश्रित आबादी और दक्षिण दिशा में बसे हैं कुलीन, अभिजात्य वर्ग। सवर्ण ब्राह्मण। जैसा कि आम भारतीय गांवों की बसावट का स्वरूप होता है। प्रायः गांव के उत्तर में वही बसाये जाते रहे हैं, जो छुआछूत जैसे भेदभाव के शिकार रहे हैं। अभिजात्य वर्ग अपनी सुविधानुसार जातियों को बसाते थे। गांव के उत्तर, एकदम उत्तर, ताकि आवागमन में गांव घर से निकलते वक्त अभिजात्य को त्याज्य वर्ग के स्त्री-पुरुष के दर्शन न हो जाये।

इसी तरह के सामंती माहौल में चन्द्रदेव साहू ने तब विद्रोह किया जब वे किशोर थे। यह बात करीब सवा सौ साल पुरानी है। तब देश अंग्रेजों का गुलाम तो था ही ब्राह्मणवादियों का भी गुलाम था। उपर से सामंती विचारधारा के आगे दलित-बहुजन लाचार थे।

चन्द्रदेव जी की पहली पूण्य तिथि बीते 25 जून को मनाई गई। इनकी प्रतिमा का अनावरण गांव में ही किया गया। गांव के पहले सामाजिक विद्रोही की प्रतिमा का अनावरण उनकी जीवन संगिनी जितनी देवी ने किया। वे बताती हैं कि जब चन्द्रदेव साहू के पुत्र सुंदर साहू के पढ़ने की उम्र हुई तो गांव के पुरोहित ने कहा कि- बेटे को मत पढाना, अन्यथा वंश नहीं बचेगा। सब बेटा तुम्हारा मर जाएगा। यह सलाह कम आदेश अधिक था, क्योंकि गांव में तत्कालीन समाज में पुरोहित की सलाह या भविष्यवाणी को खारिज करने का साहस कोई नहीं कर सकता था। ऐसा करना कई तरह की परेशानियों को आमंत्रित करना होता था।

चन्द्रदेव साहू ने विद्रोह का रास्ता चुना। सब्जी बेचते हुए परिवार चलाते और बड़े बेटे सुंदर साहू को ननिहाल भेज दिया-पढ़ने के लिए। बारी-बारी अन्य बेटों को भी ननिहाल में रखकर पढाया। वर्तमान में सुंदर साहू सिंचाई विभाग में इंजीनियर हैं। अन्य बेटे में सुरेंद्र प्रसाद, महेंद्र प्रसाद, विनय कुमार व विवेक कुमार को स्नातक कराया। विवेक जल सेना में नौकरी करते हैं।

चन्द्रदेव साहू के सामाजिक विद्रोह और विकासपरक सोच ने सुंदर साहू को भी विद्रोही बना दिया। वे नौकरी में गए तो वहां भी वैश्य अभियंता फोरम बनाया। समुदाय को एक करने का अभियान चला रहे हैं। वे सनातनी कर्मकांडी परंपरा से दूर आर्य समाज के तरीकों से धार्मिक, वैवाहिक अनुष्ठान करते हैं।

बहरहाल बिहार के सुदूर गोगो गांव में चन्द्रदेव साहू की प्रतिमा इस बात का प्रमाण है कि बेहतर समाज के निर्माण के लिए ब्राह्मणवाद का विरोध जरूरी है और इसकी शुरूआत सभी को अपने घर से करनी चाहिए। वजह यह कि समाज का मूल आधार परिवार है और परिवार का वृहतर स्वरूप ही समाज है।


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