आखिर आजादी के 70 वर्षों बाद भी ओबीसी समाज अपना हक क्यों नहीं प्राप्त कर पाया?

ओबीसी का बहुलांश हिस्सा न केवल सामाजिक-शैक्षणिक तौर पर पिछड़ा है, बल्कि संपत्ति और साधन विहीन भी है। इस समुदाय के एक बडे हिस्से के पास कोई हुनर भी नहीं है। आजादी के बाद निरंतर इसकी उपेक्षा हुई, इसके कारण क्या हैं, इस पर रोशनी डाली है, पी.एस. कृष्णनन ने :

सामाजिक समता और सामाजिक न्याय के पक्षधर सभी व्यक्तियों के मन में यह प्रश्न कौंधता है कि आखिर आजादी के 70 सालों बाद भी पिछड़ा वर्ग अपना हक क्यों नहीं प्राप्त कर सका। आज का पिछड़ा वर्ग ही मनुवादी  व्यवस्था के भीतर शूद्र वर्ग है। हमेशा यह देश की आबादी का बहुसंख्यक वर्ग रहा है। मंडल आयोग के अनुसार भी यह तबका कुल आबादी का 52 प्रतिशत है। आज की जनसंख्या के आधार पर देखा जाए, तो इसकी कुल संख्या कम से कम से कम 75 करोड़ है। पिछड़ा वर्ग क्यों अपना हक नहीं प्राप्त कर सका, और आज इस वर्ग की स्थिति क्या है? यही सवाल हमने भारत सरकार के पूर्व सचिव पी.एस. कृष्णनन से पूछा।

उन्होंने अत्यन्त बेचैनी से कहा कि आजादी के तुरंत बाद यह वर्ग अपने हक के लिए संघर्ष में चूक गया। संविधान की धारा 340 में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछ़डे वर्ग के रूप में इस तबके का जिक्र तो हुआ, इसके लिए विशेष प्रावधान और उपाय करने की चर्चा तो हुई, लेकिन वास्तव में हुआ कुछ नहीं। इस धारा में यह प्रावधान था कि राष्ट्रपति एक कमीशन नियुक्ति करेंगे। यह कमीशन ओबीसी जातियों की पहचान करेगा। कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर ओबीसी जातियों को प्रतिनिधित्व के लिए उचित कदम सरकार उठायेगी।

23 जनवरी 1953 को पिछड़ी जातियों की पहचान  और विविध क्षेत्रों में उनको उचित प्रतिनिधित्व देने की सिफारिश करने के लिेए काकाकालकेर आयोग का गठन किया गया। इस आयोग ने 30 मार्च 1955 को अपनी रिपोर्ट दी। आयोग की सिफारिशों को लागू करने से नेहरू की सरकार ने इंकार कर दिया। असंगठित और नेतृत्वविहीन पिछड़ी जातियां कोई कारगर प्रतिरोध नहीं कर पाईं।

जनता पार्टी की सरकार आने पर जब पिछड़ी जातियों के नेताओं ने दबाव डाला तो, बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल के नेतृत्व में एक नया आयोग बना। जिसे मंडल आयोग कहा गया। इसने 31 दिसंबर 1980 को अपनी रिपोर्ट पेश किया। इस रिपोर्ट को भी  ठण्डे बस्ते में डाल दिया गया। लगभग 10 सालों बाद 7 अगस्त 1990 को वी.पी. सिंह ने मंडल आयोग की कुछ सिफारिशों को लागू करने का निर्णय लिया। कथित उच्च जातियों की ओर से ऐसी प्रतिक्रिया आई, जैसे कोई भूचाल आ गया हो। दो वर्षों तक इसे लागू होने से सर्वोच्च न्यायालय ने रोके रखा। आखिरकर 16 दिसंबर 1992 को सरकारी नौकरियों में ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू हुआ। इस प्रकार लगभग 42 वर्षों तक ओबीसी समुदाय आरक्षण से पूर्णतया वंचित रहा। उच्च शिक्षा संस्थानों ओबीसी के लिए आरक्षण 2006 में जाकर लागू। पिछड़ों जातियों के लिए संवैधानिक दर्जा प्राप्त आयोग अभी तक नहीं बन पाया।

आखिर पिछड़ा वर्ग अपना बाजिब हक क्यों नही प्राप्त कर सका? उसे बहुत थोड़ा हक, इतनी देर से क्यों प्राप्त हुआ, क्यों वह इस मामले में दलितों से भी पीछे छूट गया?

इसका कारण बताते हुए पी.एस. कृष्णनन कहते हैं कि  पहली बात यह कि उत्तर भारत में आजादी के पहले और बाद कोई ऐसा सशक्त नेता नहीं था, जो सभी पिछड़ी जातियों को एकजुट कर उनके हक-हकूक के लिए आवाज उठा सके। संगठन और नेतृत्व का अभाव ही वह मुख्य कारण है, जिसके चलते इस वर्ग की जातियां अपने बाजिब हक प्राप्त नहीं कर सकी। वे याद दिलाते हैं कि दक्षिण भारत में स्थिति इससे भिन्न थी। वहां प्रभावकारी नेतृत्व और आपसी एकता दोनों थी। जिसके चलते  वहां पिछड़ों के लिए आरक्षण आजादी के काफी पहले ही लागू हो गया। कोल्हापुर ने 1902 मेें ही पिछड़ों के लिए आरक्षण लागू कर दिया था। बाद में बाम्बे प्रेसीडेंसी में भी आरक्षण लागू हुआ। इस बात-चीत के दौैरान वह यह भी कहना नहीं भूलते हैं कि जो लोग कहते हैं कि आरक्षण से काम की गुणवत्ता गिरती है, उन्हें दक्षिण के राज्यों के अनुभव पर ध्यान देना चाहिए, जहां आजादी के बहुत पहले से आरक्षण लागू है, आजादी के बाद 50 प्रतिशत आरक्षण दक्षिण के कई राज्यों में (तमिलनाडु में 50 प्रतिशत से भी अधिक) उत्तर भारत से काफी पहले लागू हो गया था। दक्षिण के राज्य हर मामले में उत्ततर भारत से आगे हैं।

कृष्णनन चेताते हैं कि एकता, संघर्ष और सशक्त नेतृत्व के बिना पिछड़ी जातियां अपना वाजिब हक प्राप्त नहीं कर पायेंगी, उच्च जातियों के बराबर नहीं उठ पायेगीं। वे यह भी कहते हैं कि पिछड़ी जातियों के उत्थान और सशक्तीकरण के बिना भारत में न्यायपूर्ण समाज की स्थापना की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।


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