संघ-भाजपा के नए नायक दीनदयाल उपाध्याय की हकीकत

संघ-भाजपा हिंदुत्ववाद के नए नायक के रूप में पंडित दीनदयाल उपाध्याय को पेश करने का अभियान चला रही हैं। उनके हिंदुत्ववादी और वर्ण-जाति समर्थक विचारों को ढंक कर उन्हें दलित-बहुजनों के नायक के रूप में भी प्रस्तुत करने की कोशिश की जा रही है, इस झूठ का पर्दाफाश कर रहे हैं, सुभाष गताडे

  निरस्तपदपेशे एरंडोपि दूरमायाते                                              

 (एक पेड़ विहीन देश में एक एरंड भी बड़ा पेड़ कहलाता है)                      

आरएसएस अपने जन्म के साथ ही, अपने लिए ऐसे नायको की तलाश करता रहा है, जिन्हें भारतीय समाज के नायक के रूप में प्रस्तुत किया जा सके। यही हाल उसके सहयोगी संगठनों का भी रहा है। इस तलाश की सबसे नई  उपज दीनदयाल उपाध्याय हैं। दीनदयाल उपाध्याय  भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष थे। उनकी मौत के पचास साल बाद  सत्तासीन भाजपा ने जोरदार ढंग से उनके जन्मशती समारोह का आयोजन किया। इस दौरान तमाम तरह की गतिविधियों को केन्द्र एवं राज्य सरकारों के स्तर पर अंजाम दिया गया। उनकी संकलित रचनाओं को हजारों की तादाद में छपवा कर हर स्कूल/शिक्षा संस्थानों तक पहुंचाने से लेकर, कई नई योजनाओं को उनका नाम देने तक के, तरह- तरह के काम संपन्न हुए। उन्हें एक जननायक का दर्जा देने की भाजपा भरपूर कोशिश कर रही है, कितनी सफलता हाथ लगेगी, यह दीगर बात है।

हिंदुत्ववादियों की यह हताशा भरी कोशिश खुद ही उन्हें  सवालों के कटघरे में खड़ा करती है। सवाल यह उठता है कि इस पूरी कवायद का क्या औचित्य है? और क्या यह एक तरह का अप्रत्यक्ष स्वीकार नहीं है कि अपनी लंबी राजनीतिक यात्रा के बावजूद  वह ऐसे व्यक्तित्वों को उभार नहीं सके हैं जिनको समाज के तमाम तबके अपना मान पाएं, इसके चलते उन्हें अपने लिए आयकन ढूंढने की मशक्कत करनी पड़ रही है, ताकि आधुनिक भारत के निर्माताओं की कतार में केसरिया जमात में से भी किसी को  दिखाया जा सके। ढूंढते-ढूंढते उन्हें दीनदयाल उपाध्याय मिले।

 यह बात गौर करने लायक है कि  जनाब मोदी ने पिछले साल कोझिकोड  में दीनदयाल उपाध्याय को महात्मा गांधी और लोहिया जैसों की श्रेणी में रखा था। उन्होंने कहा  “जिन्होंने विगत सदी में भारतीय राजनीतिक चिन्तन को प्रभावित किया एवं आकार दिया था।’’ उसी वक्त़ लोगों की निगाह में यह बात आयी थी कि किस तरह उन्होंने अांबेडकर का नामोल्लेख तक नहीं किया था। ध्यान रहे कि दीनदयाल उपाध्याय  (जन्म 25 सितम्बर 1916 -11 फरवरी 1968 ) ने अपने सियासी-समाजी जिंदगी की शुरूआत राष्टीय स्वयंसेवक संघ के अदद कार्यकर्ता के तौर पर 1937 में की थी। वर्ष 1945 में वह संयुक्त प्रांत (आज का उत्तर प्रदेश) के सहप्रांतीय संगठक बनाए गए।

दीनदयाल उपाध्याय के जीवन का अधिकांश हिस्सा उस कालखण्ड से जुड़ा हुआ है, जिसमें औपनिवेशिक गुलामी के  साथ-साथ जातिप्रथा, स्त्री की गुलामी, प्राचीन किस्म की रूढि एवं मान्यताओं के खिलाफ भी संघर्ष चल रहा था। समूची सामाजिक मुक्ति के लिए – महान जयोति थास, अययनकली, नारायण गुरू, पेरियार, मंगू राम, डॉ.अंबेडकर और उनके जैसों तमाम सामाजिक विद्रोहियों की अगुआई में जारी संघर्ष ने सदियों से ठहराव में पड़े भारतीय समाज को हिला कर रख दिया था। हम सभी इस बात से वाकिफ हैं कि किस तरह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा अन्य हिन्दू वर्चस्ववादी जमातों ने ऐसे संघर्षों को संदेह की निगाह से देखा था, उनकी मुखालिफत की थी और माना था कि अखिल हिंदू एकता के लिए यह संघर्ष ‘विभाजक’ किस्म के हैं। अब यह बात इतिहास हो चुकी है कि किस तरह इन संघर्षों के साझे प्रभाव की परिणति भारत के संविधान के निर्माण में हुई। डॉ. आंबेडकर ने मसविदा कमेटी की अगुआई की। लम्बे समय से गतिरोध का शिकार रहे भारतीय समाज में यह ऐसा संविधान था, जो व्यक्तिगत अधिकारों की अनुल्लंघनीयता पर आधारित था। जिसमें उन करोड़ों लोगों के लिए विशेष अवसरों का प्रावधान किया गया था, जो धार्मिक ग्रंथों की दुहाई देते हुए सभी किस्म के मानवीय अधिकारों से वंचित रखे गए थे।


अगर हम पीछे मुड़ कर देखें तो पता चल सकता है कि किस तरह हिंदू राष्ट के हिमायतियों ने ऐसे संविधान के निर्माण का विरोध किया था और स्वाधीन भारत के लिए मनुस्मृति को संविधान बनाने की हिमायत की थी। अपने संगठन के शीर्ष लोगों  में शामिल रहे दीनदयाल उपाध्याय बाद में जातिवाद को जायज ठहराते हुए तथा उसे स्वधर्म के साथ जोड़ते हुए लिखते हैं:  “हालांकि आधुनिक दुनिया में समानता के नारे उठते हैं, समानता की अवधारणा को सोच समझ कर स्वीकारने की जरूरत है। हमारा वास्तविक अनुभव यही बताता है कि व्यावहारिक और भौतिक नज़रिये से देखें तो कोई भी दो लोग समान नहीं होते, बहुत सारी उग्रता से बचा जा सकता है अगर हम हिंदू चिंतकों द्वारा प्रस्तुत किए गए समानता के विचार पर गंभीरता से गौर करें। सबसे पहला और बुनियादी प्रस्थान बिंदु यही है कि भले ही लोगों के अलग-अलग गुण होते हैं और उन्हें उनके गुणों के हिसाब से अलग- अलग काम आवंटित होते हैं, मगर सभी काम समान रूप से सम्मानजनक होते हैं। इसे ही स्वधर्म कहते हैं और इसमें एक स्पष्ट गारंटी रहती है कि स्वधर्म का पालन ईश्वर की पूजा के समकक्ष होता है। इसलिए स्वधर्म की पूर्ति के लिए संपन्न किए गए किसी भी कर्तव्य में, उच्च और नीच और सम्मानित तथा असम्मानित का प्रश्न उठता ही नहीं है। अगर कर्तव्य को बिना स्वार्थ के पूरा किया जाए, तो करनेवाले पर कोई दोष नहीं आता।”(  सी.पी. भीषीकर, पंडित दीनदयाल उपाध्याय : आइडियालॉजी एण्ड परसेप्शन : कॉसेप्ट ऑफ दी राष्ट्रा, खंड- पांच, सुरूचि प्रकाशन, देलही, 169)    

भारतीय जनसंघ ने वर्ष 1965 में ‘एकात्म मानववाद’ को अपने दिशानिर्देशक सिद्धांत के तौर पर स्वीकारा, जिसे बाद में वर्ष 1980 में भाजपा ने भी अपनाया। क्रिस्टोफ जाफरलो, जो फ्रेंच विद्वान हैं जिन्होंने भारतीय समाज का गहन  अध्ययन करते हुए कई किताबें तक लिखी हैं। वे दीनदयाल उपाध्याय के ‘एकात्म मानववाद’ के  विचारों की विवेचना करते हुए  कहते हैं कि उनका वर्णव्यवस्था के प्रति निरन्तर  सम्मोहन बना रहा है। दीनदयाल के मुताबिक ‘एकात्म मानववाद’  सामाजिक एकजुटता/संबंध का ऐसा माॅडल था, जिसका हर जाति पालन करती थी जिसमें ‘अछूत’ भी शामिल थे।

‘एकात्म मानववाद’  जो दीनदयाल उपाध्याय के विचारों  का केंद्रीय तत्व है, जिसे संघ परिवार के अगुवा लोगों  द्वारा उनकी विचारधारा की बुनियाद कहा गया है। उस एकात्म मानववाद की मूलभूत कल्पना वर्णव्यवस्था पर टिकी है। वर्ष 1965 में उन्होंने लिखा: ‘चार जातियों की हमारी अवधारणा में, वह विराट पुरूष – आदिम मनुष्य जिसके त्याग ने, जैसा कि ऋग्वेद का कहना है, वर्ण व्यवस्था के रूप में समाज को जन्म दिया – ’के चार अवयवों के समकक्ष हैं।’ उनके हिसाब से वर्णव्यवस्था में वह जैविक एकता होती है, जो राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को जारी रख सकती है।

यह बात भी विदित है कि दीनदयाल धर्मनिरपेक्षता के विचारों का विरोध करते थे और मानते थे कि ‘‘संविधान को रैडिकल तरीके से बदलना होगा, क्योंकि वह भारत की एकता और अविभाजनीयता के खिलाफ पड़ता है। यहां भारत माता, हमारी पवित्र  मातृभूमि, जो यहां के लोगों के दिलों में बसी है-के विचार का कोई स्वीकार नहीं है।’’ इसके अलावा वह मानते थे कि किस तरह जनसंघ मानता है कि भारत वर्ष की तरह भारतीय संस्कृति एक है और अविभाजनीय है। साझी संस्कृति की कोई भी बात, इसलिए न केवल असत्य है बल्कि खतरनाक भी है क्योंकि वह राष्ट्रीय एकता को कमजोर करती है और विघटनात्मक प्रवृत्तियों को बढ़ावा देती है।

कोई भी देख सकता है कि उनकी यह समझदारी दीनदयाल की उसी समझदारी से निःसृत होती दिखती है जिसमें वह मुसलमानों को ‘‘जटिल समस्या’’ के तौर पर देखते हैं।

‘‘आजादी के बाद सरकार, राजनीतिक पार्टियों और लोगों को कई महत्वपूर्ण समस्याओं का सामना करना पड़ा। लेकिन मुस्लिम समस्या इनमें सबसे पुरानी, सबसे जटिल है और नये-नये रूपों में उपस्थित होती रहती है। विगत 1200 सालों से इस समस्या से हम जूझ रहे हैं।” (सी.पी. भीषीकर, पंडित दीनदयाल उपाध्याय : आइडियालॉजी एण्ड परसेप्शन : कॉसेप्ट ऑफ दी राष्ट्रा, खंड- पांच, सुरूचि प्रकाशन, देलही, 169)   

कोई भी देख सकता है कि अपने इंतकाल के लगभग पचास साल बाद दीनदयाल उपाध्याय का यह आकस्मिक महिमामंडन, उन्हें राष्ट्र निर्माताओं की कतार में पहुंचाने की कोशिशें, हिन्दू राष्ट के हिमायतियों के बारे में एक महत्वपूर्ण तथ्य बयान करती है। दरअसल उन्हें अब यह बात निश्चित ही समझ में आ रही है कि जिस ‘‘न्यू इंडिया’ की बात वह आए दिन करते रहते हैं उसके लिए दीनदयाल सबसे उपयुक्त आयकन हो सकते हैं जो बकौल थाॅमस ब्लाॅम हानसेन ‘गोलवलकर के संगठनवादी विचार’ को ‘गांधीवादी विमर्श से पूरक बनाते हैं’ और इन बातों को ‘‘हिन्दू राष्ट्रवाद की ऐसी जुबां में प्रस्तुत करते हैं जिसमें जनसंघ की सांप्रदायिक छवि मिटती दिखती है और एक सौम्य, अनाक्रमक छवि सामने आती है जो सामाजिक समता, ‘भारतीयकरण और ‘सामाजिक सदभाव’ की बात करती हो  (थामस ब्लोम हॉनसेन, सैफर्न वेब : डेमोक्रेसी एण्ड हिंदू नेशनेलिज्म इन मार्डन इंडिया, आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस,पेज. 84-85 )   


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