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आंखन-देखी : बहुजन नायक जगदेव प्रसाद

बिहार के लेनिन जगदेव प्रसाद का कथन एक हद तक सही साबित हो रहा है। उन्होंने कहा था - ‘पहली पीढ़ी मारी जाएगी, दूसरी पीढ़ी जेल जाएगी और तीसरी पीढ़ी राज करेगी।’ उनके द्वारा स्थापित शोषित समाज दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष व उनके संघर्ष के आत्मसाक्षी रहे रघुनीराम शास्त्री से नवल किशोर कुमार की खास बातचीत

जगदेव प्रसाद का जीवन बहुसंख्यक वर्ग के संघर्ष का वह अध्याय है जिसने 70 के दशक में ही भारत की राजनीति की दिशा का निर्धारण कर दिया था। आजादी के बाद देश में सत्तासीन हुआ सवर्ण समाज अंग्रेजों की भांति ही उत्पीड़क बनने लगा। आंबेडकर के निधन के बाद दलितों में राजनीतिक जागरूकता धीमी पड़ गयी और लोहिया का समाजवाद भी कमजोर पड़ने लगा। जय प्रकाश नारायण सरीखे समाजवादी भी सामंती ताकतों से स्वयं को अलग न रख सके। ऐसे में जगदेव प्रसाद दलितों और पिछड़ों के निर्भीक नेता के रूप में उभरे। लेकिन सत्ता में मदांध सामंती ताकतों ने उनकी हत्या कर दी। जगदेव प्रसाद के निधन के बाद उनके द्वारा स्थापित शोषित समाज दल भी धीरे-धीरे प्रभावहीन होता चला गया। गुमनामी तो नहीं, लेकिन लगभग अप्रासंगिक हो चुके इस दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष रघुनीराम शास्त्री भी इस सच को स्वीकारते हैं। हमारे हिंदी संपादक नवल किशोर कुमार द्वारा शास्त्री जी के साथ किया गया यह साक्षात्कार जगदेव प्रसाद के जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालता ही है, साथ ही बिहार व भारत में हुए राजनीतिक संघर्ष के बनते-बिगड़ते आयामों को भी सामने रखता है – संपादक

 

रघुनीराम शास्त्री जी, जगदेव बाबू के संपर्क में आप कब आये?

औरंगाबाद में जगदेव प्रसाद की एक प्रतिमा

जगदेव बाबू से मेरा संपर्क वैसे नहीं के बराबर रहा। मतलब सीधे-सीधे बातचीत तो नहीं हो पाई लेकिन उनके विचारों से संपर्क 1972 के पहले ही हो गया था। दाऊदनगर में सम्मेलन हो रहा था। शोषित समाज दल का जिला सम्मेलन। वहीं मैं गया था। उसके पहले मैं पार्टी से जुड़ गया था। नाम सुनता था उनका। वहां गया तो उनसे साक्षात्कार हुआ लेकिन हमसे कोई बातचीत नहीं हुई। बहुत भीड़भाड़ थी। सभा दाऊदनगर के चावल बाजार में हुई थी। मंच पर मैं था। उनका भाषण सुना। काफी प्रभावित हुआ। और वह जो सम्मेलन हो रहा था, दाऊदनगर में। पटेल कॉलेज अकोढ़ा, दाऊदनगर के मैदान में। जगदेव बाबू ने इसके लिए भी संघर्ष किया था। वह जमीन जहां कार्यक्रम था, बाजार समिति में जा रही थी। जगदेव बाबू ने ही उस समय रामाधार बाबू एक अफसर थे। मार्केटिंग पदाधिकारी। उनसे मिलकर जगदेव बाबू ने जमीन को मुक्त कराया। लेकिन वहां के एक बहुत चर्चित आदमी थे,  नाम था – गुप्तेश्वर सिंह। वह अमेरिका पलट(अमेरिका रिटर्न)  थे। इन लोगों को जगदेव बाबू रास नहीं आ रहे थे दाऊदनगर में।  पूरा पंडाल सजा हुआ था। रातोंरात पंडाल हटा दिया गया। और फिर नहर के बगल में पंडाल बनाया गया। सम्मेलन हुआ। दूसरे दिन की सभा दाऊदनगर के चावल बाजार में हुई। वह 1972 के पहले का जमाना था। वह तो पार्टी 1972 में 7 अगस्त को बनी। पटना के विधायक क्लब हॉल में। शोषित दल के नेता जगदेव प्रसाद और अर्जक संघ के संस्थापक व उत्तरप्रदेश के पूर्व वित्त मंत्री महामानव रामस्वरूप वर्मा के संयुक्त नेतृत्व में शोषित समाज दल का गठन हुआ। इसमें शोषित दल, समाज दल, रिपब्लिक पार्टी(कश्यप गुट), सेवा दल और समता दल का विलय हुआ व विधिवत शोषित समाज दल बना। जिसका राष्ट्रीय सम्मेलन यानी प्रथम स्थापना सम्मेलन  23, 24 और 25 फरवरी 1973 को डालमिया नगर में हुआ। इस सम्मेलन में लाखों लोगों का हुजूम था। जगदेव बाबू का नेतृत्व था। मैं विधिवत जुड़ा। वैसे पार्टी से मेरा संबंध तब बना जब मैंने बीए की परीक्षा पास की 1972 में। मैँ त्रिवेणी कॉलेज, कलेर का छात्र था। दाऊदनगर के बगल में कलेर है। वहीं से मैंने बीए किया और एमए की पढ़ाई के लिए मगध यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया। तो जब-जब सभायें होती थीं, मैं जाता था। इसके पहले जगदेव बाबू से हमारी बात तो नहीं ही हुई लेकिन 1968 में अरवल में प्रदर्शन था। उस समय शोषित दल था। शोषित समाज दल तो 1972 में बना। बाद में 1969 में अरवल में उपचुनाव था। उसके बाद वह सम्मेलन था। वहीं शोषित पत्रिका के दो अंक मुझे मिला था उसी सभा में। चूंकि हमलोग त्रिवेणी कॉलेज में पढ़ते थे। वहां एक रूप नारायण सिंह थे। इकोनॉमी के हेड थे। उन्हीं की प्रेरणा से हमलोग अरवल पहुंच गये। जगदेव बाबू ने ट्रक भेजा था। कॉलेज में ट्रक। हम छात्र लोग उसीपर बैठ गये और अरवल चले गये। वहां  मनुस्मृति के बारे में शोषित पत्रिका का अंक मिला। वहां तो मैं पढ़ा नहीं। वहीं शोषित दल का झंडा था लाल। बीच में हलधर चक्र था। उसका चुनाव चिन्ह मछली था। तो उस झंडे को मैं घर ले गया। मेरे दरवाजे पर नीम का पेड़ था। उसी पेड़ पर झंडे को लगा दिया और शोषित पत्रिका को पढ़ा। उसमें मनुस्मृति के जितने श्लोक थे उसका संस्कृत और हिंदी अनुवाद था। मैं उससे काफी प्रभावित हुआ।

‘शोषित’ पत्रिका का संपादन जगदेव बाबू ने स्वयं किया था?

जी, जगदेव बाबू उसके प्रधान संपादक थे। बाद में एक रमेश प्रसाद सिंह थे। बक्सर तरफ के थे। बाद में जयराम बाबू। प्रो जयराम प्रसाद सिंह सहायक संपादक हुए। जगदेव बाबू के बाद प्रो जयराम प्रसाद सिंह प्रधान संपादक हुए और मैं उसका संपादक था। इस समय मैं जयराम बाबू के निधन के बाद प्रधान संपादक हूं।

रघुनीराम जी, जगदेव बाबू ने खेतिहर मजदूरों को लेकर आंदोलन किया था। इसके बारे में बतायें।

वह जगदेव बाबू की जवानी का जमाना था। उनके इलाके में जमींदार हाथी रखता था। उस समय ईख की खेती होती थी। धान बहुत कम होता था। सिंचाई का साधन कम था। इस कारण लोग ईख की खेती अधिक करते थे। खेती करने वाले पिछड़े वर्ग के गरीब थे या छोटे किसान थे। जमींदार किसी भी रैयत के खेत में जाकर पांच कट्ठा बराबर दो-चार दिन पर ईख काट लेता था। बिना किसान से पूछे और बिना उसकी रजामंदी के। जगदेव बाबू ने जब यह देखा तो उन्हें अच्छा नहीं लगा। जमीन हमारी, मेहनत हमारी, ईख हमारा और फिर बिना इजाजत जमींदार ईख कैसे काट सकता है। उन्होंने किसानों और नौजवानों को ललकारा और गोलबंद किया। उस समय जमींदार के खिलाफ संघर्ष करना व बगावत करना कठिन काम था। लेकिन जगदेव बाबू ने कहा कि हम अपने खून-पसीने की कमाई जमींदार के हाथी को खाने नहीं देंगे। जब जमींदार का महावत और जमींदार के बड़ाहिल एक खेत में ईख काटने पहुंचे तब जगदेव बाबू ने पहुंचकर हमला किया। युद्ध हुआ। दोनों पक्षों में मारपीट हुई। वह जमाना लाठी डंडा, भाला और गंड़ासा का था। इस घटना के बाद वह प्रथा समाप्त हो गई।

उन दिनों गरीबों को मजदूरी नहीं मिलती थी। बेगारी की प्रथा थी। जमींदारों के यहां लोग काम करते थे। जमींदारों की कृपा होती थाी। जो दे दिया तो दे दिया। मजदूरी विधिवत तय नहीं थी। तब जगदेव बाबू ने इसका प्रतिकार किया। उन्होंने कहा कि जब हम मेहनत करते हैं, काम करते हैं तो इसके बदले में मजदूरी मिलनी चाहिए। मेहनताना मिलना चाहिए। इस तरह से उन्होंने इस काम को शुरू किया। तब जाकर एक टोकन के रूप में मजदूरों को मजदूरी दी जाने लगी। एक किलो अनाज। एक किलो से भी कम था। एक सेर था देहात में। एक सेर मिलता था और खाने को चबेना या फुटहा। बाद में संघर्ष और बढ़ा तो मजदूरी और बढ़ी। और जब जमाना आ गया 1974 का। बहुत बाद में। तब इंदिरा गांधी ने 20सूत्री कार्यक्रम चलाया और उसमें  मजदूरी अधिनियम की बात हुई। जगदेव बाबू के नेतृत्व में शोषित समाज दल के बैनर तले 5 सितंबर 1974(जगदेव बाबू का शहादत दिवस) से लेकर 11 सितंबर 1974 तक राज्य के सभी प्रखंडों पर इंदिराशाही के खिलाफ सात सूत्री मांगों को लेकर जेल भरो आंदोलन का निर्णय किया गया। वह सत्याग्रह आंदोलन था। मैं उस समय प्रो जयराम प्रसाद सिंह के साथ दाऊदनगर प्रखंड में सत्याग्रह पर था। इस सत्याग्रह की मुख्य मांगें थीं :

1. प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य, एक समान मानववादी शिक्षा मुफ्त की जाय

2. देश के सभी पुस्तकालयों में डॉ आंबेडकर का साहित्य उपलब्ध कराया जाय

3. सभी मतदाताओं को फोटो युक्त पहचान पत्र उपलब्ध कराया जाय

4. मतदान अनिवार्य घोषित किया जाय

5. खेती और फैक्ट्रियों में उत्पादित सामानों की कीमतों में समान अनुपात तय किया जाय

6. खेती के साधनों को करमुक्त किया जाय

7. जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण लागू किया जाय

8. बटाईदारी कानून और मजदूरी अधिनियम लागू किया जाय

एक सवाल है रघुनीराम जी। इंदिरा गांधी ने जो मजदूरी अधिनियम की घोषणा की थी, क्या वह मजदूरों के हित में नहीं थाा जिसके कारण जगदेव बाबू ने आंदोलन का आह्वान किया?

मजदूरी अधिनियम यदि लागू होता तो उसका लाभ मजदूरों को जरूर मिलता। लेकिन इसे लागू करने की बात नहीं कही गई थी। केवल घोषणा की गयी थी। साथ ही इसके लिए कोई आंदोलन नहीं था। इंदिरा गांधी के द्वारा केवल एक फरमान जारी किया गया था। फरमान जारी होने से तो कुछ नहीं होता है। इसके लिए आंदोलन जरूरी था।

जगदेव बाबू ने जब मजदूरों के लिए आंदोलन का आह्वान किया तब उनके साथ बहुजन यानी दलित और पिछड़े वर्गों के कौन-कौन नेता उनके साथ थे?

देखिए, जब जगदेव बाबू ने यह आंदोलन शुरू किया और उनका मुख्य आधार था बाबा साहब डॉ आंबेडकर, जोतिबा फुले, नायकर स्वामी का चिंतन। वे मानते थे कि जबतक भारत में सांस्कृतिक व सामाजिक बदलाव नहीं होगा तबतक राजनीतिक और आर्थिक बदलाव नहीं हो सकता है। जब इस बात को तेज किया गया तो सच पूछिए तो बिहार का कोई नेता इसके समर्थन में नहीं था। इसलिए जगदेव बाबू ने कहा था – देश की सत्ता पर सवर्णों, सामंतियों और पूंजीपतियों का कब्जा है। दलित व पिछड़े वर्ग के नेता केवल गुलामी का काम करते हैं। बनिहारी करते हैं। अंतर यही है कि गांव का मजदूर एक किलो अनाज के लिए जमींदार की हरवाही करता है और दलित-पिछड़ों के नेता पटना और दिल्ली में एक कार और एक बंगला के लिए हरवाही करते हैं। पार्टी के नीति निर्धारण में दलित व पिछड़े वर्गों के नेताओं की कोई भूमिका नहीं होती है।  तो इसलिए दलित-पिछड़े वर्ग के जो नेता थे, जगदेव बाबू के विचारों से सहमत नहीं थे। क्योंकि उनका यह चिंतन था कि जब जगदेव प्रसाद की बातें आगे बढेंगी तो सवर्णों के नेतृत्व वाली जो पार्टियां जिसमें हम हैं, वह कमजोर होगी। उस समय तो कांग्रेस थी। सोशलिस्ट और कम्युनिस्ट पार्टियां भी थीं। जनसंघ था और उस समय भाजपा नहीं थी। जनसंघ की धारा बहुत पतली थी।

एक कार्यक्रम को संबोधित करते शोषित समाज दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष रघुनीराम शास्त्री

जेपी के साथ जगदेव बाबू के रिश्ते कैसे थे?

जेपी के साथ जगदेव बाबू के रिश्ते एकदम विपरीत थे। दो आंदोलन चला। एक जयप्रकाश का आंदोलन संपूर्ण क्रांति और जब बनारस में उन्होंने, लगता है 17 नवंबर को जब उन्होंने जनेऊ तोड़ने का अभियान चलाया तो उसके दूसरे दिन उनके शार्गिदों ने गोली-बंदूक के बल पर बंद करवा दिया। जगदेव बाबू का यह स्पष्ट कहना था कि जयप्रकाश का जो आंदोलन है वह आंदोलन तो सही ही है लेकिन नेतृत्व गलत है। जयप्रकाश के साथ बड़े पूंजीपति और सामंत और जमींदार हैं। ये वे लोग हैं जो गांवों में गरीबों को, दलितों को और पिछड़ों को सताते हैं। यही लोग जयप्रकाश के साथ हैं। बिड़ला और टाटा जितने बड़े पूंजीपति हैं, जयप्रकाश के साथ हैं। इसलिए यह आंदोलन कभी सफल नहीं हो सकता है। फिर इस आंदोलन से दलितों और पिछड़ों को कोई लाभ नहीं मिलने जा रहा है।

उस समय रामलखन यादव थे। कर्पूरी ठाकुर भी थे। इन नेताओं के साथ जगदेव बाबू के कैसे रिश्ते थे?

सहानुभूति तो भीतर-भीतर रहती होगी। लेकिन खुले तौर पर इन लोगों ने जगदेव बाबू का साथ नहीं दिया। बल्कि कर्पूरी जी तो जगदेव बाबू के बड़े विरोधी थे। मैं आपको एक घटना बताता हूं। जब 1967 में संविद सरकार बनी तब 60 और 40 वाला लोहिया का नारा पालन में नहीं लाया गया। असल में यह घालेमल वाला विचार था। दलित, आदिवासी, पिछड़े और मुसलमान तमाम को लोहिया बैकवर्ड मानते थे। ऊंची जाति की महिलाओं को भी बैकवर्ड मानते थे। लोहिया के हिसाब से साठ प्रतिशत बैकवर्ड को मिलना था। सवर्ण के पुरूषों को स्पष्ट तौर पर 40 फीसदी दिया जाना था। वे 40 फीसदी के हकदार बन गए। लोहिया के हिसाब से। इसी आधार पर टिकट का बंटवारा हुआ। लोकसभा और विधानसभा दोनों चुनावों का। बिहार में बसावन सिंह थे। वैसे वे उत्तर बिहार के भूमिहार थे। 40 प्रतिशत के कोटे के तहत उन्हें विधानसभा चुनाव का टिकट दिया गया। वे जीत भी गए। विधायक बन गए। और 60 प्रतिशत के कोटे से उनकी पत्नी एमएलसी बन गयी। इसी तरह लोकसभा के चुनाव में एक अर्जुन सिंह भदौरिया थे। राजस्थान तरफ के।  40 प्रतिशत के कोटे के तहत उन्हें लोकसभा का टिकट दिया गया और 60 प्रतिशत के कोटे से उनकी पत्नी सरला भदौरिया राज्यसभा में सांसद बन गयीं। जगदेव बाबू ने लोहिया जी से कहा कि जो तमाम दलित-पिछड़े हैं, जो आपकी पार्टी का झंडा ढोते हैं। तो आपकी पार्टी में इनका हिस्सा कहां है। जब सवर्ण जाति के पति-पत्नी दोनों ही सौ प्रतिशत पर कब्जा करते हैं। यह तो एक बात हुई। दूसरी बात यह कि बिहार सहित नौ प्रदेशों में उस समय 67 में गैर कांग्रेसी सरकारें बनी। बिहार में भी संविद सरकार बनी। 69 विधायक थे सोशलिस्ट पार्टी के और 19 विधायक थे बीकेडी के, जिसके नेता थे महामाया प्रसाद सिन्हा। 69 विधायकों वाली पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया। लेकिन 19 विधायकों वाली पार्टी के नेता को मुख्यमंत्री बना दिया गया। मंत्रिमंडल में 60 प्रतिशत हिस्सेदारी बैकवर्ड को मिलनी चाहिए थी। लेकिन मिला केवल 40 प्रतिशत। सवर्णों को 40 फीसदी जगह मिलना चाहिए था लेकिन उन्हें 60 फीसदी मंत्री पद मिल गया। जगदेव बाबू ने इसका विरोध किया। तब पार्टी के नेताओं को लगा कि जगदेव बाबू मंत्री बनना चाहते हैं। तब हुआ कि उन्हें शिक्षा विभाग का डिप्टी मनिस्टर बनाया जाय। इसके लिए एक सवर्ण मंत्री को हटाकार पिछड़े के कोटे से जगदेव बाबू को डिप्टी मिनिस्टर का पद दिया जाय। उस समय तीन तरह के मंत्री होते थे। कैबिनेट मिनिस्टर, स्टेट मिनिस्टर और डिप्टी मिनिस्टर। तो जगदेव बाबू को शिक्षा विभाग का डिप्टी मिनिस्टर के पद का ऑफर दिया गया। जगदेव बाबू ने उसको नकार दिया।

क्या यह ऑफर महामाया प्रसाद सिन्हा की ओर से दिया गया था?

नहीं, यह ऑफर पार्टी के लीडरों ने दिया था। उस समय कई पार्टियां एक साथ थीं। जैसे 1977 में लगभग सभी गैर कांग्रेसी पार्टियां एक साथ हुईं, वैसे ही उस समय भी हुआ था। जगदेव बाबू सोशलिस्ट पार्टी के विधायक थे। उन्हें मंत्री बनाने का फैसला इसी पार्टी के नेताओं ने किया था। तब तय हुआ कि पिछड़ों का एक मंत्री बढ़ा दिया जाय और एक सवर्ण मंत्री को हटा दिया जाय। तब पिछड़ों की हिस्सेदारी 60 फीसदी हो जाएगी और सवर्णें की 40। तब उस समय ‘कूपढ़’ रामानंद तिवारी पुलिस मंत्री थे। कैबिनेट मिनिस्टर। हुआ कि रामानंद तिवारी को हटा दिया जाय। कर्पूरी ठाकुर को पार्टी के नाते रामानंद तिवारी से बड़ा मोह था। कर्पूरी जी ने कहा कि यदि ऐसा हुआ तो हम रिजाइन कर देंगे। तब बड़ी परेशानी आयी। तब जगदेव बाबू ने विद्रोह किया। तीन मुख्य विभेद थे। एक तो टिकट का बंटवारा, दूसरा मंत्री पद का बंटवारा  और तीसरा यह कि महामाया प्रसाद सिन्हा की सरकार जिसे प्रगतिशील सरकार कहा गया, उसमें दलित, आदिवासी और मुसलमान समाज का कोई मंत्री नहीं था। विशेष अवसर की बात ये लोग करते थे। इन तीन मुद्दों पर जगदेव बाबू ने विद्रोह किया और 25 अगस्त 1967 को  उन्होंने देश के सभी समाजवादी नेताओं को पटना के अंजुमन इस्लामिया हॉल में बुलाया और वहीं शोषित दल नामक पार्टी के गठन की घोषणा की। इस मौके पर उन्होंने कहा था – ऊंची जाति वालों ने हमारे बाप-दादाओं से हरवाही करवायी है, मैं उनकी राजनीतिक हरवाही करने को तैयार नहीं। मैं तमाम दलित, पिछड़ों, आदिवासियों और मुसलमानों को निश्चित सिद्धांतों के तहत एकजुट करूंगा और दिल्ली व पटना की गद्दी पर ऐसे लोगों को बैठाऊंगा जो धन-दौलत का बंटवारा स्वयं करेगा। इसी कार्यक्रम में जगदेव बाबू ने कहा था – यह लड़ाई लंबी, तगड़ी और जुझारू होगी। पहली पीढी के लोग मारे जाएंगे। दूसरी पीढ़ी जेल जाएगी और तीसरी पीढ़ी राज करेगी।  हमारी लड़ाई सौ वर्षों की है। यह नहीं है कि हम तत्कालिक  तौर पर किसी तरह सत्ता में पहुंच जायें। जबतक विचारों के प्रति लोगों को प्रतिबद्ध न किया जाय, तबतक सरकार नहीं बन सकती है। यदि किसी कारण से सरकार बन गयी तो वह टिकाऊ नहीं होगी।

1974 के पहले ही बिहार में छात्र आंदोलन की शुरूआत हो चुकी थी और गुजरात में भी आंदोलन हो चुका था। इसे जगदेव बाबू किस रूप में देखते थे?

वह तो मैंने बताया कि गुजरात से आंदोलन शुरू हुआ और जयप्रकाश ने बिहार में आंदोलन का नेतृत्व संभाला। मैंने पहले भी बताया कि आंदोलन तो सही था, लेकिन नेतृत्व गलत था। इसलिए जगदेव बाबू ने अलग आंदोलन शुरू किया। जगदेव बाबू ने स्पष्ट कहा – “मैं भंडुआ बन सकता हूं लेकिन जयप्रकाश का नेतृत्व स्वीकार नहीं कर सकता। क्योंकि जयप्रकाश के साथ बड़े पूंजीपति और सामंती ताकतें खड़ी हैं। ऐसे नेतृत्व से दलितों और पिछड़ों को लाभ नहीं मिल सकता। यह जयप्रकाश का जो आंदोलन है, वह दलितों और पिछड़ों को समुद्र में ले जाकर डूबा देगा।”

बिहार के अरवल जिले क कुर्था प्रखंड के एक गांव में दीवार पर जगदेव प्रसाद का एक नारा

जगदेव बाबू की हत्या के बाद जो पुलिस अनुसंधान हुआ और सरकार के द्वारा कार्रवाई की गयी, क्या आप लोग उससे संतुष्ट थे? क्या आपको कभी लगा कि उनके हत्यारों को बचाया जा रहा है?

पूरी साजिश हत्यारों को बचाने की थी। इसमें जयप्रकाश नारायण भी शामिल थे। जयप्रकाश नारायण ने पूरा सहयोग किया विपक्षियों को। जो कमीशन के लोग थे। एक रिटायर मुसलमान थे। अब नाम मैं भूल रहा हूं इस समय। जब कमीशन ने पूछा कि कुर्था में जो गोली चार्ज की गयी क्या उससे पहले वैधानिक प्रक्रियाओं को पूरा किया गया। मसलन गोली चार्ज के पहले नियम है कि जब भीड़ अनियंत्रित होती है तो पहले नेता को गिरफ्तार कर लिया जाता है। सामान्य नियम है। अगर बात बहुत आगे बढ़ी तब लाठीचार्ज होता है। अश्रु गैस छोड़ा जाता है। और जब बहुत तीव्र और हिंसक स्थिति आ जाती है तब गोली चार्ज किया जाता है। उसके पहले भी पर्दा टंगता है। इसपर लिखा होता है गोली चार्ज। फिर सायरन बजाया जाता है। तब गोली चलायी जाती है। क्या इन सबका पालन हुआ। इसके जवाब में सरकार के जुड़े पदाधिकारी निरूत्तर थे। लेकिन इसके बावजूद जब फैसला हुआ तो साजिश के तहत गोली चार्ज को सही ठहरा दिया गया। इस साजिश में जयप्रकाश नारायण भी शामिल थे क्योंकि वहां जो एसडीओ था वह कायस्थ जाति का था। उसे बचाने के लिए जयप्रकाश ने पैरवी की थी। हालांकि जयप्रकाश नारायण उस शोक सभा में शामिल हुए जो 7 सितंबर 1974 को गांधी मैदान में हुई थी। 5 सितंबर 1974 को जगदेव बाबू मारे गये। 6 सितंबर की शाम में लाश दिया गया। जगदेव बाबू की लाश को छिपाने की कोशिश की गयी। उनकी लाश को रातोंरात हजारीबाग के छिपादोहर  के इलाके में फेंक देने की बात चल रही थी। लेकिन उस समय एक नेता थे भोला प्रसाद सिंह और बी पी मंडल जो कि पूर्व मुख्यमंत्री थे शोषित दल से और रामलखन यादव। जब हत्या हो गयी तो इन लोगों ने सरकार को चेताया कि यदि लाश नहीं दी गयी तो स्थिति बहुत ही हिंसक हो जाएगी। तब फिर 6 सितंबर को शाम में लाश पटना के विधायक क्लब में चुपके से रख दिया जाता है। तब हमलोग जाने और हमलोग रातोंरात पटना पहुंचे। उस समय हत्या की घोषणा बीबीसी रेडियो ने 5 सितंबर को शाम में कर दी थी जिसमें कहा गया कि बिहार लेनिन जगदेव प्रसाद की हत्या कर दी गयी। लेकिन बिहार में आकाशवाणी ने इस खबर को प्रसारित नहीं किया था। हमलोग जान नहीं पाये। 6 सितंबर को हमलोग दाऊदनगर में थे। उस समय अरवल के इलाके से गाड़ियां नहीं चलती थीं। मेटाडोर टाइप की एक छोटी गाड़ी चलती थी। अरवल टू दाऊदनगर। जब 6 सितंबर को सुबह में हमलोग खाना बना रहे थे। वहीं भगरूआ मोड़ कहलाता है। चाय पीने के लिए हम नहीं, जयराम बाबू गये। वहां  एक ड्राइवर पहुंचा और उन्हें देखकर बोला – कुर्था में गोली चल गई और जगदेव बाबू मारे गये। तब वे दौड़े-दौड़े आये जहां हमलोग खाना बना रहे थे। वे कहने लगे कि रघुनी जी, रघुनी जी जल्दी चलिए। कुर्था में गोली चल गयी। जगदेव बाबू की हत्या हो गई। मैंने उन्हें डांट दिया। कौन कहता है? तबतक वह रोने लगे। बगल में 25-30 और साथी थे जो नहा रहे थे। उनलोगों के पास मैं दौड़कर गया और जानकारी दी। उसी वक्त हमलोग उसी मेटाडोर पर चढ़कर अरवल चल दिये। कलेर एक जगह कहलाता है। वहां से राज्य सरकार की लाल बस चलती थी। पटना टू डाल्टेनगंज। हमलोग कलेर बाजार में पहुंचते हैं। वहीं आर्यावर्त अखबार का बंडल आता था। पटना से उस समय यह अखबार निकलता था।  उसी के फर्स्ट पेज के दायें साइड में लिखा हुआ था – “स्वयंभू बिहार लेनिन जगदेव प्रसाद की गोली मारकर हत्या। 27 राऊंड फायरिंग। कुर्था में कर्फ्यू लागू।”

हमलोग वहीं अखबार का बंडल लिये और यह कंफर्म हो गया कि जगदेव बाबू मारे गये। हमलोग उसी गाड़ी से अरवल गये और फिर अरवल से कुर्था-किंजर गये। फिर जहानाबाद गये। फिर पटना शाम में गये। वहीं विधायक क्लब में जगदेव बाबू की डेड बॉडी थी। पूरे बिहार के लोग रातोंरात जमा हुए। 7 सितंबर को उनका शव जुलूस निकला।  वह शव जुलूस राजेंद्र प्रसाद जी की शवयात्रा के बाद दूसरा मौका था जब लाखों का हुजूम था।

क्या जगदेव प्रसाद के समर्थकों के द्वारा भी कोई एफआईआर दर्ज करवाया गया था?

नहीं। स्थानीय स्तर पर चौकीदार द्वारा एफआईआर दर्ज कराया गया था। क्योंकि इधर के लोगों को तो वहां पहुंचने ही नहीं दिया गया। जब हत्या हो गयी तब औपचारिक तौर पर चौकीदार द्वारा एक सनहा टाइप जानकारी दर्ज कराया गया था। फिर आंदोलन किया गया और उच्च स्तरीय जांच की मांग की गयी तब जांच के लिए कमीशन बनाया गया।

जगदेव बाबू के बाद आंदोलन कमजोर क्यों होता चला गया?

देखिए, मुझे यह सच स्वीकारने में कोई समस्या नहीं है। जगदेव बाबू का आंदोलन 90 फीसदी लोगों का था। दस फीसदी लोगों द्वारा हकमारी के खिलाफ। लेकिन इसी बीच कई तरह के राजनीतिक घटनायें घटीं। जैसे उसी समय कर्पूरी जी सत्ता में आये। तब बैकवर्ड लोगों का दिमाग बन गया कि सत्ता के साथ रहना चाहिए। कर्पूरी जी थे। रामलखन यादव कांग्रेस में थे। इसी बीच नक्सल आंदोलन चला। मजदूर और वंचित उस ओर भी मुखातिब हो गए। इसी बीच फिर चरण सिंह का जमाना आ गया। संयोग से कुछ दिन के लिए वे प्रधानमंत्री भी बन गए। तेरह दिनों के लिए। जो संसद में गए ही नहीं। इन सबके साथ ही बसपा आ गयी। और माले भी आ गया। इन्डियन पीपुल्स फ्रंट। इसी तरह से ताकत का बंटवारा होता चला गया। मुझे यह सच स्वीकारने में कोई परेशानी नहीं है।

टिप्पणी : यह बातचीत जगदेव प्रसाद की जयंती 2 फरवरी 2018 को दूरभाष के जरिए रिकार्ड की गयी। वाक्यों को पठनीय बनाने के लिए केवल आवश्यक संशोधन किये गये हैं।


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लेखक के बारे में

नवल किशोर कुमार

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस के संपादक (हिन्दी) हैं।

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जननायक को भारत रत्न का सम्मान देकर स्वयं सम्मानित हुई भारत सरकार
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जगदेव प्रसाद की नजर में केवल सांप्रदायिक हिंसा-घृणा तक सीमित नहीं रहा जनसंघ और आरएसएस
जगदेव प्रसाद हिंदू-मुसलमान के बायनरी में नहीं फंसते हैं। वह ऊंची जात बनाम शोषित वर्ग के बायनरी में एक वर्गीय राजनीति गढ़ने की पहल...
समाजिक न्याय के सांस्कृतिक पुरोधा भिखारी ठाकुर को अब भी नहीं मिल रहा समुचित सम्मान
प्रेमचंद के इस प्रसिद्ध वक्तव्य कि “संस्कृति राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है” को आधार बनाएं तो यह कहा जा सकता है कि...
गुरु घासीदास की सतनाम क्रांति के दो सौ साल बाद
गुरु घासीदास जातिवाद और अछूत प्रथा के जड़-मूल से उन्मूलन के पक्षधर थे। वे मूर्ति पूजा, मंदिर और भक्ति को भी ख़ारिज करते थे।...