इन गुणों के कारण बहुजन नायक कहलाए मान्यवर कांशीराम

मान्यवर कांशीराम की राजनीति केवल दलितों तक सीमित नहीं थी। उनकी परिकल्पना बहुजन समाज की थी जिसमें समाज के वंचित शामिल थे। लेकिन उनके बाद बहुजन की राजनीति सीमित क्यों हो गई? जयंती पर कांशीराम जी को याद कर रहे हैं मोहनदास नैमिशराय :

कांशीराम (15 मार्च 1934 – 9 अक्टूबर, 2006) पर विशेष

देश की आजादी के बाद राजनीति के फलक पर बहुजन समाज पार्टी का उभरना दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के द्वारा सत्ता के सवर्ण मठों पर जोरदार दस्तक के रूप में जाना जा सकता है। विशेष रूप में दलितों ने मान्यवर कांशीराम जी के नेतृत्व में जबर्दस्त पहल की और राजनीति में हिस्सेदारी ही नहीं बल्कि पॉवर सिंबल बनकर उभरे।

बसपा प्रमुख मायावती और मान्यवर कांशीराम (फाइल फोटो)

कहना न होगा कि कांशीराम के कारण ही दलितों की राजनीतिक आवाज देश के कोने-कोने में गूंजी। सदियों से सत्ता से दूर रहने वाला समाज सत्ता पर आसीन हुआ। 3 जून 1995 को नीति के पण्डितों के लिए उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज के हाथों में सत्ता का आना निश्चित ही अचरज से भरा था। कुछ के लिए यह दुखद अहसास जैसा ही था तथा कुछ के लिए सुखद अहसास। कुछ भी हो, ज्योतिबा फुले और डॉ. आंबेडकर के द्वारा जलाई गई परिवर्तन की मशाल कांशीराम के आते-आते उपलब्धियों में बदल गई, । जिसे बहुजन समाज ने राजनीति के विजय पर्व के रूप देखा।

उनकी सामाजिक और राजनैतिक क्षमता  विलक्षण थी। उनके नैतिक बल का कोई सानी नहीं था। सामाजिक सरोकारों के लिए उनकी प्रतिबद्धता, अभूतपूर्व थी। उन्होंने वह कर दिखाया, जो दलितों के बहुत ही कम नेता कर सके थे। आजादी के बाद सशक्त तरीके से कांग्रेस की परंपरागत राजनीति को चुनौती देने वाली बहुजन राजनीति ही थी, जिसे यहां तक ले आने में कांशीराम जी ने जी-तोड़ मेहनत की थी। वे पहले ऐसे नेता रहे जिन्होंने बहुजन समाज के अधिक से अधिक सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं से उन्हीं के घर/उन्हीं की बस्ती और उन्हीं के गांव/कस्बों तथा शहरों में जाकर मुलाकात की थी।

मुलायम सिंह यादव के साथ मान्यवर कांशीराम (फाइल फोटो)

कांशीराम जी पहले ऐसे सामाजिक और राजनैतिक चिंतक रहे, जिन्होंने स्वयं अपना मंच तैयार किया। इसीलिए एक समय ऐसा भी था, जब बड़ी-बड़ी राजनैतिक हस्तियां उनसे मिलने के लिए जाती थी। बल्कि कहना चाहिए कि उनसे मिलने का उन्हें समय लेना पड़ता था। हालांकि कांशीराम जी ने विकट और विषम परिस्थितियों में एक ऐसा मंच बनाया था, जिस पर हजारों और लाखों नहीं, करोड़ों की संख्या में उनके अनुयायी निकल पड़े थे। उन्होंने जिस तरह की राजनैतिक अफरा-तफरी भारतीय समाज में देखी और महसूस की थी, उससे निपटते हुए वे बहुजन समाज के लिए समता और समानता के दर्शन के विकल्प को जुटाना चाहते थे। उन्होंने कहा था, “बहुजन समाज पार्टी का यह लक्ष्य होगा कि इस गैर-बराबरी को जल्द से जल्द दूर करने की कोशिश करें।” मायावती के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की चार बार सरकार बनी, जो इतिहास में एक रिकार्ड के रूप में दर्ज हुई। वैसे अकेले एक प्रदेश में ही नहीं, देश भर में सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक आधार पर गैर-बराबरी पहले से कहीं अधिक बढ़ी है। दलित उत्पीड़न की घटनाएं भी हुई हैं। महिलाओं की अस्मिता से भी छेड़छाड़ हुई है। कांशीराम जी के जो भी उत्तराधिकारी रहे, ऐसा नहीं कि उन्होंने कुछ भी नहीं किया। अवश्य ही नया कुछ करने के प्रयास किए होंगे, लेकिन दलित समाज के लोग विशेषरूप से मतदाता, फिर से उसी चौराहे पर खड़े हैं, सत्ता से अलग होकर उनको छोड़ा गया था। क्या सत्ता का अर्थ सिर्फ राजनैतिक सत्ता है?। समाज की बेहतरी में जो योजनाएं मान्यवर कांशीराम जी ने बनाई थी, उनका क्या हुआ? क्या दलित इतिहास/संस्कृति/साहित्य तथा पत्रकारिता में दलितों का बहुजन समाज की हिस्सेदारी के कोई अर्थ नहीं? देखा गया है कि बहुजन समाज के अधिकांश नेता इन सब से अलग-थलग रहे हैं। वे साहित्य को दोयम मानते रहे हैं। इसीलिए  साहित्य और पत्रकारिता में दलित और पिछड़ी जाति की उतनी पैठ नहीं हो पायी है, जितनी होनी चाहिए। सवर्णों के अधिकांश संपादक और पत्रकार उनकी समस्याओं से वाकिफ तो हैं, लेकिन वे न्याय नहीं कर पाते हैं। बेहतर होगा कि बहुजन समाज के नेता इस पर विचार करें।


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