सनातनियों से सतनामी तक की यात्रा : गुरु घासीदास, संघर्ष और सृजन

गुरु घासीदास ने वर्ण-जाति आधारित ब्राह्मणवाद को चुनौती दी और छत्तीसगढ़ में समता आधारित सतनामी समाज का निर्माण किया। सतनामी समाज में ओबीसी और दलित जातियों के लोग बड़ा संख्या में शामिल हुए थे। इस समाज ने  अपने को वर्ण-जाति के चंगुल से कैसे मुक्त किया, बता रहे हैं मोहनदास नैमिशराय :

छत्तीसगढ़ी लोक काव्य (पंथी गीत) के बहाने दलित साहित्य स्रोत की तलाश करें तो उसका उद‍्गम झोपड़ियों से हुआ। जो शास्त्रीय परंपरा और रूढ़ियों के विरोध में बाहर आया। बाद के दिनों में इसकी तेजस्विता और प्रखरता के कारण इसका विकास होता गया। लेकिन दुखद स्थिति रही कि राजसत्ता के कुछ चाटूकारों तथा कुछ सतनामी लेखकों ने भी ‘गुरु घासीदास’ को चमत्कारी बाबा घोषित कर उनके व्यक्तित्व को एकांगी बना दिया। सवर्ण लेखकों तथा इतिहासकारों ने तो घासीदास जी को हिंदुत्व के रंग में रंगने में कोई कोर कसर छोड़ी ही नहीं। उनका जीवन ऐसी पहेली बना दिया गया कि बहुजन समाज के शोधार्थी जितना पहेलियों को हल करने का आज प्रयास करते हैं उतना ही वे उलझते जाते हैं।

गुरु घासीदास की एक तस्वीर

इतिहास की दृष्टि से देखें तो विश्व में तलवार और कलम, इन दोनों का महत्व रहा है। पर अतंर यह रहा कि एक ने ध्वंस किया और दूसरे ने सृजन। नेपोलियन बोनापार्ट ने हजार तलवारों से कहीं अधिक एक कलम की भूमिका को वरीयता दी है। इस बारे मेें हमारे सामने सतनामी पंथ उभरता है। गुरु घासीदास जी ने न सिर्फ मध्यकाल की संत परंपरा को आधुनिक काल से जोड़ा बल्कि भगवान बुद्ध के सतनाम मानवीय दर्शन को भी आगे बढ़ाया। लेकिन उन्होंने संघर्ष को नहीं छोड़ा। इसलिए कि संघर्ष ही उनका जीवन था। और संघर्ष के साथ ही सृजन। इस बारे में उन्हें पहला संत, गुरु या पथ-प्रदर्शक ही कहा जाएगा, जिनके दर्शन से क्रांंति के बीज उभरे। जिन्होंने अपने अनुयायियों को आत्मसम्मान का जीवन जीना सिखाया।

वे एक संत प्रकृति के महापुरुष थे। घासीदास का संतत्व उनके क्रांतिकारी जीवन का स्रोत था। उनका क्रांतिकारी तथा साधुरुप मानवता के प्रति गहरी चिंता का विषय था। इसीलिए एक संत का क्रांतिकारी होना, उसका अवमूल्यन नहीं है। निश्चित ही आधुनिक युग में घासीदास जी भारतीय समाज में एक सशक्त क्रांतिदर्शी और आध्यात्मिक गुरु के रूप में उभरे थे। भारत में उन्होंने राजाराम मोहनराय से बहुत पहले नवजागरण का संदेश दिया था। यह महत्वपूर्ण तथ्य बहुजन समाज के शोधार्थियों को गंभीरता सेे लेना चाहिए। संगठन और संघर्ष इन दोनों का महत्व घासीदास जी ने सूर्य की तरह जाना था। यह सब उन्होंने अपने पुरखों से समझा था, जिन्होंने पंजाब के नारनौल मेें औरंगजेब की सेना को जबर्दस्त जवाब दिया था। उनके पास बल था। पर छल से दूर रहे। वे स्वाभिमानी थे। गुरु घासीदास जी ने छत्तीसगढ़ के भूमिपुत्रों के बीच चेतना जगाई और समाज  में जातिभेद के खिलाफ समतावादी समाज की रचना के लिए आह्वान किया। कहना न होगा कि कबीर, रैदास, गुरुनानक, गुरु गोविंद सिंह और नाभादास आदि की क्रांतिकारी परंपरा को उन्होंने आगे बढ़ाया। इस तरह भगवान बुद्ध के द्वारा शुरू किये गये सतनाम दर्शन को पहले कबीर ने स्वीकार किया और कबीर के बाद गुरु घासीदास के पुरखों ने अपनाया। फिर अपने पुरखों से इसी मानवीय पंथ को स्वयं गुरु घासीदास ने आगे बढ़ाया।

देखा जाए तो सतनाम पंथ पहले इतिहास से जुड़ा फिर राजनीति से और बाद में समाज सुधार से। इस तरह तीन चरणों से होते हुए गुरु घासीदास, उनके बेटे बालकदास तथा अनुयाईयों का आंदोलन आगे बढ़ा। संक्षेप में देखें तो उस समय दलितों पर दो तरफ का उत्पीड़न हो रहा था। एक ओर हिन्दू समाज में विषमता थी दूसरी तरफ मुस्लिम समाज के लोगों के द्वारा भी दलितों के साथ भेदभाव होता था।

इतिहास में देखें तो 1656 ई. में शाहजहां की मृत्यु हो गई उसी वर्ष उसका पुत्र औरंगजेब गद्दी पर बैठा। जो 1656 से 1707 तक रहा। पंजाब में सिखों के साथ मुगलों के युद्ध होते रहे। जाटों ने भी विद्रोह किये। सतनामियों ने भी विद्रोह किये। पंजाब में औरंगजेब के अत्याचार बढ़ने लगे थे। सतनामी भी बेचैनी अनुभव करने लगे थे। असल में तब तक सतनामी नाम से श्रमिक जातियों का ऐसा समाज बन गया था, जो जातियों के जाल से मुक्त होकर समता, स्वतंत्रता और बंधुता में विश्वास करने करने लगा था। वे हिंसक नहीं थे, लेकिन गुरु गोविन्द सिंह की तरह अपनी सुरक्षा के लिए तैयार भी रहते थे।

इसी दौरान औरंगजेब की सेना से एक बार नहीं कई बार सतनामियों के साथ छिटपुट युद्ध हुए। उन्होंने मुगल फौजों से डट कर मुकाबला किया। मनोवैज्ञानिक रूप से दो-तीन बार तो मुगल सिपाही पस्त होते दिखाई दिये पर बाद में दिल्ली से भारी संख्या में सिपाहियों के साथ तोपें भी लाई गईं। जिनका सामना अधिक दिनों तक सतनामी नहीं कर सके। ऐसा भी कहा जाता है कि सतनामियों के बच्चे तोपों में घुस जाते थे और दुश्मन की सेना को परेशान करते थे पर अतंत सतनामियों को हारना पड़ा। न सिर्फ हारना बल्कि उन्हें अपनी मातृभूमि से उजड़ना भी पड़ा। नारनौल से सतनामी मुगल सेना से बचते हुए बिहार, असम, दिल्ली, नागपुर, बम्बई गये। सबसे अधिक संख्या में महानदी के किनारे-किनारे जाते हुए सतनामी छत्तीसगढ़ पहुंचे जहां सघन वन थे। हालांकि मुगल सैनिकों ने उनका पीछा भी किया लेकिन वे जंगलों व वनों में अपने आपको छुपाते रहे। बाद के दिनों में सतनामियों ने न केवल मुगलों के खिलाफ विद्रोह किये बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य से भी अपना सामना किया।

जिन दिनों बाराबंकी और छत्तीसगढ़ में सतनाम पंथ का जन-जन में प्रचार-प्रसार हो रहा था, उस समय पूरे देश में हाशिए के लोगों के बीत चेतना उभरने लगी थी। वे अपने इतिहास और अस्मिता से रू-ब-रू हो रहे थेे और वर्तमान में समता तथा सम्मान के लिए संघर्ष कर रहे थे। पंजाब में  बाबू मंगूराम मुगोवालिया (1886-1980) ने आदिधर्म पंथ की शुरूआत की। उत्तर प्रदेश में स्वामी अछूतानंद (1879-1933) ने आदि हिन्दू आंदोलन चलाया। इसी दौरान आन्ध्र प्रदेश में भाग्य रेड्डी वर्मा ने आदि हिन्दू पंथ शुरू किया तथा अल्मोड़ा में मुंशी हरिप्रसाद टम्टा (1887) ने शिल्पकार सभा का गठन करके शिल्पकारों में चेतना विकसित की। मद्रास में रामासामी नायकर (1873) ने आत्मसम्मान आंदोलन की शुरूआत की। बंगाल में हरिचन्द्र ठाकोर (1880) ने मतुआ धर्म (1872) और अनके बेटे गुरुचंद ठाकोर ने नमोशुद्रा आंदोलन चलाया। उनसे पहले राजाराम मोहनराय (1772-1833) ने भी सती प्रथा बाल विवाह के खिलाफ आंदोलन शुरू किया। उड़ीसा में भीमा भोई (1846) ने महिमा धर्म चलाया। केरल में अयंकाली (1863) ने शिक्षा हेतु प्रयास किये। वहीं जाेती राव फुले ने 1873 में सत्य शोधक समाज का गठन किया तथा उनकी पत्नी सावित्री बाई फुले (1831-1897) ने भी महिलाओं के बीच शिक्षा देने के प्रयास किये। इनके साथ देश भर में उसी दौरान अन्य महापुरुष भी जन जागरण कर रहे थे।     

गुरु घासीदास के अध्ययन का इतिहास 1862 ई. से प्रारंभ होता है, जब चीशोल्म ने उन पर एक विस्तृत आलेख लिखा था, जो जर्नल आॅफ एशियाटिक सोसाइटी आॅफ बंगाल में छपा था। इसी आलेख का संक्षिप्त रूप उन्होंने बाद में 1868 ई. के रिपोर्ट आॅन द लैंड रेवन्यू सेटेलमेंट आॅफ द बिलासपुर, डिस्ट्रिक्ट इन सेंट्रल प्राविन्सेज में प्रस्तुत किया था। उक्त रिपोर्ट में भी चीशोल्स ने अपने पूर्ववर्ती आलेख का हवाला दिया है (1868, 45 पैरा, 97)। चीशाल्म के पश्चात हीवेट (1869) ग्रांट (1870) शेरिंग (1872) इब्नेत्सन (1881) क्रैडोक (1889) बोस (1890) भट्टाचार्य (1896) गोर्डोन (1902-1908) वाल्टोन (1903) नेल्सन (1909-1910) थर्स्टन तथा रंगाचारी (1909) ट्रेंच (1909) रोज (1911) रिजजे (1915) रसेल तथा हीरालाल (1916) ब्रिग्स (1920) और एल्विन (1946) आदि ने घासीदास के व्यक्तित्व पर संक्षिप्त प्रकाश डाला है। इनके अलावा 1920 में जी.डब्ल्यू बिग्स की पुस्तक द चमार्स और विलियम बाइजरकी बिहाइंड मड वाल्स (1932) से भी तत्कालीन परिस्थितियों का पता चलता है।

गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर, मध्यप्रदेश

सतनामी पंथ, सतनामी समाज या फिर सतनामी दर्शन के मूलभूत तत्वों, परिस्थितियों, कार्यों, संघर्षों और इन सबको आगे बढ़ाने वाले सूत्राधारों के बारे में लिखने का उद्देश्य यह भी है कि संभवतः पूरे  देश में सतनामी पंथ पहला ऐसा क्रांतिकारी प्रयास रहा है जिसके माध्यम से अनुयाईयों ने जाति के जंजालों से मुक्त होकर सामाजिक बदलाव के कार्यक्रमों को अमली जामा पहनाया था। मानव-मानव के बीच भेदभाव की दीवारों को गिराकर एक ऐसे समाज की कल्पना की गई थी जिसमें किसी भी तरह का जुल्म और उत्पीड़न न हो। हर व्यक्ति को सम्मान मिले। हर महिला की अस्मिता की रक्षा हो और मेहनतकश वर्ग को जीविका उपार्जन करने के सम्मान सहित अवसर मिले। उसका आर्थिक पक्ष मजबूत हो। समाज से विषमता दूर हो और लोगों के आध्यात्मिक जीवन में सुधार हो। प्रत्येक संत/महापुरुष और दार्शनिक अपने युग का प्रतिनिधित्व करता है। लेकिन अपने युग के बाद भी इस युग में भी उनके अनुयायी उनके कार्यों को जन-जन तक ले जाने में लगे हैं। रायपुर के पास गिरोधपुरी में हर वर्ष उनके जन्म दिवस 18 दिसम्बर माह में मेला लगता है। जिसमें कई लाख सतनामी शामिल होते हैं। उनके अनुयाईयों में आज भी अधिकांश किसी भी  तरह के व्यसन से दूर रहते हुए सादगी का जीवन व्यतीत करते हैं। दूसरे न उनमें जाति के प्रति कट्टरता है और न धर्म के लिये। वे साम्प्रदायिक सोहार्द का प्रतीक हैं। और अन्य धर्मों के लोगों के लिए उदार हैं। वास्तव में आज के तनावग्रस्त जीवन में यह उनका सकारात्मक तत्व है। गुरु घासीदास की सतनामी विरासत को उनके बाद उनके बेटे बालकदास, बालकदास के बेट साहिबदास साथ ही बालकदास के भाई आगरदास, आगरदास के बेटे अजबदास आदि ने आगे बढ़ाया। निश्चित ही जीवन के सच के प्रचार-प्रसार के लिए यह चुनौती थी।

गुरु घासीदास जी का संक्षिप्त जीवन संघर्ष

सतनामी परिवार में एक परिवार मेदनीदास का भी था। जो पंजाब से यहां तक आए थे। मेदनीदास के पुत्र महंगूदास हुए, जो गिरोधपुरु या गिरोधा में बस गये थे।

गुरु घासीदास का जन्म 18 दिसम्बर, 1756 को (माघ मास की पूर्णिमा तिथि) बिलासपुर जिले के गीरोधा नामक गांव में किसान परिवार में हुआ था। अब यह गांव रायपुर जिले के अन्तर्गत सोनाखान जंगल के पास है। उनका आरंभिक जीवन गरीबी में बीता। वे दूसरों के खेतों में काम करते थे। उनके पिता का नाम महंगूदास तथा माता का नाम अमरौतीन था। गरीबी और सामाजिक भेदभाव, यह सब देखते और झेलते हुए वे जवान हुए। पिता का सपना था कि बेटा भी सवर्ण बच्चों की तरह स्कूल में जाकर पढ़े लिखे, लेकिन यह दलितों के लिए कहा संभव था। अंतत: घासीदास जी को खेती कार्य में ही आगे भी लगना पड़ा। खेती-बाड़ी ही जब घासीदास जी की जीविका उपार्जन बन गया तो महंगूदास ने उनका विवाह सिरपुर गांव निवासी देवदत्त की पुत्री सफूरा के साथ कर दिया। बाद में उनके चार बेटे अमरदास, बालकदास, आगरदास और अड़गड़िया के साथ बेटी सुभद्रा हुई। कुछ वर्ष उनका जीवन गृहस्थ में बीता, लेकिन मन नहीं लगा। और वे तथागत की तरह लोगों के दुखों से द्रवित होने लगे। एक दिन निर्जन जंगल की ओर निकल पड़े। वहां ‘छाता’ नाम से पहाड़ था, जिसके औरा-घौरा व तेंदू वृक्ष के नीचे बैठकर तपस्या की। जो अब दलितों का तीर्थस्थान भी बन गया है। वहीं एक सतनामी नाम से जगह बना दी गई। इस तरह सतनाम पंथ का प्रचार-प्रसार आगे बढ़ा। घासीदास के नैतिक दर्शन में भाग्य का कोई स्थान नहीं है। कर्म के सिद्धान्त को उन्होंने वरीयता दी है। सती, टोनही का बध, नरबलि, अंधविश्वास के खिलाफ उन्होंने ताउम्र आवाज बुलंद की।

गुरु घासीदास ने अपने सामाजिक सुधार के मिशन में पहला लक्ष्य दलितों के उद्धार का बनाया था। घासीदास के प्रभाव से लगभग सभी जातियों के लोग  सतनामी बने थे। जिसमें चमार, सुनार, लुहार, गड़रिया, यादव, अहीर, तेली, कुम्हार, जाट, कुर्मी, बढ़ई आदि की विशेष रूप से भागीदारी थी। हीवेट के उक्त कथन की पुष्टि अधोलिखित सतनामी गीत से भी होती है।

ब्राह्मण क्षत्री बनिया शूद्र चारों बरन के लोग

तब बनिन सतनामी, टोरिन भेद-भरम के रोग ला

सफा मिटाइन गया।

घासीदास गुरु बाबा पंथ ला चलाइन गा

गोंड कवंर कोरी घासी-चमरा महरा मोची

राउत अउ रोहिदास तेली सतनाम ल सोचिन

खुल गे हृदय कपाट गा।

मंदिर के भीतर रखी पत्थर की मूर्ति से अलग गुरु घासीदास जी ने अपने भीतर छिपी हुई शक्ति के बारे में कहा है,

अपन घट ही के देव ला मनाबो,

मंदिरवा में का करे जाबो,

पथरा के देवता हालै नई तो डोले,

पथरा के देवता सूधे नई तो जानै हो,

ओमा का धूप अगरबत्ती चढ़ाबो।

मंदिरबा में का करे जाबो,

क्रांति केवल कुर्बानी चाहती है, समझौता नहीं, यह पाठ गुरु घासीदास जी ने अपने अनुयाईयों को सिखाया। उनके बाद सतनाम पंथ को जिन्होंने ईमानदारी से आगे बढ‍़ाया, उन सभी को सवर्णों के अत्याचार सहने पड़े। गुरु घासीदास जी और सतनामियों के बारे में एक महत्वपूर्ण बात यहां दर्ज करनी जरूरी है। वह यह कि अधिकांश ब्राह्मणों को उस समय उनके पंथीगीतों के साथ मानवता के लिए दिये गये संदेश रास नहींं आते थे। बावजूद इसके कि सतनामियों से नैतिकता और स्वच्छता तथा चाल-चलन में ब्राहमण पीछे ही थे, लेेकिन सवर्णों को यह पसंद नहीं था कि दलित समाज का कोई संत या गुरु आगे आये। कहना न होगा कि मनुवाद पूरे देश में हावी था। लेकिन गुरु घासीदास भी अपनी प्रतिमा, चरित्रबल तथा साहस से इतिहास के उस गौरवशाली अध्याय से जुड़े, जिसे आज हम पढ़ते हैं।

इस काल की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा धार्मिक परिस्थितियां विषमता से परिपूर्ण थीं। 1740-41 तक छत्तीसगढ़ का शासन-सूत्र मराठों के अधिकार में जा चुका था। घासीदास कालीन छत्तीसगढ़ 10,000 वर्गमील केे क्षेत्र में फैला हुआ था। मराठें बहुत निर्दयी थे। न्याय नाम की कोई चीज नहीं थी। ब्राह्मण, गोसाई तथा बैरागियों को कभी मृत्युदंड शायद ही दिया गया हो।

ब्रिटिश औपनिवेशिक शक्ति की नजरें छत्तीसगढ़ पर पहले से ही थी। सतनामी-विद्रोह (1820-30) छत्तीसगढ़ के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना है। तत्कालीन समय में छत्तीसगढ़ में सूफियों, बैरागियों, शाक्तों, कबीरपंथियों, रैदासों तथा रामनामियों का प्रभाव था।

संत धरमदास कबीरदास के पट्ट शिष्य थे। उनका जन्म कसौदा ग्राम के वैश्य परिवार में हुआ था। उन्होंने लोकगीतों को सहज-सरल शैली में आमजन को दिया। दूसरी आेर देखें तो घासीदास के अनुयायी पहले अपने आपको रैदास की परंपरा से जोड़ते थे। (रसेल तथा हीरालाल, प्रथम खण्ड, 1916:313)

इसी नाम से एक दूसरा पंथ अठारहवीं शताब्दी में आया। इसके संस्थापक जगजीवनदास थे। गुरु घासीदास की कथा ‘अवरा’ तथा ‘धंवरा’ नामक वृक्षों के नीचे तपश्चरण के साथ प्रारंभ होती है–

एक पेड़ अंवरा, दूसर पेड़ धंवरा साहब

चारो वरन नयै अयरित पियाये साहब

घासीदास का जीवन इतिहास में शोषित और शोषक वर्ग के बीच के संघर्ष को उभारता है। कहना न होगा कि पंथीगीत मिथकीय फार्मेट (कथावस्तु) से जुड़े। यह वह युग था जब देवताओं और दैत्यों में युद्ध होता था। घासीदास स्वयं नवीं (रसूल) होना स्वीकार करते हैं।

हीवेट (1869:33), रिजले (ट्राइब्स एंड कास्ट्स ऑफ बंगाल), बोस (1890:2923), तथा रसेल व हीरालाल (प्रथम खण्ड 312-3) के अध्ययन क्रम के दौरान छत्तीसगढ़ के सतनामियों ने अपने को रैदास का वंशज माना था। डेंजिल इब्बेत्सन ने सतनामियों को छत्तीसगढ़ के मूल हिंदुओं के बीच घुसपैठिये के रूप में चित्रित किया है। इब्बेत्सन ने पंजाब में जनगणना का कार्य किया था। सतनामी मूल रूप से पंजाब से आए थे।

गुरु घासीदास की स्मृति में भारत सरकार द्वारा जारी डाक टिकट

घासीदास जन्म से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र को नहीं मानते थे। पंथीगीतों मेें वर्णित चारों बरन ला अमरित पिलाएं में उनका यही भाव था। वे व्यक्तियों के टाइप को मानते हैं। उनके अनुसार ब्राह्मणों में भी शूद्र पैदा होते हैं और शूद्रों में भी ब्राह्मण पैदा होते हैं। क्षत्रियों में वैश्य पैदा हो जाते हैं और वैश्यों में क्षत्रिय पैदा हो जाते हैं। वे वर्ण के इस मनोवेज्ञाानिक तथ्य को समझते थे। और जातीय भेदभाव मिटाने का प्रयास करते थे। डॉ. हीरालाल शुक्ल के मतानुसार वे केवल दलितों के ही मसीहा नहीं थे, अपितु संपूर्ण छत्तीसगढ़ के मसीहा बनकर उभरे थे। इसलिए उनके सामने छत्तीसगढ़ की अस्मिता का सवाल प्रमुखता से रहा। 1820 से 1830 के मध्य छत्तीसगढ़ एक सांस्कृतिक क्रांति के दौर से होकर गुजरा था। सतनामियों के संगठन और संघर्ष ने प्रतीक के रूप में सफेद झंडे का चुनाव किया था। जिसे जेत खान पर लहराया जाता था। प्रत्येक प्रातः और सायं सूर्योपासना की विधि प्रचलित थी। गुरु घासीदास जी का परिनिर्वाण 20 फरवरी, 1850 को हुआ।

गोत्र समूह

सतनामियों के गोत्र संक्षेप में इस तरह थे– सोनी, जागड़ा, बंजारा, मंडल, राउत, सोनबरना, चैहान, पटेला और जहां तक धर्म की बात है, सतनामियों ने अपना धर्म अलग माना। न वे हिन्दू थे और न मुसलमान। गुरु ग्रंथ साहब की तरह गुरु घासीदास ने निर्माण ज्ञान की रचना की।  

गुरु घासीदास के वैभव से संबद्ध सैकड़ों नृत्यमय पंथीगीत सतनामियों में प्रचलित हैं। उनमें एक पंथीगीत धरती और किसान के महत्व को रेखांकित करता है–

सत्यधारी बन के आए, जग म महान

तैं हलधर किसान, खेती-खार-नरवा बनाई के

उपजाए तैं हर धान, खेती-खार-नरवा बनाई के ।।

नरवा-झोरकी-डोगरी-पहरी

जंगल-झाड़ी पाए हस, जंगल झाड़ी पाए हस

लाघन भुखन खून पसीना

मेहनत पार बनाए हस, मेहनत पार बनाए हस

तारे सत्या हे महाान, जग देहे अन्नदान

धरती के सेवा ले बजाई के–

तैं हलधर किसान खेती खार नरवा बनाई के

अहरु बिछरु सांप सेरु, कांटी खुटी गड़ि के

कांटी खुटी गड़ि के

हिरण्यकेशी-सूत्र ने यह भी व्यवस्था दी थी कि ‘यदि कोई शूद्र कर्तव्यनिष्ठ आर्य को भला-बुरा कहे अथवा मार्ग या किसी सवारी या किसी आसन पर उसकी बराबरी करे तो उसे छड़ी से पीटना चाहिए।’(विल्सन, इंडियन कास्ट, पृ. .195)

निकटता का यह एक दूसरा ही पक्ष था, जिसमें ‘आसन के स्तर’ के अनुसार सोपानिक भिन्नता का ज्ञान होता है। मातहत या छोटे व्यक्ति को अपने से बड़े व्यक्ति के सामने अधिक ऊंचे या समान बराबरी वाले आसन पर नहीं बैठना चाहिए। निर्विवाद रूप से यह एक सामंती विचार है, जिसका इतिहास स्मृति-ग्रंथों से जुड़ा से जुड़ा हुआ है। मनु (11.198) का कथन है कि ‘जब शिष्य अध्यापक या गुरु के पास हो तो उसे चाहिए कि अपनी शय्या या आसन उसकी शय्या या आसन से नीची कर ले।’ बील्स (1962-61) ने यह अनुभव किया था कि गांव के महत्वपूर्ण व्यक्ति जब मालगुजार से मिलने आते थे तो वे मालगुजार के आसन के नीचे बने हुए आसन में बैठते थे। इस प्रकार स्थानगत दूरी प्रतिष्ठा का पैमाना बन गई थी। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि घासीदास के अनुयायी इस बात को नहीं भूले थे। यही कारण है कि इस दूरी को समाप्त करने के लिए ‘रेल के डिब्बों में प्रवेश कर जाते थे और जानबूझकर सवर्णों को धक्का देते थे यह कहते हुए कि उन्होंने भी टिकिट के लिए पैसा दिया है और उनका भी सीट पर बैठने का बराबर का अधिकार है। ऐसी स्थिति में सवर्ण अपने को भ्रष्ट मानकर शुद्ध होने के लिए स्नान करते थे।’ ” (रसेल तथा हीरालाल, खण्ड 1, 1916, पृष्ठ 314)। सतनामी-विद्रोह में सतनामियों की यह चाह थी कि वे अपने खोये हुए आत्मसम्मान को पुन: प्राप्त कर लें। इसीलिए विपरीत स्थिति में उनका आक्रोश व्यक्त होना स्वाभाविक था। वे अपने ऊपर सदियों से मढ़़े गये प्रतीकों को उखाड़ फेंकना चाहते थे। इस क्रम में जो उलटफेर हुए, वे बार-बार हुए। सरकारी अभिलेख इनसे भरे पड़े हैं। प्रत्येक बार पहले से भी अधिक संख्या में उलटफेर हुए। इसीलिए कहीं-कहीं हिंसा का भी प्रदर्शन हो गया। सम्मानजनक ऊंचाई के पारंपरिक नियम उस समय टूटे, जब सतनामी-विद्रोह के दरमियान कोई सतनामी वहां के सुविधाभोगी व्यक्ति के घर के सामने से हाथी या घोड़े पर चढ़कर निकला (बोस 1890)। उसने ऐसा इसलिए किया कि परंपरा से चले आ रहे निषेध का उल्लंघन करे।

उनके बेटे बालक दास की तो हत्या इसलिए ही कर दी गई थी कि हाथी पर चलते थे। यहां यह सवाल पाठकों के बीच से आ सकता है कि सतनामियों के पास हाथी, घोड़े कहां से आ गये। असल में छत्तीसगढ़ को समृद्ध बनाने में उनका बड़ा हाथ रहा है। हरियाणा से छत्तीसगढ़ आने पर सतनामियों ने सूनी पड़ी धरती में अन्न उगाने में बहुत मेहनत की। परिणाम स्वरुप उनके पास भी पैसा आया।

(कॉपी एडिटर : प्रमोद रंजन)

संदर्भ :

हिंदी पुस्तकें

  1. डाॅ. जे. आर. सोनी, सतनाम पोथी, वैभव प्रकाशन, रायपुर, छत्तीसगढ, 2006
  2. सूरज बड्त्या, बाबू मंगूराम और आदि धर्म मंडल आंदोलन, अनामिका पब्लिशर्स, 4697/3, 21-ए, 3. अंसारी रोड दरियागंज, नई दिल्ली-110002, 2013
  3. मोहनदास नैमिशराय, भारतीय दलित आन्दोलन का इतिहास, भाग-1, राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा. लि. दरियागंज, नई दिल्ली, 2013
  4. बाबा साहेब डाॅ. अम्बेडकर संपूर्ण वांड्मय खंड-16
  5. टी. आर. खुन्टे, सतनाम दर्शन, सतनाम  कल्याण एवं गुरु घासीदास चेतना संस्थान, डी. 134, कोण्डली, दिल्ली-110096
  6. डाॅ. हीरालाल शुक्ल, ‘गुरु घासीदास संघर्ष समन्वय और सिद्धान्त’ सिद्धार्थ बुक्स, हरदेव पुरी, दिल्ली – 110093

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