‘यूजीसी के अलाेकतांत्रिक कदम का विरोध हो’

यूजीसी द्वारा फारवर्ड प्रेस को अपनी कथित ‘मान्यता’ सूची से बाहर करने पर विकाश सिंह मौर्य कहते हैं कि यह समाज को शिक्षा से वंचित करने षड्यंत्र है। पढ़िए उनकी टिप्पणी :

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा वैज्ञानिक मिजाज समाज वैज्ञानिक पत्रिकाओं को बिना किसी विधिवत जांच-पड़ताल और पूर्वसूचना के अपनी लिस्ट से बाहर कर देना अलोकतांत्रिक और शिक्षा विरोधी फैसला है। हम इसका विरोध करते हैं। हमारे विरोध का प्रमुख कारण यह है कि यूजीसी का फैसला शोध की वैज्ञानिक प्रकृति एवं मानवतावादी प्रतिबद्धता को आधार न बनाते हुए अपने से भिन्न मत रखने के लोकतान्त्रिक मूल अधिकारों का हनन करते हुए किया गया है।

मेरा अपना अनुभव है कि फारवर्ड प्रेस के माध्यम से ही मुझे कई बहुजन महापुरुषों, महामहिलाओं एवं समाज वैज्ञानिकों, साहित्यकारों के बारे में जानकारी प्राप्त हुई है। मसलन भिक्खु बोधानंद, तारक चंद्र दास, मोती रावण कंगाली और भी बहुत से सृजनात्मक क्षमता वाले इन्सान। मुझे अच्छे से स्मरण है कि फारवर्ड प्रेस ही वह मैगजीन है जिसने संपूर्ण भारत भर में एक सांस्कृतिक विकल्प के रूप में महिषासुर आंदोलन को खड़ा करने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाया है।

अब जबकि पूरे भारत भर के विश्वविद्यालयों में हिंसा एवं अराजकता का प्रायोजित माहौल बनाया जा रहा है और ऐसा माहौल बनाने में भाजपा नेतृत्व वाली केंद्र सरकार एवं उसका पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, सहयोगी शाखाएं विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, हिंदू युवा वाहिनी, हिंदू रक्षा मंच और भी जाने कितने बड़े-छोटे कायर शिक्षा-शिक्षण विरोधी संगठन पूरी शिद्दत से लगे हुए हैं।

फारवर्ड प्रेस पत्रिका के अक्टूबर, 2013 का कवर पेज। फारवर्ड प्रेस शोधपरक आलेखों के लिए जाना जाता है

स्पष्ट शब्दों में कहा जाये तो यूजीसी द्वारा इन हिंसक, अराजक और शिक्षण विरोधी संगठनों के कार्यकलापों पर रोक नहीं लगाकर वैज्ञानिक मिजाज वाली पत्रिकाओं को ही रोकना। यह बहुत बड़ी साजिश के तहत किया जा रहा है। क्योंकि इतिहास गवाह है कि इन निकम्मे और अराजक लोगों का गिरोह (बमुश्किल पूरी जनसँख्या का चार-पाँच फीसदी) हमेशा से ही पढ़ने-लिखने वाले और चिंतनशील लोगों की सृजनशीलता से भयभीत रहें हैं। अगर यह सृजनशीलता किसी भी समाज के 90 फ़ीसदी आबादी के द्वारा की जा रही हो या उनके हित में की जा रही हो तो दस फ़ीसदी वालों के नेतृत्वकर्ताओं को न जाने क्यों ऐसा लगता है कि यह उनके खिलाफ हो रहा है।

प्रथम दृष्टया तो कारण यही समझ में आता है कि यह फौज कोई काम नहीं करना चाहती। ये हमेशा दूसरों के शोषण पर केंद्रित अपनी आजीविका चलाना चाहते हैं। अब यह आजीविका किस तरीके से बदस्तूर कायम रहे, खास तौर पर शिक्षण केंद्रों में उनके लिए सारा कारोबार और मठाधीशी कैसे बनी रहे, इसके लिए ये प्रपंच किये जा रहे हैं।

क्योंकि शिक्षा एक ऐसी पूंजी है जहां से इनके सांस्कृतिक और सामाजिक शोषण का पर्दाफाश होगा। ये कभी नहीं चाहेंगे कि सदियों से चली आ रही ये गुलामी की संस्कृति खत्म हो। फॉरवर्ड प्रेस जैसी पत्रिकाओं पर बैन लगाना भी इनकी इसी ‘कब्ज़ा करो, जानकारी, समझदारी और इतिहासबोध नागरिकों में न आने दो’ की घृणित राजनीति का हिस्सा है।

इस भारत भूमि पर कई नालंदा राजकीय संरक्षण में श्रमण संस्कृति के उन्नायकों ने फलीभूत किये हैं। अतीत में पुरोहित वर्ग के इशारे पर सरकारी संरक्षण में जलाये भी गए हैं और वर्तमान में भी बरबाद किये जा रहे हैं। देखना यह हैं कि यह लड़ाई किन-किन स्तरों पर और कितनी लम्बी चलती है। हम अपने स्वभावतः नए नालंदा बसाते जायेंगे। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के इस अलोकतांत्रिक कदम का हर जगह विरोध होना चाहिए। हम सदैव फारवर्ड प्रेस और वैज्ञानिक मिजाज समाज वैज्ञानिक पत्रिकाओं के साथ हैं।

भवत्तु सब्ब मंगलं।।


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