संस्मरण : जब महामना रामस्वरूप वर्मा के आह्वान पर जलायी गयी थी मनुस्मृति और रामायण की प्रतियां

आज दिल्ली में सरकार की आंखों के सामने संविधान की प्रतियां जलायी जा रही हैं। स्थानीय प्रशासन की नींद तब खुलती है जब पूरे देश में लाेग विरोध करते हैं। लेकिन जब रामस्वरूप वर्मा के आह्वान पर रामायण और मनुस्मृति की प्रतियां जलायी गयी थी तब सरकार पहले से ही चौकस थी और कार्यक्रम के पहले ही कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया था। अपना संस्मरण बता रहे हैं उपेंद्र पथिक :

(रामस्वरूप वर्मा ‍‍: जन्म 22 अगस्त 1923 – निधन 19 अगस्त 1998)

अभी हाल में दिल्ली के जंतर-मंतर पर कुछ लोगों ने संविधान की प्रतियां जलायी। प्रारंभ में स्थानीय प्रशासन ने तो उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। परंतु जब देश भर में इसका विरोध होने लगा और मुकदमे दर्ज हुए तब स्थानीय प्रशासन की नींद खुली और अबतक मिली जानकारी के अनुसार तीन लोगों की गिरफ्तारियां हुई हैं।

दरअसल यह घटना उस दिन की यादों को ताजा कर देती है जब 1978 में अर्जक संघ के संस्थापक महामना रामस्वरूप वर्मा के आह्वान पर अर्जक संघ और शोषित समाज दल के कार्यकर्ताओं द्वारा उत्तर प्रदेश  और बिहार में मनुस्मृति व रामायण की प्रतियां जलायी गयी थी। तब कई जगहों पर तो प्रशासन इतनी सतर्क थी कि कार्यक्रम के पहले ही कई कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया था। तमाम दबिश के बावजूद कई जगहों पर यथा कानपुर के देनतपुर (कांधी) में सुबह-सवेरे ही मनुस्मृति व रामायण की प्रतियां जला दी गयीं।  

जैसे ही प्रशासन को इस बात की जानकारी मिली उसने अर्जक संघ के शिवकुमार भारती ,एडवोकेट राजेन्द्र बहादुर,  मनफूल सिंह, प्रेम नारायण सचान आदि कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया। उन्हें मुकदमों में फंसा दिया गया। यह वह दौर था जब अर्जक संघ के कार्यकर्ताओं को ब्राह्मणवादी व्यवस्था में पल रहे समाज के अपने पराये सभी लोगों के कोपभाजन का शिकार होना पड़ रहा था।  यह एकमात्र उदाहरण नहीं था। ऐसी घटनायें दर्जनों जगहों पर हुए। मसलन बोधगया में शोषित समाज दल के नेता राघवेन्द्र नारायण यादव, कमलेश वर्मा आदि के नेतृत्व में रामायण व मनुस्मृति का दहन होने वाला ही था कि प्रशासन ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। पुलिस द्वारा दमन की यह कार्रवाई अप्रत्याशित नहीं थी। बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर के बाद आजाद भारत में पहली बार अर्जक संघ के संस्थापक महामना रामस्वरूप वर्मा के नेतृत्व में रामायण और मनुस्मृति का खुलेअाम दहन किया गया।

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इस कार्यक्रम के पहले 1970 में जब भारत की तात्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने तुलसी चतुश्शती समारोह की अध्यक्षता स्वीकार कर ली और लाखों रुपए का सहयोग कर दिया तब उत्तर प्रदेश के विधायक होने और अर्जक संघ के संस्थापक की हैसियत से महामना रामस्वरूप वर्मा ने उन्हें और तत्कालीन राष्ट्रपति बी.वी. गिरि को रामायण में स्त्री और शुद्रों के खिलाफ तथा ब्राह्मण की महिमा मंडन करने वाले तमाम श्लोकों की चर्चा करते हुए पत्र लिखा कि यह संविधान सम्मत नहीं है, इसलिए उस कार्यक्रम से अपने को अलग रखें। परंतु वे नहीं माने। यहां तक कि पत्र का उत्तर भी नहीं दिया गया।

अपने इस पत्र को वर्मा जी ने पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया जिसका नाम ‘ब्राह्मण महिमा क्यों और कैसे’ रखा।  पहला संस्करण हाथोंहाथ बिक गया। तुरंत ही दूसरा संस्करण छपवाना पड़ा था। वर्मा जी यही नहीं रूके। उन्होंने कुछ समय बाद ही ‘मनुस्मृति राष्ट्र का कलंक’ नामक पुस्तक लिखी। यह भी प्रकाशित होते ही हाथोंहाथ बिक गयी। इसके बाद 23 दिसंबर 1972 को लखनऊ से प्रकाशित अर्जक साप्ताहिक में एक लेख लिखा जिसका शीर्षक था – सरकार  ब्राह्मणवादी ग्रंथ जब्त करे।

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अपने  लेख में  वर्मा जी ने लिखा था कि जाति-पाति की गैरबराबरी, उठने-बैठने की गैरबराबरी, बोलचाल की गैरबराबरी और खान-पान की गैरबराबरी ब्राह्मणवादी  ग्रंथों में भरी पड़ी है। इनमें मनुस्मृति, रामायण, विष्णु स्मृति, वशिष्ठ धर्म सूत्र, शतपथ ब्राह्मण, पराशर स्मृति आदि ब्राह्मणवादी ग्रंथ शामिल हैं।

उन्होंने यह भी लिखा कि भारत में जनतंत्र है और भारत का संविधान सबसे बड़ा शास्त्र। और जो भी इसके विपरीत चलेगा वह दंड का भागी होगा।  ऐसी परिस्थिति में यदि अवलोकन किया जाय तो रामायण, मनुस्मृति आदि धार्मिक ग्रंथ नहीं बल्कि ब्राह्मणवादी ग्रंथ है, क्योंकि इन ग्रंथों में एक ओर जहां केवल ब्राह्मण का महिमामंडन किया गया है  वहीं दूसरी ओर स्त्री और शुद्रों के साथ अन्याय और शोषण करने के उपाय बताये गये हैं।

जन्म 22 अगस्त 1923 – निधन 19 अगस्त 1998)

उन्होंने यह भी लिखा कि मनुस्मृति विषमता मूलक संस्कृति को बढ़ावा देने वाला और वैज्ञानिक चिंतन का विरोधी है। इतना ही नहीं शुद्र और स्त्री के प्रति इतनी घृणा फैलायी गयी है कि भारतीय दंड विधान की धारा 153, 295 ए के अंतर्गत दंडनीय करार दिया जा सकता है।

वर्मा जी ने अर्जक साप्ताहिक में जो निबंध लिखा था, उसे मिलाकर एक नया पुस्तक का आकार दिया गया जिसका नाम ‘मानववाद बनाम ब्राह्मणवाद’  है। इसके अलावा ‘क्रांति क्यों और कैसे’, ‘मानववादी प्रश्नोत्तरी’ आदि भी पुस्तकें लिखी है। उन पुस्तकों को पढ़कर ब्राह्मणवाद और मानववाद को सही रूप में समझा जा सकता है।

यहां पर यह चर्चा करना भी जरूरी है कि उत्तर प्रदेश की सरकार ने 1970 में बाबा  साहब की लिखित पुस्तकों को जब्त कर लिया था तब अर्जक संघ ने आंदोलन छेड़ा और अर्जक नेता ललई सिंह यादव के हवाले से इलाहाबाद उच्च न्यायलय में सरकार के विरोध में मुकदमा दर्ज किया गया। उन्हें जीत मिली और बाबा साहब के उन पुस्तकों पर से लगा प्रतिबंध हटाया जा सका। 5 सितंबर 1974 को जिन मांगों को लेकर शोषित समाज दल के राष्ट्रीय महामंत्री जगदेव प्रसाद कुर्था (अरवल,  बिहार) प्रखंड कार्यालय में शहीद हो गये थे, उनमें पहली मांग यही थी कि डॉ. आंबेडकर की पुस्तकों को सभी स्कूलों व पुस्तकालयों में अनिवार्य रूप से उपलब्ध करायी जाय।

कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि बाबा साहब के बाद भारत में पहली बार महामना  रामस्वरूप वर्मा ने ब्राह्मणवाद के खिलाफ जो आंदोलन छेड़ा था, यह उसी का परिणाम है कि हमें आज समाज में  थोड़ा बहुत सम्मानजनक स्थान मिल सका है। उस आंदोलन में ललई सिंह यादव, चौधरी महाराज सिंह भारती और जगदेव प्रसाद की भूमिका भी अहम रही है जो अपनी लेखनी के माध्यम से भी अर्जक समाज को जागृत करते रहे हैं।  हमें उस आंदोलन को और आगे बढ़ाने का संकल्प लेना चाहिए और उसके लिए यह आवश्यक है कि ब्राह्मणवादी ग्रंथों को समाज से नकार कर मानववादी ग्रंथों को पढ़ने पर जोर दिया जाना चाहिए।

(कॉपी एडिटर : एफपी डेस्क/सिद्धार्थ)


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