आधार : जानें क्यों उठाया जस्टिस चंद्रचूड़ ने सवाल?

राजनीतिक पार्टियां हार में भी अपनी जीत तलाशती हैं और कई बार इसमें सफल भी रहती हैं। आधार पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद केंद्र की भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने ऐसा ही रुख अख्तियार किया है। वैसे सुप्रीम कोर्ट के बहुमत के फैसले ने इसे असंवैधानिक नहीं बताया पर आधार इस फैसले से लहूलुहान हो गया है। पढ़िए यह आलेख

शीर्ष अदालत का फैसला, आधार कानून, और आंकड़ों का राष्ट्रवाद  

आधार कानून, 2016 की धारा 57 के मुताबिक ‘राज्य या कोई निगम या व्यक्ति’ आधार संख्या का इस्तेमाल ‘किसी भी उद्देश्य के लिये किसी व्यक्ति की पहचान स्थापित करने में कर सकता है।’  इसी प्रावधान के तहत मोबाइल कंपनियां, प्राइवेट सर्विस प्रोवाइडर्स के पास वैधानिक सपोर्ट था जिससे पहचान के लिए उपभोक्ताओं का आधार संख्या मांगा जाता था। इस कानून को धन विधेयक के रूप में पेश किये जाने के फैसले को लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने स्वीकृति दी थी। सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों वाली संविधान पीठ ने दो फैसले दिये हैं। दोनों फैसलों मे आधार कानून पर सवाल उठाया गया है। चार जजों ने आधार के बहुत सारे प्रावधानों पर सवाल उठाया है। एक जज ने तो पूरे आधार कानून को ही असंवैधानिक बताया है। कोर्ट ने आधार कानून की धारा 57 को खत्म कर दिया है।

2010 से ही निजी कंपनियां कर रही थीं मांग

आधार क़ानून के तहत प्राइवेट कंपनियां 2010 से ही आधार की मांग कर रही थी। धारा 57 के अनुसार सिर्फ राज्य ही नहीं बल्कि बॉडी कॉरपोरेट या फिर किसी व्यक्ति को चिन्हित करने के लिए आधार संख्या मांगने का अधिकार नहीं है। इस प्रावधान के तहत मोबाइल कंपनी, प्राइवेट सर्विस प्रोवाइडर्स के पास वैधानिक सपोर्ट था जिससे वो पहचान के लिए आपका आधार संख्या मांगते थे। ऐसे नाजायज प्रावधान को धन विधेयक का हिस्सा बनाया गया था जिसे लोकसभा ने कानून बना दिया था। 26 सितंबर, 2018 तक इस प्रावधान के तहत देशवासियों के साथ कानून के नाम पर घोर अन्याय किया गया। ऐसा करके देश हित और नागरिकों के हित के साथ खिलवाड़ किया गया है।  इसकी सांस्थानिक जिम्मेवारी तय होनी चाहिए।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा – केंद्र ने किया फर्जीवाड़ा

बावजूद इसके, सुप्रीम कोर्ट के पांच में से चार जजों के फैसले में आधार कानून को धन विधेयक (मनी बिल) के रूप में संसद से पास कराने को गलत नहीं कहा है और उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष के फैसले को सही बताया। ये चार जज हैं प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए.के. सीकरी, न्यायमूर्ति ए.एम. खानविलकर और न्यायमूर्ति अशोक भूषण। इन चार जजों का यह मानना भी है कि लोकसभा अध्यक्ष के फैसले को संवैधानिक चुनौती दी जा सकती है।

जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़

न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ ने अपने फैसले मे कहा है कि वह सरकार की इस दलील से सहमत नहीं हैं कि आधार कानून धन विधेयक है और उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष के फैसले को गलत बताया है। आधार को किसी भी तरीके से लोकसभा अध्यक्ष को धन विधेयक नहीं बताना चाहिये था क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 110 (धन विधेयक की परिभाषा) की शर्तों को पूरा नहीं करता है। उन्होंने कहा कि धारा 57 के तहत कोई लाभ और सब्सिडी का वितरण नहीं है। धन विधेयक के तहत राजस्व और खर्च से जुड़े हुए मामले आते हैं। इस पर अंतिम फैसला लोकसभा लेती है। ऐसे विधेयकों पर राज्यसभा में चर्चा तो हो सकती है लेकिन राज्यसभा उसे खारिज नहीं कर सकती। उन्होंने अपने फैसले में कहा कि आधार को साधारण विधेयक की तरह पारित किया जा सकता था। उन्होंने आधार को लागू करने वाले भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) के साथ हुए विदेशी निजी कंपनियों के करार का हवाला देते हुए कहा कि नयी इन बायोमेट्रिक तकनीक बनाने वाली  कंपनियों की इसमें सहभागिता से राष्ट्रीय सुरक्षा को होने वाले खतरे और नागरिकों के मूलभूत अधिकारों के हनन को नजरंदाज नहीं किया जा सकता है। इसलिये उन्होंने आधार परियोजना और कानून को खारिज कर दिया और इसके जगह पर कोई और वैकल्पिक व्यवस्था करने की अनुशंसा की।      

लोकसभा में आधार विधेयक पेश करते वित्त मंत्री अरुण जेटली

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने आधार विधेयक 2016 को लोकसभा में धन विधेयक कि तरह पेश किया जिसे लोकसभा अध्यक्ष ने धन विधेयक होने की स्वीकृति दी।  इसे राज्यसभा में भी पेश किया गया था। राज्यसभा ने 16 मार्च, 2016 को पाँच संशोधनों के साथ इसे वापस लोकसभा भेज दिया था।  लेकिन लोकसभा ने इन संशोधनों को अस्वीकार कर दिया और आधार विधेयक, 2016 को लोकसभा में पारित कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार विशिष्ट पहचान संख्या इसलिए विशिष्ट है क्योंकि वह बायोमेट्रिक (उँगलियों और पुतलियों की तस्वीर जैसे) आकड़ों पर आधारित है। यह मान्यता अवैज्ञानिक है क्योंकि मानव शरीर मे ऐसा कोई अंग नहीं है जो परिवर्तनशील नहीं है। इसी अवैज्ञानिक मान्यता के आधार पर आधार परियोजना और आधार कानून को देशवासियों के ऊपर थोपा गया है।       

सरकार ने किया सुप्रीम कोर्ट को गुमराह

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को गुमराह किया है। जिस तरह से आधार के तहत उँगलियों के निशान और रेटिना की  तस्वीरें ली जा रही हैं उसकी वजह से नागरिकों को कैदियों की स्थिति से भी बदतर हालत में खड़ा कर दिया जा रहा है। क्योंकि कैदी पहचान कानून के तहत ये प्रावधान है कि कैदी अगर बाइज्जत बरी होता है या सजा काट लेता है तो उसके उँगलियों के निशान को नष्ट कर दिया जाता है। आधार के लिए जुटाए गए ये आंकड़े कभी नष्ट नहीं होने वाले थे। अब सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि इस तरह के रिकॉर्ड छह माह से अधिक समय के लिए नहीं रखे जा सकते।  

आधार बनाने लिए आंखों की तस्वीर खिंचवाती एक वृद्धा

वित्तमंत्री अरूण जेटली ने आधार के जरिए जुटाए जा रहे बायोमेट्रिक आंकड़ों को पूरी तरह सुरक्षित बताया था। मीडिया मे हुए खुलासों ने इस दावे की पोल खोल दी है। इन खुलासों से यह स्पष्ट हो गया है कि आंकड़ों वाली कंपनियों और उनके विशेषज्ञों में और अपराध जगत के माफिया तंत्र के बीच मीडिया में परिष्कृत प्रस्तुतीकरण का ही फर्क है। राज्यसभा में उन्होंने कहा ”ये केवल खास मकसद से है और सटीक तरीका भी इसके लिए बनाया गया है। इसके आलोचकों का यह  कहना कि इस जानकारी का वैसे इस्तेमाल किया जाएगा जैसे नाजी यहूदी लोगों को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल करते थे। इन दावों की सच्चाई का पता आधिकारिक तौर पर कोर्ट के कम-से-कम एक जज को चल गया है। दिल्ली हाइकोर्ट के एकल पीठ के सामने लंबित रक्षा वैज्ञानिक मैथ्यू थॉमस की याचिका की सुनवाई के बाद जनता सहित सभी जज भी उसे जान जाएँगे। इस मामले की सुनवाई 17 नवम्बर को तय है।     

वित्तमंत्री अरूण जेटली पर तथ्यों को गलत ढंग से पेश करने का आरोप लगाया गया है। सूचना के अधिकार के तहत कॉन्ट्रेक्ट एग्रीमेंट के बारे में जो जानकारियां प्राप्त की गई हैं उसमें स्पष्ट कहा गया है कि ऐक्सेंचर, सैफ्रन ग्रुप, एर्नेस्ट यंग नाम की ये कंपनियां भारतवासियों के इन संवेदनशील बायोमेट्रिक आंकड़ों को सात साल के लिए अपने पास रखेंगीं। इस का संज्ञान सूप्रीम कोर्ट के एकल जज के फैसले में लिया गया है। इसी कारण चार जजों ने भी निजी कंपनियों को आधार सूचना देने पर पाबंदी लगा दी है।

मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा

यह परियोजना विदेशी बायोमेट्रिक टेक्नोलॉजी कंपनियों को मुनाफे देने के लिए बनाया गया है। आधार परियोजना में हर एक पंजीकरण पर 2 रुपये 75 पैसे खर्च हो रहे हैं। भारत की आबादी लगभग 125 करोड़ है.न सिर्फ पंजीकरण के समय बल्कि जब जब इसे इस्तेमाल किया जाएगा, रीडुप्लिकेशन के नाम पर इन कंपनियों को  इसका मुनाफा पहुंचाया जाएगा। इन बायोमेट्रिक टेक्नोलॉजी कंपनियों को मुनाफा पहुंचाने के लिए ये सब किया जा रहा है। यह देशहित में नहीं है और यह मानवाधिकारों का बड़ा उल्लंघन है।

नाकाफी है आधार की अनिवार्यता खत्म करने की पहल

इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यूजीसी, सीबीएसई और निफ्ट जैसी संस्थाएं आधार नहीं मांग सकती हैं। साथ ही स्कूल भी आधार नहीं मांग सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अवैध प्रवासियों को आधार न दिया जाए। कोर्ट ने कहा है कि मोबाइल और निजी कंपनियाँ आधार नहीं मांग सकती हैं। कोर्ट ने आधार को मोबाइल से लिंक करने का फैसला भी रद्द कर दिया। कोर्ट ने आधार को बैंक खाते से लिंक करने के फैसले को भी रद्द कर दिया। किसी भी बच्चे को आधार नंबर नहीं होने के कारण लाभ/सुविधाओं से वंचित नहीं किया जा सकता है। मगर यह काफी नहीं है।

प्राधिकरण द्वारा अब तक 120 करोड़ से अधिक भारतीयों  को आधार संख्या जारी कर चुका है। यह नागरिकता का पहचान नहीं है। यह आधार पंजीकरण से पहले देश में 182 दिन रहने का पहचान प्रदान करता है। कोई बुरुंडी, टिंबकटू, सूडान, चीन, तिब्बत, पाकिस्तान, होनोलूलू या अन्य देश का नागरिक भी इसे बनवा सकता है। नागरिकों के अधिकार को उनके बराबर करना और इसे बाध्यकारी बनाकर और इस्तेमाल करके उन्हें मूलभूत अधिकारों से वंचित करना तर्कसंगत और न्यायसंगत नहीं है। आधार परियोजना आपातकाल के दौर के संजय गांधी की बाध्यकारी परिवार नियोजन की याद दिलाता है। इसका खामियाजा संजय गांधी और कांग्रेस पार्टी को भोगना पड़ा था। आधार परियोजना के पैरोकार भी उनके रास्ते ही चल रहे हैं।           

आंकड़ों और डिजिटल तकनीक के गठजोड़ से बढ़ सकती है गैरबराबरी और गरीबी

धन की परिभाषा में देश के आंकड़े, निजी संवेदनशील सूचना और डिजिटल सूचना शामिल है। भारत सरकार की बॉयोमेट्रिक्स समिति की रिपोर्ट बॉयोमेट्रिक्स डिजाइन स्टैंडर्ड फॉर यूआईडी एप्लिकेशंस की अनुशंसा में कहा है कि बॉयोमेट्रिक्स आंकड़े राष्ट्रीय संपत्ति हैं और उन्हें अपने मूल विशिष्ट लक्षण में संरक्षित रखना चाहिए। इलेक्ट्रॉनिक आंकड़े भी राष्ट्रीय संपत्ति हैं अन्यथा अमेरिका और उसके सहयोगी देश अंतरराष्ट्रीय व्यापार संगठन की वार्ता में मुफ्त में ऐसी सूचना पर अधिकार क्यों मांगते? कोई राष्ट्र या कंपनी या इन दोनों का कोई समूह अपनी राजनीतिक शक्ति का विस्तार आंकड़े को अपने वश में करके अन्य राष्ट्रों पर नियंत्रण कर सकता है। एक देश या एक कंपनी किसी अन्य देश के संसाधनों को अपने हित में शोषण कर सकता है। आंकड़ों के गणितीय मॉडल और डिजिटल तकनीक के गठजोड़ से गैरबराबरी और गरीबी बढ़ सकती है और लोकतंत्र खतरे में पड़ सकता है। संवेदनशील सूचना के कंप्यूटिंग क्लाउड क्षेत्र में उपलब्ध होने से देशवासियों, देश की संप्रभुता व सुरक्षा पर खतरा बढ़ गया है| किसी भी डिजिटल पहल के द्वारा अपने भौगोलिक क्षेत्र के लोगों पर किसी दूसरे भौगोलिक क्षेत्र के तत्वों द्वारा उपनिवेश स्थापित करने देना और यह कहना कि यह अच्छा काम है, देश हित में नहीं हो सकता है। उपनिवेशवाद के प्रवर्तकों की तरह ही साइबरवाद व डिजिटल इंडिया के पैरोकार खुद को मसीहा के तौर पर पेश कर रहे हैं और बराबरी, लोकतंत्र एवं मूलभूत अधिकार के जुमलों का  मंत्रोच्चारण कर रहे हैं| ऐसा करके वे अपने मुनाफे के मूल मकसद को छुपा रहे हैं।    

दूसरे कई देशों ने आधार जैसी परियोजनाओं पर जो कदम उठाए उनके अनुभवों को दरकिनार करके आधार पर चार जजों का यह फैसला अधूरा प्रतीत होता है। इसने आकड़ों के राष्ट्रवाद की विचारधारा को नकार दिया है। इस विचारधारा के तहत यूरोप में जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन के अलावा अमेरिका, चीन, आस्ट्रेलिया जैसे देशों में इस तरह की परियोजनाओं को रोक दिया गया है। अब तो यह स्पष्ट है कि आधार परियोजना और आधार कानून राष्ट्रवाद का लिटमस टेस्ट बन गया है।

(कॉपी सम्पादन : अशोक झा/एफपी डेस्क)


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