महिषासुर एक जननायक

प्रमोद रंजन द्वारा संपादित यह किताब देश के विभिन्न हिस्सों में बहुजन परंपराओं और वर्चस्ववादी द्विज संस्कृति को मिल रही चुनौतियों पर केंद्रित लेखों का संग्रह है। विभिन्न पुस्तक विक्रेताओं और ई-कामर्स वेबसाइटों पर उपलब्ध। विशेष छूट! शीघ्र आर्डर करें

जब बचपन में मैं रामायण और महिषाासुर मर्दिनी दुर्गा के बारे में सुनता था, तब अजीब लगता था। अजीब लगने की वजह यह थी कि महिषासुर और उसकी वेशभूषा बिल्कुल हम लोगों के जैसी थी। वह हमारी तरह ही जंगलों में रहता था, गायें चराता था, शिकार करता था। फिर एक सवाल, जो मुझे परेशान करता था, वह यह कि आखिर देवताओं को हम असुरों के साथ युद्ध क्यों लड़ना पड़ा होगा। फिर जब बड़ा हुआ तो सारी बात समझ आई कि यह सब अभिजात्य वर्ग की साजिश थी, हमारे जल, जंगल और जमीन अधिकार बनाने के लिए।

जब मुझे वर्ष 2005 में झारखंड का मुख्यमंत्री बनने का मौका पहली बार मिला, तब मैंने झारखंड में रहने वाले असुर जाति के लोगों के कल्याण के लिए एक विशेष सर्वे कराने की योजना बनाई थी। इस उद्देश्य यह था कि विलुप्त हो रही इस जाति को बचाया जा सके और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ा जा सके। वर्ष 2008 में दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने पर मैंने इस दिशा में एक ठोस नीति बनाने की पहल की, लेकिन ऐसा न हो सका।

बहरहाल, आज की युवा पीढ़ी अभिजात्यों द्वारा फैलाए गए अंधविश्वास की सच्चाई को समझे और नए समाज के निर्माण में योगदान दे। – शिबू सोरेन (इसी पुस्तक में)

ब्राह्मणवाद के विरुद्ध एक सांस्कृतिक विद्रोह- दुर्गा-महिषासुर के मिथक का एक पुनर्पाठ
ऐतिहासिक सच्चाई है कि ब्राह्मणवाद ने वर्चस्व के लिए इतिहास को मिथकीय, पौराणिक और अलौकिक पात्रों और चमात्कारिक काल्पनिक घटनाओं के जंजाल में कैद कर, समाज के आर्थिक-बौद्धिक विकास को जड़ बनाए रखा. ऐसा वह ज्ञान को निहित स्वार्थों की सीमाओं में परिभाषित कर, शिक्षा के माध्यम से उस पर एकाधिकार स्थापित कर सका. ज्ञान की ब्राह्मणवादी परिभाषा को सर्वमान्य बनाने के लिए जरूरी था ज्ञान की अन्य परिभाषाओं तथा प्रतीकों को नष्ट करना. गौर तलब है कि पुष्यमित्र शुंग द्वारा छल से आखिरी मौर्य सम्राट की हत्या कर मगध सम्राट बनने के साथ ही लोकायत की भौतिकवादी ज्ञान प्रणाली और बौद्ध ग्रंथों तथा संस्थानों-प्रतीकों को नष्ट करने की प्रायोजित शुरुआत हुई.(हस्तक्षेप डॉट कॉम पर प्रकाशित ईश मिश्रा की समीक्षा)

इतिहासकारों का दावा – महिषासुर के नाम पर है मैसूरु, वह राक्षस था पर उसमें भी थे अच्छे गुण
कई इतिहासकारों और किवदंतियों के मुताबिक कर्नाटक का मैसूरु शहर का नाम महिषासुर के नाम पर पड़ा। स्थानीय कथाओं के अनुसार राक्षस महिषासुर के नाम पर इस जगह का नाम मैसूर हुआ। महिषासुर को चामुंडेश्वरी देवी ने मारा था। मैसूरु नाम का मतलब महिषासुर की धरती भी होता है। यहां पर केवल एक पहाड़ी का नाम ही चामुंडेश्वरी देवी के नाम पर है। यहां के लोगों को भी महिषासुर के नाम पर शहर का नाम होने से कोई परेशानी नहीं है। मैसूरु की चामुंडेश्वरी पहाड़ी पर महिषासुर की मूर्ति भी लगी हुई है। (जनसत्ता में प्रकाशित)

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फारवर्ड प्रेस में ‘महिषासुर एक जननायक

छत्‍तीसगढ में बवाल, महिषासुर पर किताब हॉट पिक
https://www.forwardpress.in/2016/10/chattishgdh-me-mahishasura/

महिषासुर : पुनर्पाठ की जरूरत
https://www.forwardpress.in/2014/02/mahishasur-purpath-ki-jarurat/

 

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