महिषासुर : पुनर्पाठ की जरूरत

पुस्तिका में प्रेमकुमार मणि, अश्विनी कुमार पंकज, इंडिया टुडे (हिंदी) के प्रबंध संपादक दिलीप मंडल समेत सात प्रमुख लेखकों, पत्रकारों व शोधार्थियों के लेख हैं, जिनमें से अधिकांश फारवर्ड प्रेस पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं

बलिजन कल्चरल मूवमेंट द्वारा प्रकाशित पुस्तिका ‘किसकी पूजा कर रहे है बहुजन? महिषासुर : एक पुनर्पाठ’ मेरे सामने है। तकरीबन चालीस पृष्ठों की इस सामग्री को मैंने लगभग दो घंटे में पढ़ लिया। मगर इस छोटे से अंतराल ने मेरे भीतर जमे अनगिनत टीलों को दरका दिया है। फारवर्ड प्रेस के सलाहकार संपादक प्रमोद रंजन द्वारा संपादित इस पुस्तिका को 17 अक्टूबर, 2013 को दिल्ली के जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में ‘बैकवर्ड स्टूडेंट्स फोरम’ द्वारा आयोजित ‘महिषासुर शहादत दिवस’ पर जारी किया गया था। पुस्तिका में प्रेमकुमार मणि, अश्विनी कुमार पंकज, इंडिया टुडे (हिंदी) के प्रबंध संपादक दिलीप मंडल समेत सात प्रमुख लेखकों, पत्रकारों व शोधार्थियों  के लेख हैं, जिनमें से अधिकांश फारवर्ड प्रेस पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं। दरअसल, इस पत्रिका में प्रकाशित लेखों के माध्यम से ही यह विमर्श हिंदी पट्टी में चर्चा में आया।

जिस दिन मैंने इस पुस्तिका को पढ़ा, उसी दिन शाम को टीवी के एक चैनल पर दिल दहला देने वाली खबर थी। उत्तरी कोरिया के तानाशाह किम जोंग ऊन ने अपने फूफा और उसके छह साथियों को तीन दिन से भूखे रखे गए एक सौ बीस शिकारी कुत्तों को परोस दिया। तकरीबन एक घंटे में इन कुत्तों ने उनके शरीर को फाड़कर चट कर डाला। इस विशाल पिंजरे के चारों ओर की बालकनियों में खड़े दर्शक इस दौरान तालियां बजाते रहे। उनमें खुद किम जोंग ऊन भी मौजूद था। ऐसा ही दृश्य सद्दाम हुसैन को अमेरिका द्वारा फांसी दिए जाने का था। इन विजेताओं ने मारे जाने वालों को बर्बर, क्रूर व अमानवीय घोषित किया था। यह हारे हुए लोगों के प्रति विजेता का न्याय  था।

यही कुछ महिषासुर के साथ किया गया था। सदियों से उसकी ऐसी अमानवीय छवियां गढी गई हैं, जो उस शासक की हत्या को जायज ठहराने का काम करती रही हैं। आर्यों (सुरापान करने वाले और पालतू पशुओं को अपने यज्ञों के नाम पर वध करके उनके मांस को खा जाने वाले सुरों) ने खुद को देवता घोषित कर दिया और बंग प्रदेश के मूल निवासियों को असुर। महिषासुर इन्हीं असुरों (अनार्यों) का बलशाली और न्यायप्रिय राजा था। आर्य इन अनार्यों के जंगल, जमीन की भूसंपदा और वनस्पति को लूटने और अनार्यों के दुधारु जानवरों को हवन में आहुत कर देने के लिए कुख्यात थे। महिषासुर और उनकी अनार्य प्रजा ने अनार्यों के इन कुकर्मों को रोकने के लिए इंद्र की सेना को इतनी बार परास्त कर डाला कि उसकी रीढ़ ही ध्वस्त हो गई। ऐसे में इंद्र ने विष्णु से हस्तक्षेप करवाकर एक रुपसी दुर्गा को महिषासुर को मार डालने का जिम्मा सौंपा।

इन विजेताओं ने दुर्गा के लिए पशुबलि का प्रावधान रखा है। तर्क दिया जाता है कि यह पशुबलि दुर्गा के वाहन शेर के लिए है। बाकी वे खुद को शाकाहारी घोषित करते हैं ताकि असुरों को मांसाहारी सिद्ध करने का तर्क उनके पास मौजूद रहे।

बहुत हद तक प्रस्तुत पुस्तिका में महिषासुर दुर्गा के इसी पुनर्पाठ की प्रस्तुति है, मगर इस पर अधिक व्यापक शोध की जरूरत है, जिसके चलते बहुत से छिपे सत्य उद्घाटित होने की संभावना बनती है, जिन्हें नकारा जाना आज के आर्यपुत्रों के लिए मुमकिन नहीं रहेगा।

फिलहाल मैं धर्मग्रंथों की बिक्री की एक दुकान से ‘दुर्गा सप्तशती’ नामक पुस्तक लाया हूं। यह रणधीर बुक सेल्स (प्रकाशन) हरिद्वार से प्रकाशित है। इसमें मौजूद पाठ हालांकि सुरों के पक्ष में लिखा गया है, मगर यह महिषासुर वध के छल-छद्म और सुरों के चरित्र पर बहुत कुछ कह जाता है -‘प्राचीन काल मेें देवी-देवताओं तथा दैत्यों में पूरे सौ बरस युद्ध होता रहा। उस समय दैत्यों का स्वामी महिषासुर और देवताओं का राजा इंद्र था। उस संग्राम में देवताओं की सेना दैत्यों से हार गई। तब सभी देवताओं को जीतकर महिषासुर इंद्र बन बैठा। हारकर सभी देवता ब्रह्माजी को अग्रणी बनाकर वहां गए जहां विष्णु और शंकर विराज रहे थे। वहां पर देवताओं ने महिषासुर के सभी उपद्रव एवं अपने पराभव का पूरा-पूरा वृत्तांत कह सुनाया। उन्होंने कहा, महिषासुर ने तो सूर्य, अग्नि, पवन, चंद्रमा, यम और वरुण और इसी प्रकार अन्य सभी देवताओं का अधिकार छीन लिया है। स्वयं ही सबका अधिष्ठाता बन बैठा है। उसने देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया है। महिषासुर महादुरात्मा है। देवता पृथ्वी पर मृत्यों की भांति विचर रहे हैं। उसके वध का कोई उपाय कीजिए। इस प्रकार मधुसूदन और महादेव जी ने देवताओं के वचन सुने, क्रोध से उनकी भौंहे तन गईं।’ इसके बाद उन्होंने दुर्गा को महिषासुर का वध करने को भेजा। जब युद्ध चल रहा थो तो ‘देवी जी ने अपने बाणों के समूह से महिषासुर के फेंके हुए पर्वतों को चूर-चूर कर दिया। तब सुरापान के मद के कारण लाल-लाल नेत्रवाली चण्डिका जी ने कुछ अस्त-व्यस्त शब्दों में कहा-हे मूढ़ ! जब तक कि मैं मधुपान कर लूं, तब तक तू भी क्षण भर के लिए गरज ले। मेरे द्वारा संग्रामभूमि में तेरा वध हो जाने पर तो शीघ्र ही देवता भी गरजने लगेंगे।’ इस धमकी के बावजूद उस दैत्य ने युद्ध करना नहीं छोड़ा। तब देवी जी ने अपनी तेज तलवार से उसका सिर काटकर नीचे गिरा दिया….देवता अत्यंत प्रसन्न हुए। दिव्य महर्षियों के साथ देवता लोगों ने स्तुतियां कीं। गंधर्व गायन करने लगे। अप्सराएं नाचने लगीं। बहरहाल, इस कथा में देवी का ‘सुरापान’ स्वयं अनेक अनुमानों को जन्म देता है।

उपरोक्त तथ्य कुछ ऐसे अंतर्निहित पाठों की सृष्टि करते हैं, जो महज एक छोटे से आलेख में नहीं निपटाए जा सकते। इसके लिए व्यापक शोध की जरूरत है। अगर इनके अर्थ संकेतों पर गौर किया जाए, तो असल में ये आज की भारतीय राजनीति का भी बहुत गंभीर पाठ प्रस्तुत करते हैं। इंद्र अगर प्रधानमंत्री था, तो ये विष्णु, शिव वगैरह  कौन हैं, जिनके सामने गंधर्व गाते हैं और अप्सराएं नाचती हैं। पिछड़ों, दलितों, महिलाओं व वंचित लोगों के इस व्यापक अर्थपाठ के बीच जो ये नक्सलवाद के नाम पर आदिवासियों को उनके जंगल, जमीन से हांका जा रहा है-इसके अध्ययन और पुनर्पाठ की प्रस्तुति से कितना कुछ सामने आएगा, यह कोई कल्पना से परे की चीज नहीं है। अब तो पश्चिम पार से आने वाले आर्यों को सेना की जरूरत भी नहीं है। उनकी पूंजी ही अनार्यों को खदेड़ देने के लिए काफी है और अपने देश के शासक उस पूंजी के गुलाम बने हैं ही।

फिलहाल, मेरी इच्छा है कि रणेन्द्र के चर्चित उपन्यास ‘ग्लोबल गांव के देवता’ मे वर्णित आदिवासियों, खासकर असुर जनजाति की त्रासदी को भी इन्हीं परिप्रेक्ष्यों में पढ़कर व्यापक शोध में शामिल करने कोई पिछड़ा-दलित विद्वान या विदुषी आगे आए। महिषासुर ललकार रहा है।

शीर्षक : किसकी पूजा कर रहे हैं बहुजन? (महिषासुर: एक पुनर्पाठ)

संपादक : प्रमोद रंजन

प्रकाशन : बलिजन कल्चरल मूवमेंट, पी-22,

साउथ एक्स-2, नयी दिल्ली-110049

फोन : 011-26250778

मूल्य – 30 रुपए

 

(फारवर्ड प्रेस के फरवरी, 2014 अंक में प्रकाशित)


महिषासुर से संबंधित विस्तृत जानकारी के लिए  ‘महिषासुर : एक जननायक’ शीर्षक किताब देखें। ‘द मार्जिनलाइज्ड प्रकाशनवर्धा/दिल्‍ली। मोबाइल  : 9968527911ऑनलाइन आर्डर करने के लिए यहाँ  जाएँ : महिषासुर : एक जननायकइस किताब का अंग्रेजी संस्करण भी ‘Mahishasur: A people’s Hero’ शीर्षक से उपलब्ध है।

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