अपनी खुद की पार्टी बनायें डिनोटिफाइड जनजातियों के लोग

डिनोटिफाइड समुदाय लम्बे समय से हाशिये पर रहा है। इसमें कोई दो राय नहीं कि उनके हिसाब से देखें तो अंग्रेजों की तुलना में आज़ाद भारत के शासक थोड़ा कम क्रूर भले रहे हों, लेकिन बेरूखी और उपेक्षा अभी भी जारी है। स्थितियां ऐसी हैं कि डीएनटी समुदाय को संसद और विधानसभाओं में हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए एक पृथक पार्टी का बनानी चाहिए। पढ़ें, एम. सुब्बा राव का विश्लेषण :

डिनोटिफाइड यानी घुमन्तू/खानाबदोश और अर्द्धघुमन्तू जनजातियों की आबादी को मिला दें तो भारत में उनके 12 करोड़ वोट बनते हैं। यह एक अच्छी खासी संख्या है। विडम्बना है कि डिनोटिफाइड समुदायों का भारत के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग तरीकों से वर्गीकरण किया गया है। कहीं उन्हें अनुसूचित जाति कहा जाता है तो कहीं अनुसूचित जनजाति, तो कहीं अन्य पिछड़ा समुदाय तो कहीं अल्पसंख्यक। इन अलग-अलग श्रेणियों में शामिल डिनोटिफाइड समुदायों के सदस्य अपनी इस विशिष्ट पहचान के प्रति जागरूक नहीं दिखते और यहां तक कि कई चुने हुए डीएनटी नेता, जिनमें से कुछ पार्टियों के अगुआ हैं, वह भी ऐसे मुद्दों में उलझे हैं , जिनका डीएनटी समुदायों से कोई संबंध नहीं है।

एक नजर उन पार्टियों पर जिनका नेतृत्व डीएनटी समुदाय के हाथ में है :

सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी

सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) की  स्थापना वर्ष 2002 में ओमप्रकाश राजभर के नेतृत्व में हुई। इस पार्टी का गठन करने के पहले वह बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के सदस्य थे। सुभासपा ने वर्ष 2014 के आम चुनावों में 13 प्रत्याशियों को खड़ा किया था। उसके प्रत्याशियों को कुल मिला कर 1,18,947 वोट मिले। ( राष्टव्यापी वोट का यह 0.02 प्रतिशत था)

ओमप्रकाश राजभर

वर्ष 2014 के आम चुनावों के पहले, पार्टी ने ‘एकता मंच’ के निर्माण में पहल की थी। यह उत्तर प्रदेश की छोटी-छोटी पार्टियों का गठजोड़ था। ओमप्रकाश राजभर इस गठजोड़ के संयोजक बनाए गए। ओमप्रकाश, जो डीएनटी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं, उन्होंने दावा किया कि चुनावों में प्रत्याशियों की जीत में राजभरों के वोट निर्णायक साबित होंगे। आज की तारीख़ में उत्तर प्रदेश विधानसभा में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के चार विधायक हैं। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनावों में, भाजपा ने अपना दल (एस) और सुभासपा जैसे अपने सहयोगियों के साथ 325 सीटों पर जीत हासिल की। सुभासपा ने कुल आठ सीटों पर चुनाव लड़ा जिनमें से चार सीटों पर उसे जीत हासिल हुई।

जीतन राम मांझी

हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा

जीतन राम मांझी, जो 20 मई 2014 से 20 फरवरी 2015 तक बिहार के मुख्यमंत्राी रहे, वह हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा के नेता हैं। मांझी, जो खुद मुसहर समुदाय से आते हैं, इसके पहले नीतीश कुमार के कैबिनेट में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति कल्याण विभाग के मंत्री भी रह चुके हैं।

मांझी वर्ष 1980 में पहली बार बिहार विधान सभा के सदस्य रहे। तब से लेकर वह विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के साथ  मसलन भारतीय राष्टीय कांग्रेस (1980-1990), जनता दल (1990-1996), राष्टीय जनता दल (1996-2005) और जदयू (2005-2015) जुड़े रहे। बिहार के कई राज्य सरकारों में कई मुख्यमंत्रियों के मातहत वह मंत्राी भी रह चुके हैं। जैसे चंद्रशेखर सिंह, बिन्देश्वरी दुबे, सत्येन्द्र नारायण सिंह, जगन्नाथ मिश्रा, लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी। मांझी जिस समुदाय से ताल्लुक रखते हैं उस मुसहर जाति को डीएनटी की सूची में शामिल किया गया है, अलबत्ता वह बिहार की राजनीति का दलित चेहरा बने हैं।

आखिर डीएनटी समुदायों को मुख्यधारा की राजनीति में क्यों प्रवेश करना चाहिए?

कोई भी समुदाय चुनावी राजनीति से दूर नहीं रह सकता। डीएनटी समुदायों को हमेशा ही मुख्यधारा की राजनीति और सरकार से दूर रखा गया है। डीएनटी समुदायों का एक छोटा सा हिस्सा मध्यम वर्ग में शामिल हो सका है और उसने इस बात को पहचाना है कि किस तरह नीति निर्माताओं और बाकी समाज ने उसके साथ अन्याय किया है। पिछले तीन दशकों से यह समुदाय संवैधानिक पहचान, जीवनयापन, जीने के हालात और आवास को लेकर अपनी मांगें बुलन्द करता रहा है।

डीएनटी समुदाय के एक हिस्से की मानसिकता ‘लेने वाले’ तक सीमित है न कि ‘देने वाला या प्रदाता’ की। उन्हें लगता है कि उनकी वफादारी के बदले में सत्ता के ‘परोपकारी’ केन्द्र उन पर कृपा बरसाएंगे। उन्होंने कभी इस बात पर सोचा तक नहीं कि वह खुद सत्ता में आ सकते हैं और निर्णय प्रक्रिया में उनकी साझेदारी हो सकती है।

डीएनटी समुदायों की जिन्दगियों को प्रभावित करनेवाले तमाम कानून सीधे या अप्रत्यक्ष तौर पर दमनकारी नीतियों की हुकूमतों की विरासत मात्र हैं। इन्हीं नीतियों के तहत उन्हें प्राकृतिक संसाधनों से वंचित किया गया, उन्हें चोर कहा गया और संस्कृति, जीवनशैली और जीवनयापन के साथ घुली-मिली उनकी आध्यात्मिकता से दूर किया गया। डीएनटी समुदायों के मुददों के प्रति सरकारों ने हमेशा ही उपेक्षा का रूख अख्तियार किया है। जब जब चुनाव नजदीक आए हैं, तब डीएनटी समुदायों के मुददों की पड़ताल करने के लिए आयोगों के गठन की घोषणा की गयी है, मगर ऐसे आयोगों की सिफारिशों पर कभी अमल नहीं किया है।

जैसे कि रेणके आयोग की सिफारिशों पर मौजूदा सरकार का रूख कोई अलग नहीं है। हरीभाउ राठौड़, संसद के सदस्य रह चुके हैं, उन्होंने वर्ष 2008 में संसद में एक मसविदा पेश किया था। इसके जरिए भारतीय संविधान में संशोधन कर डीएनटी समुदायों को अनुसूचित जनजातियों में शामिल करने का प्रस्ताव रखा गया था, हालांकि बाकी पार्टी के नेताओं के दबाव में उन्होंने इस विधेयक को वापस लिया था।

इसी तरह आज भी डीएनटी समुदाय को अपने मुददों की तरफ ध्यानाकर्षित करने के लिए गैर डीएनटी सदस्यों की दया पर निर्भर रहना पड़ता है। फिर चाहे उसके लिए संविधान में संशोधन की जरूरत का मसला सामने आए या नए कानूनों या कार्यपालिका के आदेशों की जरूरत दिखे।  यही वजह है कि डीएनटी समुदायों का प्रतिनिधित्व कर सके, ऐसी किसी राजनीतिक पार्टी की आज आवश्यकता है। विचारधारा के स्तर पर मजबूत किसी डीएनटी नेता की आज जरूरत है जो डीएनटी समुदायों के सभी मुद्दों के प्रति जागरूक हो। ऐसा व्यक्ति किसी पार्टी नेतृत्व के सामने या उंची जातियों के हितों के सामने दब कर नहीं रहेगा। हालांकि ऐसे नेता के पास यह कुशलता भी होनी चाहिए कि वह अन्य समुदायों के समान विचारों वाली ताकतों के साथ हाथ मिला सके।

पसुमपोन मुथुरामालिंगा थेवर (30 अक्टूबर, 1908- 30 अक्तूबर, 1963)

संसाधनों को एकत्रित किए बिना और समाज के विभिन्न तबकों के वोटों को साथ में लाए बिना, डीएनटी समुदायों के लिए सत्ता में आना काफी कठिन होगा। इस सन्दर्भ में हम पसुमपोन मुथुरामालिंगा थेवर (30 अक्टूबर, 1908- 30 अक्टूबर, 1963) को याद कर सकते हैं, जो शायद पहले व्यक्ति थे जिन्होंने डीएनटी समुदायों के लिए स्वतंत्र राजनीतिक मोर्चा बनाने की दिशा में काम शुरू किया था। वह पहले कांग्रेस से जुड़े थे और बाद में फाॅरवर्ड ब्लाॅक में शामिल हुए थे। वह शायद उन गिने-चुने नेताओं में से थे जिन्होंने अन्याय पर टिके ‘आपराधिक जनजाति अधिनियम’ के खिलाफ लोगों को गोलबन्द किया था। इस अधिनियम के तहत घुमन्तू जातियों को ‘आदतन अपराधी’ कहा जाता था और उनके घुमने-फिरने पर पाबन्दी लगायी जाती थी। वर्ष 1949 में अंततः इस कानून को समाप्त किया गया।

डीएनटी समुदायों के बीच राजनीतिक आकांक्षा रखनेवालों को चाहिए कि वह जमीनी स्तर से काम शुरू करें। ग्रासरूट स्तर पर समुदाय का विश्वास हासिल करे, वार्ड और जिला स्तर पर नेताओं को प्रशिक्षित करने का काम करें। अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़ा वर्गों और डीएनटी और अल्पसंख्यक समुदायों की ढेर सारी छोटी-बड़ी पार्टियां आज सक्रिय हैं, जिन्हें एक मोर्चे के तहत साथ लाया जा सकता है।

(अनुवाद : सुभाष गताडे, कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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