मिथक-परंपराओं की पुनर्व्याख्या से इतिहास की खोज

ब्राह्मणवादी इतिहासबोध कालक्रम आधारित, तथ्यपरक न होकर मिथकपरक पौराणिक है, जो हकीकत को मिथकीय रहस्यों में ढंक देता है। स्थापित मान्यताओं को खंडित किए बिना नई मान्यताएं स्थापित नहीं की जा सकतीं। ईश मिश्र की समीक्षा :

‘महिषासुर : मिथक व परंपराएं’ प्रमोद रंजन द्वारा संपादित एक महत्वपूर्ण किताब है। यह किताब दुर्गा-महिषासुर के मिथक का पुनर्पाठ और 2011 में जेएनयू में महिषासुर दिवस के आयोजन से शुरू विमर्श को एक नया मुकाम देती है। इसमें इस विमर्श के विविध आयामों को समेटने वाले लेख हैं। यहां यह जानना भी जरूरी है कि इसके पहले प्रमोद रंजन के ही संपादन में ‘महिषासुर : एक जननायक’ (2016) आयी थी।

‘महिषासुर : मिथक व परंपराएं’ किताब 6 खंडों में विभाजित है। इन विविध खंडों में अनेक जगहों की परंपरा-प्रतीकों; मिथक-उत्सवों के शोधपूर्ण अध्ययन-विश्लेषण पर आधारित लेखों का संकलन किया गया है। परिशिष्ट में महिषासुर दिवस से संबंधित तथ्य हैं। वैसे तो खंड 6 भी परिशिष्ट सा ही है। इसमें जोतीराव फुले की प्रार्थना से लेकर संजीव चंदन के नाटक ‘असुरप्रिया’ जैसी नई धारा की साहित्यिक रचनाएं हैं। प्रमोद रंजन के संपादन में आयी पहली पुस्तक ‘महिषासुर: एक जननायक’ की मेरे द्वारा की गई समीक्षा का उपशीर्षक था ‘ब्राह्मणवाद के विरुद्ध एक सांस्कृतिक विद्रोह, मौजूदा समीक्षार्थ पुस्तक में संकलित लेख तस्दीक करते हैं कि विद्रोह व्यापक सांस्कृतिक आंदोलन का रूप ले चुका है। पिछली पुस्तक की उपरोक्त समीक्षा में एक अफ्रीकी कहावत का हवाला दिया था, “जब तक शेरों के अपने इतिहासकार नहीं होंगे, इतिहास शिकारियों का ही महिमामंडन करता रहेगा”।

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