संविधान में हो हमारी पहचान, मिले हम धुमंतूओं को अधिकार : एम. सुब्बा राव

अब केवल बात से कोई काम नहीं होगा न! हमें रिप्रेजेंटेशन चाहिए। दलितों का रिप्रजेंटेशन है। एसटी का भी और ओबीसी का भी है। लेकिन, हम इन तीनों में से कोई नहीं हैं। हम हिंदू नहीं हैं। हम डीएनटी हैं। हमें न तो एससी के हिस्से का लाभ चाहिए, न एसटी समुदाय के हिस्से का और न ही ओबीसी वर्ग का। पढ़ें, विमुक्त, घुमंतू और अर्द्ध-घुमंतू जनजातियों के लिए प्रतिबद्ध सामाजिक कार्यकर्ता एम. सुब्बा राव से विस्तृत बातचीत :

30 जून 2008 को बालकृष्ण रेणके कमीशन ने अपनी रिपोर्ट तत्कालीन केंद्र सरकार को सौंपी थी। अपनी रिपोर्ट की प्रस्तावना में इस कमीशन ने लिखा : “भारतीय संविधान में आर्थिक और सामाजिक  गैर-बराबरी दूर हो, इस लक्ष्य को हासिल करने के तमाम उपाय किए गए हैं। इसके तहत ऐतिहासिक रूप से शोषित और वंचित तबकों के लोगों को अलग-अलग वर्गों जैसे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल किया गया। इनमें शामिल सभी को कुछ निश्चित विशेषाधिकार दिए गए ताकि वे सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन की स्थिति से उबर सकें। इस वर्गीकरण में वे समुदाय जो पहले विमुक्त, घुमंतू, अर्द्ध-घुमंतू जनजातियां थीं, उन्हें भी अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग की सूचियों में शामिल किया गया। यह वर्गीकरण न तो तार्किक था और न ही समरूप। अभी भी बहुत सारे विमुक्त, घुमंतू और अर्द्ध-घुमंतू जनजातियां हैं जो इनमें कहीं नहीं हैं। उन्हें सामान्य वर्ग में रखा गया है। ये समुदाय लंबे समय से हाशिये पर रखे गये हैं। ऐतिहासिक साक्ष्य हैं कि पहले उन्हें औपनिवेशिक शासनकाल में वंचित रखा गया और आजाद भारत में भी।”

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