द्विज-उन्माद का एकमात्र जवाब आंबेडकरवाद

डॉ. आंबेडकर के महापरिनिर्वाण दिवस पर दिल्ली से सटे गाजियाबाद में आंबेडकर में ही संविधान के खतरों का निदान विषय पर आयोजित परिचर्चा का सार यही रहा कि आंबेडकर के सिद्धांतों पर चलकर ही संविधान पर आए संकट को खत्म किया जा सकता है। फारवर्ड प्रेस की रिपोर्ट :

फारवर्ड प्रेस की किताब ‘जाति का विनाश’ सहित दो किताबों का हुआ विमोचन

डॉ. आंबेडकर (14 अप्रैल 1891 – 6 दिसंबर 1956) के महापरिनिर्वाण दिवस 6 दिसम्बर पर डा आंबेडकर पार्क, माता कॉलोनी, विजयनगर, गाजियाबाद में श्रद्धांजलि सभा के साथ-साथ ‘संविधान पर खतरों का आंबेडकरवाद में निदान’ विषय पर विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत बुद्ध वंदना से हुई।

विचार गोष्ठी के दौरान अधिकांश वक्ताओं ने कहा कि आज जिस दौर से देश गुजर रहा है और संविधान के समक्ष खतरे की बातें सामने आ रही हैं, उसमें एकमात्र रास्ता यही बचा है कि आंबेडकरवाद के सहारे संविधान की रक्षा की जाए। माना गया कि समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व का ख्याल रखते हुए मानवतावादी सिद्धांतों के अनुरूप संविधान का निर्माण कराया था। यह भी कहा गया कि संविधान लागू होने से अभी वर्तमान समय तक डा आंबेडकर के सपनों का भारत तो नहीं बन पाया लेकिन भारत का सर्वोत्तम जनहितैषी के रूप में अपनी साख स्थापित करने में संविधान जरूर सफल रहा है। उसी कड़ी में संविधान पर खतरों का आंबेडकरवाद में निदान विषय पर आयोजित इस गोष्ठी में प्रो. सतीश प्रकाश (मेरठ), एडवोकेट रामेश्वर दत्त, डाॅ. सिद्धार्थ (हिंदी-संपादक, फारवर्ड प्रेस), कवि राजेंद्र सिंह, बौद्धाचार्य और लेखक रघुवीर सिंह, डाॅ. भीमराव आंबेडकर विचार मंच एवं जन्मोत्सव समिति, गाजियाबाद  के अध्यक्ष मदनपाल गौतम, नीरजा वर्मा, संदीप राव जी, कम्युनिस्ट विचारक हर्ष मेहता, डा. अखलाक, शकील सैफी, जमीर अहमद खां ( संपादक नेशनल रफ्तार), लोकतांत्रिक राष्ट्रवाद पत्रिका परिवार से रामेश्वर दयाल, महेंद्र बौद्ध और संपादक रामनिवास आदि ने भी अपने-अपने विचार रखे और सार में सभी वक्ताओं में इस बात पर सहमति रही कि आंबेडकरवाद में ही संविधान पर मंडरा रहे खतरों का निदान है।

कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं का किया गया स्वागत

विषमताओं के लिए ब्राह्मणवादी वर्चस्ववादी विचारधारा जिम्मेवार

इस मौके पर फारवर्ड प्रेस के संपादक (हिन्दी) डाॅ. सिद्धार्थ ने कहा कि मनुवादी विचारधारा संविधान पर विभिन्न रूपों में हमलावर है। अयोध्या में राम मंदिर को लेकर जो हायतौबा मचाया जा रहा है, उसकी काट बहुजनों का तीर्थस्थल भीमाकोरेगांव और आंबेडकरवाद है।

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लेखक संदीप रावजी ने कहा कि मनुवादी विचारधारा की सरकार के कारण किसान, मजदूर, युवा, महिलाओं के हितों पर कुठाराघात वाली नीतियों के कारण संविधान के समक्ष खतरा उत्पन्न हुआ है। जनहितैषी नीतियां नहीं होने के कारण व मानवीय हकों के नहीं मिलने के कारण अराजकता, भय व अविश्वास का वातावरण उत्पन्न हुआ है और ऐेसे में अच्छे भारत का कैसे निर्माण किया जा सकेगा। उन्होंने बाबरी मस्जिद विध्वंस घटना का जिक्र करते हुए कहा कि उसे ढहाया जाना, संविधान पर प्रहार है। कवि राजेंद्र सिंह ने कहा कि संविधान की रक्षा करना हम सबों का कर्तव्य है क्योंकि संविधान भारत की जनता की आकांक्षाओं और सपनों का आइना है, संरक्षक है।

इस मौके पर शकील सैफी, जमीर अहमद खां और डा. अखलाक ने कहा कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद से मुस्लिमों में भय उत्पन्न हो गया है। इन लोगों ने भी शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे मसलों के हल नहीं होने के लिए वर्चस्ववादी ब्राह्मणवाद को जिम्मेदार ठहराया और आंबेडकरवाद को निदान बताया।

आंबेडकर से जुड़ी दो किताबों का हुआ विमोचन

इस अवसर पर डॉ. आंबेडकर की दो महत्वपूर्ण किताबों जाति का विनाश (प्रकाशक- फारवर्ड प्रेस) और ‘वेटिंग फॉर वीजा’  (सावित्री बाई फूले प्रकाशन केंद्र) का विमोचन किया गया। पहली किताब ‘जाति का विनाश’ 1931 में डॉ. आंबेडकर द्वारा लिखी गई किताब ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ का मुकम्मल हिन्दी अनुवाद है। इस किताब की एक खासियत यह भी है कि इसमें 1916 में डॉ. आंबेडकर द्वारा कोलंबिया विश्वविद्यालय में दिए गए प्रथम शोध पत्र ‘भारत में जातियां : उनका तंत्र, उत्पत्ति और विकास’ का हिन्दी अनुवाद भी शामिल किया गया है। इस किताब का अनुवाद दिवंगत पत्रकार राजकिशोर ने किया है।

दूसरी किताब ‘वेटिंग फॉर वीजा’ है। यह किताब दरअसल डॉ. आंबेडकर की अपनी आत्मकथा है और इसे सभी दलित बहुजनों को अवश्य पढ़ना चाहिए ताकि वे यह जान सकें कि किन चुनौतियों का सामना करते हुए बाबा साहब ने संविधान में दलित बहुजनों के अधिकार को सुनिश्चित किया। इस किताब में बताया गया है कि देश के महान विद्वान विभूति को बड़ोदरा के महाराजा के यहां बेहतर नौकरी होते हुए भी भारत में जाति जहर के कारण किराए का मकान तो दूर होटल, सराय तक में आश्रय के लिए जगह नहीं मिल पाई थी जबकि वे ज्यादा दाम चुकाने के लिए वे तैयार थे। जाति का जहर न केवल हिन्दू बल्कि भारत के अन्य धर्मों और सम्प्रदायों में जड़ों तक व्याप्त है। डॉ. आंबेडकर ने सदियों से दासता की दंश झेल रहे बहुजन को संविधान के जरिए सभी को बराबरी का हक दिलाया था। इस किताब का अनुवाद कंवल भारती ने किया है।

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कार्यक्रम के संयोजक लखमीचंद ने इन किताबों के बारे में कहा कि यह किताब आज के दौर में बहुत प्रासंगिक है। आज पूरे देश में तमाम कानून होने के बावजूद दलितों और आदिवासियों पर अत्याचार जारी है। जातिगत दंभ खत्म होने का नाम नहीं ले रहा। समाज में खुद को सबसे ऊंचा मानने वाले आज भी उसी बंधन में जकड़े हैं, जिनके खात्मे की बात बाबा साहेब ने कही थी। अंत में कार्यक्रम के आयोजक डाॅ. भीमराव आंबेडकर विचार मंच एवं जन्मोत्सव समिति, गाजियाबाद के सलाहकार वीर सिंह ने विचार गोष्ठी में आए सभी वक्ताओं व श्रोताओं का धन्यवाद किया और साथ ही घोषणा की कि आने वाले समय में समय- समय पर इस तरह की विचारगोष्ठी का आयोजन किया जाता रहेगा ताकि लोग बाबा साहेब को करीब से समझ सकें और समाज के अंदर उन्नति, प्रगति व शांति का माहौल बना रह सके।

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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