h n

उपेंद्र कुशवाहा ने दिया इस्तीफा, बिहार में एनडीए दो फाड़

रालोसपा प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ने केंद्रीय मंत्रिपरिषद से इस्तीफा दे दिया है। कयास लगाया जा रहा था कि भाजपा कुशवाहा की मांग पर विचार करेगी और बिहार में उन्हें सम्मानजनक सीटें देने पर राजी हो जाएगी। परंतु, ऐसा नहीं हो सका

मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री व राष्ट्रीय लोकतांत्रिक समता पार्टी (रालोसपा) प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ने सोमवार को केंद्रीय मंत्रिपरिषद से इस्तीफा दे दिया। इसके साथ ही बिहार में नेशनल डेमोक्रेटिक एलायंस (एनडीए) दो फाड़ हो गया है। उन्होंने अपना इस्तीफा नई दिल्ली में एनडीए की होने वाली बैठक के ठीक पहले दिया। पहले यह कयास लगाया जा रहा था कि इस बैठक में भाजपा कुशवाहा की मांग पर विचार करेगी और बिहार में उन्हें सम्मानजनक सीटें देने पर राजी हो जाएगी।

कुशवाहा के इस्तीफा के संबंध में उनकी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव रामबिहारी सिंह ने फारवर्ड प्रेस से बातचीत में कहा कि उनके नेता ने अपना इस्तीफा सही समय पर दिया है। उन्होंने कहा, “आज देश और बिहार को सामाजिक न्याय की राजनीति की जरूरत है। हमारे नेता ने इस्तीफा देकर यह साबित कर दिया है कि हमारे लिए हमारे मुद्दे महत्वपूर्ण हैं, कुर्सी नहीं।”

रालोसपा प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा

यह पूछे जाने पर कि इस्तीफा देने की एक वजह यह तो नहीं कि एनडीए में सीटों के बंटवारे को लेकर रार चल रही थी, रामबिहारी सिंह ने कहा, “हमारे नेता ने सीटों के लिए इस्तीफा नहीं दिया है। उन्होंने व्यवस्थागत समस्याओं को दूर करने के लिए जो सवाल उठाए थे, उनके उपर ध्यान नहीं दिया जा रहा था। हमलोगों ने शिक्षा का सवाल उठाया। हमलोगों ने न्यायपालिका में कालेजियम सिस्टम को खत्म करने की मांग की। लेकिन हमारी मांगों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा था। ऐसे में हमारे लिए सरकार में बने रहने का कोई औचित्य नहीं था।”

रालोसपा के राष्ट्रीय महासचिव रामबिहारी सिंह

वहीं नीतीश कुमार के एनडीए में दुबारा वापसी के बाद बढ़े मनमुटाव के सवाल पर रालोसपा नेता ने कहा, “सच तो यह है कि नीतीश कुमार हमारे कारण घुटन महसूस कर रहे थे। हमलोग तो व्यवस्था में बदलाव की राजनीति करते हैं। हम पद के लिए राजनीति नहीं करते हैं। रही बात नीतीश कुमार के एनडीए में वापसी की तो उससे हमारी पार्टी, हमारे विचार और हमारे जनाधार पर कोई असर नहीं पड़ेगा।”

महागठबंधन में शामिल होने के सवाल पर रामबिहारी सिंह ने कहा, “राजनीति करने के लिए किसी गठबंधन की आवश्यकता नहीं होती है। गठबंधन की आवश्यकता चुनाव के समय होती है। जब चुनाव का समय आएगा तब देखा जाएगा। फिलहाल हमारा फोकस उन सवालों पर है जिसके लिए हम वर्षों से संघर्षरत रहे हैं। हम आपको बताना चाहते हैं कि आज बिहार में हमारी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी है। इसका आधार हमारा संगठन है। इसलिए किसी को किसी तरह के मुगालता में नहीं रहना चाहिए।”

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें 

 

बहुजन साहित्य की प्रस्तावना 

दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

महिषासुर एक जननायक’

महिषासुर : मिथक व परंपराए

जाति के प्रश्न पर कबी

चिंतन के जन सरोकार

लेखक के बारे में

एफपी डेस्‍क

संबंधित आलेख

यूजीसी रेगुलेशन : इन कारणों से जरूरी है दलित-बहुजनों की यह लड़ाई
विश्वविद्यालयों में बहुजन छात्रों के ख़िलाफ़ गहरे और व्यवस्थित भेदभाव का एक प्रमुख कारण यह है कि प्रशासन अक्सर उच्च जाति की लॉबी से...
यूजीसी रेगुलेशन : बिहार के चप्पे-चप्पे में दलित-बहुजनों का हल्ला बोल
सिवान जिले के प्रिंस पासवान कहते हैं कि मुट्ठी भर लोगों के विरोध से एक बड़ी आबादी को भेदभाव से सुरक्षा प्रदान करने वाले...
यूजीसी रेगुलेशन : सच्चाई से मुंह मोड़ रहे हैं इसके विरोधी
ऊंची जाति के विद्यार्थियों के साथ भेदभाव की इक्का-दुक्का घटनाएं हो सकती हैं, मगर एससी, एसटी और ओबीसी समुदायों को संरचनात्मक बहिष्करण का सामना...
इलाहाबाद विश्वविद्यालय को हुआ क्या है?
कल 3 फरवरी, 2026 को जो घटना हुई उसने विश्वविद्यालय में व्याप्त जातिवाद को स्पष्ट तौर पर उजागर कर दिया। दिशा छात्र संगठन के...
महाराष्ट्र नगरपालिका चुनाव परिणाम : विपक्ष के लिए फिर एक बार गंभीर सबक
ओबीसी समाज एकसमान नहीं है। वह अनेक जातियों का समूह है। इसलिए पूरे ओबीसी समाज का एक नेता बनना संभव नहीं। भाजपा-संघ ने पहले...