जब मैं आईएएस ऑफिसर बना : पी. एस. कृष्णन

भारत में नौकरशाही, समूल सामाजिक परिवर्तन की राह में बाधा नहीं बन सकती अगर राजनीतिज्ञ, विशेषकर वे जो सत्ता में हैं, क्रन्तिकारी सामाजिक परिवर्तन के पक्षधर और अन्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था को उखाड़ फेंकने के प्रति प्रतिबद्ध हों

आजादी के बाद का सामाजिक न्याय का इतिहास : पी.एस. कृष्णन की जुबानी, भाग – 5

(भारत सरकार के नौकरशाहों में जिन चंद लोगों ने अपने को वंचित समाज के हितों के लिए समर्पित कर दिया, उसमें पी.एस. कृष्णन  भी शामिल हैं। वे एक तरह से आजादी के बाद के सामाजिक न्याय के जीते-जागते दस्तावेज हैं। सेवानिवृति के बाद उन्होंने सामाजिक न्याय संबंधी अपने अनुभवों को डॉ. वासंती देवी के साथ साझा किया। वासंती देवी मनोनमानियम सुन्दरनर विश्वविद्यालय तमिलनाडु  की कुलपति रही हैं। संवाद की इस प्रक्रिया में एक विस्तृत किताब सामने आई, जो वस्तुत : आजादी के बाद के सामाजिक न्याय का इतिहास है। फॉरवर्ड प्रेस की इस किताब का हिंदी अनुवाद प्रकाशित करने की योजना है। हम किताब प्रकाशित करने से पहले इसके कुछ हिस्सों को सिलसिलेवार वेब पाठकों को उपलब्ध करा रहे हैं – संपादक )

वासंती देवी : जब आप सिविल सेवा परीक्षा उत्तीर्ण कर प्रशिक्षु के रूप में भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के सदस्य बने, तब आपके सपने और योजनाएं क्या थीं? क्या आपको ऐसा लगा कि आपके साथी प्रशिक्षणार्थी दमित वर्गों के साथ न्याय की आपकी सोच से किसी भी तरह का जुड़ाव महसूस करते थे? ऐसा कहा जाता है कि भारत की अन्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन लाने की राह में नौकरशाही सबसे बड़ा रोड़ा है। आपकी इस संबंध में क्या सोच है?

पी.एस. कृष्णन : मैं जब आईएएस में आया उस समय भी सामाजिक समानता के मुद्दे पर मेरे विचार एकदम स्पष्ट थे और मैं अछूत प्रथा और जाति प्रथा का आमूल विरोधी था। मैंने 1955 में आईएएस की परीक्षा दी थी। मैं यह परीक्षा देने काे तनिक भी इच्छुक नहीं था और ना ही मैंने इसकी तैयारी बहुत गंभीरतापूर्वक की थी। जब 24 जनवरी 1956 को मुझे यूपीएससी से साक्षात्कार का बुलावा आया तब मैं न गर्वित हुआ और न उल्लासित। बल्कि मैं अशांत और व्याकुल था। मैंने अपनी चिंताएं श्री बी. सुकुमार, जो मेरे घनिष्ठतम मित्रों में से एक हैं, से सांझा कीं। मुझे डर था कि साक्षात्कार देने जाने की मेरी यात्रा, मेरे आदर्शों की अंतिम यात्रा न बन जाए। इस आशंका ने मुझे इतना व्यथित कर दिया कि मैं फूट-फूटकर रोने लगा। मेरे जीवन में ऐसे बहुत कम मौके आए हैं जब मैं इतना व्याकुल और चिंतित था। मैंने 2 मई 1956 को दिल्ली के मेटकाफ हाऊस में स्थित आईएएस ट्रेनिंग स्कूल में अपना प्रशिक्षण प्रारंभ किया।

शुरूआत से ही मैं हर योजना और हर कानून को केवल इस दृष्टि से देखता था कि उसमें दलितों/अनुसूचित जातियों (एससी), आदिवासियों/अनुसूचित जनजातियों (एसटी) व सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों (एसईबीसी) के लिए क्या है, अथवा नहीं। अपने सेवाकाल में मैंने हर कार्यक्रम और योजना को इस तरह से लागू किया, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि उसमें एससी, एसटी व एसईबीसी को उनका वाजिब हक मिले। हमारे प्रशिक्षण के दूसरे महीने में हमें अध्ययन के लिए एक गांव में ले जाया गया। जो गांव चुना गया वह था हैदरपुर, जो दिल्ली के निकट बदली, अलीपुर ब्लाक में था। हम लोग एक महीने तक हर दिन उस गांव में जाते थे। दूसरे ही दिन से मैंने अपने को मेरे साथियों से अलग कर लिया और मैं हैदरपुर की एससी बस्ती में जा पहुंचा। मुझे याद है कि उस समय वहां के निवासी श्री ईश्वरदास को मैंने उनके छोटे से बच्चे को गोद में लिए हुए देखा। बच्चे के पूरे शरीर में खाज थी। मैंने ट्रेनिंग स्कूल के डाॅक्टर से परामर्श कर कुछ दवाएं खरीदी और बच्चे के पिता को दी। इस गांव की महीने भर तक चली यात्रा ने मुझे दिल्ली के आसपास रहने वाले एससी लोगों की स्थिति से परिचित करवाया। उनकी हालत उतनी ही खराब थी जितनी कि देश के अन्य हिस्सों में रहने वाले एससी की।

सामाजिक न्याय के लिए संघर्षरत योद्धा पी. एस. कृष्णन

हमें सोनीपत सामुदायिक विकासखंड (सीडी) में भी ले जाया गया। उस समय वह पंजाब का हिस्सा था। सन 1966 में राज्यों के भाषाई आधार पर पुनर्गठन के बाद, वह हरियाणा का भाग बना। इस पुनर्गठन के बाद हरियाणा राज्य अस्तित्व में आया। तत्कालीन पंजाब का कुछ हिस्सा, हिमाचल प्रदेश में शामिल कर दिया गया और पंजाब में केवल पंजाबी-भाषी क्षेत्र बचा। प्रखंड विकास अधिकारी (बीडीओ) बड़े उत्साह से हमें तत्समय प्रारंभ हुईं सामुदायिक विकास गतिविधियों के बारे में बताने लगे। जब वे कुछ देर बोल चुके तब मैंने उनसे एक सीधा-सा प्रश्न पुछाः ‘‘हरिजनों के लिए क्या किया जा रहा है?” उस समय एससी/दलितों के लिए हरिजन शब्द प्रचलित था। बीडीओ के मुंह से एक शब्द न फूटा। स्पष्टतः, सरकारी अधिकारियों के दिमागों और सरकार के योजनाओं में एससी के लिए कोई स्थान ही नहीं था। सोनीपत प्रखंड की अपनी यात्रा के दौरान हम लोग आसपास के कई गांवों में भी गए। उनमें से एक था थारू। हम थारू की दलित बस्ती में पहुंचे। बीडीओ की उपस्थिति में बस्ती के रहवासियों ने सामुदायिक विकास कार्यक्रम की तारीफों के पुल बांधने शुरू कर दिए परन्तु मैं यह देख पा रहा था कि वे मुखौटा पहने हुए हैं।  मैं तब तक वहां रुका रहा जब तक कि हमारे बैच के सभी अधिकारी वहां से चले नहीं गए। जब वहां ऐसा कोई व्यक्ति नहीं बचा जो दलितों को प्रभावित कर सकता था, तब मैंने उनसे बातचीत शुरू की। अब उनके स्वर बदले हुए थे। अपनी व्यथा का वर्णन करते हुए वे भावुक हो गए और उनमें से कुछ ने तीखी आवाज में कहा कि ‘‘हमें इस हालत में रखने से बेहतर यह है कि हमें गोली मार दी जाए”।

इसके एक लम्बे अरसे बाद, सन 1980 में, जब मैं गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव और एससी व बीसी विकास व कल्याण का प्रभारी था, मैं फिर थारु गया। अब वहां की दुनिया बदल चुकी थी। दलितों को निकटवर्ती सोनीपत में निर्माण के गैर-परंपरागत क्षेत्र में रोजगार उपलब्ध हो गया था और कुल मिलकर उनकी स्थिति पहले से बहुत बेहतर थी। यह देख कर मुझे लगा की एससी को निराशा से उबारना और उनमें आशा का संचार करना कितना आसान है।

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आईएएस अधिकारियों को उनके प्रशिक्षण काल में ही अलग-अलग राज्यों को आवंटित कर दिया जाता है। आईएएस, भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) और भारतीय वन सेवा (आईएफएस), अखिल भारतीय सेवाएं हैं। यूपीएससी द्वारा आयोजित सिविल सेवा परीक्षा, जिसके जरिये आईएएस व आईपीएस में भर्ती की जाती है, उसी के जरिये केंद्रीय सेवाओं जैसे भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस), भारतीय लेखा परीक्षा व लेखा सेवा (आईए एंड एएस) में भी भर्ती होती है। मेटकाफ हाउस में प्रशिक्षण के दौरान ही मुझे हैदराबाद कैडर आवंटित कर दिया गया। सिविल सेवा परीक्षा की मेरिट लिस्ट में मेरा जो स्थान था, उसके चलते मुझे मेरी पसंद का कोई भी राज्य मिल सकता था। आईएएस परीक्षा के आवेदनपत्र के एक कॉलम में उम्मीदवार को राज्य की अपनी पहली, दूसरी और तीसरी पसंद भरनी होती थी। यूपीएससी की चयन सूची में उम्मीदवार के स्थान और उसकी पसंद, दोनों को ध्यान में रखते हुए उसे राज्य आवंटित किया जाता था। मैंने उस कॉलम में ‘‘कोई भी राज्य” भरा था। मैंने जानबूझकर किसी राज्य को तरजीह नहीं दी। देश के सभी राज्य मुझे उतने ही प्यारे हैं।

मेरे साक्षात्कार के दौरान, इंटरव्यू बोर्ड ने भी मुझसे यह प्रश्न पूछा था कि मैंने किसी राज्य को प्राथमिकता क्यों नहीं दी। बहरहाल, मेरे बैच के तीन अन्य अधिकारियों सहित, मुझे हैदराबाद राज्य आवंटित किया गया। परन्तु जब मैं हैदराबाद पहुंचा, तब तक उसके तीन टुकड़े हो चुके थे और हम चार अधिकारियों को उन तीन राज्यों में बाँट दिया गया। हैदराबाद राज्य के हिस्से जिन राज्यों में मिलाये गए थे वे थे – बम्बई, जिसमें राज्य का मराठी-भाषी क्षेत्र मराठवाडा मिलाया गया था, कर्नाटक (तब मैसूर), जिसे कन्नड़-भाषी जिले स्थानांतरित किये गए थे और आंध्र प्रदेश, जिसका गठन हैदराबाद के तेलुगू-भाषी जिलों और तेलुगू-भाषी आंध्र राज्य को मिलकर बनाया गया था। आंध्र राज्य का गठन सन 1958 में मद्रास प्रेसीडेंसी से तेलुगू-भाषी जिलों को अलग कर दिया गया था।

मेरे एक बैचमेट, जो बम्बई राज्य के थे, और जिन्हें हैदराबाद आवंटित किया गया, ने मुझसे यह अनुरोध किया कि मैं बम्बई राज्य आवंटित किए जाने की मांग न करूं ताकि बम्बई, जिसमें अब पुराने हैदराबाद राज्य का मराठवाडा क्षेत्र शामिल था, उन्हें मिल सके। मैंने उन्हें साफ कह दिया कि मैं अपनी कोई पसंद नहीं दूंगा। मेरे एक अन्य बैचमेट, जो कर्नाटक के थे, को कर्नाटक राज्य आवंटित किया गया, जिसमें अब हैदराबाद-कर्नाटक (बेल्लारी, बीदर, गुलबर्गा, जिन्हें अब कलबुर्गी, रायचूर कहा जाता है) भी शामिल था। एक तीसरे बैचमेट, जो आंध्र के थे, को स्वमेव आंध्र प्रदेश आवंटित हो गया। बचा मैं तो मुझे पुराने हैदराबाद राज्य के टूटने से बना सबसे बड़ा राज्य – आंध्र प्रदेश, जिसमें तेलंगाना शामिल था, आवंटित किया गया।

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मेटकाफ हाउस में एक साल के प्रशिक्षण के बाद हमें उन राज्यों में भेज दिया गया, जो हमें आवंटित किये गए थे। राज्यों में हमें लगभग डेढ़ साल तक विभिन्न स्तरों पर मैदानी प्रशिक्षण लेना था। मैदानी प्रशिक्षण के पहले चरण के लिए मुझे पुराने हैदराबाद राज्य के मेदक जिले (जिसे हाल में तीन जिलों में बाँट दिया गया है) में भेजा गया। दूसरे चरण का प्रशिक्षण मुझे आंध्र क्षेत्र के अनंतपुर जिले में मिला। इसके पहले तक, हैदराबाद राज्य में जिला स्तर पर आईएएस अधिकारियों के प्रशिक्षण की कोई व्यवस्था नहीं थी। हैदराबाद सिविल सेवा के अधिकारियों का प्रशिक्षण, पड़ोसी राज्यों बम्बई, मद्रास और सेंट्रल प्रोविन्सस में होता था। प्रशिक्षण का कोई पूर्व निर्धारित कार्यक्रम न होने के कारण, मुझे यह समझने का मौका मिला कि प्रशासन, समाज के सबसे निचले पायदान के लोगों और सामाजिक समूहों को किस तरह प्रभावित करना है। उदाहरण के लिए, मुझे याद है कि मैं डिस्ट्रिक्ट सर्वे ऑफिसर श्री रशीद के साथ मेदक जिले के एक गाँव निजामपेट में गया था। वहां मडिगा समुदाय के लोग बड़ी संख्या में रहते हैं (मडिगा, तेलंगाना की सबसे बड़ी एससी जाति है और आंध्र प्रदेश की दो सबसे बड़ी एससी जातियों में से एक है, तमिलनाडु के अरुन्धतियर की तरह)।

अंग्रेजी किताब क्रूसेड फॉर सोशल जस्टिस की तस्वीर (जिसका हिंदी अनुवाद फॉरवर्ड प्रेस से शीघ्र प्रकाश्य)

मडिगाओं ने डिस्ट्रिक्ट सर्वे ऑफिसर के ध्यान में यह तथ्य लाया कि 200 एकड़ का जमीन का एक टुकड़ा, जिसे वे जोतते आ रहे थे, सरकार के नए भू-अभिलेखों में इस रूप में दर्ज नहीं था। हैदराबाद राज्य ने, देश के अन्य राज्यों की तुलना में, कहीं अधिक दूरगामी प्रभाव वाला भू-सुधार कानून बनाया था। यह एक तरह से तेलंगाना में उठ खड़े हुए शक्तिशाली कम्युनिस्ट आन्दोलन की प्रतिक्रिया थी। इस कानून में रिकॉर्ड ऑफ राइट्स (जमीन पर अधिकार का अभिलेख) का प्रावधान था। इस अभिलेख में मडिगाओं की जमीन का कोई जिक्र नहीं था। मैंने इस जानकारी को भविष्य में उपयोग के लिए अपने दिमाग में सहेज कर रख लिया और इसका इस्तेमाल करने का मौका मुझे 1959-60 में मिला जब मुझे दलितों और अन्य वंचित वर्गों के साथ मिलने-बैठने की सजा स्वरुप असिस्टेंट सेटलमेंट ऑफिसर के रूप में पदस्थ किया गया।

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मेरे बैच के एक या दो अधिकारी भी मेरी तरह, दमितों के साथ न्याय के हामी थे। उनमें से एक थे स्वर्गीय टी. बालाकृष्णन, जिन्हें पहले आन्ध्र आवंटित किया गया और बाद में हैदराबाद राज्य के तेलंगाना के जिलों और आंध्र को मिलाकर बनाया गया वृहत्तर आंध्र प्रदेश। वहां कुछ वर्ष काम करने के बाद, वे लम्बे समय तक विदेश में रहे। दो या तीन अन्य अधिकारी भी मेरे विचारों को पसंद करते थे। उनमें से एक थे एक प्रवासी बंगाली (अर्थात ऐसा बंगाली जो बंगाल के बाहर बस गया हो) श्री अरुण सेन, जो कि नागपुर से थे और जिन्हें पश्चिम बंगाल कैडर आवंटित किया गया था। एक अन्य थे डॉ. भूपिंदर सिंह, जो मूलतः पंजाब के थे परन्तु जिनका जन्म और पालन-पोषण मद्रास में हुआ था, जहाँ उनके पिता व्यवसायी थे। मेरे बैच के डॉ बी. डी. शर्मा ने प्रशिक्षण के दौरान तो इस दिशा में कोई विशेष रूचि नहीं दिखाई परन्तु जब वे मध्य प्रदेश के बस्तर जिले (जो अब मध्यप्रदेश से अलग कर सन 2000 में बनाये गए छत्तीसगढ़ राज्य का हिस्सा है) के कलेक्टर थे, तब उन्हें आदिवासियों के दमन को निकट से देखने का अवसर मिला। जिले के अधिकांश निवासी आदिवासी थे और वहां विभिन्न सरकारी परियोजनाओं में पदस्थ गैर-आदिवासी उनका जम कर शोषण और दमन करते थे। इसका उन पर गहरा प्रभाव पड़ा और उसके बाद से वे जीवनपर्यंत आदिवसियों के हितों के लिए संघर्षरत रहे। आदिवासियों की निष्ठापूर्वक सेवा करते हुए, सन 2015 में वे इस दुनिया से विदा हो गए। डॉ. भूपिंदर सिंह, जिन्हें उड़ीसा कैडर आवंटित हुआ था, भी आदिवासी-बहुल जिलों और आदिवासियों से जुड़े विभागों में अपनी पदस्थापना के दौरान, आदिवासियों की बदहाली से परिचित हुए और जीवन भर उनके लिए काम करते रहे।   

भारत में नौकरशाही, समूल सामाजिक परिवर्तन की राह में बाधा नहीं बन सकती अगर राजनीतिज्ञ, विशेषकर वे जो सत्ता में हैं, क्रन्तिकारी सामाजिक परिवर्तन के पक्षधर और अन्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था को उखाड़ फेंकने के प्रति प्रतिबद्ध हों। नौकरशाह, निम्न मध्यम वर्ग और उच्च मध्यम वर्ग से आते हैं। जहाँ दक्षिण भारत के अधिकांश आईएएस अधिकारियों की सामाजिक पृष्टभूमि निम्न मध्यम वर्ग की होती है, वहीं उत्तर भारत में वे मुख्यतः मध्यम-मध्यम और उच्च-मध्यम वर्गों से होते हैं। उनमें से अधिकांश के जीवन मूल्य, उनके आर्थिक वर्ग और उससे भी अधिक, उनकी जाति से निर्धारित होते हैं। परन्तु इसके कुछ अपवाद भी हैं, जिनमें मेरे बैच के वे अधिकारी शामिल हैं, जिनकी मैंने ऊपर चर्चा की है और 1957 के मेरे अगले बैच के श्री एस. आर. शंकरन भी, जिन्हें भी आंध्र प्रदेश कैडर आवंटित हुआ था।

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यह एक संयोग ही था कि मेटकाफ हाउस में श्री शंकरन को भी वही कमरा नंबर 2 मिला था, जिसमें मैं रहता था। उनके बारे में मुझे सबसे पहले श्री मुहम्मद अली से पता चला था, जो मेटकाफ हाउस में कक्ष परिचारक थे। वहां हर चार प्रशिक्षु आईएएस अधिकारियों को एक परिचारक मिलता था। वे एक गंभीर व्यक्ति थे और बहुत कम बोलते थे। मेरे जीवन में पहली बार मुझे मेरा काम करने के लिए कोई व्यक्ति मिला था और मुझे उनके प्रति एक विशेष जिम्मेदारी का एहसास होता था। मैं हर माह उन्हें उनके बच्चों की पढ़ाई के लिए कुछ रकम भेजता था। वे भी मुझे समय-समय पर पत्र लिखते थे और उन्हीं में से एक में उन्होंने मुझे श्री शंकरन के बारे में बताया था और लिखा था कि वे भी ‘मेरी तरह‘ एक अच्छे व्यक्ति हैं। श्री शंकरन के साथ मेरे संबंधों की चर्चा मैं आगे करूंगा।

मुझे ऐसा लगता है कि नौकरशाही के दृष्टिकोण में परिवर्तन ला उसे अन्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था को समाप्त करने का औजार बनाने के लिए निम्न साधन अपनाए जा सकते हैं।

  1. अगर राजनीतिक व्यवस्था इस मामले में ईमानदार हो।
  2. एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था का निर्माण हो जो सभी आयु वर्गों के विद्यार्थियों को यह एहसास दिलाए कि जिस व्यवस्था को हमने उत्तराधिकार में पाया है वह मूलतः अन्यायपूर्ण थी और है और यह भी कि यह व्यवस्था न केवल उसके पीड़ितों विशेषकर एससी, एसटी व एसईबीसी को त्रास देती है वरन् हमारे देश के लिए भी घातक है।
  3. इस पक्ष को अधिकारियों क प्रशिक्षण का भाग बनाना।

परंतु जब तक नहीं हो जाता तब तक भी हमारे पास यह मानने का कोई कारण नहीं है कि नौकरशाही यथास्थितिवादी है। आईएएस व उच्च सेवाओं में चयनित प्रत्येक व्यक्ति परिपक्व होता है और उसमें विचार करने और अपने आसपास की चीजों को महसूस करने की क्षमता होती है। इनमें से हर एक का यह उत्तरदायित्व है कि वह सामाजिक न्याय के आदर्श को अपनाए और उसकी स्थापना की दिशा में प्रयास करे फिर चाहे हमारी शैक्षणिक व्यवस्था, राजनैतिक प्रणाली और प्रशिक्षण की विषयवस्तु में चाहे जो कमियां हों। हमारा जीवन तभी अर्थपूर्ण होता है जब हमारे कुछ आदर्श और मिशन हों और हम अपने पेशेवर और सार्वजनिक जीवन में उन आदर्शों को हासिल करने और उस मिशन को पूरा करने की दिशा में काम करें। हमें हमारे व्यक्तिगत और पेशेवराना नैतिकता को सामाजिक नैतिकता, संवैधानिक नैतिकता और मानवतावादी नैतिकता से जोड़ना होगा। इससे हमारा व्यक्तित्व पूर्ण बनेगा। मेरी यह मान्यता है कि जो लोग आईएएस व अन्य उच्च सेवाओं में कार्यरत हैं उन्हें अपने जीवन और कार्य के प्रति इस तरह के दृष्टिकोण को अपनाना चाहिए। इससे न केवल उन्हें व्यक्तिगत रूप से शांति मिलेगी वरन् आईएएस और अन्य उच्च सेवाओं की प्रतिष्ठा में भी वृद्धि होगी और लोगों को ऐसा लगेगा कि अधिकारी सामाजिक और नैतिक दृष्टि से प्रासंगिक हैं।

(क्रमश: जारी)

(अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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